Monday, 6 January 2014

भारतीय रेल, भारतीय लोग! भाग – तीन (आप का नाम क्या है?)

आप का नाम क्या है?- एक भोली भाली बच्ची (लगभग तीन साल की) अपने बड़े पापा से पूछती है. बड़े पापा अपना नाम ख्याति बताते हैं. नहीं ख्याति तो मेरा नाम है आप तो बड़े पापा हो!
आज से हमने अपना नाम बदल लिया है मेरा नाम ख्याति है. आपका नाम ख्याति है तो मेरा नाम बड़े पापा है! ठीक है अब हम अपना कपड़ा भी बदल लेते हैं मेरा कपड़ा तुम पहन लो मैं तुम्हारा पहन लेता हूँ . आपको मेरा कपड़ा होगा क्या? यहाँ तक आयेगा अपने घुटने दिखलाती हुई बोलती है. तो क्या हुआ? हम वैसे ही पहन लेंगे. …फिर वे ख्याति को गुदगुदी करते हैं. ख्याति पूछती है- किसने गुदगुदी लगाई? बड़े पापा – मैंने तो नहीं लगाई.
मैंने आपको देखा है...
इतनी अच्छी हिंदी बोलने वाली तीन साल की बच्ची! मेरा मन मोह रही थी. कृष्णाराजपुरम रेलवे स्टेसन पर हम यशवंतपुर हटिया ट्रैन का इंतजार करते हुए टाइम पास कर रहे थे. ख्याति के माता पिता का वेटिंग लिस्ट था..हमारा कन्फर्म बर्थ था.
ट्रैन आयी और हम सभी अपने निर्धारित बर्थ पर स्थान ले चुके थे पर हमेशा की तरह बिना रिजर्वेशन वाले भी स्लीपर क्लास में चढ़ जाते हैं, महिला टी. टी. ई. उन सबको जनरल डब्बे में जाने को कह रही थी.
मेरे सामने की सीट पर एक लड़की बैठी थी. उसके पास एक मोटी सी पुस्तक थी. Oath of Vayuputras ( Triology of Shiva ) Part -3 author Amish Tripathi . मेरे पास पढ़ने योग्य कोई पुस्तक नहीं थी, इसलिए मैंने उस श्वेता नाम की लड़की से पुस्तक मांग ली, देखने के लिए. क्योंकि वह अभी नहीं पढ़ रही थी. थोडा पढ़ने के बाद ही उसका नाम पूछा - क्या नाम है तुम्हारा, बेबी! उसने अपना नाम श्वेता बताया. कहाँ तक जाओगी – हटिया तक . पिताजी का नाम ?- ए. के. उपाध्याय.
Oath of Vayuputras ( Triology of Shiva ) Part -3
uthor: Amish Tripathi
Publisher: Westland
Pages: 575
Price: Rs 350
What is evil? Why does it exist? How does one deal with it? These are questions that keep coming up in the first two books of The Shiva Trilogy. The third and final instalment of the series, The Oath Of The Vayuputras, offers some answers.
In The Immortals Of Meluha, Shiva, a tribal from Tibet, was invited to the kingdom of Meluha, ruled by the Suryavanshis who are at war with the ‘evil’ Chandravanshis and facing attacks by Naga terrorists. Meluhan citizens live long thanks to the Somras, a drink manufactured by Meluhan scientists. Shiva’s throat turns blue when he first drinks the Somras, giving rise to the belief that he is the Neelkanth, an incarnation of Lord Rudra. The book ends with Shiva helping the Meluhan king, Daksha, defeat the Chandravanshi king.
The Secret Of The Nagas suggested the notion of evil is more complicated than the Meluhans would have Shiva believe. The Chandravanshis, it turned out, also believe in the legend of the Neelkanth and while their way of life is not as orderly as the Meluhan’s, it isn’t evil. Something far more sinister is afoot — this is causing the river Saraswati to dry up, creating deformed babies and causing cancerous diseases.
While the first book was a runaway success, the second book received criticism for bad editing and sloppy writing. Philosophical discourses interfered with the arc of the story. Those chinks have been ironed out in The Oath… and while characters do slip into monologues about topics like life and the significance of human action, there’s enough richly detailed action to engage those reading the book purely for ploy. One scene where Sati, Shiva’s wife, fights a group of assassins is particularly well-told.
New characters are introduced in this book, including the Vayuputras, Lord Rudra’s tribe and those whose divinely assigned task is to help the next incarnation of Lord Rudra —Shiva — with his mission. It’s unclear why author Amish Tripathi imagined the Vayuputras to be from present-day Iran but as a result, the description of Zoroastrian mythological elements seems ornamental. Tripathi also mentions Hariyuappa in the book, (an obvious reference to Harappa) melding ancient history with mythology. Again, there doesn’t seem to be a good reason to do this.
Ultimately, different characters turn out to be weak, greedy, foolish, brave or principled. But Tripathi doesn’t tag them with value judgements like ‘evil’. Which leads to an end that is fitting, for ultimately, everyone has lost something.
Shiva is gathering his forces. He reaches the Naga capital, Panchavati, and Evil is finally revealed. The Neelkanth prepares for a holy war against his true enemy, a man whose name instils dread in the fiercest of warriors.
India convulses under the onslaught of a series of brutal battles. It’s a war for the very soul of the nation. Many will die. But Shiva must not fail, no matter what the cost. In his desperation, he reaches out to the ones who have never offered any help to him: the Vayuputras.
Will he succeed? And what will be the real cost of battling Evil? To India? And to Shiva’s soul?
Discover the answer to these mysteries in this concluding part of the bestselling Shiva Trilogy.
About the Author :
Amish is a 1974-born, IIM (Kolkata)-educated, boring banker turned happy author. The success of his debut book, The Immortals of Meluha (Book 1 of the Shiva Trilogy), encouraged him to give up a fourteen-yearold career in financial services to focus on writing. He is passionate about history, mythology and philosophy, finding beauty and meaning in all world religions.
Amish lives in Mumbai with his wife Preeti and son Neel.
ऊपर के भाग को मैंने गूगल से कॉपी कर यहाँ ज्यों का त्यों पेस्ट कर दिया है ताकि विद्वान लोग इसे मूल रूप में देख-समझ सकें.
मैंने बी.कॉम. में पढने वाली श्वेता से पूछा – इस पुस्तक को क्या तुम्हारे पिताजी ने पढ़ा या देखा है? उनकी क्या प्रतिक्रिया थी.
उनके अनुसार यह बकवास है हमारे धर्मशास्त्रों का विकृत रूप[ है. डिस्कवरी ऑफ़ इण्डिया में नेहरू ने भी भारत की प्राचीन संस्कृति को अपने नजरिये से देखा अब आज के नौजवान भी वही कर रहे हैं. तुम्हे इसमें कैसे इंटरेस्ट जगा ? असल में मैं इसका पहले दो भाग पढ़ चुकी हूँ इसलिए तीसरा भी ले लिया. मैं पढ़ती हूँ, इस तरह की पुस्तकें. जान कर अच्छा लगा आज के नौनिहाल भी हमारी हिन्दू संस्कृति में रूचि रखते हैं और पढ़ते हैं चाहे जिस रूप में . आमिष त्रिपाठी भी आईआईएम कोलकाता से पढ़ा युवक है, जिसने इस किताब के तीन भाग को लिखने और प्रकाशित करने का साहस किया है. प्रारम्भ में कोई प्रकाशक इसे छापने को तैयार नहीं था. बाद में इसके पहले भाग की लोकप्रियता के बाद इसका दूसरा और तीसरा भाग भी खूब बिका. पौराणिक आख्यानों को आज की भाषा में तार्किक रूप से पेश किया जाय तो आज के परिष्कृत वर्ग ज्यादा पसंद करते हैं,.ऐसा मुझे लगता है.
अब आगे का सफ़र… ट्रेन की पैंट्री का नाश्ता, खाना देने वाला व्यक्ति केवल हमारा बर्थ नम्बर कागज की प्लेट पर नोट कर रहा था. पैसे नहीं मांग रहा था. उस नौजवान का स्वभाव प्रभावित कर गया. हंसमुख, मजाकिया … दूसरे दिन मैंने कहा – “दोपहर का खाना नहीं खाऊंगा.” क्यों?” “आपलोग सब्जी में मसाला बहुत डालते हो”. “आज मसाला नहीं है, मैंने मना कर दिया है”. उसके ब्यवहार से मैंने पुन: खाने का आर्डर दे दिया.
राउरकेला स्टेसन आने से पहले इस नौजवान ने हमलोगों के कूपे का रुख किया और सारा हिशाब कर रुपये ले गया. यहाँ भी उसका मजाक जारी रहा, हम जो बोलेंगे आप दे देंगे? मेरी श्रीमती जी से नहीं रहा गया … उसने पूछ ही लिया -आपका नाम क्या है? आजाद (मोहम्मद आजाद खान) मैंने उसके ”यूनिफार्म” पर लिखा ‘नेम प्लेट’ पढ़ लिया.
उसी कोच में कुछ मुस्लिम धर्मावलम्बी भी थे, जिनकी पहचान उनकी टोपी दाढ़ी आदि से हो रही थी..मैंने उनलोगों को देखा – एक साथ नमाज पढते हुए. एक कूपे में एक साथ तीन… दो बर्थ पर और तीसरा नीचे. दो कूपे में कुल छह: सभी एक साथ खड़े होते, झुकते, बुदबुदाते..,…. क्या सामंजस्य था, उनमे….
रायगढ़ में ट्रैन कुछ ज्यादा देर के लिए रुक गयी, शुबह का समय सभी धूप का आनंद लेने, ट्रेन से बाहर निकल गए. मुस्लिम बंधुओं की जमात भी एक जगह इकट्ठे हो गए. बात चीत में मालूम हुआ वे लोग धर्म के प्रचार के लिए बैंगलोर गए थे. “अल्लाताला ने हम सबको इतना कुछ दिया है कि हम उन्हें जिंदगी भर शुक्रिया अदा नहीं कर सकते”. मुझे भी कबीरदास की पंक्ति याद आ गयी - “सात समुद को मसि करौ, लेखनी सब बनराई, धरती सब कागद कराऊँ हरी गुण लिखा न जाई”. उनलोगों में एक दो सज्जन हंसमुख अंदाज में प्रेम दर्शा रहे थे. उनमे एक अति उत्साही सज्जन से मैंने उनका नाम पूछ लिया – “आपका नाम क्या है”” मुहम्मद हयात” . हयात का मतलब ही ऐसी जिंदगी से है, इसमें सामाजिकता कूट कूट कर भरी हो.
कुल मिलकर कहा जाय तो इस सफ़र में हर प्रकार के लोगों से मिलना हुआ.
यह प्रसंग अधूरा रह जायेगा अगर किन्नरों की चर्चा न करें तो! जिस डब्बे में हम थे, उसमे कुछ नौजवान भी थे. किन्नरों का आना-जाना लगातार जारी था. वे युवकों पर ही ज्यादा प्यार बरसाते थे, .. “दे बाबा दे”,”दे रे चिकना!” दोनों हाथ से ताली का विशेष अंदाज..ज्यादातर युवक दस रुपये देकर छुटकारा पाना चाहते थे. पर कितनी बार देते. एक हो तब न? सौ पचास की संख्या में वे लोग होंगे और मांगना ही उनका पेशा है. मांगकर गुजारा करना. वे काफी सज धज कर नारी रूप में ही रहती हैं ताकि पुरुषों को आकर्षित कर सकें.
बगल की बर्थ पर बैठने की कोशिश की तो उस बर्थ की मालकिन ने आपत्ति दर्ज की … तुनकती हुई उठ गयी- “लो बाबा नहीं बैठती तुम्हारे सीट पर, मैं किन्नर न नर.. न नारी… विपदा की मारी,… मैं किसी का बुरा नहीं चाहती…. जो खुशी से देता उसे आशीर्वाद देती”. वे तीन मेरे बर्थ और और मेरी पत्नी की बर्थ पर बैठ गयी. मिले रुपयों का हिशाब किताब करने लगी. दोनों ने अपने सारे रुपये तीसरी (उनकी मेट) को दे दी. उनमे  से एक का तबीयत ख़राब था, इसलिए आँख बंद कर झपकी लेने लगी. .बाकी दो आपस में बात करती ही जा रही थी. उत्सुकतावश मैंने उनका रहने का ठिकाना पूछ लिया. “हमलोगों का कोई ठिकाना नहीं.. पहले, रायगढ़ में रहती थी,फिर बलांगीर में कुछ दिन रही, वहाँ से लोगों ने भगा दिया तो सम्बलपुर में आ गयी”.“आपलोग कुछ काम क्यों नहीं करतीं. इस तरह भीख मांगने के बजाय?” मेरा सवाल. “कौन काम देगा हमलोगों को .. सभी हमलोगों को दुत्कारते हैं. गोरमिंट भी कुछ नहीं करती. हमलोगों का इसी तरह गुजारा चल जाता है और क्या? हमें कोई बच्चा पालना है या घर बसाना है?” मैंने किन्नरों के बारे में जानना चाहा तो मालूम हुआ ये तो पुरातन काल से हैं. राम जब वन जा रहे थे, तो सभी अयोध्या वासी उनके साथ आ गए थे. भगवन राम ने कुछ दूर आकर सभी नर-नारियों से निवेदन किया – “आप सभी नर नारी अवधपुर लौट जायं”. भगवन राम के आदेशानुसार सभी नर नारी तो लौट गए पर किन्नर लोग वही रुक गए. जब भगवान राम चौदह वर्ष बनवास काटकर लौट रहे थे तो उन्होंने इन किन्नरों को उसी स्थान पर पाया. पूछने पर उन लोगों ने कहा – “आपने तो नर और नारी को अयोध्या लौटने को कहा था, पर हम लोग तो न नर हैं न नारी” भगवान राम ने उसी समय उनलोगों को वरदान दिया – “आप लोग जिसे भी मन से आशीर्वाद देंगे, वह फलीभूत होगा.और तब से ये लोग किसी भी बच्चे के जन्म के बाद बधाई गाने आते हैं.और कुछ दान स्वरुप रुपये पैसे पा जाते हैं….मुझे कुछ किन्नरों के समाचार याद आते हैं, जिन्होंने म्युनिस्पैलिटी के चुनाव जीते हैं और विधायक के लिए भी चुनाव लड़े हैं और जीते हैं. वही किन्नरों के दिल्ली में हुए एक सम्मलेन में हुई आगजनी में ३५ किन्नर जल मरे थे. ये भी विधाता की ही रचना हैं, इनका अपना ऐतिहासिक और पौराणिक गाथा भी है.कहते हैं इनका आशीर्वाद फलता है. पर अब इनका एक मात्र ब्यवसाय ट्रेनों में या भीड़ भाड़ के इलाकों में माँगना और उसी से निर्वाह करना इनका पेशा रह गया है. अगर ये लोग भी भारतीय नागरिक हैं, तो इनके अस्तित्व की रक्षा होनी चाहिए और इन्हे भी भीख मांगने के बजाय कुछ रचनात्मक काम करना चाहिए..कुछ करते भी हैं पर या तो वे खुद यौन शोषण के शिकार बनते हैं या फिर ये उसे ही अपना पेशा बना लेते हैं. सामजिक स्तरमें गिरावट लगतार जारी है. पर मैं इस लम्बी यात्रा के दास्तान को यहीं विराम दे रहा हूँ. हो सकता है कुछ और संस्मरण या रचना जन्म ले तबतक आप इसे पढ़ें बहुत लम्बा हो गया है…. उबाऊ भी लगेगा ..पर मैं अपना अनुभव साझा करना चाहता था. इसलिए लिखा और उम्मीद करता हूँ कि आप सबको बोर कर पाया हूँ.
जवाहर लाल सिंह

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