Wednesday, 29 January 2014

सृष्टि का श्रृंगार कैसा!

सृष्टि का श्रृंगार कैसा! भक्ति का ब्यवहार कैसा!
पेड़ से लिपटी लताएँ
देखती क्या कोई कंटक?
श्याम बादल घूमते ज्यों,
सकल मही या खाई पर्वत,
गिरि-शिखर निर्झर व नदियां,
स्वच्छ है जल धार कैसा!

सृष्टि का श्रृंगार कैसा! भक्ति का ब्यवहार कैसा!
मातृ लेती जब बलाएं,
शिशु का मुंह चूमती है
गाय की बछिया पुलक हो
थन से पय को चूसती है
जब यशोदा दूहती गौ,
कृष्ण देखें धार कैसा!

सृष्टि का श्रृंगार कैसा! भक्ति का ब्यवहार कैसा!
सूर ने क्या कृष्ण देखा,
तुलसी ने कब राम देखा,
मीरा को हम क्या कहेंगे,
नयन ने घनश्याम देखा,
गोपिकाओं के ह्रदय में
वीथि वन में प्यार कैसा!

सृष्टि का श्रृंगार कैसा! भक्ति का ब्यवहार कैसा!
सूर्य की रश्मि नवेली,
ओस की बूंदे अकेली
रजत आभा फूटती है
दूब से शोभित मही री.
पक्षी रव जब कूजते हैं
मुक्त नभ में हार जैसा!

सृष्टि का श्रृंगार कैसा! भक्ति का ब्यवहार कैसा!
उपवनों में जाके देखो,
भांति भांति पुष्प पेखो,
तितलियों की ये छटाएं ,
भ्रमर के भी रूप देखो,
चलती जब ठंढी हवाएं,
आ..हा..हा! बयार कैसा,

सृष्टि का श्रृंगार कैसा! भक्ति का ब्यवहार कैसा!
कृषक जन अपने फसल को
मुग्ध होकर देखते हैं,
फूल सरसो के सुहाते,
मटरफली भी सोहते हैं,
कृषक मन में भी पनपती
सस्य के संग प्यार कैसा!

सृष्टि का श्रृंगार कैसा! भक्ति का ब्यवहार कैसा!
शिल्पकारी की कलाएं
सबके मन को मोहती है,
मूल्य इसका क्या लगाएं
दर्शकों को जोहती है
कवि के दिल से पूछ देखो,
पंक्ति निज से प्यार कैसा !

सृष्टि का श्रृंगार कैसा! भक्ति का ब्यवहार कैसा!

- जवाहर लाल सिंह

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