Saturday, 22 April 2017

ऐसा भी एक किसान आन्दोलन!

वरिष्ठ पत्रकार और टी वी एंकर श्री रविश कुमार के शब्दों में- “लोकतंत्र की हम जब भी बात करते हैं, हमारा ध्यान राजनीतिक दल और उनके नेताओं की तरफ ही जाता है. स्वाभाविक भी है. लेकिन आप यह भी देख सकते हैं कि जब चुनाव समाप्त हो जाता है तो वो कौन लोग हैं जो आवाज़ उठाने का साहस करते हैं, सत्ता से सीधे टकराते हैं. राजनीति से निराश होते वक्त भी हम इनकी तरफ नहीं देखते. हो सकता है कि हमें ये लगता हो कि लाठी खाते शिक्षकों से हमारा क्या लेना देना, फीस वृद्धि की मार सहने वाले मां-बाप से हमारा क्या लेना, रोज़गार की मांग करने वालों से हमारा क्या. हालांकि आप इन सबमें होते हैं लेकिन देखने और सोचने की ट्रेनिंग ऐसी हो गई है कि पार्टी के बाहर आप किसी को नेता की तरह देखते ही नहीं हैं. हम सब यह मान चुके हैं कि लोकतंत्र के लिए संघर्ष राजनीतिक दलों के मुख्यालयों से ही होता है”. कुछ साल पहले जब रामलीला मैदान में दिन-रात सत्याग्रह चल रहा था तब नर्मदा नदी में कुछ किसान जल सत्याग्रह करने उतर गए. 213 लोगों ने 32 दिनों तक कमर भर पानी में खड़े होकर प्रदर्शन किया था. उनके पांव खराब हो गए थे. मीडिया और सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए आम लोगों को क्या-क्या करना पड़ रहा है. वे अपनी रचनात्मकता के ज़रिए इस लोकतंत्र को समृद्ध करते रहे हैं. कभी जीत जाते हैं, कभी हार भी जाते हैं.
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मार्च को तमिलनाडु से 134 किसान दिल्ली आए. तमिलनाडु में भयंकर सूखा है, 140 साल में ऐसा सूखा किसी ने नहीं देखा, मगर वहां के नेता सत्ता का खेल खेल रहे हैं. किसान मुआवज़े और कर्ज़ माफी की मांग को लेकर दिल्ली आए. मुश्किल से इनके बीच कोई हिन्दी बोलने वाला है. देखिए कि इन किसानों ने अपने प्रदर्शन को किस तरह से हर दिन एक नई ऊंचाई दी है. ये प्रदर्शनों की रचनात्मकता का दौर है. किसान नहीं ये असली कवि हैं.
स्टेशन से उतरते ही वहां छोटी मोटी सभा जैसी कर ली. सबको निर्देश दिया कि कहां जाना है, क्या करना है और फिर जंतर-मंतर के लिए चल दिए. जल्दी ही ये लोग हर दिन ख़ुद ही घटना बनने लगे. सबसे पहले खुद को अर्धनग्न किया. हाथ में कटोरा लिया और उस पर बेगर(begger) लिख दिया. आधे ढंके तन के साथ ये किसान कर्ज़ माफी की मांग करने लगे. इनके गले में नरमुंड की माला भी थी. इनका कहना था कि यह खोपड़ी उन किसानों की है जिन्होंने कर्ज़ से तंग आकर आत्महत्या कर ली है. 40 दिन से ये जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं. इन किसानों में 25 साल का नौजवान भी है और 75 साल के बुजुर्ग किसान भी.
दूसरे दिन दो किसान पेड़ पर चढ़ गए और फांसी लगाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने समय रहते इस घटना को रोक दिया. तीसरे दिन किसानों ने अपने कपड़े उतार दिए और पत्तों से शरीर को ढंक लिया. चौथे दिन पूरे शरीर को पेंट कर लिया. छठे दिन वे रुद्राक्ष की माला पहनकर प्रदर्शन करने लगे. सातवें, आठवें और नौंवे दिन इन्होंने कुछ अलग नहीं किया. जंतर मंतर पर ही प्रदर्शन करते रहे. 10 वें दिन सुप्रीम कोर्ट तक लंगोट में पदयात्रा की, 11 वें दिन जंतर मंतर पर कुत्ता बन गए और भौंककर प्रदर्शन करने लगे. 12 वें दिन एक किसान लाश बन गया, किसान लाश के आसपास बैठकर घंटा बजाने लगे, रोने लगे,लाश बने किसान की शवयात्रा भी निकाली. 13 वें दिन रो-रोकर प्रदर्शन करने लगे. 14 वें दिन दिल्ली रेलवे स्टेशन गए और वहां से चूहे पकड़कर ले आए. पटरियों पर दौड़ते चूहों को पकड़ना और उन्हें लेकर आना और फिर दांत से दबाना. तमाम मंत्रियों के दफ्तर भी गए, तमिलनाडु से मोदी सरकार में मंत्री भी आए, राहुल गांधी भी गए और बहुत से सामान्य लोग भी गए. इनका कहना है कि कुछ हो जाए, दिल्ली से लड़ाई जीतकर जाएंगे. इनका कहना है कि अगर सरकार ट्रेन में बिठा देगी तो चेन खींच देंगे, फिर भी उतरने नहीं देगी तो चलती ट्रेन से कूद जाएंगे. अब तो इन किसानों का कहना है कि वे पेशाब पीने जा रहे हैं.
उन्होंने जंतर मंतर पर एक नाटक भी खेला. इसमें प्रधानमंत्री को चाबुक मारते हुए दिखाया गया और किसान गांधी का मुखौटा पहनकर ज़मीन पर कोड़ा खाते रहे और मदद मांगते रहे. यह उनके प्रदर्शन का 15 वां दिन था. 16 वें दिन सांप का मांस खाया. 17 वें दिन काले कपड़े से सर और आंख को ढंक लिया. 18 वें दिन कटोरा लेकर भिखारी बन गए. 19 वें दिन आधा सर और आधी मूंछ मुंडवा ली. 21 वें दिन पूरी मूंछ साफ कर दी और 22 वें दिन सर के बल खड़े हो गए.
इस आंदोलन का नेतृत्व 70 साल के एक वकील कर रहे हैं. इनका कहना है कि ये पिछले साल भी दिल्ली आए थे. तमिलनाडु के किसानों की व्यथा बताई थी मगर किसी ने परवाह नहीं की. वे ज़रूर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं मगर तमिलनाडु की राजनीतिक गतिविधियों को देखकर नहीं लगता कि वहां के विधायकों या सरकार को किसानों की चिंता है.  24 वें दिन इन किसानों ने कपड़े से खुद को ढंक लिया. 25 वें दिन एक आदमी प्रधानमंत्री बन गया और किसान अपनी हथेली काटकर खून उनके चरणों में अर्पित करने लगा. 26 वें दिन भूख हड़ताल की. 27 वें दिन गले में फांसी डालकर प्रदर्शन करने लगे. 28 वें और 29 वें दिन इनका प्रदर्शन झकझोर देने वाला रहा. किसी ने कल्पना नहीं की थी कि प्रधानमंत्री कार्यालय में अपना ज्ञापन देकर लौटते वक्त ये निर्वस्त्र हो जाएंगे और प्रदर्शन करने लगेंगे.
जैसे-जैसे दिन गुजरा इन किसानों की ज़िद बढ़ती गई. चालीस हज़ार करोड़ की मदद राशि की मांग है इनकी. किसी भी सरकार के लिए मुश्किल है. केंद्र सरकार ने भी 2000 करोड़ से अधिक की मदद का एलान तो किया ही है मगर चालीस हज़ार करोड़ वह दे सकेगी, हम अंदाज़ा तो कर ही सकते हैं. 29 वें दिन इन्होंने जो किया वो और भी मुश्किल था. खुली सड़क पर चावल को चादर की तरह बिछा दिया. उस पर दाल डालकर खाने लगे. 30 वें दिन उन्होंने जिस शरीर को भाषा में बदला था, उसी की छाती और पीठ पर मांग लिख दी. 31 वें दिन की जानकारी नहीं है हमारे पास. 32 वें दिन इन किसानों ने साड़ी पहनकर प्रदर्शन किया. इन किसानों ने बताया कि एक किसान ने पत्नी का मंगलसूत्र गिरवी रखकर कर्ज़ लिया था. लोन नहीं चुका पाया तो साहूकार मंगलसूत्र ले गया. इस सीन को किसानों ने जंतर मंतर पर दोहराया. धागे के मंगल सूत्र पहनकर प्रदर्शन करने लगे.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राज्य के सहकारिता बैंकों से लिए गए 5,780 करोड़ के कर्ज़ वहां की सरकार ने माफ कर दिए हैं. हाईकोर्ट ने भी कहा है कि तमिलनाडु के किसानों का कर्ज़ माफ होना चाहिए. पिछले साल यहां 170 मिलीमीटर बारिश हुई जबकि औसतन 437 मिलीमीटर बारिश होती है. 80 फीसदी किसान, छोटे किसान हैं. 34 वें दिन किसान औरत बन गए, चूड़ी तोड़कर प्रदर्शन करने लगे. 37 वें दिन किसानों ने फटा हुआ कुर्ता पहन लिया.
हम कह सकते हैं कि किसानों के इन प्रदर्शनों में अतिवाद है, विचित्रता भी हैं, लेकिन यह भी तो देखिए कि आम किसान अपनी बात को लेकर कैसे लड़ रहा है. लड़ने के लिए किन-किन तरीकों को ईजाद कर रहा है. जंतर मंतर पर ही उनका घर बस गया है. मांग पूरी होने तक जाने वाले नहीं हैं इसलिए वहीं रात बिताते हैं, वहीं खाना बनाते हैं. आसपास से लोग मदद भी करने आ रहे हैं. कोई आर्थिक मदद कर रहा है तो कोई नैतिक मदद दे रहा है. लेकिन इनके प्रदर्शनों में कोई ज़ोर शोर से शामिल नहीं है. नेता मंत्री गए हैं मगर जाने की औपचारिकता दर्ज हो, उतने भर के लिए गए हैं. किसान चक्रव्यूह में फंसे हैं. ऐसा नहीं है कि सरकारें कुछ नहीं करती हैं लेकिन उनका करना काफी नहीं है. किसानों ने जो रचनात्मकता दिखाई है उससे उनकी बेचैनी समझ में आती है. कुछ लोग निंदा भी कर रहे होंगे कि इतना अतिवाद क्यों. कई बार करुणा दिखानी चाहिए. समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क्यों कोई मुंह में चूहा दबा रहा है, ज़मीन पर दाल-भात बिछाकर खा रहा है. वो क्या कहना चाहता है, क्या पाना चाहता है. ऐसी ही ज़िद और रचनात्मकता चाहिए किसानों को अपनी समस्या से निकलने के लिए. प्रदर्शन के लिए भी और खेती के तौर तरीके बदल देने के लिए भी.... इसमे मेरा कुछ भी नहीं है, मात्र संकलन है- ध्यानाकर्षण के लिए मात्र आप सबने जरूर देखा सुना होगा. इस देश का जय जवान! जय किसान! नारा भी सुना ही होगा .....

- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर 

Saturday, 15 April 2017

विश्वास के विश्वास को ठेस

आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्‍वास का तकरीबन 13 मिनट का वीडियो वायरल हो रहा है. उसमें उन्‍होंने राष्‍ट्रवाद के नाम पर देश के प्रधानमंत्री से लेकर दिल्‍ली में आप सरकार के कथित भ्रष्‍टाचार के मामले पर अरविंद केजरीवाल तक को घेरा है. हम भारत के लोग (we the nation) नामक इस वीडियो सोशल मीडिया पर छाने लगा है. इस वीडियो में अपनी बात शुरू कहते हुए भारतीय नागरिक की हैसियत से जनता से की गई अपील में कुमार विश्‍वास ने वीडियो की शुरुआत में ही सवालिया लहजे में कहा कि पिछले दिनों से एक वीडियो उनको बेचैन कर रहा है कि जम्‍मू-कश्‍मीर में हो रहे उपचुनाव को संपन्‍न कराने के लिए गए जवानों को वहां के शोहदे परेशान कर रहे हैं. वे जवान सशस्‍त्र हैं लेकिन उनके पैरों में तथाकथित कानून की बेडि़यां जकड़ी हैं...इस पर तंज कसते हुए कुमार विश्‍वास ने कहा कि ऐसा कैसे संभव है कि जिस पार्टी की सरकार केंद्र और राज्‍य दोनों जगहों पर हैं, वहां पर भारत मां के किसी जवान के साथ ऐसी हरकत हो रही है...उन्‍होंने श्रीनगर में महज छह फीसद मतदान पर भी सवाल करते हुए कहा कि इसके दो ही कारण दिखते हैं कि या तो लोगों को भय है या भरोसा नहीं है.
इसके साथ ही लोगों से भी सवालिया निशान करते हुए पूछा, ''क्‍या हम इस देश में कुछ देर के लिए अपनी-अपनी पार्टी और अपने-अपने नेताओं की चापलूसी और घेरे से बाहर आकर सोच सकते हैं...क्‍या हम यह सवाल कर सकते हैं कि राज्‍य और केंद्र में एक जैसी सरकार होने के बाद भी...सारी शक्ति होने के बाद भी एक लफंगा हिंदुस्‍तान के बेटे पर हाथ कैसे उठा देता है...हम अपने-अपने रहनुमाओं पर फिदा हैं...मोदी-मोदी, अरविंद-अरविंद, राहुल-राहुल...हमें पता नहीं हैं कि मोदी, अरविंद, राहुल, योगी सिर्फ 5, 10 या अधिक से अधिक 25 साल के लिए हैं लेकिन देश का इतिहास 5000 साल पुराना है...हमारे बाद भी हजारों वर्ष तक बना रहेगा...''
इसके साथ ही उन्‍होंने वीडियो में भ्रष्‍टाचार के मुद्दे पर अरविंद केजरीवाल सरकार को घेरते हुए कहा, ''अगर आप भ्रष्‍टाचार से मुक्ति के नाम पर सरकार बनाएंगे और फिर भ्रष्‍टाचार में अपने ही लोगों के लिप्‍त पाए जाने पर मौन रहेंगे तो लोग सवाल पूछेंगे ही...''
भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को पाकिस्‍तान में फांसी की सजा के मसले पर कुमार विश्‍वास ने कहा कि पाकिस्‍तान के भारत के एक बेटे को पकड़ लिया है और हम संसद और सड़क पर हंगामा कर रहे हैं. उन्‍होंने सवाल करते हुए कहा, ''हम अमेरिका से उम्‍मीद में हैं कि वह पाकिस्‍तान को आतंकवादी देश घोषित कर दे लेकिन क्‍या भारत ने उसे आतंकी देश घोषित कर दिया...''
इस विडियो में कुमार विश्वास ने दुष्यंत कुमार से लेकर कई जाने माने शायरों की शायरी भी प्रस्तुत की है और आवाम से प्रश्न किया है कि क्या हमारे अन्दर देश भक्ति का जज्बा बाकी है कि नहीं? अगर बाकी है तो क्यों न हम सब मिलकर लालकिले के बाद लाल चौक पर तिरंगा लहराएँ जो पाकिस्तान को भी भली-भांति दिखलाई दे. कश्मीरियों को भी विश्वास में लें और उसे अपना साथी बनायें. वे सेना के जवानों के दर्द की बात भी उठाते हैं और राष्ट्रवादी सरकार से उम्मीद करते हैं कि यथोचित कार्रवाई होनी चाहिए. वे अंत में अपने आपको आम नागरिक के साथ साथ एक छोटे से (कवि) चंदबरदाई भी कहना चाहते हैं और पृथ्वीराजों और चन्द्रगुप्तों को ललकारते हुए कहते हैं कि अब भी जागो और देश के नागरिकों में विश्वास पैदा करो.
पूरा विडियो से मुझे जो समझ में आया वह कुछ इस प्रकार है - कुमार विश्वास बहुत दुखी हैं, मायूस हैं. हाल के आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन पर वे आहत हैं. पंजाब में आंशिक सफलता, गोवा में भारी असफलता और अंत में राजौरी गार्डन की विफलता ने उन्हें झकझोर दिया है. केजरीवाल पर भी निशाना इसलिए साध रहे हैं कि केजरीवाल इधर निरंकुश होते जा रहे हैं शायद! कुमार विश्वास से भी सलाह मशविरा नहीं करते हैं जबकि वे आम आदमी पार्टी के संस्थापक और कार्यकारिणी समिति के सदस्य और संयोजक भी हैं. पार्टी के प्रदर्शन से वे नाखुश हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ी गयी अन्ना आन्दोलन की लड़ाई को कुंद होते देख विचलित हैं. यह भी सही है कि वे वर्तमान केंद्र सरकार के प्रतिद्वंद्वी हैं इसलिए भी वर्तमान भाजपा सरकार की कार्यशैली से नाराज है और बीच-बीच में खींच-तान करते रहते हैं, पर उसके विकल्प में उभरने वाली ‘आम आदमी पार्टी’ के प्रदर्शन पर भी संतुष्ट नहीं हैं.
केजरीवाल सीधा और खरा बोलते हैं, पर अपनी बात को सही साबित नहीं कर पाते. प्रधान मंत्री और उनके मंत्रियों पर आरोप तो लगाते रहते हैं पर अदालतों में साबित नहीं कर पाते. दिल्ली में चाहे वे जो कर रहे हों, पर सारी जनता को एक साथ खुश रखना संभव नहीं है शायद, इसीलिए उनका जनधार खिसक रहा है. उनके कार्यकर्ता भी जनता से दूर होते जा रहे हैं शायद! केंद्र सरकार और दिल्ली के उप राज्यपाल केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की जड़ खोदने में कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहते. ऐसे में जहाँ टीम भावना से काम होना चाहिए था वहीं केजरीवाल अपने ही टीम के लोगों के एक-एक कर बाहर करते जा रहे हैं. आम आदमी पार्टी से बाहर जानेवाला व्यक्ति आम आदमी पार्टी का दुश्मन बन जाता है और भाजपा कांग्रेस आदि पार्टियाँ उनका इस्तेमाल भी भली-भाँति करना जानती है. कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे की प्रतिद्वंद्वी है पर आम आदमी के खिलाफ दोनों एक हो जाती हैं. राजौरी गार्डन से भाजपा अपनी जीत से उतनी खुश नहीं थी जितनी कि आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार के जमानत जब्त होने से. कांग्रेस भी दूसरे नम्बर पर अपने को पाकर खुश हो रही थी और केजरीवाल की ही बुराई कर रही थी.
अब देखना यह है कि कुमार विश्वास के इस विडियो से केजरीवाल विश्वास के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हैं या अपनी टीम में सुधार का प्रयास करते हैं. विश्वास के खिलाफ कार्रवाई आत्मघाती कदम होगा केजरीवाल के लिए, पर विश्वास की बातों पर ध्यान देकर टीम में सुधार का हर संभव प्रयास करना ही हितकर होगा. दिल्ली में सरकार के सही काम-काज करने और पंजाब में सकारात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने में ही असली सफलता है. नकारात्मकता शायद लोगों को पसंद नहीं आती. अगर केजरीवाल ने सचमुच जनता के हित में काम किया है तो MCD में उन्हें सफलता मिलेगी अन्यथा जनता पर छोड़ दें. जनता क्या चाहती हैं, यह भी तो पता चले. EVM की शिकायत भी तभी उचित है जब कोई ठोस प्रमाण हो अन्यथा छीछालेदर करवाने से क्या फायदा ?
कुमार विश्वास को भी अपनी बात को अरविन्द और मनीष सिसोदिया से सीधा रखना चाहिए, क्योंकि वे उनके अच्छे मित्र भी हैं. कुमार विश्वास एक विद्वान कवि के साथ प्रखर वक्ता भी हैं. इनका साथ अरविन्द केजरीवाल को भूलकर भी नहीं छोड़नी चाहिए बल्कि इनकी बातों पर मनन करनी चाहिए. देश सबसे ऊपर है यह सभी जानते हैं. देश प्रेम का  जज्बा अभी अधिकांश लोगों में कायम है. देश है तो हम हैं. इसलिए देश सर्वोपरि होना भी चाहिए पर देश का मतलब भौगोलिक भूभाग नहीं हो सकता ... भूभाग के नागरिक मिलकर ही देश का निर्माण करते हैं. उम्मीद है हमारा देश जिसके कर्णधार मोदी जैसे नेता हैं अभी सही दिशा में जाने के प्रयास में है, यह कदम आगे बढ़ता रहना चाहिए. विपक्ष का काम है कि वह सही कदम में सकरात्मक सहयोग दे और गलत में विरोध करे. तभी होगी सच्चे लोकतंत्र की अवधारणा और सबका समुचित विकास! जय हिन्द! जय भारत!

-    जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर    

Saturday, 8 April 2017

पत्रकारिता के जज्बे को सलाम!

दर्शकों को रोज़ाना देश-दुनिया की खबरों से वाकिफ कराने वाली छत्तीसगढ़ के एक प्राइवेट न्यूज चैनल की 28 वर्षीय एंकर की जिंदगी में उस समय दुखों का पहाड़ टूट पड़ा जब उन्‍हें अपने पति की एक सड़क हादसे में दर्दनाक मौत की खबर मिली. उससे भी दुखद बात यह रही कि इस हादसे की ब्रेकिंग न्‍यूज खुद उन्‍हें ही पढ़नी पड़ी. एंकर के इस अदम्‍य साहस और कर्तव्‍यनिष्‍ठा की लोग भूरि-भूरि प्रशंसा कर रहे हैं और उनके साहस को सलाम कर रहे हैं. उनके साथ बीती इस दर्दनाक घटना को लेकर लोग दुख भी जता रहे हैं. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने भी सुप्रीत कौर के पति हर्षद गावड़े के निधन पर दुख जताया है.
उक्‍त मामला शनिवार की सुबह का है, जब प्राइवेट न्यूज चैनल IBC-24 पर लाइव न्यूज बुलेटिन के प्रसारण के दौरान न्यूज एंकर सुप्रीत कौर खबरें पढ़ रही थीं. इसी दौरान एक सड़क दुर्घटना की ब्रेकिंग न्यूज आई. एंकर सुप्रीत कौर को रिपोर्टर से बातचीत के दौरान ही अंदेशा हो गया कि इस हादसे में मरने वालों में उनके पति भी शामिल हैं. इस बेहद मुश्किल वक्त में भी सुप्रीत ने खुद को संभाले रखा और वे न्यूज बुलेटिन पढ़ती रहीं. सुप्रीत ने रिपोर्टर से बात करते हुए दर्शकों को हादसे की विस्तृत जानकारी भी दी.
दरअसल, राष्‍ट्रीय राजमार्ग- 353 पर लहरौद के पास एक ट्रक और रेनॉ डस्टर के बीच टक्‍कर हुई थी. इस हादसे में कार में सवार पांच से तीन लोगों की मौत हो गई. मृतकों में एंकर के पति भी शामिल थे. हादसे में घायल अन्‍य दो लोगों को उपचार के लिए पिथौरा स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया.
दर्शकों को हादसे की पूरी जानकारी मुहैया कराने के बाद भी सुप्रीत ने पूरा न्‍यूज बुलेटिन पढ़ा. इसके बाद वह स्टूडियो से बाहर आईं और फूट-फूटकर रोने लगीं और दुर्घटनास्थल के लिए रवाना हो गईं.
सुप्रीत के एक सहकर्मी ने कहा, 'सुप्रीत बहुत बहादुर हैं. पूरी टीम को उनके काम पर गर्व है, लेकिन आज जो हुआ उससे हम सब स्तब्ध हैं'. उनके एक और सहकर्मी ने जानकारी देते हुए बताया कि सुप्रीत को ब्रेकिंग न्‍यूज पढ़ते ही यह अंदेशा हो गया था कि यह दुर्घटना उनके पति के साथ हुई है. बुलेटिन खत्‍म करने के बाद उन्‍होंने स्टूडियो से बाहर निकलते ही अपने रिश्‍तेदारों को फोन मिलाने शुरू कर दिए थे.' उसने आगे बताया कि, हम सभी को उनके पति की मौत की खबर पहले ही मिल चुकी थी, लेकिन हममें से किसी की हिम्‍मत नहीं हुई कि उन्‍हें यह बता सकें.
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने ट्वीट कर सुप्रीत कौर के जज्बे को सलाम किया, जिन्होंने इस दुखद घड़ी में भी साहस के साथ अपना कर्तव्य निभाया. ट्विटर पर अन्‍य लोग भी अपनी प्रतिक्रिया में उनके साहस को सलाम कर रहे हैं और उनके पति की मृत्‍यु पर शोक जाहिर रहे हैं...
सुप्रीत पिछले 9 साल से इस चैनल में न्यूज एंकर के तौर पर कार्यरत हैं. वह मूल रूप से भिलाई की रहने वाली हैं. सालभर पहले ही उनकी शादी हर्षद गावडे़ से हुई थी.
पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव लिखते हैं, ''पत्रकारों को गाली देने वालों को इस महिला एंकर सुप्रीत कौर की कहानी से शायद कुछ सबक मिले, जिन्होंने पेशेवर ज़िम्मेदारी की मिसाल कायम करते हुए एक सड़क हादसे में अपने पति की मौत की खबर को भी अपनी भावनाओं पर काबू पाते हुए सहज ढंग से पढ़ा.''
रोहित ने फेसबुक पर लिखा, ''सुप्रीत कौर के जज़्बे को सलाम करते हैं. भगवान ऐसे वक्त में सुप्रीत को शक्ति दे.''
सुप्रीत कौर के अपने पेशे के प्रति जज्बे को जितनी प्रशंशा की जाय कम है!
सुप्रीत कौर के साथ जरा दूसरी महिला पत्रकारों की भी चर्चा कर लें.
अंजना ओम कश्यप जो वर्तमान में आजतक की एंकर हैं काफी बोल्ड और साहसी हैं. लाइव रिपोर्टिंग के साथ साथ भीड़ भाड़ पर नियंत्रण रखते हुए कई बार परेशानियों से गुजरती हैं पर हिम्मत नहीं हारती. उन्होंने महिला और पुरुष में भेदभाव की लड़ाई अपने घर से ही और बचपन से ही लड़ती आई है. इसका खुलाशा उन्होंने हाल ही में एक साक्षात्कार में बतलाया था. मनपसंद की खबर न बताने पर इन्हें सोसल मीडिया में भी कई बार अभद्रता का शिकार होना पड़ता है. ‘आजतक’ के ‘थर्ड डिग्री’ कार्यक्रम में भी काफी बोल्ड अंदाज में कड़े सवाल करती थीं. कश्मीर की बर्फबारी में भी इन्हें मैंने फ़िल्मी अंदाज में लाइव रिपोर्टिंग करते हुए देखा है. समाजवादी पार्टी की हार के बाद जब अंजना शिवपाल यादव के पास हाल चाल पूछने गयी थी तब शिवपाल यादव के भद्दे कमेन्ट को भी बखूबी बर्दाश्त कर गयी थी. अंजना आरा बिहार में जन्मी और रांची में पढ़ी-बढी है. इनके अलावा श्वेता सिंह तथा अन्य कई महिला रिपोर्टर आजतक चैनेल पर हैं जो हर क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाती हैं और दर्शकों के दिल में जगह बना पाती हैं. श्वेता सिंह का एक कार्यक्रम ईश्वर एक खोज बहुत ही लोकप्रिय हुआ है. यह भी पटना बिहार की हैं.  
NDTV छोड़ चुकी बरखा दत्त काफी चर्चित नाम है, जो कई बार विवादों में भी घिरी हैं पर रिपोर्टिंग और लाइव कवरेज का जज्बा काबिले तारीफ़ ही कही जायेगी. कारगिल युद्द के समय सैनिक बंकर से रिपोर्टिंग का साहसिक प्रयास एक यादगार है. इसके अलावा अन्य विषम परिस्थितियों की कवरेज से भी वह नहीं घबरातीं.  NDTV की ही सिक्ता देव और निधि कुलपति की रिपोर्टिंग का अंदाज आकर्षित करता है.
ABP न्यूज़ में भी काफी महिला रिपोर्टर हैं जो हर परिस्थिति में एंकरिंग और लाइव रिपोर्टिंग करती हैं. कुछ नाम जो मुझे याद आ रहे हैं उनमे हैं नेहा पन्त, रूमाना, विनीता जादव, सरोज सिंह, चित्रा त्रिपाठी आदि ऐसी है जो हर सम-बिषम परिस्थितियों में रिपोर्टिंग करती हैं जिन्हें अक्सर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.
आपलोगों को याद होगा अगस्त २०१३ का मामला जब मुंबई के पास बंद पड़े शक्ति मिल में रिपोर्टिंग के दौरान एक महिला रिपोर्टर, जिसका सामूहिक बलात्कार हुआ था.... और भी कई ऐसे मामले हैं जहाँ महिला पत्रकारों को मुसीबतों का सामना करना पड़ता है तो कहीं पर पेशे से जुड़े अनावश्यक समझौते करने पड़ते हैं.
महिला पत्रकारों की श्रेणी में और भी कई नाम है जिनका नाम हम सभी आदर के साथ लेते हैं वे हैं मृणाल पाण्डे, तवलीन सिंह, शोभा डे, नीरजा चौधरी, आदि आदि!
महिलाओं के बारे में ऐसी धारणा है कि वे मिहनती और सहनशील होती हैं, पुरुषों के साथ महिलाओं से भी खुलकर बात कर सच निकलवा लेती हैं. ज्यादातर मामलों में यह भ्रष्ट नहीं होतीं.(अपवाद हर जगह होते हैं)... सरकार और समाज को चाहिए कि पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करें. उन्हें सच कहने से न रोकें क्योंकि वही लोग लोकतंत्र के चौथे खम्भे के रूप में विराजमान हैं जो सरकार के साथ साथ विरोधियों को भी कटघरे में खड़ा करते हैं. महिला सुरक्षा की बात आज हर जगह हो हो रही हैं उन्हें सुरक्षित अपना काम करने दें. उनके सामने अपनी परेशानियाँ खुल कर रक्खें... ताकि वे हमारी आपकी बात को सरकार और जनता तक पहुंचा सकें.  लोकतंत्र में इनकी अपनी अलग महत्ता है और इनका सम्मान करना हम सबका कर्तव्य है. यह भी ख्याल रखना चाहिए कि वे भी हमारी आप की तरह मनुष्य हैं जिनकी अपनी भावनाएं और विचार होते हैं, उनके भी अपने दुःख सुख होते हैं. हर परिस्थिति में वे अपना काम करते हैं. मैंने कई बार कहा है – रिपोर्टिंग का काम बहुत कठिन है. हर बाढ़, तूफ़ान, सूखा, गर्मी, आदि प्राकृतिक विपदाओं के साथ मानव जनित दुर्घटनाओं का भी लाइव रिपोर्टिंग करते/करती हैं. अभी हाल ही में रामनवमी का त्योहार बड़े उत्साह और उल्लास के साथ जमशेदपुर में भी मनाया गया. आमलोगों को थोड़ी परेशानी अवश्य हुई पर ये पत्रकार सारे करतब/करिश्मे को कवर करते रहे और रिपोर्ट अख़बारों और टी वी में देते रहे. एक बार मन से उन्हें याद ही कर लें. जय हिन्द! वन्दे मातरम ! जय श्री राम!
-    -  जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.