Sunday, 25 June 2017

किसानों का कर्ज माफी – एक फैशन?

केंद्रीय शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू ने मुंबई में बयान दिया है - “किसानों की कर्ज़ माफ़ी फ़ैशन हो गया है”. कहीं इससे प्रभावित होकर उनकी पार्टी के मुख्यमंत्री देवेंद फडणवीस कर्ज़ माफ़ी का अपना फ़ैसला वापस न ले लें. किसानों की कर्ज़ माफ़ी को फैशन कहने से पहले लगता है कि उन्हें यूपी चुनाव का ध्यान नहीं रहा जब ख़ुद प्रधानमंत्री कहा करते थे कि हमारी सरकार बनी तो उसकी कैबिनेट की पहली बैठक में किसानों की कर्ज़माफी होगी और यह बकायदा बीजेपी के घोषणापत्र का हिस्सा था. वेंकैया नायडू को यह सुझाव चुनाव से पहले देना चाहिए था. यूपी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को वे अब भी कह सकते हैं कि फैशन बंद कीजिए. महाराष्ट्र इनकार करता रहा लेकिन किसान आंदोलनों ने मुख्यमंत्री फडणवीस को मजबूर कर दिया कि कर्ज़ माफी करें. पंजाब को ऐलान करना पड़ा क्योंकि कांग्रेस ने वहां चुनावों में जनता से वादा किया था. फिर कर्नाटक से ख़बर आई कि वहां भी फ़सली ऋण माफ करने का ऐलान हुआ है. मध्य प्रदेश ने भी कर्ज़ माफी की एक योजना बनाकर 1000 करोड़ का प्रावधान किया है. 9 साल पहले 2008 में यूपीए सरकार ने कर्ज़माफी का ऐलान किया था. 2008 में केंद्र सरकार ने कर्ज़ माफी की थी लेकिन इस बार राज्य सरकारें कर रही हैं. वित्त मंत्री जेटली ने साफ-साफ कहा है कि कर्ज़ माफी नहीं करेंगे. आंकड़ों के अनुसार - उत्तर प्रदेश ने 36,359 करोड़,  महाराष्ट्र ने 30,000 करोड़, कर्नाटक ने 8,165 करोड़,  पंजाब में 21000 करोड़, तेलंगाना ने 17,000 करोड़, आंध्र प्रदेश ने 22000 करोड़, तमिलनाडु सरकार ने 5,780 करोड़ की कर्ज़माफी का ऐलान किया है
सात राज्यों का कुल योग होता है 140,304 करोड़ रुपये.
2008
में यूपीए ने 60,000 करोड़ की कर्ज़माफी का ऐलान किया था. 2016 और 2017 की कर्ज़ माफी का कुल योग है करीब 1 लाख 40 हज़ार करोड़. कहीं भी पूर्ण माफी नहीं हुई है. कहीं ऐलान ही हुआ है, कहीं ऐलान होने के बाद आधा काम हुआ है, कहीं प्रक्रिया चल ही रही है और कहीं प्रक्रिया इतनी जटिल कर दी गई है कि उससे कुछ लाभ भी नहीं. सितंबर 2016 में राज्यसभा में कृषि राज्य मंत्री ने बताया था कि भारत के किसानों पर 30 सितंबर 2016 तक 12 लाख 60 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज़ा है. इनमें से 9 लाख 57 हज़ार करोड़ का कर्ज़ा व्यावसायिक बैंकों ने किसानों को दिया है. 12 लाख 60 हज़ार करोड़ में से 7 लाख 75 हज़ार करोड़ कर्ज़ा फसलों के लिए लिया गया है. तब कृषि मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला ने कहा था कि सरकार कर्ज़ा माफ नहीं करेगी. रिज़र्व बैंक ने कहा है कि इससे कर्ज़ वसूली पर नकारात्म असर पड़ेगा. 12 लाख 60,000 करोड़ का कर्ज़ा है और सात राज्यों में माफी का ऐलान हुआ है एक लाख 40 हज़ार करोड़. यह कितना हुआ, मात्र 12 प्रतिशत. क्या 12 प्रतिशत कर्ज़ माफी का ऐलान फैशन है.
वेंकैया नायडू के बयान में चार बिंदु हैं. पहला कि कर्ज़माफी फैशन होता जा रहा है. दूसरा कि कर्ज़ माफी अंतिम समाधान नहीं है, तीसरा बिन्दु यह है कि किसान के हाथ में पैसा कैसे पहुंचे इसके लिए क्या कदम उठाया जाए तो इसकी समीक्षा उन्हें ही करनी चाहिए कि क्योंकि सरकार उनकी है और सरकार ने कदम तो उठाये ही होंगे. चौथा बिन्दु यह है कि कर्ज़ माफी एक्सट्रीम सिचुएशन यानी चरम स्थिति में होनी चाहिए.
ख़बरों के अनुसार सागर के बसारी गांव के किसान गुलई कुरमी पर 8 लाख रुपये का कर्ज़ था. 11 एकड़ ज़मीन के इस किसान के पास कर्ज़ के कारण खुदकुशी करने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए थी. लेकिन कर्ज़ चुकाते चुकाते गुलई कुर्मी की 5 एकड़ ज़मीन बिक भी गई. जो 7 एकड़ ज़मीन बची थी उस पर भी महाजन की नज़र पड़ गई थी. गुलई की जेब से एक सुसाइड नोट भी मिला है. उस पत्र को सुनकर आप समझ सकते हैं कि किसानों की जान कौन लोग ले रहे हैं. 3 बच्चों के पिता गुलई लिखते हैं कि शंकर बऊदेनियां महाराज ने धोखाधड़ी से बेनामा करा लियो. हम इनका ब्याज देते रहे, हमेशा देते रहे, इनकी नीयत ख़राब होने लगी. हमको जे धमकी देने लगे. हम ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लेंगे. एक लाख रुपये लिए जिसमें से लिखा पढ़ी के पैसे काटे, एक लाख में से काटे, बाकी 2 लाख 50000 रुपया पहुंचे. इनका हमारा हिसाब हो चुका था फिर भी जे हमसे और पैसा मांग रहे हैं. जान मारने की धमकी देने को तैयार हैं. सूदखोर 20 से 24 प्रतिशत तक का ब्याज़ वसूलते हैं. किसानों को ज़रूरत का सारा पैसा बैंक से नहीं मिलता है. मध्य प्रदेश में 15 दिन में 22 किसानों ने खुदकुशी की है. और यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. 13 जून को मध्य प्रदेश के गृहमंत्री ने कहा था कि पिछले एक साल में सिर्फ चार किसानों ने कर्ज़ के कारण आत्महत्या की है. ये वही मंत्री हैं जिन्होंने कहा था कि पुलिस की गोली से किसान नहीं मरे हैं फिर तीन दिन बाद माना कि पुलिस की गोली से मरे हैं. 3 मई को सुप्रीम कोर्ट में सेंटर ने जो हलफनामा दिया है उसमें बताया है कि 2015 में मध्य प्रदेश में 581 किसानों ने आत्महत्या की थी. उसमें कहीं नहीं कहा है कि इन किसानों ने कर्ज के कारण आत्महत्या नहीं की है बल्कि यही कहा है कि खेती में सकंट के कारण तनाव है और सरकार उनकी आमदनी बढ़ाने का प्रयास भी कर रही है. इसकी ठीक से जांच होनी चाहिए कि किसान किन महाजनों से 20 से 24 फीसदी पर ब्याज़ ले रहा है और वो कौन लोग हैं. किसान बैंक से परेशान है या इन महाजनों के चंगुल से. बुदनी मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सिहोर ज़िले की तहसील का नाम है, यहां 22 जून की सुबह 55 साल के शत्रुघ्न मीणा ने सल्फास खाकर आत्महत्या कर ली. परिवार के लोग होशंगाबाद के निजी अस्पताल भी ले गए मगर शत्रुघ्न ने दम तोड़ दिया. परिवारवालों के अनुसार शत्रुघ्न पर दस लाख का कर्ज़ था. अपने खेत में बिजली का स्थाई कनेक्शन लेने के लिए वे 22 जून को तहसील कार्यालय गए. वहां पता चला कि जिस सात एकड़ ज़मीन को वो अपना मान रहे हैं वो उनके नाम नहीं है. बस वहां से लौट कर सल्फास खा ली और आत्महत्या कर ली. बेटे का आरोप है कि बीजेपी के स्थानीय नेता अर्जुन मालवीय ने उनकी ज़मीन हड़प ली है. आरोप की जांच होनी चाहिए.
पंजाब के तरणतारण में भी दो किसानों ने 22 जून को खुदकुशी की है. तरणतारण के कोट सिवया के किसान जोगिन्दर सिंह और खडूर साहिब के पड़ते गांव आलोवाल के किसान दलबीर सिंह ने आत्महत्या कर ली. जोगिन्दर सिंह पर सात लाख का कर्ज़ था. इसमें पांच लाख कर्ज बैंक का था, दो लाख आढ़ती से लिए थे और ढाई एकड़ ज़मीन थी. दलबीर सिंह ने भी रात को सोते वक्त ज़हर पी लिया.  दलबीर सिंह ने 4 लाख आढ़ती से लिये थे. दो लाख जालंधर के दूसरे आढ़तियों से लिये थे. एक लाख बैंक का कर्ज था और चार एकड़ ज़मीन थी. साठ साल की उम्र में कोई किसान आत्महत्या कर रहा है तो इसका मतलब है कि किसान एक्सट्रीम सिचुएशन में है. 22 जून को चार किसानों ने आत्महत्या की है. शिवसेना ने वेंकैया नायडू के बयान की आलोचना की है. ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिनसे यह जाहिर होता है कि कोई भी किसान एक्सट्रीम सिचुएशन में ही आत्महत्या करता है. और आत्म हत्या फैशन कैसे हो सकता है?. तेलंगाना में हर दिन छह किसान आत्महत्या करते हैं. इसी साल 3 मई को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया है कि खेती के सेक्टर में हर साल 12000 किसान आत्महत्या करते हैं. एक साल में 12,000 किसानों का आत्महत्या करना क्या एक्स्ट्रीम सिचुएशन नहीं है ?
अब आते हैं राजस्थान की एक ख़बर पर. ग़रीब के साथ सरकार ही अच्छा मज़ाक करती है.
मैं ग़रीब परिवार से हूं और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम यानी एनएफएसए के तहत राशन लेता हूं. कुछ घरों पर ऐसा लिखा देखेंगे तो क्या आपके मन को ठेस नहीं पहुंचेगी? सरकार अपने रिकॉर्ड में हिसाब रखे, गरीब के घर के बाहर क्यों लिखा गया है कि मैं ग़रीब परिवार से हूं और राशन लेता हूं. दौसा ज़िले में 52,164 परिवार बीपीएल हैं. सरकार ने डेढ़ लाख से अधिक घरों के बाहर की दीवार पर मैं ग़रीब परिवार से हूं, लिखवा दिया है. ग़रीब का भी स्वाभिमान होता है. एक चीज़ समझ लेनी चाहिए कि सब्सिडी ख़ैरात नहीं है, न ही भीख है बल्कि यह अधिकार है जिसे देते समय सरकारें संसद में कानून बनाती है, मंत्रिमंडल में फैसला होता है. राजस्थान में राशन कार्ड धारकों को जब आधार से जोड़ दिया गया है तब दीवार पर लिखने की क्या ज़रूरत थी. मध्यप्रदेश के गोपालगंज के गांवों में परिवार वालों की मंज़ूरी के बिना दीवार पर ग़रीब लिख दिया गया है. यह सब एक्सट्रीम सिचुएशन ही है. यह एक सामाजिक बुराई के रूप में भी उभर कर आता है. बेटे-बेटी की शादी के समय कोई भी व्यक्ति गरीब परिवार से रिश्ता नहीं करना चाहेगा.

अंत में यही कहना चाहूँगा कि जिम्मेदार पद पर बैठे मंत्री और नेताओं को उलटे-सीधे बयान से बचना चाहिए. समस्या है तो समाधान की तरफ कदम बढ़ना चाहिए न कि समस्या को और उलझा दिया जाना चाहिए. किसानों की उसकी उपज कैसे बढ़े, आमदनी कैसे बढ़े और असंतोष कैसे कम हो इसपर ध्यान दिया जाना चाहिए. सबसे बड़ी बात कि किसान हमारी अर्थ ब्यवस्था के मेरुदंड हैं और रोटी, कपड़ा और मकान जैसी प्रमुख आवश्यकताओं को पूरा करने में इनका ही प्रमुख योगदान है. वोट देनेवाले भी ज्यादातर गरीब, मजदूर-किसान ही होते हैं. आप जिनके वोटों से सरकार बनाते हैं उसे अनदेखी कैसे कर सकते हैं? नारों से वोट लिए जा सकते हैं, पर देश तो चलता है धरातल पर हुए काम से. – जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर. 

Sunday, 11 June 2017

और पूरा हुआ मुख्यमंत्री शिवराज का उपवास

किसान आंदोलन के बाद राज्य में शांति बहाली के लिए मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री शिवराज सिंह चौहान अपना उपवास खत्म कर दिया. बीजेपी के वरिष्ठ नेता कैलाश जोशी ने शिवराज सिंह चौहान को नारियल पानी पिलाकर उनका उपवास खत्म करवाया. सी एम शिवराज सिंह चौहान के उपवास का दूसरा दिन था. सी एम शिवराज ने शुक्रवार को एलान किया था कि वो राज्य में शांति बहाली के लिए अनिश्चितकालीन उपवास करेंगे.
जानकारी के मुताबिक मंदसौर में पुलिस की गोली से मारे गए किसानों के परिजनों ने कल सीएम से मुलाकात की थी. मृतक किसानों के परिवार वालों ने सीएम से उपवास खत्म करने की अपील की थी. मीडिया से बात करते हुए सीएम शिवराज सिंह चौहान ने बताया, पीड़ित परिवार के लोग मुझसे इतने दुख के बावजूद भी मिले. उन्होंने मुझसे कहा कि आप अपना उपवास खत्म कर दें. उन्होंने गांव भी बुलाया था.
एक दिन पहले जब शिवराज सिंह ने उपवास शुरू किया था उस दिन भावुक कर देनेवाला जोरदार भाषण दिया था. उन्होंने बताया कि किसानों के हित के लिए बहुत सारे काम किये हैं. आज भी किसानों के लिए वे समर्पित हैं. उनके खिलाफ झूठी अफवाहें फैलाई गयी. पुराना विडियो दिखाकर लोगों को भड़काया गया. पुरानी विडियो में शिवराज सिंह यह कहते हुए दीख रहे हैं कि हड़ताल करनेवालों को एक धेला नहीं देनेवाले. आइये बात करिए. - इसका परिणाम यह हुआ कि किसान और किसानों के नौजवान बच्चे ज्यादा भड़क गए. कांग्रेस ने भी मौके का खूब फायदा उठाया और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार के गृह मंत्री से लेकर अन्य मंत्रियों ने भी गलत बयानी कर आन्दोलन को भड़काने का ही काम किया. फलस्वरूप ६ मासूमों की जान तो गयी ही, राज्य सरकार की संपत्तियों को भी आग लगाकर काफी नुक्सान पहुँचाया गया. काश कि शिवराज जी समय रहते सम्हल जाते, किसानों की आवाज सुन तो लेते. किसानों की मांग पूरी हुई या नहीं इससे क्या फर्क पड़ता है. मौत का प्रायश्चित तो हो गया. १ करोड़ एक किसान परिवार के लिए कम नहीं होते! शिवराज मामा की जय जयकार फिर हो गयी. देखनेवाले, हवा देने वाले देखते ही रह गए. बल्कि मीडिया के सामने विरोधियों के ऊपर हमला करने का भी खूब मौका मिल गया.  
पर इस देश में जरूरतमंदों को कुछ भी आसानी से कहाँ मिलता है? खूब नाटक किये जाते हैं ताकि उसका राजनीतिक लाभ लिया जा सके. शिवराज सिंह ने भी जो भेल का दशहरा मैदान, उपवास स्थल चुना उसे एक दिन के अन्दर कितन भव्य बनाया गया, यह भी मीडिया के कैमरे बता रहे हैं. इसे ६ किसानों की मौत पर फाइव स्टार उपवास की भी संज्ञा दी गयी. सोसल मीडिया पर भी खूब बवाल कटा. आन्दोलनकारियों को किसान मानने से ही इनकार किया गया. इसके पहले दिल्ली के जंतर-मंतर पर कर रहे तमिलनाडु के किसानों पर भी सवाल उठाये गए. धीरे धीरे किसानों की मांग का समर्थन करते हुए महाराष्ट्र और राजस्थान के किसान भी आन्दोलन करने लगे. यु पी में भी सुगबुगाहट हुई अब इसे राष्ट्रीय स्तर पर भुनाने की कोशिश की जा रहे है. रिपोर्ट के अनुसार ११ जून को देश भर में किसानों का सांकेतिक प्रदर्शन हुआ.

महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में बड़े पैमाने पर हो रहा किसान आंदोलन अब देश के अन्य राज्यों में पहुंचेगा. देश के अलग-अलग राज्यों में किसान आज से सांकेतिक प्रदर्शन शुरु करेंगे. शनिवार को दिल्ली में 62 किसान संगठनों की बैठक में तय हुआ. राष्ट्रीय किसान महासंघ के संयोजक शिव कुमार शर्मा ने मीडिया को बताया कि ११ जून को  को किसानो का समूह अलग अलग इलाकों में काली पट्टी लगाकर सांकेतिक प्रदर्शन करेगा. किसान संगठनो की तरफ से ये भी कहा गया है कि 16 जून को देशभर के हाईवे दोपहर 12 बजे से 3 बजे तक बंद करेंगे. हालांकि अभी ये देखना बाकी है कि मध्यप्रद्देश और महाराष्ट्र के बाहर इन संगठनो को कितना समर्थन मिलता है. उधर खबर है कि महाराष्ट्र के किसानों के कर्ज की माफी की घोषणा फडणवीस सरकार ने कर दी है. हो सकता है मामला ठंडा पड़ जाय. मॉनसून शुरू होने के बाद किसान भी अपनी खेती में लग जायेंगे तब वे आन्दोलन में कहाँ भाग लेंगे. पहले तो उपज पैदा करनी होती है तभी तो उसके लिए उचित दाम की मांग करना होगा.

शिवराज के खिलाफ कांग्रेस ने सिंधिया को मैदान में उतारा
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के उपवास के जवाब में कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया अब मैदान में उतरेंगे. ये घोषणा की गयी है की कांग्रेस के युवा चेहरा और सांसद ज्योतिदित्य सिंधिया शिवराज सरकार के खिलाफ प्रदेश में 72 घंटों का सत्याग्रह करेंगे. सिंधिया 14 जून को दोपहर 3 बजे भोपाल शहर के टी. टी. नगर दशहरा मैदान में 72 घंटे के लिए सत्याग्रह पर बैठेंगे. अपना सत्याग्रह शुरू करने के एक दिन पहले सिंधिया 13 जून को मंदसौर जाएंगे और छह जून को किसान आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग में मंदसौर जिले में मारे गये पांच किसानों के परिजनों से मुलाकात भी करेंगे.
किसान संगठनों का प्रतिनिधि मंडल पहुंचा मंदसौर
मध्यप्रदेश के मंदसौर में किसान आंदोलन के दौरान मरने वाले किसानों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त करने पूरे देश से किसानों और किसान संगठनों का एक प्रतिनिधि मंडल ११ जून को सुबह मंदसौर जाने को निकले थे. इस प्रतिनिधिमंडल में मेधा पाटेकर, योगेन्द्र यादव, स्वामी अग्निवेश, वीएम सिंह, डॉ-सुनीलम, अविक साहा, के. बालाकृष्णन और सोमनाथ तिवारी हैं. आदि को जावरा के मानखेड़ा टोल पर ही हिरासत में ले लिया गया.  कोई भी सरकार मामले को टूल देना नहीं चाहेगी या प्रतिद्वंद्वी को अपनी रोटी सेंकने का मौका नहीं देगी. राहुल गाँधी को मंदसौर पहुँचने से रोका गया था. प्रधान मंत्री चुप है यानी चुपचाप निगरानी रखे हुए हैं. उधर अमित शाह महात्मा गाँधी को चतुर बनिया कहकर नई हवा फैला दी.  
सवाल यही है कि किसानों की हक़ की बात हर कोई करता है. वोट लेने के लिए घोषणाएँ कर दी जाती है. पर उसके कार्यान्वयन की जब बात आती है तो विभिन्न प्रकार के पेंच पैदा कर दिए जाते हैं.
सबसे पहले बात करते हैं न्यूनतम समर्थन मूल्य की राजनीति की. 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी ने किसान यानि अन्नदाता की दुर्दशा का जमकर रोना रोया था. उसने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि सत्ता में आने पर स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिशें लागू कर दी जाएंगी. कमेटी ने किसानों को लागत से उपर पचास फीसद मुनाफा देने की बात कही गयी थी. 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार अपने हर चुनावी भाषण में किसान और जवान की बात करते थे. किसान को एमएसपी पर पचास फीसद का मुनाफा देना था.
चुनावी वायदा पूरा नहीं करने के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हल्फनामा दायर कर कहा कि वह न्यूनतम समर्थन मूल्य से पचास फीसद ज्यादा पैसा किसानों को नहीं दे सकती है. इस वादाखिलाफी को लेकर विपक्ष मोदी सरकार की खिंचाई करता रहा है. यह वायदा किसानों को तब याद आता है जब प्याज, आलू, टमाटर के उचित दाम नहीं मिलने पर उसे सड़कों पर फैंकना पड़ता है. जब खेत में खड़ी फसल को किसान खुद ही आग लगाने को मजबूर हो जाते हैं. जब दाल के दाम नहीं मिलने पर किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ता है.
किसानो अन्नदाता की विशेषण से नवाजने और २०२२ तक उनकी आमदनी दुगनी करने के वादे पर कितना काम अभी हुआ है? मध्यम और निचले स्तर के किसानों की क्या स्थिति है? उनके फसलों/उत्पादों के सही दाम मिल रहे हैं? अगर नहीं तो क्यों? वर्तमान केंद्र और राज्य सरकारों को यह जरूर सोचना पड़ेगा कि किसान आंदोलित क्यों है? अगर किसान हड़ताल करेंगे तो पूरी जनता का क्या हस्र होगा. आखिर हम सभी किसानों के उत्पाद ही खाकर जीवित हैं. ये देश के विकास के लिए मेरुदंड हैं. बिना कृषि उत्पाद के कुछ भी बेमानी है. किसानों के उत्पाद को सस्ते दामों पर खरीदकर फ़ूड प्रोसेसिंग करने वाली कंपनियां कई गुना मुनाफा कमा रही है. निश्चित रूप से किसानों के वाजिब मांग पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की जरूरत है. ताकि खेती को फायदेमंद बनाया जा सके. तभी होगा जय जवान और जय किसान ! आखिर किसानों के बेटे ही ज्यादातर फ़ौज में भर्ती होते हैं.

-    जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

Tuesday, 30 May 2017

...और मैंने सिगरेट शराब सब छोड़ दी!

...और मैंने सिगरेट शराब सब छोड़ दी!
वैसे सिगरेट पीना मैंने शौक से ही शुरू किया था. ऐसे ही कॉलेज के दिनों में दोस्तों के साथ स्टाइल मारने के लिए! तब सिगरेट के धुंए का छल्ला बनाना और किसी के मुंह पर धुंवा छोड़ना एक शौक था. पिकनिक वगैरह में तो सिगरेट और माचिस की डिबिया मेरी पहचान हुआ करती थी. सिगरेट पीते हुए फोटो खिंचवाने का भी शौक पाल लिया था. उन दिनों देवानंद मेरे पसंदीदा हीरो हुआ करते थे.  “हर फ़िक्र को धुंएँ में उड़ाता चला गया...” भी गुनगुना लेता था.
पढाई के बाद नौकरी भी लग गई वह भी एक अच्छी कंपनी में. यहाँ भी मेरा शौक हावी रहा. हर बुरे काम में कुछ साथी भी में मिल ही जाते हैं. काम से फुर्सत के बाद या काम से फुर्सत निकाल कर सिगरेट पी लेता था. जहाँ धूम्रपान करना मना होता था, वहां से बाहर निकलकर बाथ-रूम में या स्मोकिंग ज़ोन में. हमारे अधिकारी भी कभी-कभी हमसे सिगरेट मांग लेते थे. और मैं उनके साथ सिगरेट पीते हुए गौरवान्वित महसूस करता था. कभी-कभी मुझे भी उनके साथ महंगे ब्रांड वाला सिगरेट पीने का आनंद मिल जाता था. खांसी होने पर भी खांसी की दवा के साथ सिगरेट पीना जरूरी होता था... हमारे दूसरे सहकर्मी अधिकारी के साथ उतने सहज नहीं होते थे जितना मैं.
पार्टियों में भी सिगरेट और शराब की आदत को खूब हवा मिलती थी. शराब के कुछ घूँट हलक में जाने के बाद एन्जॉय करने का मजा ही कुछ और था. उस समय अपने सहकर्मियों/अधिकारियों की पोल खोलने का आनंद – क्या कहने! सहकर्मी आनंदित होते थे या मेरा मजाक उड़ाते थे, मुझे कुछ समझ में नहीं आता था. मैं तो सबकी परतें खोलने में ही मशगूल रहता था... बाकी लोग ठहाका लगाते या आहुति डालने का काम करते थे!
“ये देखो ये जो सीधा साधा बंदा रमेश दिख रहा है न ... डरता है साला, अपनी बीबी से, जोरू का गुलाम!”... “जूस पीता है!” ... “यार पी के देखो शराब! ... तब बोलना इसे अच्छा या ख़राब!”....और मैं गिर गया जमीन पर ...उल्टी भी हुई ! .... जब होश आया थो खुद को अपने घर में पाया... पत्नी मेरे सिर पर ठंढा पानी डाल रही थी. और जोरू का गुलाम रमेश, मेरा मित्र, मेरे सामने बैठा था.
अब मेरी पत्नी पार्टियों में मेरे साथ जाने से कतराने लगी ...नहीं जाने का कोई न कोई बहाना बना देती थी. शायद अन्य महिलाओं के सामने मेरी हरकत से उसे शर्मींदगी महसूस होती थी.
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मेरी बच्ची बड़ी होने लगी थी और मेरी आदत को देख रही थी चुपचाप!... होकर आवाक !
मैं घर में शराब या सिगरेट नहीं पीता था. कोई सामान लाने का बहाना बनाकर निकल लेता था और बाहर से ही सिगरेट पीकर आ जाता था.
फिर एक दिन मुझे घर में सिगरेट की तलब लगी और मैंने अपनी पत्नी से कहा – “अरे! धनिया पत्ता लाना तो भूल ही गया ...आ रहा हूँ लेकर ...”
“हाँ पापा चलिए मैं भी आपके साथ चलती हूँ, मुझे भी आइसक्रीम खानी है.” मेरी बेटी ने  बड़े प्यार से कहा. बेटी को आइसक्रीम खिलाकर, धनिया लेकर वापस आ गया. फिर मुझे याद आया कि मुझे एक मित्र से मिलना है. बेटी बोली – हाँ पापा! चलिए, मैं भी आपके साथ चलती हूँ..... मेरा माथा ठनका! ...मेरी बेटी सब समझ रही थी! मैंने उसे समझाने की कोशिश की. – “तुम तो घर में पढ़ाई करो. मुझे शायद देर हो जाय!”
“मैं रात में जगकर पढाई कर लूंगी, पर आज मैं आपको अकेले नही जाने दूंगी ...मुझे पता है, आप कहाँ जाना चाहते हैं....” और वह फूट फूट कर रोने लगी ... मैं अपनी एकमात्र बेटी को बहुत मानता था.... उसका रोना मुझसे देखा नहीं जाता था. उसकी हर ईच्छा मैं पूरी करता था... पर सिगरेट की लत!... उफ्फ.... और उसी समय मैंने अपनी पत्नी और बेटी के सामने कसम खाई ... “मैं तुमदोनो की कशम खाता हूँ... अब से शराब-सिगरेट को हाथ नहीं लगाऊँगा...” गजब का परिवर्तन आ गया था मुझमे... मेरे सहकर्मी मित्र आश्चर्यचकित थे. उन्होंने मुझे हिलाने-डुलाने की बहुत कोशिश की... पर अब मैं अपनी बेटी को बहुत मानता हूँ. अपनी बेटी को दुखी नहीं देख सकता था. आज मेरी बेटी मुझसे दूर है फिर भी ... सिगरेट ? ना... शराब?.... ना-बाबा-ना!   
(मौलिक और अप्रकाशित- मेरे सहकर्मी मित्र की आप बीती पर आधारित यह कहानी सत्य है)
-    जवाहर लाल सिंह, 133/L4, ओल्ड बाराद्वारी, साक्ची, जमशेदपुर.

-    संपर्क – 9431567275  

Saturday, 20 May 2017

माहौल बिगाड़ने की कोशिश

झाड़खंड यानी वनों से आच्छादित प्रदेश! यहाँ की धरती भी रत्नगर्भा है. यहाँ के लोग काफी मिहनती और मेधावी हैं. टाटा, बिरला, जिंदल, रिलायंस, हिताची आदि घरानों के अलावा राज्य और केंद्र सरकार की अनेक संस्थाएं यहाँ सही ढंग से कार्यरत हैं, साक्षर और गैर साक्षर लोग किसी ने किसी रोजगार या ब्यवसाय से जुड़े हैं. मिहनतकश लोग खेतों कारखानों या जंगलों पहाड़ों पर अपने अपने काम में ब्यस्त हैं. ज्यादातर लोग ऐसे हैं जिन्हें अपने काम से काम रहता है. ये लोग अपनी मिहनत के बल पर अपने परिवार और खुद को विकास के रफ़्तार से जोड़ना चाहते हैं. पर कुछ लोग तो है जिनके दिमाग में शैतान ने घर बना लिया हैं. ये लोग नहीं चाहते – लोग अमन चैन से रहें. इसलिए बीच-बीच में माहौल ख़राब करने की कोशिश की जाती है. कभी डायन के नाम पर, कभी बच्चा चोरी के नाम पर तो कभी छेड़छाड़ के नाम पर. सबका अंतिम उद्देश्य होता है, मामले को साम्प्रदायिक मोड़ दे देना. चाहे गोरक्षा के नाम पर, तो कभी धर्म स्थान के नाम पर! तकरीबन एक साल पहले कुछ शराबी गुंडों ने आपसी लड़ाई को धर्म से जोड़ दिया और तीन दिन तक जमशेदपुर में कर्फ्यू लागू रहा. आमलोगों को बहुत परेशानी हुई. उस समय मुख्य मंत्री रघुवर दास और सरयू राय ने स्थिति को नियंत्रण में लाया. फिर एक बार ऐसी ही स्थिति उत्पन्न हो गयी है जिसे ये दोनों नेता संभालने का हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. आम लोगों से अपील की जा रही है कि अफवाहों पर ध्यान न दें, नहीं कानून अपने हाथ में लें.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार - झारखंड में भीड़ ही अदालत होती जा रही है. कहीं हलीम और नईम को भीड़ ने मार दिया तो कहीं गौतम कुमार और गंगेश कुमार को भी भीड़ ने मार दिया. क्या ऐसा हो सकता है कि कोई समूह यह टेस्ट कर रहा हो कि अलग अलग अफवाहों के कारण भीड़ किसी को मार सकती है या नहीं. कभी यह भीड़ गाय के नाम पर बन जा रही है तो अब सुनने में आ रहा है कि बच्चा चोरी के नाम पर बन रही है. इस सवाल पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए कि व्हाट्सऐप पर ग्रुप बनाकर अफवाह बनाने वाले क्या यह टेस्ट कर रहे हैं कि लोग वाकई कितने मूर्ख हैं, और उन्हें किन किन मसलों में भीड़ के भेड़ की तरह हांक कर हत्यारे में बदला जा सकता है. ऐसी भीड़ के सामने प्रशासन भी बेबस नज़र आता है. कुछ तो है कि न प्रशासन इस भीड़ की राजनीति को समझ रहा है न ही समाज और न ही राजनीति. झारखंड में बच्चा चोरी की घटना होगी तो पुलिस का काम है पकड़ना या भीड़ किसी को भी शक के आधार पर घेर कर मार देगी.
सरायकलां खरसावां के राजनगर में सुबह सुबह बच्चा चोरी के संदेह में चार लोगों को पीट पीट कर मार दिया गया. सभी मुसलमान थे और कारोबारी थे. भीड़ का हौसला देखिये कि चारों की हत्या अलग अलग जगहों पर ले जाकर की गई. एक की हत्या शोभापुर में, दूसरे की डांडू, तीसरे व्यक्ति का शव सोसोमाली गांव में मिला, जबकि चौथे व्यक्ति का शव धोबो डुंगरी के जंगल में मिला. हल्दीपोखर निवासी शेख हलीम, मोहम्मद नईम, सज्जाद और सिराज रात दो बजे राजनगर की तरफ़ जा रहे थे. अचानक उनकी कार रोकने की कोशिश की गई. डर कर पड़ोस के गांव में रिश्तेदार के घर चले गए. लेकिन भीड़ वहां भी पहुंची, सीधी धमकी दी गई की सबको सौंप दो नहीं तो पूरे घर को आग लगा देंगे. चारों को भीड़ अपने साथ ले गई और फिर हत्या कर दी.
इस काम में हम सिर्फ मरने वाले को देखते हैं, यह नहीं देखते कि इस भीड़ की राजनीति में हमारे नौजवान हत्यारे हो रहे हैं. हिंदुस्तान अख़बार के वरिष्ठ पत्रकार अनीस ख़ान ने जो जानकारी वहां लोगों से बात कर बताई वो वाकई ख़तरनाक है. बच्चा चोरी की अफवाह को लेकर वाट्सऐप ग्रुप बनाया गया, फिर युवकों की टोली बनाई गई और बच्चा चोरी की बात फैलाई जाने लगी. यही इस समस्या की जड़ हो सकती है, क्या कोई ग्रुप है जो अलग अलग अफवाहों के ज़रिये यह टेस्ट कर रहा है कि भीड़ किसी को घेर कर मार सकती है या नहीं. अभी तक हम इसे इस रूप मे देखते रहे हैं कि भीड़ ने मुसलमानों को घेर कर मार दिया लेकिन गौतम कुमार वर्मा, विकास कुमार वर्मा और उनके दोस्त गंगेश कुमार भी इस भीड़ के शिकार हुए हैं.
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मई की रात में बागबेड़ा के नागाडीह गांव में बच्चा चोरी के आरोप में जुगसलाई के गौतम कुमार वर्मा, विकास कुमार वर्मा और उसके दोस्त गंगेश कुमार की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. यही नहीं, 65 साल की रामचंद्र देवी की बुरी तरह पिटाई की गई. इनकी हालत गंभीर है. गौतम और विकास सगे भाई हैं. उनके तसीरे भाई उत्तम को भी भीड़ ने पकड़ लिया था, लेकिन वो बचकर भागने में कामयाब रहे. उत्तम ने ही बताया कि भीड़ ने उनसे पूछताछ की और अचानक बच्चा चोर की बात कहकर उनपर हमला बोल दिया गया. झारखंड के सारे अखबारों इन ख़बरों से भरे पड़े हैं. इन्हीं से पता चलता है कि गौतम और विकास को पहले बिजली के खंभे से बांधकर पीटा गया. वहां आसपास के गांव के लोग बड़ी संख्या में जमा हुए थे. हैरानी की बात है कि इतनी बड़ी संख्या में लोग जुट रहे मगर किसी ने रोका नहीं. थानेदार साहब साढ़े आठ बजे पहुंचे, भीड़ को समझाने की कोशिश की, लेकिन उल्टा पुलिस पर भी हमला किया गया. थानेदार घायल हो गए. आखिर रात 10 बजे सिटी एसपी पहुंचे, तब जाकर कार्रवाई शुरू हुई. तब तक गौतम विकास और गंगेश की हत्या हो चुकी थी.
कोल्हान प्रमंडल जिसमें पांच ज़िले हैं, वहां 8 लोगों की हत्या हो चुकी है. अगर पूरे झारखंड की बात करें तो अब तक अफ़वाह के नाम पर 18 लोगों की हत्या की गई. हाल के कुछ घटनाओं पर सिलसिलेवार ब्यौरा कुछ इस प्रकार है--
2 मई 2017 : डुमरिया में 60 साल के बुज़ुर्ग की इसी तरह हत्या कर दी गई थी
2 मई : जादूगोड़ा के यूसिल बैराज के पास जॉन एंथनी की पिटाई की गई

2 मई : गालूडीह में बच्चा चोर बताकर एक अज्ञात व्यक्ति की बुरी तरह पिटाई

1 मई : आसनबनी तालाब के पास मोहम्मद असीम की हत्या, उसी दिन राखा माइंस स्टेशन के पास सद्दाम अंसारी उर्फ़ छोटू की पिटाई
. गालूडीह के पुतड़ू गांव के पास सुधीर सिंह की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. सुधीर भीख मांगकर गुज़ारा करते थे.
13 मई : घाटशिला थाना क्षेत्र में सलमान मियां को पीटा गया

14 मई : जमशेदपुर के पोटका थाने में एक व्यक्ति को पीट-पीटकर मार डाला

14 मई : जादूगोड़ा में मानसिक रूप से कमज़ोर महिला को बुरी तरह पीटा गया

15 मई : सुंदर नगर के खुकराडीह में सत्यपाल सिंह को भीड़ ने पीटा

16 मई : घाटशिला में दिमागी तौर पर कमज़ोर युवक की पिटाई की गई

17 मई : जादूगोड़ा में उग्र भीड़ ने दिमागी तौर पर कमज़ोर युवक पर बच्चा चोरी का आरोप लगाया गया और पिटाई की गई
19 और 20 मई को यह आग जमशेदपुर शहर में पहुँच गयी और मुस्लिम बहुल इलाकों में माहौल बिगाड़ने की कोशिश हुई. पुलिस पर पथराव हुए और सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की भरपूर कोशिश की गयी. प्रशासन और सरकार की सूझ-बूझ से माहौल को सम्हाला गया है, पर स्थिति कब भयावह हो जायेगी कहना मुश्किल है.
हम आमलोगों से अपील करते हैं कृपया अफवाहों के बहाव में न आयें न ही कानून अपने हाथ में लें. पुलिस और प्रशासन की मदद करें. गणमान्य लोग भी यही अपील कर रहे हैं. नुक्सान हमेशा आम जनता का होता है. चंद लोग इसमें अपना नेतागिरी चमका लेते हैं, कुछ बेरोजगार आवारा किश्म के नौजवानों की बदौलत! सबसे ज्यादा जरूरत है हर हाथ और दिमाग को काम दिया जाय ताकि लोग ब्यस्त रहें! तभी होगा सबका साथ और सबका विकास!  जय झाड़खंड ! जयहिंद!

 --- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.