Sunday, 27 October 2019

धनतेरस, दीपावली और छठ के त्योहार – सावधानी और बचाव


धनतेरस और दीपावली का त्योहार पूरे देश में धूमधाम से मनाया गया. अनेक शहरों में करोड़ों की खरीददारी भी हुई. सोने, चांदी और हीरों के गहनों के अलावा  पीतल, स्टील, अल्युमिनियम आदि धातु के बर्तनों, घर के लिए उपयोगी सामानों के साथ-साथ दो पहिया और चौपहिया वाहनों की भी खूब बिक्री हुई. मंदी को मात देते हुए हर वर्ग के लोगों ने अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार खरीददारी की. अपने घरों को साफ़ सुथरा कर सजाया संवारा. हर घरों में श्री लक्ष्मी-गणेश की पूजा के साथ साथ काली पूजा की भी धूम रही. धनतेरस के एक दिन पहले से ही बाजारों और सडकों पर इतनी भीड़ उमड़ी कि सड़कों और रास्ते पर जाम की स्थिति बन गई. पैदल चलना भी मुश्किल हो गया. लोगों ने जमकर खरीददारी की. दीप जलाया, लड़ियों से अपने घरों को सजाया. श्री लक्ष्मी-गणेश की पूजा की, लावा के साथ मिठाइयाँ खाई और खिलाई. 
गांवों में घर आंगन को सफाई कर मिट्टी और गोबर से लीपा जाता था. मिट्टी के घर भी बनाये जाते थे, जिनपर दिए सजाये जाते थे. आज शहरों में थर्मोकोल और कागज के बने बनाये घर मिल जाते हैं. बिजली के बल्ब टिमटिमाते हैं. पर दीयों की महत्ता आज भी कम नहीं हुई. काफी लोग मिट्टी के दिए खरीदते हैं और अपने घरों में जलाते हैं. अयोध्या में योगी जी ने 6.11 लाख दिए जलाकर विश्व में कीर्तिमान बनाया. पूरी अयोध्या नगरी सज गई जैसे राजा राम के वनवास से लौटने के बाद सजी होगी. वस्तुत: दीपावली तो भगवान राम के वनवास से लौटने के बाद स्वागत में ही मनायी जाती है, ऐसी मान्यता है.
बिहार के मूलवासी जो बाहर रोजगार के लिए गए हुए हैं, संभवत: दीपावली और छठ के अवसर पर अपने घर लौटकर पूरे परिवार के साथ दीवाली और छठ का त्योहार मनाना चाहते हैं, उनके लिए ट्रेनें और बसें कम पड़ रही हैं, फिर भी किसी न किसी तरह ठुंस कर घरों को लौट रहे हैं. त्योहार का आनंद ही कुछ ऐसा होता है कि सारे कष्ट सहकर भी हम त्योहार अवश्य मनाते हैं. त्योहारों का एक उद्देश्य यह भी है शायद कि आपसी भाईचारे में वृद्धि हो, हमारे बीच की दूरियां कम हों.
पिछले कुछ दिनों से मंदी की जो ख़बरें चल रही थी, दीपावली के अवसर पर ऐसा लगता है, मंदी का कोई असर नहीं है. पर यह मध्यम और उच्च वर्गों के लिए है, जो इस मंदी में भी अपना जीवन-यापन ढंग से कर पा रहे हैं. पर वाहन उद्योग की मंदी कम नहीं हुई है. टाटा मोटर्स में ‘ब्लाक क्लोज़र’ जारी है. अन्य सालों की अपेक्षा इस साल ज्यादा ही ब्लॉक क्लोज़र हुए हैं. अबतक 39-40 दिनों का ‘ब्लॉक क्लोज़र’ हो चुका है. परिणामस्वरूप टाटा मोटर्स पर आश्रित लघु उद्योग भी बंद पड़े हैं या सुस्त गति से चल रहे हैं. इसका प्रभाव उनमे काम करनेवाले मजदूरों पर तो पड़ता ही है. कोई उनसे जाकर पूछे कि कैसी दीपावली और धनतेरस बीती तो वे भला क्या जवाब देंगे?
वहीं वृद्धाश्रम में पड़े बुजुर्गों की हालात का जायजा भी कुछ सामाजिक संस्थाओं ने लिया है, उनके दर्द बांटने का प्रयास किया है. कुछ सामाजिक संस्थाओं ने स्लम बस्तियों में जाकर उनके बीच नए कपड़े, मिठाइयाँ और दिए, खिलौने आदि बांटे हैं. पर क्या वे पर्याप्त हैं. कुछ अधिकारी वर्ग और कर्मचारी वर्ग के लोग भी किसी-किसी का सहारा बने हैं जो काबिले-तारीफ हैं. यह बहुत अच्छी बात है कि संवेदनाएं अभी जिन्दा हैं. पर भौतिकता इतनी हावी हो गई है कि हमारे पास समय का अभाव हो गया है. हम ‘फेसबुक’ और ‘व्हाट्सएप्प’ आदि सोशल साईट पर खूब बधाई सन्देश भेजते हैं, पर आपस में मिल नहीं पाते. मिलना भी बहुत जरूरी है.
होना तो यह चाहिए कि हम सभी जो सक्षम हैं, अपनी आय का एक हिस्सा गरीबों और असहायों को मदद करने में लगायें. सरकार को भी एक कोष अवश्य बनाना चाहिए ताकि असहाय गरीब लोगों का कल्याण किया जा सके. सरकार के पास योजनायें भी हैं, क्रियान्वित भी हो रही है, पर वही अफसरशाही और सदियों से व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ हर जरूरतमंद तक नहीं पहुँच पाता, नही तो क्यों भात-भात करते संतोषी मर जाती और अनेक गरीबों को अपने भोजन के लिए किसी अस्पताल में भर्ती होना पड़ता? समाचार पत्रों के अनुसार ही कुछ मरीज जो ठीक हो चुके हैं, पर उने कोई लेने नहीं आता. वे भी वहां पड़े रहते हैं, क्योंकि वहां उन्हें दोनों शाम का खाना तो मिल जाता है. ऐसा नहीं होना चाहिए. दिल्ली की केजरीवाल सरकार एक उदाहरण पेश कर रही है. वहां शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, सड़क, आदि मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं. प्रदूषण कम करने के लिए पटाखे न जलाने की अपील की जा रही है. लोग समझ भी रहे हैं और अमल भी कर रहे हैं. यही चेतना हर शहरों और गांवों में होने चाहिए. स्वच्छता मोदी जी का मिशन है. दिल्ली सरकार ने कनाट प्लेस में खूबसूरत लेज़र शो का आयोजन किया है. लोग उसे देखने जा रहे हैं. क्या इस तरह का आयोजन अन्य सरकारें नहीं कर सकतीं? कर सकतीं हैं. जब 6.11 लाख दिए जला सकती है तो और अन्य उपाय भी किए जा सकते हैं, जिनसे प्रदूषण कम हो और लोगों को आनंद भी आये. पटाखों से कई बार दुर्घटनाएं भी घट जाती हैं. पूरी सावधानी की जरूरत है. हर एक को सजग रहने की जरूरत है. आप त्यौहार अवश्य मनाएं पर इतना ध्यान अवश्य रक्खें कि अपने साथ-साथ दूसरे का भी अहित न हो. हम सब आपस में बैठकर विचार-विमर्श तो कर ही सकते हैं. विमर्श के बाद अवश्य हल निकलेगा. पटाखों से वायु प्रदूषण के साथ साथ ध्वनि प्रदूषण भी होता है. पटाखों के तेज आवाज से कान के परदे फट सकते हैं और बहरापन भी हो सकता है. इसलिए अपने मन में अवश्य विचारें, पटाखें जलाना कितना युक्तिपरक है. अब तो पटाखें छठ पर्व के अवसर पर भी जलाये जाने लगे हैं जो कही से भी तर्कसंगत नहीं लगता, पर अंधाधुंध नक़ल में हम सभी पीछे नहीं रहनेवाले.
जनता अपना मत देती है. अपना प्रतिनिधि चुनती है. जो प्रतिनिधि चुनकर आते हैं वही सरकार बनाते हैं और जनता के भाग्य-विधाता बनते हैं. हमें स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार का ही चयन करना चाहिए जो जनता के काम ईमानदारी से करें. सभी संविधान की शपथ लेते हैं और उन्हें अपना शपथ याद रखना चाहिए. किसी भी क्षेत्र में कोई भी व्यक्ति हो, अगर वे अपना काम ईमानदारी पूर्वक कर रहे हैं तो वे भी अपने देश की भलाई में योगदान दे रहे हैं. हमें अपना कर्तव्य अवश्य करना चाहिए साथ ही अपने अधिकारों के प्रति भी सजग रहना चाहिए. गलत का विरोध भी होना चाहिए. पर कोई भी काम बिना पूरी तरह समझे नहीं करनी चाहिए. भीड़ के उकसावे या अफवाहों को बिना जांचे-परखे कभी भी उन्माद को बढ़ावा न दें. हमेशा अच्छे लोगों के बीच समय गुजारें और काव्य-शास्त्र आदि की चर्चा करें.
कहा भी गया है - काव्य शास्त्र विनोदेन, कालो गच्छति धीमताम्।
             व्यसनेन च मूर्खाणां, निद्रयाकलहेन वा। ।
बुद्‌धिमान लोग अपना समय काव्य-शास्त्र अर्थात् पठन-पाठन में व्यतीत करते हैं वहीं मूर्ख लोगों का समय व्यसन, निद्रा अथवा कलह में बीतता है।
आप सभी को धनतेरस, दीपावली, भैया दूज, चित्रगुप्त पूजा, और छठ पर्व की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ. जय हिन्द! वन्दे मातरम!
-    जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

Sunday, 1 September 2019

सरकार ने भी माना – मंदी है!


चारो तरफ से उठ रही मंदी के शोर के बीच आखिर सरकार ने भी माना कि मंदी है, तभी उसे रिज़र्व बैंक के आपातकालीन कोष से 1.76 लाख करोड़ रुपये लेने पड़े. कई तरह के आर्थिक सुधार के कदम उठाने पड़े, कई राष्ट्रीय बैंकों के विलय कर खर्च में कटौती और ऋण देने में आसानी के कदम उठाने पड़े. अन्यान्य राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों के साथ भावनात्मक को हवा देने के बावजूद भी जमीनी स्तर पर कार्रवाई की आवश्यकता महसूस की गई. काश कि ये सब कदम पूर्व में उठाये जाते और आद्योगिक मंदी को रोकने का सकारात्मक प्रयास किया गया होता. पता नहीं प्रधान मंत्री और उनके सलाहकारों को यह बात पहले क्यों नहीं समझ में आई? ऑटोमोबाइल उद्योग, कपड़ा उद्योग, रियल एस्टेट से लेकर कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व गिरावट को आखिर कबतक नजरअंदाज किया जा सकता था.
इस बीच पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश की जीडीपी, अर्थव्यवस्था में मंदी और नौकरियों में कमी को लेकर मोदी सरकार पर निशाना साधा है. उनका कहना है कि फिलहाल देश की स्थिति बेहद चिंताजनक है. पिछली तिमाही की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर 5 फीसदी इस बात के साफ संकेत देती है कि हम एक लंबे समय से मंदी के बीच में हैं.
उन्होंने कहा, देश में इससे कहीं ज्यादा दर पर वृद्धि की क्षमता है लेकिन मोदी सरकार के कुप्रबंध के कारण आज अर्थव्यवस्था में मंदी देखने को मिल रही है. मनमोहन सिंह ने कहा, यह विशेष रूप से परेशान करने वाला तथ्य है कि मैन्यूफैक्टरिंग सेक्टर की वृद्धि 0.6% से कम हो रही है. इससे ये साफ पता चलता है कि हमारी अर्थव्यवस्था अभी तक नोटबंदी जैसी गलती और जल्दबाजी में लागू की गई जीएसीटी से उबर नहीं पाई है.
पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा, घरेलू मांग की स्थिति बेहद चिंताजनक है और खपत में वृद्धि भी 18 महीने के निचले स्तर पर है. नाममात्र जीडीपी विकास 15 साल के निचले स्तर पर है.
वहीं बढ़ती बेरोजगारी के बारे में बात करते हुए उन्होंने इसकी बड़ी वजह मोदी सरकार की नीतियों को बताया. उन्होंने कहा, केवल ऑटोमोबाइल सेक्टर में ही 3.5 लाख लोग अपनी नौकरी खो चुके हैं. इसी तरह अनौपचारिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर नौकरी का नुकसान होगा. इसके अलावा किसानों के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, किसानों को पर्याप्त मूल्य नहीं मिल रहा है और ग्रामीण आय में गिरावट आई है.
मनमोहन सिंह ने कहा, कि संवैधानिक संस्थाओं पर हमले किए जा रहे हैं. सरकार ने आरबीआई से 1.76 लाख करोड़ रुपये लिए, लेकिन उसके पास कोई योजना नहीं है कि इस पैसे के साथ क्या होगा. वहीं सरकार जो डेटा उपलब्ध करती है उसकी विश्वसनियता भी सवालों के घेरे में आ गई है. बजट की घोषणाओं को वापस लिया गया, जिससे अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का विश्वास डगमगा गया. उन्होंने कहा कि भू-राजनीतिक बदलाव के कारण वैश्विक व्यापार में पैदा हुए मौकों का लाभ लेने में भारत नाकाम रहा और वह अपना निर्यात तक बढ़ा नहीं पाया. मोदी सरकार में आर्थिक प्रबंधन की यह हालत है.
वहीं पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण ने भी कहा कि केंद्र कश्मीर, अनुच्छेद 370 और पाकिस्तान पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, इसलिए कोई भी अर्थव्यवस्था पर नजर नहीं रख रहा है. उन्होंने केंद्र सरकार से जीडीपी वृद्धि दर के चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में गिरकर पांच फीसदी पर पहुंचने पर पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था बनाने की योजना के बारे में सवाल किया. चह्वाण ने कहा, 'वृद्धि दर गिरकर पांच फीसदी पर पहुंचना हैरान करने वाला है.'
उन्होंने कहा, 'अगर आप पिछली पांच तिमाहियों पर नजर डालें तो पिछले साल इस दौरान जीडीपी आठ फीसदी थी और फिर यह गिरकर सात प्रतिशत, 6.6 प्रतिशत, 5.8 प्रतिशत और आखिरकार अब पांच प्रतिशत पर आ गई. यह गिरावट तेजी से हुई.'
झाड़खंड का जमशेदपुर एक बहुत बड़ा औद्योगिक शहर है. यहाँ पर टाटा ग्रुप का टाटा स्टील, टाटा मोटर्स, टिन प्लेट, ट्यूब के अलावा अन्य इंजीनियरिंग और मैन्युफैक्चरिंग की छोटी-बड़ी कंपनियां और सहायक कंपनियां हैं. ऑटोमोबाइल क्षेत्र में मांग की कमी के कारण टाटा मोटर्स का उत्पादन ठप्प पड़ा है, फलस्वरूप उस पर आधारित सैंकड़ों कंपनियां बंद हो गईं या बंदी के कगार पर हैं. उन पर आश्रित निम्न और मध्यम आय ग्रुप वाले हजारों कामगार बेकार हुए साथ ही उनपर आश्रित दूकानदार भी बेहाल हुए हैं. पारले बिस्कुट से लेकर हीरा व्यापार तक प्रभावित हुआ है. रियल एस्टेट से शेयर मार्केट भी मंदी से जूझ रहा है. बैंकों का NPA लगातार बढ़ रहा है. अब बैंक द्वारा ऋण के ब्याज दर घटाए जा रहे हैं तो घरेलू बचत योजनाओं के भी ब्याज दर घटाए जा रहे हैं. तो छोटी बचत कर बैंकों या पोस्ट ऑफिस में पैसा रखने वालों को भी कम रुपये मिल रहे हैं. नौकरियां जा रही हैं, बेरोजगारी बढ़ रही है तो लोगों के खरीदने की क्षमता में भी कमी हो रही है. लोग अगर खरीदेंगें नहीं तो मांग बढ़ेगी कैसे और फिर उत्पादन कैसे बढ़ेगा?
हाँ, यह बात अलग है कि विश्व बाजार में हो रहे उथल-पुथल का भी असर अपने देश में होना स्वाभाविक है. मॉनसून का अनियमित प्रभाव भी कृषि को बहुत हद तक प्रभावित करता है. इस साल कहीं पर या तो अतिबृष्टि से नुक्सान हुआ है तो कहीं पर कम बारिश से सूखे की स्थिति का सामान करना पड़ा है. इसका असर कृषि उत्पादों पर होना स्वाभाविक है और कृषि आधारित बहुत सारे उद्योग और अर्थ व्यवस्था प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती.
सरकार कदम उठा रही है, पर सारा बोझ फिर से आम आदमी पर पड़ रहा है. जैसे ट्रेनों के टिकट पर सेवा शुल्क पर बढ़ोत्तरी, बैंकों की विभिन्न सेवाओं पर शुल्क लगाना, और ऑटोमोबाइल उत्पादों, उसके पंजीयन शुल्क, सड़क शुल्क और बीमा राशि में हर साल बढ़ोत्तरी भी आम आदमी के व्यय-भार को बढ़ाता है.
आम आदमी पर ही पूरी अर्थ-व्यवस्था चलती है और आम आदमी हर बार प्रभावित भी होता है. यही आम आदमी सरकारों के बनाने बिगाड़ने में भी अहम भूमिका निभाता है. यह बात सही है कि भावनात्मक मुद्दे को उछालकर तत्काल राजनीति की जा सकती है, पर हर हाथ को काम और उसके अनुसार उसकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी सरकार का दायित्व होता है. सरकारें होती ही हैं इसीलिए, अत: वर्तमान सरकार भी देर से ही सही, जागी है तो उसे तमाम अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों के साथ विचार-विमर्श कर तत्काल और लम्बी अवधि के लिए भी नीति निर्धारण करना चाहिए जिससे देश की अर्थव्यवस्था पटरी पर आये और निराशा का दौर समाप्त हो.
पहले भी मंदी आती रही हैं, प्राकृतिक आपदाएं आती रही हैं और सभी सरकारें यथोचित कदम उठाती रही हैं. उम्मीद है और ऐसा देखा भी जा रहा है, वर्तमान सरकार भी कदम उठा रही है. हमें आशान्वित रहना चाहिए कि आगे अच्छे दिन आयेंगे. हर रात के बाद सवेरा होता है. अस्त के बाद उदय भी होता है.
अभी गणेश चतुर्थी के बाद ही त्योहारों का मौसम आ रहा है. उम्मीद है लोग संचित धन से भी त्योहारों के लिए खरीददारी करेंगे ही, और बाजारों में भी रौनक लौट आयेगी. सभी पाठकों और आम नागरिकों को आनेवाले सभी त्योहारों की बधाई और शुभकामनाएं! हम सभी ईश्वरीय शक्ति में विश्वास रकहते हैं. वही सबके पालनहार भी हैं और विघ्नहर्ता भी हैं. इसलिए हम सभी उसी ईश्वरीय शक्ति को एक बार पूर्ण समर्पण के साथ मन से याद करें और अपना काम ईमानदारी के साथ करें! जय श्री गणेश! जय माँ दुर्गे! जयहिंद! वन्दे मातरम!
-जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर 

Wednesday, 21 August 2019

सकारात्मक सोच से धनात्मक उर्जा


एक व्यंग्य
सकारात्मक सोच से धनात्मक उर्जा (positive energy) मिलती है, ऐसा मैंने किसी महापुरुष या संत के मुख से सुना था. तब से मेरी सोच सकारात्मक होने लगी है! और हर चीज के सकारात्मक पहलू के बारे में सोचने लगा हूँ.
अभी हाल ही में मैंने कई मंदिरों के दर्शन किए! मंदिर में स्थापित भगवान और देवी/ देवताओं की आराधना की. जहाँ कहीं भी धार्मिक स्थान दिख जाते हैं, सर अपने आप झुक जाता है. समूह में प्रात: भ्रमण करते-करते जब हम थक जाते हैं, माँ काली के मंदिर में जाकर शीश झुका आते हैं. शक्ति स्वरूपा माँ काली के सामने शीश झुकाते ही शक्ति का संचार होने लगता है और हम फिर कई चक्कर अबाध रूप से लगा लेते हैं.
प्राकृतिक वातावरण में सैर करने/प्रकृति के सूक्ष्म अवलोकन से भी शरीर और आत्मा में नई उर्जा का संचार होता है और हम तरोताजा महसूस करते हैं. काफी लोग स्वास्थ्य लाभ के लिए भी प्राकृतिक वातावरण की शरण लेते हैं.
भजन गाने/सुनने, रामचरित मानस का पाठ करने से, हनुमान चालीसा पाठ करने से, गीता पाठ करने से भी नया आत्मिक बल प्राप्त होता है.
किसी की आप किसी भी तरीके से मदद पहुंचाते हैं तो आपको स्वान्तः सुखाय का आनंद प्राप्त होता है और आप धनात्मक उर्जा प्राप्त करते हैं. किसी की मदद न सही, आपके द्वारा किसी को कष्ट न पहुंचे – यह भी एक प्रकार का स्वान्तः सुखाय ही है. परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम – महर्षि वेदव्यास ने भी कहा है.
इन्हें या तो सुनी सुनाई बात कह सकते हैं या खुद अनुभव कर सकते हैं. पर एक चीज आजकल स्वयंसिद्ध होती जा रही है जैसे भक्ति का जुनून अगर आप में हो तो आप कुछ भी कर गुजर सकते हैं. जैसे जय श्री राम बोलने मात्र से ही किसी का खून कर देने तक की शक्ति प्राप्त हो जाती है और तथाकथित भक्तों का समर्थन भी हासिल हो जाता है जो उसे जायज भी ठहराने लगते हैं. जय श्री राम कहने मात्र से ही आप राम भक्त और देश भक्त भी हो जाते हैं. जय श्रीराम का नारा पतित-पावनी गंगा की तरह है जिसमे डुबकी लगाते ही आपके सारे पाप धुल जाते हैं.
उसी तरह गोरक्षा का संकल्प(गोपालन नहीं) ही आपको उर्जावान बनाता है. जैसे ही आप संकल्प करते हैं गोमाता कामधेनु बन जाती है और तब आप जो चाहे कर सकते हैं. महर्षि वशिष्ट की भांति विश्वामित्र मुनि की सेना को भी परास्त कर सकते हैं. इसके बाद एक और नारा है भारत माता की जय! और वन्दे मातरम! ये दोनों नारे देश भक्ति सिखाती है और देश की रक्षा के लिए तो हर देश भक्त नागरिक शीश कटाने को तैयार ही रहता है. 
अगर आप यह सब नहीं कर सकते तो भी एक और उपाय है आपके लिए – वह है अपने विरोधियों को जीभर कर गाली देने से भी आपके अन्दर जबरदस्त उर्जा का संचार होता है. यह विरोधी आपका पड़ोसी देश पाकिस्तान भी हो सकता है या विरोधी पार्टी का नेता भी ...
आप दिन भर पाकिस्तान को गाली दीजिए या गाली देते समय तुलसी की माला के सहारे गिनते भी जाइए, एक माला दो माला या १०८ माला गाली दीजिए, और अन्दर से महसूस कीजिए कितनी उर्जा पैदा होती है. बहुत सारे बुजुर्ग जो प्रात: भ्रमण में चार-पांच चक्कर लगाने के बाद थक जाते हैं इसी पाकिस्तान के सहारे 10 चक्कर में भी नहीं थकते. फिर नेहरु गांधी परिवार के सातों पुश्त तो है ही असीम उर्जा का भण्डार! हाँ गांधी से याद आया. आजकल तो ऐसे-ऐसे विडियो आ गए है जिनमे महात्मा गाँधी को घोर हिंसक साबित किया गया है और नाथूराम गोडसे को महात्मा दधीचि. अब तो महात्मा नाथूराम गोडसे- ‘आधुनिक भारत के दधीचि’ को सम्मानित करते हुए कवि सम्मलेन भी आयोजित किये जाने लगे हैं. कहीं-कहीं पर गोडसे भगवान को अवतरित होते दिखाया जाने लगा है और वे फिर से महात्मा गाँधी के पुतले को गोली मारते हैं ताकि गाँधी की आत्मा और गांधी समर्थकों को अधिक से अधिक कष्ट पहुंचा सकें.
मैं तो अब मानने लगा हूँ कि कुंठित अर्थशास्त्री जो ख़राब आर्थिक स्थिति का रोना रो रहे हैं उन सबको उपर्युक्त सकरात्मक उर्जा का प्रयोग करना ही चाहिए ताकि देश की आर्थिक स्थिति में भी पंख लग जाए. सभी उद्योगपतियों को अपने परिसर में कर्मचारियों के साथ ‘जय श्री राम’ से लेकर ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ का कम से कम ३६ घंटे का अखंड जाप करवाना चाहिए, फिर देखिए मंदी की जगह विकास कैसे बुलेट ट्रेन की स्पीड से दौड़ने लगेगा. बीच-बीच में कार रैली, मोटर साइकिल रैली भी आयोजित करते रहना चाहिए और कर्नाटक के बागी विधायकों के जैसे ११ करोड़ की रोल्स रॉयस फैंटम VIII लग्जरी कार गाड़ी खरीद कर दौड़ लगानी चाहिए ताकि ऑटो सेक्टर की मंदी को रोका जा सके.
एक और बात- पूरे देश में एक देश- एक कानून, के साथ एक पार्टी पर भी बल देना चाहिए. बेकार का विपक्ष अड़ंगा लगाता है संसद का समय बर्बाद करता है. एक पार्टी रहेगी तो बार-बार चुनाव करने के झंझट से भी छुटकारा मिलेगा और कर द्वारा अर्जित जनता के पैसे का अपव्यय भी रुकेगा. फिर झूठ-मूठ का आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय आदि संस्थाओं को विरोधी पार्टियों के ऊपर लगाने की तोहमत नहीं उठानी पड़ेगी. मैंने अपनी समझ के अनुसार राय रक्खी है. बाकी तो हमारे शीर्षस्थ और मध्यस्थ नेता खुद ही समझदार हैं, उन्हें भला हम क्या ज्ञान दे सकते हैं.
जय श्री राम! वन्दे मातरम! भारत माता की जय! पाकिस्तान मुर्दाबाद! कांग्रेस मुक्त नया भारत! या भारत का भी कुछ नया नामकरण करने की जरूरत हो तो उस नए नाम के भारत की भी जय!       
मेरा दिल हमेशा सकारात्मक सोचता है. आपलोगों के विचार कुछ अलग हट के हो सकते हैं. उसमे भला मुझे क्यों आपत्ति होगी. यही तो एक स्वतंत्रता मिली है हम सबको. हमलोग अपनी अपनी बात कह सकते हैं, लिख सकते हैं. जयहिंद!
आज इतना ही .......
-       -  जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

Saturday, 3 August 2019

रवीश कुमार को रैमॉन मैग्सेसे पुरस्कार


५ दिसम्बर १९७४ को बिहार के मोतिहारी में जन्मे रवीश कुमार एक भारतीय टीवी एंकर, लेखक और पत्रकार हैंजो भारतीय राजनीति और समाज से संबंधित विषयों को मुखरता के साथ जनता के सामने रखते हैं. रवीश एनडीटीवी समाचार नेटवर्क के हिंदी समाचार चैनल NDTV इण्डिया में वरिष्ठ कार्यकारी संपादक है, और चैनल के प्रमुख कार्यक्रमों जैसे 'हमलोगऔर 'रवीश की रिपोर्टके होस्ट रहे हैं. रवीश कुमार का ‘प्राइम टाइम’ शो वर्तमान में काफी लोकप्रिय है. २०१६ में “द इंडियन एक्सप्रेस”  ने अपनी '१०० सबसे प्रभावशाली भारतीयों' की सूची में उन्हें भी शामिल किया था. रवीश कुमार ने हिंदी टेलीविज़न पत्रकारिता को नया मुकाम दिया. उन्होंने लोयोला हाई स्कूल, पटना, से अपनी प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की, फिर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए वह दिल्ली आ गये. दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने भारतीय जन संचार संस्थान से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त किया.
अबतक उन्हें निम्न पुरस्कारों से विभूषित किया गया है.
१.      हिंदी पत्रिका रंग में गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार २०१० जो उन्हें २०१४ में राष्ट्रपति के हाथों प्रदान किया गया.
२.      पत्रिका रंग में रामनाथ गोयंका पुरस्कार २०१३
३.      इंडियन टेलीविज़न पुरस्कार २०१४ – उत्तम हिंदी एंकर
४.      कुलदीप नायर पुरस्कार २०१७
५.      रेमन मैग्सेसे पुरस्कार – अगस्त २०१९ – ‘रैमॉन मैग्सेसे’ पुरस्कार को एसिया का ‘नोबेल’ पुरस्कार के बराबर माना जाता है.

पत्रकारिता जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके एनडीटीवी इंडिया के मैनेजिंग एडिटर रवीश कुमार  को इस बार वर्ष 2019 के 'रैमॉन मैगसेसे' पुरस्कार से सम्मानित किया गया. एनडीटीवी के रवीश कुमार को ये सम्मान हिंदी टीवी पत्रकारिता में उनके योगदान के लिए मिला है. 'रैमॉन मैगसेसे' को एशिया का नोबेल पुरस्कार भी कहा जाता है. रैमॉन मैगसेसे पुरस्कार एशिया के व्यक्तियों और संस्थाओं को उनके अपने क्षेत्र में विशेष रूप से उल्लेखनीय कार्य करने के लिए प्रदान किया जाता है. यह पुरस्कार फिलीपीन्स के भूतपूर्व राष्ट्रपति रैमॉन मैगसेसे की याद में दिया जाता है.
पुरस्कार संस्था ने ट्वीट कर बताया कि रवीश कुमार को यह सम्मान "बेआवाजों की आवाज बनने के लिए दिया गया है." रैमॉन मैगसेसे अवार्ड फाउंडेशन ने इस संबंध में कहा, "रवीश कुमार का कार्यक्रम 'प्राइम टाइम' 'आम लोगों की वास्तविक, अनकही समस्याओं को उठाता है." साथ ही प्रशस्ति पत्र में कहा गया, 'अगर आप लोगों की आवाज बन गए हैं, तो आप पत्रकार हैं.'  रवीश कुमार ऐसे छठे पत्रकार हैं जिनको यह पुरस्कार मिला है. इससे पहले अमिताभ चौधरी (1961), बीजी वर्गीज (1975), अरुण शौरी (1982), आरके लक्ष्मण (1984), पी. साईंनाथ (2007) को यह पुरस्कार मिल चुका है.
एनडीटीवी के लिए भी यह एक गौरव का दिन है. रवीश कुमार ने बहुत लंबा सफर तय किया है. बहुत नीचे से उन्होंने शुरुआत की और यहां तक पहुंचे हैं. वर्ष 1996 से रवीश कुमार एनडीटीवी से जुड़े रहे हैं. शुरुआती दिनों में एनडीटीवी में आई चिट्ठियां छांटा करते थे. इसके बाद वो रिपोर्टिंग की ओर मुड़े और उनकी सजग आंख देश और समाज की विडंबनाओं को अचूक ढंग से पहचानती रही. उनका कार्यक्रम 'रवीश की रिपोर्ट' बेहद चर्चित हुआ और हिंदुस्तान के आम लोगों का कार्यक्रम बन गया.
बाद में एंकरिंग करते हुए उन्होंने टीवी पत्रकारिता की जैसे एक नई परिभाषा रची. इस देश में जिसे भी लगता है कि उसकी आवाज कोई नहीं सुनता है, उसे रवीश कुमार से उम्मीद होती है. टीवी पत्रकारिता के इस शोर-शराबे भरे दौर में उन्होंने सरोकार वाली पत्रकारिता का परचम लहराए रखा है. सत्ता के खिलाफ बेखौफ पत्रकारिता करते रहे. आज उनकी पत्रकारिता को एक और बड़ी मान्यता मिली है.
रवीश कुमार के अलावा वर्ष 2019 रैमॉन मैगसेसे अवार्ड के चार अन्य विजेताओं में म्यांमार से को स्वे विन, थाईलैंड से अंगखाना नीलापजीत, फिलीपींस से रेमुंडो पुजांते कैयाब और दक्षिण कोरिया से किम जोंग-की हैं.
यह अवॉर्ड मिलने के बाद चारों ओर से रवीश कुमार को बधाइयां मिल रही हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री व पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती और ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओब्रायन के बाद अब रवीश कुमार को बधाई देने वालों में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी का और राहुल गाँधी का नाम भी जुड़ गया है.
फेसबुक और ट्विटर पर अनेक लोग जो उनको जानते और चाहते हैं, बधाइयाँ दी हैं. कुछ लोगों ने अवार्ड की ही आलोचना चालू कर दी है. यह सब अभिव्यक्ति की आजादी है. यही तो वे भी चाहते हैं. पत्रकार को सत्यनिष्ट और सजग होना चाहिए. सत्ता की चाटुकारिता नहीं बल्कि समय समय पर आलोचना भी की जानी चाहिए. आज के समय में अधिकांश मीडिया हाउस को सत्ता द्वारा अपहरण कर लिया गया है, वहां ऐसे निडर और निष्पक्ष पत्रकार की सख्त जरूरत है. पत्रकार वही है, जो जनता की आवाज बन सके, सत्य को सामने रख सके.
सत्ता की आलोचना के चलते रवीश कुमार को पिछले दिनों सोशल मीडिया पर बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है. उन्हें सरेआम गालियाँ और धमकियाँ दी जाती रही है. उनके जैसे कई अन्य पत्रकारों को, जिन्होंने सत्ता के खिलाफ आवाज उठाई उन्हें अपनी नौकरी भी गंवानी पडी है. पर उन्हें NDTV ने अपने साथ बनाये रक्खा इसलिए रवीश कुमार ने पूरी टीम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है. इस सम्मान से वे अभिभूत तो हैं ही, किन्तु उनको वहां तक पहुँचाने में पूरी टीम का हाथ है. अकेला आदमी सब कुछ नहीं कर सकता, उसे टीम ही आगे बढ़ाती है.
अपने प्राइम टाइम के कार्यक्रम में रवीश कुमार ने एक बार नौकरी पर लगातार श्रृंखला चलाई जिससे काफी लोगों को रोजागार और नौकरियाँ मिली. ऐसे बहुत सारे नौजवान रवीश के प्रति कृतज्ञता जाहिर करते हैं. विश्वविद्यालयों, शिक्षण संस्थाओं पर भी कई कार्यक्रम किये हैं. दूर दराज के गांवों और शहरों में भी विपरीत परिस्थितयों में रिपोर्टिंग की है. कई बार सचमुच का रोड शो उन्होंने भी क्या है. निचले तबकों के दर्द को खुद महसूस कर उसकी समस्या को उजागर किया है. इससे कई सरकारों, और प्रशासनिक अधिकारियों की आँखें भी खुली है.
कई बार वे क्लिष्ट विषयों को भी आम आदमी के सामने लाते रहे. सामाजिक, साहित्यिक, आर्थिक और पर्यावरण से सम्बंधित विषयों पर भी कार्यक्रम करते रहे हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि प्राइम टाइम करने के पहले वे खुद उसपर अध्ययन और शोध कर चुके होते हैं, तब ही वे कार्यक्रम पेश करते हैं. उन्हें जब धमकियाँ दी जा रही थी तो उन्होंने प्रधान मंत्री के नाम से भी खुला पत्र लिखा था. वे लिखते हैं मैं इस पत्र को आपके पास डाक से भेज रहा हूँ और उम्मीद करता हूँ कि आप इसपर अवश्य ध्यान देंगे.
काफी लोगों ने उन्हें ‘रबिश’ कहा, जातिवादी, वाममार्गी कहा तब भी वे अपनी आवाज को उसी बुलंदी के साथ उठाते रहे. आज भी वे नए पत्रकारों को खूब पढ़ने और खूब मिहनत करने की सलाह देते हैं. पढ़ना और मिहनत करना हर हाल में जरूरी है. सरल रास्तों से चलकर कोई भी उच्च मुकाम तक पहुँच सकता है, पर कठिन रास्तों को लांघते हुए ऊंचाई पर जो पहुंचता है, उसका नाम सभी लेते हैं. हमारी भारत भूमि तमाम ऐसे लोगों से परिपूरित है. समय आने पर वे भी अवश्य खिलते हैं, चमकते हैं, राह दिखाते हैं.
एक बार फिर से बेजुबानों की आवाज उठानेवाले निर्भीक और निडर पत्रकार रवीश कुमार को तहेदिल से बधाई और भविष्य के लिए शुभकामनाएं. उम्मीद है वे अपने उद्देश्य में आगे भी ऐसे ही लगे रहेंगे! जयहिंद! जय भारत! वन्दे मातरम!
- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर  

Saturday, 27 July 2019

ऑटोमोबाइल सेक्टर में मंदी की मार


ख़बरों के अनुसार घरेलू वाहन बनाने और बेचने वाली कंपनी टाटा मोटर्स को चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 3,679.66 करोड़ रुपये का शुद्ध एकीकृत घाटा हुआ है. इससे पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में कंपनी को 1,862.57 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. कंपनी ने हाल ही में  शेयर बाजार को यह जानकारी दी. कंपनी ने बताया कि समीक्षावधि में उसकी कुल आय 61,466.99 करोड़ रुपये रही जो इससे पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में 66,701.05 करोड़ रुपये थी. समीक्षावधि में कंपनी की कुल बिक्री 22.7 फीसद घटकर 1,36,705 इकाई रही. कंपनी की ब्रितानी इकाई जगुआर लैंड रोवर का कर पूर्व नुकसान 39.5 करोड़ पौंड (करीब 3408.91 करोड़ रुपये) रहा जो इससे पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में 26.4 करोड़ पौंड (करीब 2278.36 करोड़ रुपये) था. एकल आधार पर कंपनी 97.10 करोड़ रुपये के शुद्ध नुकसान में है. जबकि पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि में कंपनी को एकल आधार पर 1,187.65 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ हुआ था. बीएसई पर कंपनी का शेयर गुरुवार को 4.56 फीसद टूटकर 144.35 रुपये पर बंद हुआ.
जमशेदपुर स्थित टाटा मोटर्स के अधिकांश पार्ट और छोटे-मोटे कल-पुर्जे जमशेदपुर के ही  आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र स्थित छोटे और मंझोले स्तर की कंपनियां बनाती हैं. ऑटोमोबाइल सेक्टर में मंदी का असर उन कंपनियों पर भी पड़ा है और ३० हजार से ज्यादा कामगार अभी बेरोजगार हो गए हैं.
वाहन कलपुर्जा विनिर्माताओं के अखिल भारतीय संगठन एक्मा(Automotive Component Manufacturing Association of India) ने वाहन क्षेत्र के लिए माल एवं सेवाकर (जीएसटी) की दर एक समान 18 प्रतिशत करने का अनुरोध किया है, ताकि पूरे वाहन उद्योग में मांग को बढ़ाया जा सके जिससे करीब 10 लाख नौकरियां बचाने में मदद मिलेगी. अभी वाहन बिक्री में लगातार मंदी रहने की वजह से यह नौकरियां दांव पर लगी हैं. वाहन कलपुर्जा उद्योग करीब 50 लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध कराता है. एक्मा ने बैटरी चालित वाहनों की नीति को भी स्पष्ट करने के लिए कहा है.
ऑटोमोटिव कंपोनेंट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एक्मा) के अध्यक्ष राम वेंकटरमानी ने कहा, 'वाहन उद्योग अभूतपूर्व मंदी का सामना कर रहा है. हर श्रेणी में वाहनों की बिक्री पिछले कई महीनों से भारी दबाव का सामना कर रही है.' उन्होंने कहा कि वाहन कलपुर्जा उद्योग की वृद्धि पूरी तरह से वाहन उद्योग पर निर्भर करती है. मौजूदा स्थिति में वाहन उत्पादन में 15 से 20 प्रतिशत की कटौती हुई है जिससे कलपुर्जा उद्योग के सामने संकट खड़ा हो गया है. उन्होंने कहा, 'यदि यही रुख जारी रहता है तो करीब 10 लाख लोग बेरोजगार हो सकते हैं.' वेंकटरमानी ने कहा कि कुछ स्थानों पर छंटनी का काम शुरू भी हो चुका है.
जीएसटी प्रणाली के तहत पहले से ही करीब 70 प्रतिशत वाहन कलपुर्जों पर 18 प्रतिशत की दर से कर लग रहा है. जबकि बाकी बचे 30 प्रतिशत पर 28 प्रतिशत जीएसटी है. इसके अलावा वाहनों पर 28 प्रतिशत जीएसटी के साथ उनकी लंबाई, इंजन के आकार और प्रकार के आधार पर एक से 15 प्रतिशत का उपकर भी लग रहा है. उन्होंने कहा कि मांग में कमी, भारत स्टेज-4(बीएस-4)  से भारत स्टेज-6(BS- 6)  उत्सर्जन मानकों के लिए हाल में किए गए निवेश, ई-वाहन नीति को लेकर अस्पष्टता से वाहन उद्योग का भविष्य अनिश्चित दिख रहा है और इस वजह से भविष्य के सभी निवेश रुक गए हैं. वेंकटरमानी ने कहा, 'सरकार की ओर से तत्काल हस्तक्षेप किए जाने की जरूरत है. हमारी ठोस मांग है कि वाहन और वाहन कलपुर्जा क्षेत्र को 18 प्रतिशत जीएसटी दर के दायरे में लाया जाएगा.'
संगठन ने इसके अलावा स्थिर इलेक्ट्रिक वाहन नीति की जरूरत बतायी. वेंकटरमानी ने कहा कि ई-वाहन को पेश करने के लक्ष्य में और कोई भी बदलाव करने से देश का आयात बिल बढ़ेगा जबकि देश के मौजूदा कलपुर्जा उद्योग को भारी नुकसान होगा.
वैसे कमोबेश हर क्षेत्र में ही मंदी का माहौल है, पढ़े लिखे युवा बेरोजगार हैं या बहुत कम वेतन पर गुजारा कर रहे हैं. सीधी सी बात है कि अगर आमदनी नहीं होगी तो क्रय-शक्ति कहाँ से बढ़ेगी. क्रय-शक्ति नहीं बढ़ेगी तो मांग में गिरावट आयेगी और मंदी की मार झेलनी ही पड़ेगी. इधर मानसून की देरी से और वर्षा की कमी से बिहार, झारखण्ड के अधिकांश हिस्से सुखाड़ की चपेट में हैं. खरीफ की बुवाई नहीं हो पाई है. तो किसानों की आमदनी में भी कमी और उत्पाद की कमी से जिंसों के दाम बढ़ने की पूर्ण संभावना है. कृषि उत्पाद में मंदी से कृषि कार्य में लगने वाले संसाधनों की खपत में भी कमी आयेगी. यानी परेशानी ही परेशानी. उधर उत्तर बिहार और असम में बाढ़ के कारण लाखों लोग बेघर हुए हैं. आपदा चारो तरफ है. पानी की किल्लत की समस्या दिन प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है. जंगलों के कटने से प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है और जलवायु परिवर्तन का असर लगभग पूरे विश्व में है.
हम चाहे चाँद पर चले जाएँ या मंगल ग्रह पर रोटी, कपड़ा और मकान की आवश्यकता रहेगी ही. ऊपर से जनसंख्या का दिन-प्रतिदिन बढ़ते जाना समस्या को बढ़ाता ही है. समस्या है तो समाधान भी है और समाधान के लिए सरकार के साथ-साथ समाज और हर व्यक्ति को सोचना होगा और समाधान निकालने का हर संभव प्रयास करना ही होगा.
दूसरे विकासशील और विकसित देश की सरकारें और वहां की जनता भी देश के उत्थान के बारे में चिंतित और प्रयत्नशील रहती हैं. वैसे ही हम सबको जागरूक होकर प्रयत्न करना होगा. गैरजरूरी और विवादित मुद्दों पर ज्यादा ध्यान न देकर आनेवाले कल की क्या तस्वीर होनेवाली है, इसपर विचार करना ही होगा.
कृषि और किसान हमेशा से उपेक्षित रहा है जबकि इनपर ही हम सभी अवलंबित हैं. कृषि पर अनुसन्धान और उसका जमीनी स्तर तक क्रियान्वयन जरूरी है. कम समय में, कम लागत पर फसलें कैसे अधिक उपजाई जाय, इसपर अनुसन्धान जरूरी है. साथ ही कृषकों को उसके उत्पाद की सही कीमत मिले यह भी जरूरी है, अन्यथा बहुत सारे किसान या तो आत्महत्या कर रहे हैं या कृषि कार्य से विमुख होकर शहर की तरफ कोई रोजगार के लिए भाग रहे हैं.
मेरा निवेदन तमाम अर्थशास्त्रियों, वैज्ञानिकों, राजनीतिज्ञों और समाजशास्त्रियों से है कि सब लोग मिल बैठकर समस्या का हल ढूढें और देश को प्रगति के पथ पर आरूढ़ करें. तभी हमारा देश समृद्ध संपन्न और विश्वगुरु बनने की तरफ बढ़ेगा. अपराध पर लगाम लगेगा. तमाम बेरोजगार लोग ही गलत कार्यों में लगाये जाते हैं, वे ही नक्सली या आतंकवादी बनते हैं. इसलिए चाहिए हर हाथ को काम और उचित मजदूरी. आप अगर अपने काम में व्यस्त हैं तो गलत काम की तरफ झुकाव नहीं होगा. अन्यथा ‘खाली मन शैतान का घर’ होता है यह तो सभी जानते हैं. ‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया’ यही तो हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है. यही हम प्रार्थना भी करते हैं. आइये हम सब मिलकर भारत को समृद्ध और संपन्न बनायें. आपसी सौहार्द्र का वातावरण बनायें और प्रेम को बढ़ावा दें. प्रेम अमूल्य वरदान है जो हम सबको आपस में जोड़े रखता है.
जय हिन्द! जय भारत! वन्दे मातरम!
जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर