Wednesday, 16 December 2015

पहल

पहल किया था अन्ना ने, वे भ्रष्टाचार मिटायेंगे
भ्रष्टाचार मिटाने को. वे लोकपाल को लायेंगे.
पर, भ्रष्टाचार मिटा है क्या ?
पहल किया था संसद ने भी, लोक पाल बिल ले आया
ऐसा लोकपाल बिल जो, सब सांसद को मन भाया
पर, भ्रष्टाचार मिटा है क्या?
पहल किया था जनता ने भी, बदल दिया सरकार को
कठपुतली को हटा दिया, बैठाया चौकीदार को
पर, भ्रष्टाचार मिटा है क्या?
पहल किया 'जनसेवक'जी ने, झाड़ू स्वयम लगा देखी
देखा-देखी किया सभी ने, जनता ने फोटो देखी
सच में, साफ़ हुआ है क्या?
पहल किया जब ‘आप’ ने, जनता ने झट दिल्ली सौंपी
ऐसा बहुमत मिला उसे, बाकी सब की बज गयी पीपी
पर, दिल्ली कुछ बदली है क्या?
और कहाँ तक गिने, मिल गए भुजंग-चन्दन कुमार
जनता ने दी कुर्बानी, बन गयी मिली जुली सरकार
देखें, बिहार बदला है क्या?
पहल अभी भी जारी है, बहस अभी भी जारी है
संविधान गुण गाते गाते, हो हल्ला की बारी है
देखें, कुछ बदला है क्या? 

Sunday, 13 December 2015

हाई स्पीड ट्रेन ही नहीं, हाई स्पीड ग्रोथ भी चाहते हैं : पीएम मोदी

तीन दिवसीय भारत दौरे पर आए जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के दौरे के दूसरे दिन की शुरुआत दिल्ली में बिजनेस लीडर फोरम से हुई। फोरम में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि वे हाई स्पीड ट्रेन ही नहीं, बल्कि हाई स्पीड ग्रोथ भी चाहते हैं। पीएम ने कहा कि ऐसा पहली बार होगा कि भारत से जापान कार आयात करेगा और जापानी कंपनियों की कारें भारत में बनेंगी। उन्होंने कहा कि भारत संभावनाओं का देश है और तकनीक इसकी ताक़त है. जापान में मेक इन इंडिया मिशन चल रहा है।
शिखर वार्ता में कई अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर हुई चर्चा
इन रणनीतिक समझौतों पर हस्ताक्षर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके जापानी समकक्ष शिन्जो आबे के बीच शिखर वार्ता के बाद हुए। इस शिखर वार्ता में दोनों नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में विस्तार सहित परस्पर रूप से महत्वपूर्ण कई अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा की।
रेल विकास के लिए 12 अरब डॉलर की मदद
आबे के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा ‘भारत के आर्थिक सपनों को सच करने में जापान से ज्यादा कोई मित्र मायने नहीं रखेगा।’ उन्होंने आबे को ‘एक निजी मित्र और भारत-जापान भागीदारी का बड़ा समर्थक बताया।’ हस्ताक्षरित समझौतों का जिक्र करते हुए मोदी ने कहा ‘गति, विश्वसनीयता और सुरक्षा के लिए जानी जाने वाली शिनकानसेन के माध्यम से मुंबई-अहमदाबाद सेक्टर में हाई स्पीड रेल चलाने का फैसला ऐतिहासिक से कम नहीं है।’ उन्होंने कहा कि परियोजना के लिए करीब 12 अरब डॉलर का महत्वपूर्ण पैकेज और बहुत आसान शर्तों पर तकनीकी सहायता सराहनीय है। पीएम मोदी ने कहा कि हमने असैन्य परमाणु ऊर्जा सहयोग पर हस्ताक्षर किए जो वाणिज्य एवं स्वच्छ ऊर्जा के लिए एक समझौते से कहीं ज्यादा है। यह एक शांतिपूर्ण तथा सुरक्षित दुनिया के लक्ष्य में रणनीतिक भागीदारी और परस्पर विश्वास के नए स्तर का एक शानदार प्रतीक है।’
वहीं, जापानी पीएम ने साझा बयान में अपने संबोधन की शुरुआत नमस्कार अभिवादन से साथ की, एक दो पंक्तियाँ हिंदी में बोलने की कोशिश भी की।
हाई स्पीड ट्रेन ही नहीं, हाई स्पीड ग्रोथ भी चाहते हैं : पीएम मोदी
तीन दिवसीय भारत दौरे पर आए जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के दौरे के दूसरे दिन की शुरुआत आज दिल्ली में बिजनेस लीडर फोरम से हुई। फोरम में पीएम नरेंद्र मोदी ने कहा कि वे हाई स्पीड ट्रेन नहीं, बल्कि हाई स्पीड ग्रोथ भी चाहते हैं। पीएम ने कहा कि ऐसा पहली बार होगा कि भारत से जापान कार आयात करेगा और जापानी कंपनियों की कारें भारत में बनेंगी। उन्होंने कहा कि भारत संभावनाओं का देश है और तकनीक इसकी ताक़त है और जापान में मेक इन इंडिया मिशन चल रहा है।
पीएम मोदी की स्पीड बुलेट ट्रेन की तरह : शिंजो आबे
वहीं, जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने अपने संबोधन की शुरुआत पीएम मोदी की तारीफ़ से की। उन्होंने कहा कि नीतियों को अमल में लाने में पीएम मोदी की स्पीड बुलेट ट्रेन की तरह है। साथ ही उन्होंने कहा कि मज़बूत जापान भारत के लिए अच्छा है।
दोनों प्रधान मंत्रियों ने वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती में हिस्सा लिया
सालाना शिखर वार्ता के बाद जापानी पीएम शिंज़ो आबे पीएम नरेंद्र मोदी के साथ उनके संसदीय क्षेत्र वाराणसी गए। दोनों देशों के प्रधानमंत्री यहां दशाश्वमेध घाट पर गंगा आरती में हिस्सा लिया। पीएम मोदी और शिंज़ो आबे के आगमन को लेकर वाराणसी में ख़ास तैयारियां हुई। गंगा घाटों की सफ़ाई के लिए मुंबई से स्टीमर मंगाए गए। घाटों को ख़ूबसूरती से सजाया गया। आरती में पारंपरिक मंत्रोच्चार के साथ नमामि गंगे के भजन भी गाए गए. पूरा ही वातावरण धार्मिक और आध्यात्मिक हो गया… राधा रमण हरि गोविन्द बोलो! और हर हर महादेव के स्वर से पूरा समारोह गुंजायमान हो गया.
पिछले साल अगस्त में जब पीएम मोदी जापान गए थे तो दोनों देशों के बीच वाराणसी को जापान के शहर क्योतो के तर्ज पर बसाए जाने का समझौता हुआ था।
इस समझौते की कुछ और खास बातें
जापान 5 साल में 35 बिलियन डॉलर का निवेश भारत में करेगा
प्रधान मंत्री मोदी ने कहा – 1 मार्च 2016 से जापानियों को वीजा ऑन अराइवल मिलेगा
रेलवे विकास के लिए १२ अरब डॉलर देगा जापान
द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने पर जोर देते हुए जापान ने 1,500 अरब युआन (करीब 83,000 करोड़ रुपये) का ‘मेक इन इंडिया’ कोष स्थापित किया है, जबकि भारत ने ‘जापान औद्योगिक शहर’ में निवेश आकर्षित करने के लिए एक विशेष प्रोत्साहन पैकेज लाने का वादा किया है।

एक ख़ास बात मोदी जी के व्यक्तित्व में है कि वे जिस भी कार्य में हिस्सा लेते हैं उसे अविश्मरनीय और लुभावना बना देते हैं ताकि मीडिया के कैमरे उन पर ही रहें और इस भव्य आयोजन को पूरा देश देखे. चाहे वह जापान में ड्रम बजाने का कार्यक्रम हो या वाराणसी में गंगा आरती का आयोजन. एक बौद्ध धर्म अनुयायी देश का प्रधान मंत्री गंगा आरती भी उसी तन्मयता से करे जैसे वह हमारे धर्म के अनुष्ठान को बखूबी समझता भी हो. इसे एक सर्व-धर्म-समभाव, सर्वे भवन्तु सुखिन: के साथ धार्मिक सहिष्णुता का प्रदर्शन भी कहा जा सकता है.
नफा नुक्सान और क्रियान्वयन कितना और कब तक होगा वो सब बाद में देख जाएगा, तत्काल कम से कम वाराणसी का खास इलाका गंगा का दशाश्वमेध घाट साफ़ और सुसज्जित तो हो गया, भले कल के बाद यही मीडिया के कैमरे बनारस की गलियों की गंदगी और मैली गंगा की छवि न दिखाने लग जाय! अभी तो सपने देखो और उसी में खो जाओ. मुझे नहीं पता इन सब योजनाओं के लिए संसद में मंजूरी लेनी पड़ती है या नहीं या सिर्फ गरीबों के लिए बिलों पर ही संसद में चर्चा की जरूरत होती है. आम गरीब तो टी वी देखें, सपने बुने, निवेश आयेगा. निवेश आयेगा तो नए उद्योग धंधे विकसित होंगे. रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, रोजगार होगा तो आमदनी बढ़ेगी. फिर दोपहिया वाहन या मोटर गाड़ी भी खरीदेंगे और उसे चलाकर करेंगे वायु प्रदूषण जिससे आज दिल्ली जूझ रही है. गंगा कब साफ़ होगी? जरूरत के सामान कब सस्ते मिलेंगे? स्किल इण्डिया, डिजिटल इण्डिया, स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत का सपना कहाँ है? भारत संचार निगम के अवरोधों से तो मैं रोज ही जूझता हूँ. मच्छर और चूहे भी अब वातानुकूलित जगहों में ही अपने आप को सुरक्षित महसूस करने लगे हैं. स्वच्छ भारत के सपने दिखानेवाले एक विश्वस्तरीय अस्पताल की बात बता रहा हूँ, जहाँ चिल्ड्रन वार्ड में भी मच्छरों और चूहों का उत्पात कम नहीं है. किसानों के खेत में पानी कब पहुंचेगा उनके उत्पाद के सही दाम कब मिलेंगे. गरीब के घरों में भी गैस के चूल्हे जलेंगे और उस चूल्हे पर रोटियां सेंकी जायेगी. बुन्देलखंड के गरीबों को भरपेट भोजन कब मिलेगा, मीडिया दिखला रहा है कि वे घास-पात की रोटी और भाजी खाने को मजबूर हैं. हर घर में बिजली का सपना भी देख ही रहे हैं. गरमी के दिनों में बिजली की मांग और आपूर्ति में कितना अंतर रहता है, वह भी हम सब जानते हैं और डीजल से चलनेवाले जेनेरेटर कितना प्रदूषण बढ़ाते हैं वह भी पर्यावरणविद ही बताएँगे. बिहार के चुनाव का परिणाम और गुजरात के निकाय चुनाव कुछ तो सन्देश देते हैं. संविधान दिवस पर संसद में बाबा साहब के खूब गुण गाये गए सहिष्णुता पर भी खूब चर्चा हुई पर अब जो संसद में हो रहा है वह भी मीडिया के कैमरे में ही दीखता है.
भ्रष्टाचार की स्थिति कैसी है? सबको पेट भरने को अनाज मिल रहा है तो? कुछ नए गोदाम बने हैं क्या? ताकि अनाज को सड़ने से बचाया जा सके. सरकारी कर्मचारी और अधिकारी अपनी क्षमता का पूर्ण उपयोग कर रहे हैं क्या? संसद की स्थिति कब ठीक होगी या यूं ही हो हल्ला मचता रहेगा?
जलवायु परिवर्तन पर समझौते हो गए हैं, उन्हें लागू कैसे किया जायेगा? दिल्ली को प्रदूषण से छुटकारा कब मिलेगा? चेन्नई, कश्मीर, उत्तराखंड में उपजी प्राकृतिक आपदा की समस्या से कब निजात पाएंगे? अनावृष्टि और अतिवृष्टि, भूस्खलन आदि प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए हम कब पूर्णत: तैयार होंगे? भारत विविधताओं का देश है तो समस्याएं भी यहाँ अनगिनत है. शिक्षा, स्वास्थ्य, पेय जल, सबको अपना घर कब तक सुलभ हो सकेगा? हाई स्पीड ग्रोथ हो रहा है तो? फिलहाल तो भोले बाबा तेरा सहारा है. माँ गंगा को निर्मल गंगा बनाना है ताकि हम नमामि गंगे कहने बार बार आ सकें. गंगा तेरा पानी अमृत!
- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

Monday, 7 December 2015

जी एस टी बिल यानी वस्तु और सेवा कर अधिनियम

जी एस टी का पूरा नाम गुड्स (वस्तु) एंड सर्विस (सेवा) टैक्स है, जो केंद्र और राज्यों द्वारा लगाए गए 20 से अधिक अप्रत्यक्ष करों के एवज में लगाया जा रहा है। जीएसटी लागू होने के बाद सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स, एडिशनल कस्टम ड्यूटी (सीवीडी), स्पेशल एडिशनल ड्यूटी ऑफ कस्टम (एसएडी), वैट/सेल्स टैक्स, सेंट्रल सेल्स टैक्स, मनोरंजन टैक्स, ऑक्ट्रॉय एंड एंट्री टैक्स, परचेज टैक्स, लक्ज़री टैक्स खत्म हो जाएंगे। जीएसटी लागू होने के बाद वस्तुओं एवं सेवाओं पर केवल तीन तरह के टैक्स वसूले जाएंगे। पहला सीजीएसटी, यानी सेंट्रल जीएसटी, जो केंद्र सरकार वसूलेगी। दूसरा एसजीएसटी, यानी स्टेट जीएसटी, जो राज्य सरकार अपने यहां होने वाले कारोबार पर वसूलेगी। कोई कारोबार अगर दो राज्यों के बीच होगा तो उस पर आईजीएसटी, यानी इंटीग्रेटेड जीएसटी वसूला जाएगा। इसे केंद्र सरकार वसूल करेगी और उसे दोनों राज्यों में समान अनुपात में बांट दिया जाएगा।
जीएसटी पर संसद में कानून – विश्व के लगभग 160 देशों में जीएसटी की कराधान व्यवस्था लागू है। भारत में इसका विचार अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा सन् 2000 में लाया गया। यूपीए सरकार के तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदम्बरम द्वारा फरवरी, 2007 में ठोस शुरुआत करते हुए मई, 2007 में जीएसटी के लिए राज्यों के वित्तमंत्रियों की संयुक्त समिति का गठन कर वर्ष 2010 से इसके लागू करने की घोषणा की गई, क्योंकि जीएसटी से राज्यों के अर्थतंत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा, इसलिए इस बिंदु पर 13वें वित्त आयोग द्वारा गठित कार्यदल ने दिसंबर, 2009 तथा 14वें वित्त आयोग ने फरवरी, 2015 में जीएसटी पर अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी है।
राज्यों के बीच विरोधाभास होने पर अप्रैल, 2010 से कांग्रेस सरकार इसे लागू कराने में विफल रही। तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा मार्च, 2011 में 115वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, जो गठबंधन सरकार के युग में विपक्ष के विरोध की वजह से पारित नहीं हो सका। बीजेपी द्वारा जीएसटी को अपने आर्थिक सुधारों का केंद्रबिंदु बताया जा रहा है तथा मोदी सरकार ने 122वां संविधान संशोधन विधेयक (अनुछेद 246, 248 एवं 268 इत्यादि में संशोधन) दिसंबर, 2014 में संसद में पेश किया, जिसे लोकसभा द्वारा मई, 2015 में पारित कर दिया गया।
जीएसटी विधेयक राज्यसभा में लंबित है, सेलेक्ट कमेटी की रिपोर्ट 9 दिसंबर को मिलने की संभावना है, तथा 10 को सरकार इस बिल को राज्यसभा में पारित करने के लिए पेश कर सकती है। वैसे, इसे पारित कराने के लिए मोदी सरकार के पास राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत नहीं है। कांग्रेस द्वारा प्रेरित टैक्स सुधार का पूरा क्रेडिट मोदी सरकार द्वारा लेने से जीएसटी के प्रति विपक्षी दलों में असहिष्णुता पनपी है, जो वर्तमान संसदीय गतिरोध एवं असहयोग का प्रमुख कारण है।
जीएसटी से प्रस्तावित लाभ – आइए जानते हैं, जीएसटी में ऐसा क्या है, जिससे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, 18 महीने में पहली बार कांग्रेस के नेताओं को ‘चाय पे चर्चा’ पर बुलाने के लिए मजबूर हो गए।
• सरकार के अनुसार जीएसटी आज़ादी के बाद टैक्स सुधार का सबसे बड़ा कदम है, जिससे जीडीपी में वृद्धि और रोज़गारों का सृजन होगा।
• केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अमेरिकी कॉरपोरेट क्षेत्र की चिंताओं को दूर करने के अपने प्रयासों के तहत पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स को दिए गए संबोधन में कहा कि जीएसटी व्यवस्था आने से भारत एक बड़े और एकीकृत बाज़ार के रूप में तब्दील होगा और जटिल करारोपण खत्म होने से विदेशी निवेशकों को आसानी होगी।
• एसोचैम के अनुसार छोटे या मध्यम उद्योग समूह (SMEs), जो असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, को इस टैक्स सुधार कानून से काफी फायदा होगा।
• 13वें केंद्रीय वित्त आयोग के अनुसार जीएसटी से कर संकलन में हो रहे कई तरह के व्यर्थ के खर्चों को रोकने में सहायता मिलेगी, जिससे राज्यों की आर्थिक हालात में सुधार होगा।
• 14वें वित्त आयोग के अनुसार जीएसटी से उन राज्यों को फायदा होगा, जहां कर रिसाव (टैक्स लीकेज) की वजह से कर संकलन प्रणाली में भ्रष्टाचार चरम पर है।
• जीएसटी लागू होने से हर सौदा इस कर व्यवस्था के तहत आ जाएगा, जिससे लोगों के लिए करों की चोरी कर पाना आसान नहीं होगा, इसीलिये जीएसटी को काले धन से निबटने के विरुद्ध मज़बूत हथियार के तौर पर देखा जा रहा है।
कांग्रेस की मांग – जब कांग्रेस इस बिल का सूत्रधार थी, तब बीजेपी-शासित गुजरात जैसे राज्य इसका विरोध करते थे। अब पासा पलट गया है। कांग्रेस अब जीएसटी बिल पर असहयोग कर रही है और बीजेपी जीएसटी की सबसे बड़ी लम्बरदार बनकर सामने आई है। जीएसटी पर बनी राज्यसभा सेलेक्ट कमेटी में कांग्रेस के तीन सदस्यों – मधुसूदन मिस्त्री, मणिशंकर अय्यर तथा भालचंद्र मुंगेकर – ने असहमति जताते हुए एक नोट दाखिल किया है। उनका दावा है कि संविधान संशोधन बिल में हालात से समझौता करते हुए इतने अपवाद छोड़ दिए गए हैं कि इसका समर्थन करना नामुमकिन हो गया है।
सरकार के अनुसार 32 में से 30 राजनीतिक दलों द्वारा इस बिल पर राज्यसभा में सहयोग का आश्वासन मिल गया है, परन्तु कांग्रेस के समर्थन के बगैर संसद में दो-तिहाई बहुमत और आधे राज्यों की सहमति मुश्किल है और इस पर कोई फैसला सोनिया गांधी की विदेश यात्रा के बाद ही संभव हो सकेगा। कांग्रेस इस कानून को पारित होने में विलंब कर राजनीतिक मोल-भाव के अलावा मोदी सरकार को झटका भी देना चाहती है।
विलंब होने से जीएसटी की कर व्यवस्था 2019 के आम चुनावों के पहले अप्रैल, 2017 से ही लागू हो पाएगी। मलेशिया और अन्य देशों की तर्ज़ पर जीएसटी लागू होने के शुरुआती तीन साल में भारत में भी महंगाई बढ़ने की आशंका है, जिससे वर्ष 2019 के आम चुनावों में बीजेपी की अलोकप्रियता बढ़ेगी, जिससे कांग्रेस को राजनीतिक फायदा हो सकता है। राज्यों के हित के नाम पर कांग्रेस द्वारा जीएसटी बिल में निम्न संशोधनों की मांग रखी गई है…
• कांग्रेस की पहली मांग है कि तमिलनाडु, महाराष्ट्र और गुजरात जैसे उत्पादक राज्यों को मिलने वाले एक फीसदी अतिरिक्त टैक्स के लाभ को खत्म किया जाए, जबकि बीजेपी-शासित राज्य इस मांग को माने जाने के खिलाफ हैं।
• कांग्रेस की दूसरी मांग है कि बिल में टैक्स की ऊपरी सीमा 18 प्रतिशत तय कर इसका प्रावधान संविधान संशोधन में किया जाए, ताकि भविष्य में सरकार मनमाने तरीके से टैक्स में बढ़ोतरी न कर सके। सरकार ने कांग्रेस पार्टी की इस मांग पर विचार करने के लिए मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया है, जिसकी रिपोर्ट बहुत जल्द आने की उम्मीद है।
• कांग्रेस की तीसरी मांग है कि केंद्र और राज्यों के बीच टैक्स विवाद निपटाने के लिए पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में ट्रिब्यूनल पंचाट के गठन का प्रावधान हो, जिसमें जीएसटी काउंसिल का दखल न हो।
• कांग्रेस की चौथी मांग के अनुसार जीएसटी से राज्यों के स्थानीय निकायों यथा नगर पालिकाओं और पंचायतों की वित्तीय स्वायत्तता पर कुठाराघात होगा, जिसके मुआवजे की व्यवस्था हेतु इस बिल में प्रावधान होना चाहिए।
उपर्युक्त आलेख (श्री विराग गुप्ता जो सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और टैक्स मामलों के विशेषज्ञ हैं…) के ब्लॉग से लिया गया है. पाठकों की जानकारी के लिए इसे यहाँ उद्धृत किया गया है.
मेरी अपनी राय यही है कि इधर प्रधान मंत्री श्री मोदी काफी विनम्र हुए हैं, उसका कारण शायद बिहार के चुनावों में मिली जबर्दश्त पराजय और देश में हो रही असहिष्णुता के प्रति विरोध प्रदर्शन हो. जब अधिकांश पार्टियाँ चाहती है कि यह बिल पास हो जाय तो जनता के हित में कांग्रेस को इसका समर्थन करना चाहिए. सूत्रों के अनुसार सरकार भी कांग्रेस अधिकांश सुझावों पर विचार करने का मन बना लिया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि यह बिल राज्य सभा में पारित हो जाय और आर्थिक सुधारों पर सरकार आगे बढ़े ताकि देश आगे बढ़े. प्रधान मंत्री ने भी कहा है कि यह देश राज्यों के मजबूत खम्भों पर ही टिका है. अगर बहुमत की सरकार भी वांछित नियम न बना पाए तो प्रश्न तो उठेंगे. वैसे भी संसद के वर्तमान सत्र का पहला सप्ताह संविधान और असहिष्णुता पर चर्चा में ही बीत गया. इस चर्चा में सभी ने अपने अपने राजनीतिक नफा नुक्सान के अनुसार ही भड़ास निकले. कुछ सार्थक परिणाम निकल कर सामने आए हो, ऐसा दीखता नहीं. इसलिए प्रधान मंत्री के अनुसार ही सहमति से कुछ सुधार करें, जिसकी उम्मीद में आम जनता टकटकी लगाये हुए है. कुछ तो सकारात्मक होना चाहिए. नकारात्मकता अंततोगत्वा विनाशकारी ही होती है. इसलिए कहीं तो सकारात्मकता दिखलाइये. – जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

Sunday, 22 November 2015

जनता आखिर क्या करे?

डिजिटल इंडिया, मेक इन इण्डिया, शाइनिंग इण्डिया, स्किल इंडिया, स्वच्छ भारत, हिन्दू राष्ट्र, विश्वगुरु बनता हुआ भारत, बुलेट ट्रेन, स्मार्ट सिटी, सबको अपना घर, सबका साथ सबका विकास, अबकी बार मोदी सरकार, कांग्रेस मुक्त भारत, भ्रष्टाचार मुक्त भारत, २४ घंटे बिजली, साफ़ सुथरी सड़कें, शिक्षित भारत, संपन्न भारत, नमामि गंगे, गोरक्षा, जन-धन, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, सेल्फी विथ डॉटर ….. आदि सपना बहुत अच्छा है. पर, इसका कुछ असर धरातल पर तो दिखना चाहिए. सचमुच क्या भारत में उसके कुछ लक्षण दिखने शुरू हुए हैं. क्या कानून का राज स्थापित हो गया है? क्या सरकार पूर्ण पारदर्शिता के साथ काम कर रही है? क्या महिलाएं सुरक्षित महसूस कर रही हैं? क्या पढ़े लिखे बेरोजगार युवाओं को रोजगार मिलने में तेजी आयी हैं? क्या विदेशी निवेश आना शुरू हुआ है? क्या नए उद्योग धंधे स्थापित होने शुरू हो गए है? क्या जाति-पाति या धर्म के आधार पर भेद करना कम हो गया है? … चीजों के दाम कम हुए या बढे? जितनी उम्मीद थी और जिस उत्साह के साथ जनता ने मोदी सरकार को स्पष्ट जनादेश दिया था, उसके अनुरूप कुछ खास परिवर्तन गत डेढ़ साल में नहीं दिखा…. बिहार में आपने सभी चाल चल कर देख लिए, सभी चालें उल्टी पड़ गयी, क्योंकि आपने सिर्फ विरोधियों को गाली दी, अपने डेढ़ साल की उपलब्धियों की चर्चा नहीं की. आपने भी गलत लोगों के टिकट दिया, जिसका आरोप आपके साथी ही लगाते रहे. आपने नीतीश, लालू, सोनिया, राहुल को जितनी भी गालियां दी, उसका असर यह हुआ कि उनके प्रति जनता की सहानुभूति बढ़ गयी. नीतीश के काम बोलते हैं और लालू के जुबान. आपने भी लालू के जुबान में बात की …आपसे ऐसी अपेक्षा न थी. फिर आपमें और लालू प्रसाद में अंतर क्या रहा? अब परिणाम सामने है. जिस जनता ने आपको अभूतपूर्व बहुमत से सत्ता सौंपी थी, उसी जनता ने आपको नकार दिया और दूसरे विकल्प का चुनाव किया. अब जो भी परिणाम है, सामने है. नीतीश का कद ऊंचा हुआ और देश में एक नया विकल्प मोदी विरोध में पनपने लगा है. आपने नीतीश को अहंकारी कहा था, पर अहंकार आपमें और आपके सिपहसालारों में कूट-कूट कर भरा था. जनता सब कुछ देखती है और उपलब्ध बेहतर विकल्प का चुनाव करती है. जनता को कम-से-कम दाल-रोटी तो चाहिए होता है न! आपने दाल, प्याज, सरसों तेल एवं अन्य जरूरी सामानों के दाम बढ़ने दिए. जमाखोरों को बहुत बाद में पकड़ा, आयात भी देर से किया. तब भी परिणाम बहुत सकारात्मक नहीं निकला. आप गैर जरूरी मुद्दे उठाते रहे और आपकी सारी मिहनत बेकार चली गयी.
तीसरी बार सत्ता सम्हालने के तुरंत बाद नीतीश कुमार ने सर्वप्रथम कानून ब्यवस्था पर ही मीटिंग की और अधिकारियों को सख्त निर्देश दिया कि कानून तोड़नेवाले बख्से नहीं जायें, चाहे वह व्यक्ति किसी भी पद पर क्यों न हो! उप मुख्य मंत्री तेजस्वी के बारे में सवाल उठाने लगे तो तेजस्वी ने भी अपनी सफाई पेश करते हुए कहा कि वे नीतीश कुमार के विकास कार्यों में हर सम्भव सहयोग करेंगे. किसी भी किताब के कवर को देखकर उसके अंदर के तथ्य का अंदाजा लगाना गलत है.
अब मैं कुछ वरिष्ठ पत्रकारों की राय प्रस्तुत कर रहा हूँ. हरिशंकर ब्यास लिखते हैं-
बिहार में नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेना उनकी राष्ट्रीय भूमिका की तैयारी का एक संकेत है। शपथ ग्रहण में जिस तरह से देश भर के नेताओं का जमावड़ा लगा, उससे अपने आप नीतीश की छवि अखिल भारतीय नेता की बनी है। लेकिन यह संशय बना हुआ है यह दूसरे मोर्चे की राजनीति है या तीसरे मोर्चे की! नीतीश कुमार की रणनीति से जुड़े नेताओं का कहना है कि नीतीश कुमार के ब्रांड को दूसरे और तीसरे मोर्चे की राजनीति से ऊपर रखना है, इसलिए उन्होंने इस समारोह को कांग्रेस का समारोह भी बनने दिया। लोकसभा चुनाव में हार के बाद यह पहला मौका था, जब कांग्रेस देश भर में अपने कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ा सकती थी। इस बात को समझते हुए भी कि कांग्रेस इस जीत से अपनी ब्रांडिंग कर रही है. बिहार की आगे की राजनीति और केंद्र की राजनीति के लिए यह जरूरी है। इसके अलावा उन्होंने तीसरे मोर्चे की संभावित पार्टियों में लेफ्ट सहित कई पार्टियों को बुलाया तो संघीय मोर्चे की संभावित पार्टियों के नेताओं को भी न्योता दिया। इस तरह से उन्होंने अपने को भाजपा विरोधी राजनीति की धुरी बनाने की कोशिश की है।
वे आगे लिखते हैं – नेता तब अपनी कब्र खोदता है, जब वह ब्रांड की फितरत में होता है। व्यक्ति अपने विचार, जमीन, मेहनत, भाग्य, परिस्थितियों से सत्ता पाता है और सत्ता उसे मुगालते में डालती है। उसे ब्रांड के फेरे में फंसाती है। नेहरू अपने इंडिया के आईडिया हो जाते हैं! इंदिरा वही इंडिया हो जाती हैं तो वाजपेयी शाईनिंग इंडिया वाले बनते हैं! सत्ता ज्यों-ज्यों बड़ा आकार लेती है, मुगालता बढ़ता है। यह नरेंद्र मोदी के साथ हुआ है, हो रहा है। कभी नरेंद्र मोदी पांच करोड़ गुजरातियों की बात करते थे। आज सवा अरब लोगों का हुंकारा मारते हैं। अपने को सुपर वैश्विक ब्रांड हुआ मान रहे हैं। इसमें भी हर्ज नहीं है, लेकिन इस ब्रांड एप्रोच में दिक्कत यह है कि सब प्रायोजित या नकली हो जाता है। जमीन से जुड़ाव टूट जाता है। नेता को पता नहीं पड़ता कि कब उसकी कमाई पूण्यता चूक गई है। वह कैसे नकली जीवन, नकली नारों, नकली उपलब्धियों में जी रहा है! हर तरह से नकली परिवेश, नकली लोग, नकली प्रबंधक, नकली मंत्रियों में घिरा हुआ एक ब्रांड!
नरेंद्र मोदी का आज का मुकाम मंझधार से कुछ पहले का है। अभी पीछे ओरिजनल गुजरात ब्रांड की तरफ लौटने की कुछ गुंजाइश है लेकिन दिल्ली के चेहरों, परिवेश और सिस्टम ने सुपर ब्रांड बनने की उनमें जो धुन पैदा की है उससे मुक्ति, पीछे हो सकना आसान नहीं है। वे अपने सुपर ब्रांड की वेल्यू सवा अरब लोग कूत रहे हैं। वे अपनी ब्रांड एंबेसडरी से अऱबों-खरबों डालर भारत आता देख रहे हैं। वे नित दिन लोक-लुभावन शो, उत्सव कर रहे हैं। उन्होंने और उनके प्रबंधकों ने 2019 तक के रोड शो, उत्सव, झांकियों, घोषणाओं, भाषणों, वैश्विक नेताओं से मुलाकातों, शिखर वार्ताओं, उद्यमियों-कारोबारियों के जमावड़ों की लंबी चौड़ी सूची बना ली है। सबकुछ भव्यता, ऊंचाईयां लिए हुए होगा जिसमें आकर्षण के नंबर एक सुपर ब्रांड होंगे-नरेंद्र मोदी!
सोचें कितना रूपहला, मनमोहक, धुनी महासंकल्प है यह! लेकिन यह सब मायावी है। इसलिए कि जनता को ब्रांड नहीं चाहिए। उसे अपने मध्य का अपने जैसा, अपनापन बताने वाला नेता चाहिए। उसे दाल चाहिए। उसे टमाटर चाहिए। उसे बिजनेस आसान नहीं जीना आसान चाहिए। यह बहुत गलत बात है, गलत थ्योरी है कि नरेंद्र मोदी से जनता को बड़ी-बड़ी उम्मीदें हैं। बड़ा विकास चाहिए। ऐसा कतई नहीं है। इन सबकी नरेंद्र मोदी से यह मामूली अपेक्षा थी और है कि वे उनका जीना आसान बनाएंगे। ये सब चाहते हैं कि वह सब न हो जो कांग्रेस के राज में होता है या जातिवादी क्षत्रपों की कमान में हुआ करता है। मतलब मनमानी, भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण नहीं हो। इसमें भी नंबर एक बात भ्रष्टाचार मिटने की चाह थी। लेकिन नरेंद्र मोदी ने सत्ता संभालने के बाद निज आत्ममुग्धता में यह ख्याल पाला कि वे खाते नहीं हैं, तो पंचायत में मनरेगा की मजदूरी भी नहीं खाई जा रही होगी। जाहिर है ऐसा सोचना और उस अंतिम व्यक्ति पर पड़ रही भ्रष्टाचार की मार को भुला बैठना ही मोदी के नकली परिवेश, नकली ख्याल, नकली ग्लैमर का नंबर एक प्रमाण है।
नौजवानों ने इतना भर चाहा कि उन्हें छोटा ही सही कुछ काम मिले। इनका मन छोटी नौकरी या छोटे बेरोजगारी भत्ते से भी उछलने लगता। मई 2014 में परिवर्तन की ट्रेन में जो संघी, भाजपाई, हिंदूवादी, राष्ट्रवादी बैठे थे वे सिर्फ वैचारिक खुराक का संतोष चाहते हैं। इन्हें इतना भर चाहिए था कि प्रधानमंत्री, मंत्रियों के निवास के दरवाजे-खिड़की उनके लिए खुले रहें। इन्होंने सहज यह उम्मीद बनाई थी कि यदि अपनी सरकार आई है तो उन्हें वह मौका मिलेगा, वह मान-सम्मान मिलेगा, वे पद मिलेंगे, वे नई संस्थाएं, नए सत्ता टापू बनेंगे जो नेहरू के आईडिया ऑफ इंडिया के प्रतिस्थापन की नींव, उनके ख्यालों के भारत की तस्वीर-तकदीर बना सके। निज ब्रांड, निज ख्याल, नकली परिवेश, नकली चेहरे जमीन पर नहीं रहा करते। वे मंच पर अभिनय करते हैं। ड्राइंग रूम में होते हैं और दिल्ली के इनसाइडर में रमे होते हैं। सो लाख टके का सवाल है कि नकली दुनिया से बाहर निकल नरेंद्र मोदी पीछे लौट मोहन भागवत के साथ क्या विचार करेंगे?
अब इस नयी नीतीश सरकार को भी कुछ समय देना बनता है ताकि वे कुछ नए फैसले लें और जनता की उम्मीदों, अपेक्षाओं पर खरे उतरें… शुभकामनाओं के साथ, जय बिहार!
- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

Saturday, 14 November 2015

मोदी का दीवाना हुआ लंदन

आज पूरे विश्व में मूल रूप से दो समस्या है – एक आतंकवाद और दूसरा ग्लोबल वार्मिंग.
आतंकवाद से पूरा विश्व किसी न किसी रूप में ग्रसित है. इसका सबसे ताजा उदाहरण फ्रांस ही है. जिसमे सैंकड़ो लोग मारे गए हैं और हजारों प्रभावित हुए हैं. इसके पहले भी जनवरी में फ्रांस के एक प्रेस 'शार्ली हेब्दो’ के मुख्यालय पर हुआ था जहाँ ११ लोग मारे गए थे.
ग्लोबल वार्मिंग भी आने वाले समय में पूरे विश्व को तकलीफ देनेवाले हैं. इन दोनों विषयों पर पूरे विश्व को चिंतन कर इसके स्थायी हल की तरफ कार्य करने की जरूरत है.
जिस तरह से प्रधान मंत्री मोदी का स्वागत लंदन के वेम्बली स्टेडियम में हुआ है, जिस तरह से वहां रहनेवाले भारतीयों ने प्रधान मंत्री का शानदार स्वागत किया है यह भारत के लिए गर्व की बात तो है ही. प्रधानमंत्री ऐसे मौकों पर अपने आप को बेहतरीन ढंग से पेश करने में हर संभव कोशिश करते हैं, जैसे ग्लोबल वार्मिंग से मुक्ति के लिए दुनिया के १०२ देशों को आह्वान किया कि वे सूर्यपुत्र हैं और वहां सूर्य की रोशनी भरपूर रहती है तो क्यों नहीं सौर उर्जा को इन देशों में बढ़ावा दिया जाय इससे गैरपारंपरिक बिजली तो मिलेगी ही, कोयले, पानी आदि प्राकृतिक संसाधनों की बचत भी होगी और ग्रीन हाउस गैसों का उत्पादन भी कम होगा. बिजली की बचत भी जरूरी है, साथ ही जरूरी है भारत के उन १८००० गांवों में बिजली पहुँचाना, जो अभी भी बिजली के पहुँच से दूर हैं. प्रधान मंत्री ने अपने भाषण में अलवर, राजस्थान के इमरान खान की भी चर्चा की जिसने मोबाइल में में ५० फ्री एजुकेशनल एप्प बनाये है. वेम्बली में लगभग ६०० भारतीय कलाकारों ने अपने हुनर का प्रदर्शन किया जिससे विदेशों में हमारा सर ऊंचा हुआ. वहीं से उन्होंने अहमदाबाद से लंदन के लिए डायरेक्ट फ्लाइट की भी घोषणा की, जिससे वहां उपस्थित अधिकांश गुजराती और पंजाबी लोगों में हर्ष की लहर दौर गयी. मोदी के अच्छे दिन की चर्चा डेविड कैमरन ने भी की. सबसे बड़ी बात तो मुझे यह लगी की लेडी कैमरन वहां साड़ी में नजर आयीं और पूरे कार्यक्रम में वे भी मौजूद रहे.
''ब्रेनड्रेन'' देशप्रेमी भारतीयों के लिए सदैव दुख का विषय रहा है. पर दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण रहा कि तमाम प्रतिभाओं को स्वदेश में अनुकूल माहौल और सम्मान न मिलने के कारण ही उन्हें विदेश में रोजी-रोटी तलाशनी पड़ी. प्रवासी भारतीय अब हर देश में पचासों हजार की तादाद में मोदी-मोदी के नारे लगाते हुए अपनी खुशी और उत्साह का प्रदर्शन कर रहे हैं. जाहिर है कि उन्हें 'मोदी' से कोई लगाव हो या न हो भारत के उस प्रधानमंत्री को देखकर उन्हें खुशी होती है जिसने कई दशक बाद भारत को विदेशी धरती पर एक 'खास सम्मान' दिलाया है. मोदी के नेतृत्व में ''भारत को जो सम्मान और रुतबा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर'' मिल रहा है, उसने प्रवासी भारतीयों का सीना ''छप्पन'' का कर दिया। आत्म-गौरव उन्हें प्रफुल्लित कर रहा है. इसका सार्वजनिक प्रदर्शन करने से वो गुरेज नहीं कर रहे. उनका दबा हुआ भारत-प्रेम मोदी को देखकर कुलांचे मार रहा है. मोदी ने दशकों बाद उन्हें वह खुशी व्यक्त करने का मौका दिया जिसकी चाहत वर्षों-दशकों से वो सीने में दबाये हुए थे. ''मोदी-मोदी'' के उनके नारे में वास्तव में ''भारत-भारत की हुंकार'' ही छिपी है.
अब आते है वहां के संवाददाताओं से पूछे गए सवाल और मोदी के जवाब पर -
“भारत बुद्ध की धरती है, गांधी की धरती है और हमारी संस्कृति समाज के मूलभूत मूल्यों के खिलाफ किसी भी बात को स्वीकार नहीं करती है. हिन्दुस्तान के किसी कोने में कोई घटना घटे, एक हो, दो हो या तीन हो.. सवा सौ करोड़ की आबादी में हमारे लिए हर घटना का गंभीर महत्व है. हम किसी को टॉलरेट (बर्दास्त) नहीं करेंगे. कानून कड़ाई से कार्रवाई करता है और करेगा। भारत एक विविधिता पूर्ण लोकतंत्र है जो संविधान के तहत चलता है और सामान्य से सामान्य नागरिकों, उनके विचारों की रक्षा को प्रतिबद्ध है, कमिटेड है”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीबीसी के रिपोर्टर के एक प्रश्न के जबाब में यह बातें कहीं. उस संवाददाता ने यह प्रश्न किया था कि भारत क्यों लगातार असहिष्णु स्थल बनता जा रहा है? उस रिपोर्टर ने भारत में हाल की असहिष्णुता की घटनाओं का हवाला भी दिया था. प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ उचित जबाब दिया बल्कि सारी दुनिया को यह आश्वासन भी दिया कि भारत के किसी भी हिस्से में असहिष्णुता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.- हालाँकि यह बातें बहुत पहले भारत में कही जानी चाहिए थी. इसे कहने में श्री मोदी ने काफी देर कर दी और दूसरे-दूसरे मुद्दे में उलझकर रह गए, फलस्वरूप बिहार में उनकी पार्टी तीसरे नंबर की पार्टी बनकर रह गयी.
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के साथ वार्ता के बाद जो संयुक्त संवाददाता सम्मेलन हुआ ‘द गार्डियन’ के रिपोर्टर ने पीएम मोदी से लंदन की सड़कों पर हो रहे प्रदर्शन के बारे में पूछा था और गुजरात में उनके कार्यकाल पर भी सवाल खड़ा किया था कि लंदन की सड़कों पर यह कहते हुए प्रदर्शन हुए हैं कि गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर उनके रिकॉर्ड को देखते हुए वह उस सम्मान के हकदार नहीं हैं, जो विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता को सामान्य तौर पर मिलता है.  
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने जवाब में कहा, “अपना रिकॉर्ड दुरुस्त कर लीजिए. 2003 में मैं यहां आया था और मेरा बहुत स्वागत, सम्मान हुआ था. यू.के. ने मुझे कभी यहां आने से नहीं रोका. कोई प्रतिबंध नहीं लगाया. मेरे समायाभाव के कारण मैं यहां नहीं आ पाया, यह अलग बात है. कृपया अपना परसेप्शन (नजरिया) ठीक कर लें” प्रधानमंत्री मोदी ने उस रिपोर्टर को बहुत सटीक, सही और करारा जबाब देकर निरुत्तर कर दिया.   
‘द गार्डियन’ समाचार पत्र के एक पत्रकार ने संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में मोदी के साथ खड़े ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन से सवाल किया कि मोदी का देश में स्वागत करते हुए वे कितना सहज महसूस कर रहे हैं, खासकर इस तथ्य को देखते हुए कि उनके प्रधानमंत्री पद के पहले कार्यकाल के समय मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर ब्रिटेन आने की अनुमति नहीं दी गई थी. कैमरन ने अपने जवाब में कहा, “मुझे मोदी का स्वागत करने में प्रसन्नता है. वह एक विशाल और ऐतिहासिक जनादेश के बाद यहां आए हैं. जहां तक अन्य मुद्दों का सवाल है, उसकी कानूनी प्रक्रियाएं हैं.”  
बिट्रिश प्रधानमंत्री ने कितना सटीक जबाब दिया है. हमारे देश में प्रधानमंत्री मोदी को मिले जिस विशाल और ऐतिहासिक जनादेश की आज विदेशों में जय-जयकार हो रही है. जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ब्रिटिश संसद में दिए गए भाषण की तारीफ़ की है और एक अच्छे राजनीतिज्ञ का परिचय दिया है. उन्होंने एक ट्विटर अकाउंट पर किए गए एक ट्वीट के जवाब में कहा, ‘भारतीय प्रधानमंत्री ने ब्रिटिश संसद में वहां के सांसदों के समक्ष बेहतरीन भाषण दिया. हम उससे क्यों गौरवान्वित नहीं हो सकते.’ यह देश के लिए गौरव की बात है,
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेहद शानदार और कई मायनों में ऐतिहासिक भाषण ब्रिटिश संसद में दिया. उसकी जितनी भी तारीफ़ की जाये, वो कम है. अपने ब्रिटेन दौरे के अंतर्गत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न सिर्फ ब्रिटिश पार्लियामेंट में शानदार और ऐतिहासिक भाषण दिया, बल्कि लंदन के वेंबले स्टेडियम में भारतीय समुदाय के 60 हजार से ज्यादा लोगों की रिकार्डतोड़ और ऐतिहासिक भीड़ को सम्बोधित करते हुए कहा कि ‘हम दुनिया से अब मेहरबानी नहीं चाहते. हम बराबरी चाहते हैं, मैं 18 महीनों के अनुभव से कह सकता हूं कि आज भारत के साथ जो भी बात करता है बराबरी से बात करता है.’ यह पूरे देश के लिए गौरव की बात है. उन्होंने कहा कि ‘भारत अब विकास के पथ पर चल पड़ा है. भारत के गरीब रहने का कोई कारण नजर नहीं आता. दुनिया भारत में एक नई संभावना देख रही है. भारत के प्रति दुनिया का नजरिया बदला है. पहले हाथ मिलाते थे अब हाथ पकड़ कर रखते हैं. यह बदलाव भारत की सफलता की निशानी है.’
अब आता हूँ अपनी बात पर. कुछ बातों पर मोदी जी अपनी ही पीठ बार-बार ठोकते नजर आते हैं. जनधन, स्वच्छता आदि पर वे बहुत बार बोल चुके हैं. तीस से अधिक विदेश यात्राओं के अगर परिणाम दिखेंगे तो बोलने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी. कृषि, शिक्षा और स्वास्थ्य में अपेक्षित निवेश और रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे ताकि ये भारतीय विदेशों की जगह अपने देश में ही रहकर देश का अपेक्षित विकास करें. भारत के नौजवान मोदी जी को आशा भरी नजरों से देख रहे हैं. उनका प्रयास यथोचित है पर उनकी टीम के कुछ लोग या अफसरशाही उनके कार्य में रोड़ा अटका रही है. उन्हें इससे आगे निकलना ही होगा. सबको साथ लेकर चलने की प्रतिबद्धता का मतलब विपक्ष को भी साथ लेकर चलना होना चाहिए. कौन विपक्ष जनता और देश का विकास नहीं चाहेगा और अगर नहीं चाहेगा तो जनता उसका जवाब देगी.  जयहिंद! जय भारत!

– जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

Sunday, 18 October 2015

साहित्यकार विरोध कैसे करें ?


देश  में बढ़ रही असहिष्णुता और प्रधान मंत्री की चुप्पी के विरोध में बहुत सारे जाने-माने साहित्यकार अपने पुरस्कार लौटाकर विरोध कर रहे हैं. इसकी शुरुआत हिंदी के जाने माने लेखक उदय प्रकाश ने कन्नड़ लेखक एम एम कुलबर्गी की हत्या के विरोध में किया. फिर नयनतारा सहगल ने यह कहकर वापस किया कि भारतीय संस्कृति की विविधता और वाद विवाद पर भयंकर प्रहार हो रहे हैं. इसके बाद अशोक बाजपेयी ने भी ऐसा ही किया और कहा कि यह सही वक्त है जब लेखकों को ऐसी घटनाओं के खिलाफ लामबंद होना चाहिए. फिर तो इसकी झड़ी लग गयी और अबतक लगभग दो दर्जन पुरस्कार वापस किये जा चुके हैं और यह सिलसिला जारी है. अब तो पद्म पुरस्कार भी लौटाए जाने की तैयारी है. 
हरियाणा के हिंदी के वरिष्ठ कवि व चिंतक मनमोहन ने हरियाणा साहित्य अकादमी से मिला सम्मान और इसके साथ मिली 1 लाख रुपये की राशि लौटा दी है. मनमोहन को हरियाणा साहित्य अकादमी से 2007-08 का महाकवि सूरदास सम्मानृ प्राप्त हुआ था। इस सम्मान के साथ मिली एक लाख रुपये की धनराशि उन्होंने वैचारिक नवजागरण मूल्यों के लिए काम कर रही स्वैच्छिक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति को भेंट कर दी थी, लेकिन अब सम्मान लौटाते हुए उन्होंने 1 लाख रुपए की यह राशि अपने पास से अकादमी को चेक के जरिए भेज दी है।
इस सम्मान के रूप में उन्हें प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिहृ, शाल और एक लाख रूपए की राशि मिली थी. हरियाणा में अपनी पीढ़ी के बड़े कवियों में शुमार मनमोहन वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं. आपातकाल के दौरान वे जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र थे और उस समय भी आपातकाल के विरोध में राजा का बाजा जैसी उनकी कई कविताएं बेहद चर्चित हुई थीं. हरियाणा में नवजागरण आंदोलन में भी उनकी प्रभावी नेतृत्वकारी उपस्थिति रही है। वे तीन वर्ष पहले ही रोहतक के महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से बतौर प्रोफेसर रिटायर्ड हुए हैं. मनमोहन ने हरियाणा साहित्य अकादमी को भेजे पत्र में देश में असहमति के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हिंसक तरीके से दबाने के तेज हुए चलन और बुद्धिजीवियों-लेखकों की हत्याओं पर चिंता जाहिर की है. उन्होंने दुख जताया है कि जिम्मेदार संवैधानिक पदों पर बैठे अनेक लोग और राजनेता ऐसी घटनाओं का औचित्यीकरण कर रहे हैं या उन्हें सीधे प्रोत्साहित करते दिखाई दे रहे हैं. उनका कहना है कि कुछ समय से देश के सार्वजनिक जीवन में असहमति के अधिकार या अपना अलग दृष्टिकोण रखने की आजादी को हिंसक तरीके से दबाने का चलन तेज हुआ है. मनमोहन ने कहा कि देश के तीन बड़े बुद्धिजीवियों और लेखकों नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे और एम. एम. कलबुर्गी को जान गंवानी पड़ी है। दुख की बात यह है कि जिम्मेदार संवैधानिक पदों पर बैठे अनेक लोग और राजनेता ऐसी घटनाओं का औचित्यीकरण कर रहे हैं या उन्हें सीधे प्रोत्साहित करते दिखाई दे रहे हैं -. पंजाब केसरी में दीपक भारद्वाज की रिपोर्ट से साभार.
जिन लोगों को लगता है इमरजेंसी के वक़्त या पहले लेखकों ने प्रतिरोध नहीं किया उनके लिए कुछ तथ्य हैं. धर्मवीर भारती ने खतरे उठाकर आकाशवाणी से मुनादी कविता पढ़ी थी। उन्हें वहीँ से गिरफ्तार कर लिया गया. नागार्जुन ने सीधे इंदिरा गांधी के खिलाफ कविता लिखी, गिरफ्तार हुए. फणीश्वर नाथ रेणु जेल गए. तो मुखर विरोध और गिरफ्तारी से भी नहीं डरे लेखक. कुछ ज़रूर थे जो रातोरात पाला बदल गए. वे अब भी हैं लेकिन प्रतिरोध का तरीक़ा तब भी उन्होंने चुना. आज भी उन्होंने चुना है..... और अब प्रख्यात शायर मुनव्वर राणा ने भी अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार के साथ एक लाख का चेक भी लौटने का ऐलान कर दिया. कब तक आप इन्हें रोकेंगे.
इस के पक्ष और विपक्ष में बहुत सारे तर्क-वितर्क-कुतर्क भी दिए जा रहे हैं. हालाँकि इस बात से लगभग सभी सहमत हैं कि नरेन्द्र दाभोलकर, गोविन्द पंसारे, कुलबर्गी एवं इखलाक की हत्याएं दुर्भाग्यपूर्ण है और ऐसा नहीं होना चाहिए था. देर-सवेर राष्ट्रपति के द्वारा दुःख जताए जाने के बाद प्रधान मंत्री ने अपनी चुप्पी तोडी जबकि इखलाक की हत्या पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा भी अपनी असहमति पहले ही जता चुके थे. सारा विश्व इस घटना को शर्मनाक कह रहा था, जबकि तब भी बहुत सारी कट्टर हिंदूवादी ताकतें इसे सही बताने पर तुली हुई थी.   
पुरस्कार लौटने के सिलसिले में बहुत सारे लोग अनेकों सवाल खड़े कर रहे थे – जैसे सिर्फ पुरस्कार के प्रतीक-चिह्न लौटा रहे हैं या पुरस्कार के साथ दी गयी धन-राशि भी. जब मालूम हुआ कि धन-राशि भी लौटा रहे है, तो सवाल करने लगे उसका ब्याज भी लौटाया जाना चाहिए. अब कुछ लोग यह भी सवाल कर रहे हैं कि पुरस्कार के बाद उन्हें जो प्रसिद्धि मिली, उसे कैसे वापस करेंगे? पुरस्कार मिलने से उनके पुस्तकों की बिक्री बढ़ी, उसे कैसे वापस करेंगे? कुछ का तो यह भी कहना है कि उन्हें अब तक कोई जानता नहीं था तो अपने आपको प्रचारित करने के लिए ऐसा कर रहे हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि पुरस्कार लौटाने के विरोध करने वाले ‘ये लोग’ सभी मौजूदा सरकार के समर्थक हैं और इसे सही ठहराने वाले सरकार के विरोधी.     
अब सवाल यह उठता है कि साहित्यकार आखिर अपना विरोध कैसे दर्ज करें? मानते हैं कलम में बहुत ताकत होती है, पर आज माध्यम बहुत हो गए हैं, सोसल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया काफी सक्रिय है और लोगों का ज्यादा समय इन्हें ही देखते सुनते बीत जाता है. सोसल मीडिया पर भी हर प्रकार के तत्व सक्रिय है. अगर आपको तर्कों से पराजित नहीं कर पाए तो कुतर्कों पर उतर आयेंगे, अगर उससे भी बात न बनी तो आपका चरित्र हनन करने लग जायेंगे आपके व्यक्ति-गत जीवन के अधखुले पन्नों को चीर फाड़कर रख देंगे. या कुछ ‘फेक’ चित्रों म माध्यम से ही आपका चरित्र हनन कर डालेंगे. आज महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी आदि के नाम को इतिहास से मिटने पर  तुले हैं. उनकी जगह भगत सिंह, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, नाथूराम गोडसे, गुरु गोलवरकर, पंडित दीन दयाल उपाध्याय आदि को स्थापित करने में लगे हैं. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि सभी इतिहास पुरुष अपने आप में अनूठे थे. सही और गलत हो सकते हैं. लेकिन तब के हालात और आज के हालात में अंतर है. आज भी अटल बिहारी बाजपेयी सर्वमान्य नेता हैं. मोदी जी आज काफी लोकप्रिय हैं, सबका अपना-अपना योगदान है. इसका मतलब किसी के योगदान को मिटाना मेरे ख्याल से सर्वथा अनुचित है. कवि गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने भी अंग्रेजों के द्वारा किये जा रहे जुल्म के खिलाफ अंग्रेजों द्वारा ही दिए गए  'नाईट हुड' की उपाधि लौटाने का काम किया था. लेखक, साहित्यकार, चिन्तक, विचारक हमारे धरोहर है. इन्होने समय समय पर देश को नयी दिशा देने का काम किया है उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता. उनकी अभिव्यक्ति की आजादी छीनी नहीं जानी चाहिए. 
अभी मोदी जी को सत्ता सम्हाले हुए मात्र १७ महीने हुए हैं. उनके कुछ कार्य जैसे स्वच्छ भारत अभियान, जनधन योजना, बीमा योजना आदि प्रशंसनीय है, तो कुछ के परिणाम आने अभी बाकी है. प्याज, दाल और खाद्य तेलों के बढ़ते दामों से आम जनता परेशान है पर कुछ ख़ास उपाय नहीं किये जा रहे हैं, निर्यात में कमी हो रही है, रुपये का अवमूल्यन हो रहा है, रोजगार में बृद्धि नहीं हो रही है फिर भी युवा वर्ग आज  ही मोदी का दीवाना है. बहुत सारे युवाओं के लिए वह 'आइकॉन' बने हुए हैं. उन्हें मोदी से बहुत कुछ आशाएं हैं. यही युवा दो तीन साल बाद अपने भविष्य में सुधार नहीं पाएंगे तो क्या मोदी को समर्थन देते रहेंगे, कहना मुश्किल है. परिवर्तन संसार का नियम है. इस संसार में विभिन्न विचारों के लोग हैं. सबके विचार, खान-पान, वेश-भूषा अलग अलग हो सकता है. उन्हें ऐसा करने की छूट है जबतक कि वे दूसरे को नुक्सान नहीं पहुंचा रहे हैं. आप अपना विचार रख सकते हैं. अपने विचार किसी पर थोप नहीं सकते हैं. कानून का राज ही चलता है और कानून के अनुसार ही सजा दी जा सकती है.
अंत में मेरा मानना है कि सबको अपना विचार रखने दीजिये. आपको पसंद है तो उसपर चलिए अन्यथा अपना रास्ता आप बनाइये और लोगों को बताइए कि आपका रास्ता क्यों सही है. अन्यथा विकास का कदम डगमगा जायेगा. जो देशी-विदेशी निवेश होना है, उसके लिए अनुकूल माहौल चाहिए. आम जनता भी अमन चैन, के साथ दाल-रोटी कमाना चाहती है. साम्प्रदायिक या जातीय तनाव कोई भी नहीं चाहता. कुछ दिग्भ्रमित लोग ही अवांछित घटनाओं का अंजाम देते हैं. इसका राजनीतिक लाभ कुछ नेता अवश्य उठा लेते हैं. पर इसके दूरगामी परिणाम से भी सभी परिचित हैं. अब सुनने में आया है प्रधान मंत्री भी अपने बयानवीर नेताओं से परेशान है और उन सबको यथोचित चेतावनी दी गयी है. अब देखा जाय इसका कितना लाभ बिहार के चुनाव में किसे होता है. देश को अगर प्रगति के पथ पर चलाना चाहते है तो उसे समरसता, भाईचारा का वातावरण चाहिए घृणा का कडवापन नहीं.    

जयहिन्द! जय भारत! – जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

Saturday, 3 October 2015

‘स्वच्छ भारत’ अभियान के एक वर्ष

२ अक्टूबर २०१४ को प्रधान मंत्री मोदी ने ‘स्वच्छ भारत’ मिशन की शुरुआत की थी. इस अभियान के तहत उन्होंने दिल्ली के बाल्मिकी नगर में खुद झाड़ू लगाकर और वहां बने बायो टॉयलेट का उद्घाटन कर किया था. श्री मोदी ने वहां से कई नामचीन लोगों को नामित किया था. जो इस स्वच्छता अभियान को आगे बढ़ाएंगे. सभी ने औपचारिक रूप से झाड़ू पकड़कर फोटो सेशन तो अवश्य करवा लिए पर धरातल पर कितना काम हुआ उसका परिणाम दिल्ली में डेंगू की बीमारी और उससे हुई मौतों का आंकड़ा बतलाता है.
तत्पश्चात ८ नवम्बर को इसी अभियान को आगे बढ़ाते हुए बनारस के अस्सी घाट से गंगा पूजन के बाद प्रधानमंत्री ने फावड़े से कचरा हटाकर सफाई अभियान की शुरुआत की. वहां जमा तलछट की मिट्टी को हटाने की शुरुआत स्वयं श्री मोदी ने कुदाल चलाकर किया था. उन्होंने लगातार १५ बार कुदाल चलाया था और मिट्टी को टोकड़ी में एक कुशल मजदूर की भांति ही इकठ्ठा किया था. सचमुच वह पल अविस्मरणीय था. सारे देश में खूब प्रशंशा हुई थी ऐसा काम करने वाले वे पहले प्रधान मंत्री थे. वहां से भी उन्होंने कुछ नामचीन लोगों को नामित किया. उसके फलाफल सभी जानते हैं.
आज़ादी के बाद से भारत मे एक दर्जन से अधिक प्रधानमंत्री हुये, जिनमे कई बड़े नाम भी हैं , लेकिन शांति के इस मसीहा(बापू) के सपनों का भारत धरातल के आसपास भी नज़र नही आता. हर साल गांधी जयंती पर गांधीवाद पर बात होती तो होती है, लेकिन अमल की नौबत नही आती है. आजकल तो कुछ संघटन शांति के इस मसीहा(बापू) को सवालों के घेरे मे भी खड़ा कर देतें हैं. गांधी के सपनों के भारत मे स्वच्छ भारत भी था. करीब 100 साल पहले महात्मा गांधी ने भारत में अपने पहले सार्वजनिक भाषण मे गंदगी का जिक्र किया था. 6 फरवरी सन 1916 को उन्होिने वराणसी मे दिये अपने इस भाषण मे आस्थान नगरी की गंदगी का जिक्र करते हुये स्वच्छ भारत की वकालत की थी. आज सौ साल बाद भी इस मामलें मे शिव की नगरी काशी के हालात बहुत नही बदलें हैं. पर अस्सी घाट की तस्वीरें बदल गई. इसे बदलना भी था क्योंकि यह मोदी जी की शुरुआत थी. इसकी तस्वीर बदलने में कई स्वयम सेवी संगठन और उद्योग घराने का भी हाथ है. बनारस का अस्सी घाट अब मुंबई की चौपाटी की तरह हो गया है. यहां सिर्फ ‘सुबहे बनारस में भोर का संगीत’ ही नहीं बल्कि शाम को भी संगीत की धुन गूंजने लगी है. ये संगीत उन छोटे-छोटे बच्चों का है जो यहां गिरजा देवी के नाम पर शुरू हुए समर कैम्प में भाग लेने लगे हैं. अस्सी घाट पर इस तरह का ये पहला समर कैम्प लगा जहां बच्चों को नृत्य, गायन, पेंटिंग, जूडो, जैसे क्लास चले हैं, जिसमें बड़ी संख्या में बच्चों के साथ उनके माता-पिता ने भी हिस्सा लिया और ये सब अस्सी घाट पर जमी मिट्टी के हटने के बाद हुआ है.
करीब एक साल बाद कितना साफ हुआ भारत, इसका सटीक आंकलन थोड़ा मुश्कि ल है. लेकिन देश की राजधानी दिल्लीु की तस्वीदर मे तो बदलाव दिखता है. रेलवे स्टेलशन से लेकर हर वह जगह जहां सार्वजनिक आवाजाही रहती है, एक साल मे कुछ बदला – बदला दिखता है.लेकिन राजधानी दिल्ली की तस्वी र से देश के सुदूर इलाकों की हालत का मिलान नही किया जा सकता है. केन्द्रत सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने पूरे एक साल देश भर के 476 शहरों की साफ-सफाई का जायजा लिया. ये पता करने की कोशिश की कि सफाई के मामले में किस शहर को कितना सफर तय करना है. सर्वे के मुताबिक साफ सफाई के मामले में टॉप पर है कर्नाटक का मैसूर और इसके अलावा कर्नाटक के तीन और शहरों ने भी टॉप टेन में जगह पाई है. सनद रहे कि दक्ष्िकण भारत पहले से ही हर मामले मे जागरूक रहा है. इस लिये दिल्लीू या दक्ष्ि ण के कुछ शहरों को देख कर ये नही कहा जा सकता कि स्वच्छ भारत अभियान करोड़ों के प्रचार के बाद भी परवान चढ़ रहा है. बिहार, उत्त र प्रदेश, उड़िसा, मध्यो प्रदेश, राजस्थाान जैसे राज्योंे के तमाम शहरों यहां तक कि वाराणसी के हालात भी जस के तस हैं. अस्पताल के बाहर कूड़े का ढेर, स्कूल के बाहर गंदगी का अम्बार, सरकारी दफ्तर के बाहर कचरे का जमावड़ा, बजबजाती नालियां, गन्दगी से पटी सड़कें, दीवारों पर पान की पीक और गली मोहल्लों में घूमते आवारा जानवर, आज भी यही देश के तमाम शहरों की तस्वीर है. नगर निगम से लेकर नगर पालिकाओं तक संसाधनों का अभाव है. छोटे शहरों मे तो कई दिन तक कूड़ा नही उठने की शिकायतें आम है. बड़ी नदियों में आज भी प्रति दिन करोड़ों लीटर गंदगी समा रही है. हां चित्रकूट जैसे पवित्र स्थ लों पर जरूर कुछ जागरूकता दिखती है. सरकारी अफसरों सहित आम नागरिक मंदाकनी को साफ करने और रखने मे आगे बढ़े हैं.
इसी तरह देश भर के स्कूलों खास कर के सरकारी स्कूअलों मे छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय की दरकार लम्बे अरसे से है. क्योंछ कि छात्राओं के स्कू-ल छोड़ने की एक वजह सरकारी प्राइमरी और जूनियर स्कू लों मे शौचालय का ना होना भी बताया जाता है. प्रधानमंत्री ने सभी स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाने की बात की और देश को यह भरोसा दिलाया कि वह इस लक्ष्य को जल्द से जल्द पूरा भी कर लेंगे. जाहिर है कि यह उनकी संवेदनशीलता और देश के शहरी वा ग्रामीण इलाकों की समझ को दर्शाता है. पर सालभर बीत जाने के बाद भी परिस्थितियों में कोई खास बदलाव नहीं आया है. हां, इस बारे में थोड़ी हलचल तो है लेकिन यह केवल बात के स्तर पर ही देखी जा सकती है. इस बारे में हकीकत में कुछ खास होता हुआ नहीं दिखता. कागज़ और आंकड़ों मे ज़रूर लक्ष्य. के नज़दीक पहु्ंचना बताया जा रहा है. स्वच्छ विद्यालय का लक्ष्य देश के सभी स्कूलों में पानी, साफ-सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं का पुख्ता इंतजाम रखा गया है.ये अभियान सेकेंडरी स्कूलों में लड़कियों की एक बड़ी आबादी को रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है. एक आंकड़े के अनुसार देश में 3.83 लाख घरेलू और लगभग 17,411 सामुदायिक शौचालयों का निर्माण हुआ, लेकिन बीते साल कितने स्कूलों में शौचालयों का निर्माण हुआ, इसका जवाब न सरकारी विभागों के पास है और न ही किसी सामाजिक संगठन के पास. सरकार के मुताबिक अभी देश के दो लाख स्कू लों मे शौचालय नही है. फिलहाल मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2012-13 में देश के 69 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था थी जबकि 2009-10 में यह 59 प्रतिशत थी. 2013-14 में हालांकि करीब 80.57 प्रतिशत प्राथमिक स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था है. स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पन्द्रह अगस्त को ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से सांसदों और कारपोरेट क्षेत्र से अगले साल तक देश भर के स्कूलों में शौचालय, विशेषकर लड़कियों के लिए अलग शौचालयों के निर्माण में मदद करने की अपील की थी. लेकिन फिलहाल देश के करीब 38 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है. हालांकि, 95 प्रतिशत स्कूलों में पेयजल सुविधा उपलब्ध है. देश के स्कूललों मे 62 फीसदी स्कूरलों मे शौचालयें होने का दावा जरूर किया जा रहा है लेकिन ये आंकड़े दस्तावेजों में ही सही दिखतें हैं. अगर हालात छोड़कर इन तथ्यों पर भरोसा किया जाए तो फिर राज्य के ग्रामीण इलाकों में लड़कियां पढ़ाई बीच में ही क्यों छोड़कर चली जाती हैं? शहरी इलाकों मे हालात गांव जितने खराब नही है. दूसरी बात, अगर इन शौचालयों में से अधिकतर बुरे हाल में हैं तो इसका अर्थ यह है कि राज्य सरकार शौचालयों के रख-रखाव के लिए बजट मुहैया नहीं कराती. ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में शौचालयों में पानी की अनुपलब्धता बड़ी चिंता का विषय है.
स्वच्छ भारत अभियान की सफलता या असफलता का रास्ताौ ग्रामीण भारत से ही हो कर जाता है. सनद रहे कि देश मे इससे पहले भी स्वच्छ भारत अभियान चला था. सन 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम की शुरुआत की थी. 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे थोड़ी ऊंचाई देते हुए पूर्ण स्वच्छता अभियान का नाम दिया. मोदी सरकार ने इसका पुनर्निर्माण करते हुए फ्लश सिस्टम वाले शौचालयों पर ध्यान केंद्रित किया और खुले में शौच बंद करने और मानव द्वारा मल उठाने पर रोक लगाने की बात की थी. इसके अलावा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाने की भी बात शुरू की गई.
हांलाकि इस पूरे हालात के लिये अकेले प्रधानमंत्री को कठघरे मे खड़ा नही किया जा सकता है. राज्य सरकारें और जिम्मेीदार अमला और जिम्मेदार नागरिक भी इसके लिये ज़् यादा दोषी नजर आता है. पीएम मोदी की तो इसके लिये तारीफ की जानी चाहिए कि बापू के सपनों को साकार करने के लिये उन्होमने एक आवाज़ दी है. बहरहाल प्रधानमंत्री अब ज़रूर इस बात को महसूस कर रहे होंगे कि स्वच्छ भारत कहना और सपना देखना तो आसान था पर पूरा करना कठिन है. – फिर भी एक शुरुआत हुई है तो हम सबको उसमे यथासंभव योगदान तो करना ही चाहिए इसी में सबका भला है.
बहुत अच्छा अभियान है यह. सफलता में समय लगेगा …. इसका दायरा थोड़ा आगे भी बढ़ाना चाहिए. जैसे स्वच्छ परिवेश के साथ स्वच्छ विचार, स्वच्छ व्यवहार, सदाचार, सर्वधर्म समभाव, ईर्ष्या द्वेष का नाश, सबका साथ सबका विकास, और सार्वजनिक बयानों में भी स्वच्छता जो आये दिन वातावरण को विषाक्त बनाने के लिए काफी है. जय हिन्द!
– जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर