Sunday, 18 October 2015

साहित्यकार विरोध कैसे करें ?


देश  में बढ़ रही असहिष्णुता और प्रधान मंत्री की चुप्पी के विरोध में बहुत सारे जाने-माने साहित्यकार अपने पुरस्कार लौटाकर विरोध कर रहे हैं. इसकी शुरुआत हिंदी के जाने माने लेखक उदय प्रकाश ने कन्नड़ लेखक एम एम कुलबर्गी की हत्या के विरोध में किया. फिर नयनतारा सहगल ने यह कहकर वापस किया कि भारतीय संस्कृति की विविधता और वाद विवाद पर भयंकर प्रहार हो रहे हैं. इसके बाद अशोक बाजपेयी ने भी ऐसा ही किया और कहा कि यह सही वक्त है जब लेखकों को ऐसी घटनाओं के खिलाफ लामबंद होना चाहिए. फिर तो इसकी झड़ी लग गयी और अबतक लगभग दो दर्जन पुरस्कार वापस किये जा चुके हैं और यह सिलसिला जारी है. अब तो पद्म पुरस्कार भी लौटाए जाने की तैयारी है. 
हरियाणा के हिंदी के वरिष्ठ कवि व चिंतक मनमोहन ने हरियाणा साहित्य अकादमी से मिला सम्मान और इसके साथ मिली 1 लाख रुपये की राशि लौटा दी है. मनमोहन को हरियाणा साहित्य अकादमी से 2007-08 का महाकवि सूरदास सम्मानृ प्राप्त हुआ था। इस सम्मान के साथ मिली एक लाख रुपये की धनराशि उन्होंने वैचारिक नवजागरण मूल्यों के लिए काम कर रही स्वैच्छिक सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था हरियाणा ज्ञान-विज्ञान समिति को भेंट कर दी थी, लेकिन अब सम्मान लौटाते हुए उन्होंने 1 लाख रुपए की यह राशि अपने पास से अकादमी को चेक के जरिए भेज दी है।
इस सम्मान के रूप में उन्हें प्रशस्ति पत्र, स्मृति चिहृ, शाल और एक लाख रूपए की राशि मिली थी. हरियाणा में अपनी पीढ़ी के बड़े कवियों में शुमार मनमोहन वैचारिक प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं. आपातकाल के दौरान वे जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र थे और उस समय भी आपातकाल के विरोध में राजा का बाजा जैसी उनकी कई कविताएं बेहद चर्चित हुई थीं. हरियाणा में नवजागरण आंदोलन में भी उनकी प्रभावी नेतृत्वकारी उपस्थिति रही है। वे तीन वर्ष पहले ही रोहतक के महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय से बतौर प्रोफेसर रिटायर्ड हुए हैं. मनमोहन ने हरियाणा साहित्य अकादमी को भेजे पत्र में देश में असहमति के अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को हिंसक तरीके से दबाने के तेज हुए चलन और बुद्धिजीवियों-लेखकों की हत्याओं पर चिंता जाहिर की है. उन्होंने दुख जताया है कि जिम्मेदार संवैधानिक पदों पर बैठे अनेक लोग और राजनेता ऐसी घटनाओं का औचित्यीकरण कर रहे हैं या उन्हें सीधे प्रोत्साहित करते दिखाई दे रहे हैं. उनका कहना है कि कुछ समय से देश के सार्वजनिक जीवन में असहमति के अधिकार या अपना अलग दृष्टिकोण रखने की आजादी को हिंसक तरीके से दबाने का चलन तेज हुआ है. मनमोहन ने कहा कि देश के तीन बड़े बुद्धिजीवियों और लेखकों नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पनसारे और एम. एम. कलबुर्गी को जान गंवानी पड़ी है। दुख की बात यह है कि जिम्मेदार संवैधानिक पदों पर बैठे अनेक लोग और राजनेता ऐसी घटनाओं का औचित्यीकरण कर रहे हैं या उन्हें सीधे प्रोत्साहित करते दिखाई दे रहे हैं -. पंजाब केसरी में दीपक भारद्वाज की रिपोर्ट से साभार.
जिन लोगों को लगता है इमरजेंसी के वक़्त या पहले लेखकों ने प्रतिरोध नहीं किया उनके लिए कुछ तथ्य हैं. धर्मवीर भारती ने खतरे उठाकर आकाशवाणी से मुनादी कविता पढ़ी थी। उन्हें वहीँ से गिरफ्तार कर लिया गया. नागार्जुन ने सीधे इंदिरा गांधी के खिलाफ कविता लिखी, गिरफ्तार हुए. फणीश्वर नाथ रेणु जेल गए. तो मुखर विरोध और गिरफ्तारी से भी नहीं डरे लेखक. कुछ ज़रूर थे जो रातोरात पाला बदल गए. वे अब भी हैं लेकिन प्रतिरोध का तरीक़ा तब भी उन्होंने चुना. आज भी उन्होंने चुना है..... और अब प्रख्यात शायर मुनव्वर राणा ने भी अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार के साथ एक लाख का चेक भी लौटने का ऐलान कर दिया. कब तक आप इन्हें रोकेंगे.
इस के पक्ष और विपक्ष में बहुत सारे तर्क-वितर्क-कुतर्क भी दिए जा रहे हैं. हालाँकि इस बात से लगभग सभी सहमत हैं कि नरेन्द्र दाभोलकर, गोविन्द पंसारे, कुलबर्गी एवं इखलाक की हत्याएं दुर्भाग्यपूर्ण है और ऐसा नहीं होना चाहिए था. देर-सवेर राष्ट्रपति के द्वारा दुःख जताए जाने के बाद प्रधान मंत्री ने अपनी चुप्पी तोडी जबकि इखलाक की हत्या पर अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा भी अपनी असहमति पहले ही जता चुके थे. सारा विश्व इस घटना को शर्मनाक कह रहा था, जबकि तब भी बहुत सारी कट्टर हिंदूवादी ताकतें इसे सही बताने पर तुली हुई थी.   
पुरस्कार लौटने के सिलसिले में बहुत सारे लोग अनेकों सवाल खड़े कर रहे थे – जैसे सिर्फ पुरस्कार के प्रतीक-चिह्न लौटा रहे हैं या पुरस्कार के साथ दी गयी धन-राशि भी. जब मालूम हुआ कि धन-राशि भी लौटा रहे है, तो सवाल करने लगे उसका ब्याज भी लौटाया जाना चाहिए. अब कुछ लोग यह भी सवाल कर रहे हैं कि पुरस्कार के बाद उन्हें जो प्रसिद्धि मिली, उसे कैसे वापस करेंगे? पुरस्कार मिलने से उनके पुस्तकों की बिक्री बढ़ी, उसे कैसे वापस करेंगे? कुछ का तो यह भी कहना है कि उन्हें अब तक कोई जानता नहीं था तो अपने आपको प्रचारित करने के लिए ऐसा कर रहे हैं. इसमें कोई संदेह नहीं कि पुरस्कार लौटाने के विरोध करने वाले ‘ये लोग’ सभी मौजूदा सरकार के समर्थक हैं और इसे सही ठहराने वाले सरकार के विरोधी.     
अब सवाल यह उठता है कि साहित्यकार आखिर अपना विरोध कैसे दर्ज करें? मानते हैं कलम में बहुत ताकत होती है, पर आज माध्यम बहुत हो गए हैं, सोसल मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया काफी सक्रिय है और लोगों का ज्यादा समय इन्हें ही देखते सुनते बीत जाता है. सोसल मीडिया पर भी हर प्रकार के तत्व सक्रिय है. अगर आपको तर्कों से पराजित नहीं कर पाए तो कुतर्कों पर उतर आयेंगे, अगर उससे भी बात न बनी तो आपका चरित्र हनन करने लग जायेंगे आपके व्यक्ति-गत जीवन के अधखुले पन्नों को चीर फाड़कर रख देंगे. या कुछ ‘फेक’ चित्रों म माध्यम से ही आपका चरित्र हनन कर डालेंगे. आज महात्मा गाँधी, जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी आदि के नाम को इतिहास से मिटने पर  तुले हैं. उनकी जगह भगत सिंह, सरदार वल्लभ भाई पटेल, सुभाष चन्द्र बोस, नाथूराम गोडसे, गुरु गोलवरकर, पंडित दीन दयाल उपाध्याय आदि को स्थापित करने में लगे हैं. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती है कि सभी इतिहास पुरुष अपने आप में अनूठे थे. सही और गलत हो सकते हैं. लेकिन तब के हालात और आज के हालात में अंतर है. आज भी अटल बिहारी बाजपेयी सर्वमान्य नेता हैं. मोदी जी आज काफी लोकप्रिय हैं, सबका अपना-अपना योगदान है. इसका मतलब किसी के योगदान को मिटाना मेरे ख्याल से सर्वथा अनुचित है. कवि गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने भी अंग्रेजों के द्वारा किये जा रहे जुल्म के खिलाफ अंग्रेजों द्वारा ही दिए गए  'नाईट हुड' की उपाधि लौटाने का काम किया था. लेखक, साहित्यकार, चिन्तक, विचारक हमारे धरोहर है. इन्होने समय समय पर देश को नयी दिशा देने का काम किया है उनके योगदान को नकारा नहीं जा सकता. उनकी अभिव्यक्ति की आजादी छीनी नहीं जानी चाहिए. 
अभी मोदी जी को सत्ता सम्हाले हुए मात्र १७ महीने हुए हैं. उनके कुछ कार्य जैसे स्वच्छ भारत अभियान, जनधन योजना, बीमा योजना आदि प्रशंसनीय है, तो कुछ के परिणाम आने अभी बाकी है. प्याज, दाल और खाद्य तेलों के बढ़ते दामों से आम जनता परेशान है पर कुछ ख़ास उपाय नहीं किये जा रहे हैं, निर्यात में कमी हो रही है, रुपये का अवमूल्यन हो रहा है, रोजगार में बृद्धि नहीं हो रही है फिर भी युवा वर्ग आज  ही मोदी का दीवाना है. बहुत सारे युवाओं के लिए वह 'आइकॉन' बने हुए हैं. उन्हें मोदी से बहुत कुछ आशाएं हैं. यही युवा दो तीन साल बाद अपने भविष्य में सुधार नहीं पाएंगे तो क्या मोदी को समर्थन देते रहेंगे, कहना मुश्किल है. परिवर्तन संसार का नियम है. इस संसार में विभिन्न विचारों के लोग हैं. सबके विचार, खान-पान, वेश-भूषा अलग अलग हो सकता है. उन्हें ऐसा करने की छूट है जबतक कि वे दूसरे को नुक्सान नहीं पहुंचा रहे हैं. आप अपना विचार रख सकते हैं. अपने विचार किसी पर थोप नहीं सकते हैं. कानून का राज ही चलता है और कानून के अनुसार ही सजा दी जा सकती है.
अंत में मेरा मानना है कि सबको अपना विचार रखने दीजिये. आपको पसंद है तो उसपर चलिए अन्यथा अपना रास्ता आप बनाइये और लोगों को बताइए कि आपका रास्ता क्यों सही है. अन्यथा विकास का कदम डगमगा जायेगा. जो देशी-विदेशी निवेश होना है, उसके लिए अनुकूल माहौल चाहिए. आम जनता भी अमन चैन, के साथ दाल-रोटी कमाना चाहती है. साम्प्रदायिक या जातीय तनाव कोई भी नहीं चाहता. कुछ दिग्भ्रमित लोग ही अवांछित घटनाओं का अंजाम देते हैं. इसका राजनीतिक लाभ कुछ नेता अवश्य उठा लेते हैं. पर इसके दूरगामी परिणाम से भी सभी परिचित हैं. अब सुनने में आया है प्रधान मंत्री भी अपने बयानवीर नेताओं से परेशान है और उन सबको यथोचित चेतावनी दी गयी है. अब देखा जाय इसका कितना लाभ बिहार के चुनाव में किसे होता है. देश को अगर प्रगति के पथ पर चलाना चाहते है तो उसे समरसता, भाईचारा का वातावरण चाहिए घृणा का कडवापन नहीं.    

जयहिन्द! जय भारत! – जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

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