Friday, 19 February 2016

टाटा समूह की कल्याणकारी योजनाएं

भारत के सबसे बड़े कारोबारी समूह में से एक टाटा समूह के कारोबार में टेटली टी और जगुआर लैंड रोवर नामक की प्रसिद्ध ईकाईयां शामिल हैं.
लेकिन इस समूह के कारोबार में 66 फीसदी हिस्से का मालिकाना हक अलग अलग चैरेटी द्वारा संभाला जाता है. यह वो मूल भाव है जिसे टाटा समूह के संस्थापक जमशेद जी टाटा और उनके वारिसों ने कायम रखा है. 19वीं सदी के अंत में भारत के कारोबारी जमशेद जी टाटा, एक बार मुंबई के सबसे महंगे होटल में गए, लेकिन उनके रंग के चलते उन्हें होटल से बाहर जाने को कहा गया. कहा जाता है कि उन्होंने उसी वक्त तय किया कि वे भारतीयों के लिए इससे बेहतर होटल बनाएंगे. और 1903 में मुंबई के समुद्र तट पर ताज महल पैलेस होटल तैयार हो गया. यह मुंबई की पहली ऐसी इमारत थी, जिसमें बिजली थी, अमरीकी पंखे लगाए गए थे, जर्मन लिफ़्ट मौजूद थी और अंग्रेज ख़ानसामा भी थे.
जमशेद जी नुसरवान जी टाटा का जन्म ३ मार्च 1839 में एक पारसी परिवार में हुआ था. उनके पूर्वज पारसी पुजारी थे. लेकिन जमशेद जी ने तो कपड़े, चाय, तांबा, पीतल और यहां तक अफीम के धंधे में भी अपनी किस्मत आज़माई. तब अफीम का धंधा कानूनी तौर पर मान्य था.उन्होंने इस दौरान काफी यात्राएं कीं और नई खोजों के प्रति उनमें एक सहज आकर्षण था. पहली कपड़ा मिल .ब्रिटेन की एक यात्रा के दौरान उन्हें लंकाशायर कॉटन मिल की क्षमता का अंदाजा हुआ. साथ में ये अहसास भी हुआ कि भारत अपने शासक देश को इस मामले में चुनौती दे सकता है और उन्होंने 1877 में भारत की पहली कपड़ा मिल खोल दी. इम्प्रेस मिल्स का उद्घाटन उसी दिन हुआ, जिस दिन क्वीन विक्टोरिया भारत की महारानी बनी. जमशेद जी के पास भारत के लिए स्वदेशी सोच का सपना था. स्वदेशी यानी अपने देश में निर्मित चीजों के प्रति आग्रह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का अहम विचार था.
उन्होंने एक बार कहा था, "कोई देश और समाज, अपने कमजोर और असहाय लोगों की मदद से उतना आगे नहीं बढ़ता जितना वो अपने बेहतरीन और सबसे बड़ी प्रतिभाओं के आगे बढ़ने से बढ़ता है." उनका सबसे बड़ा सपना इस्पात संयंत्र बनाने का था, लेकिन इस उद्देश्य के पूरा होने से पहले उनका निधन हो गया. उनके बेटे दोराब जी टाटा ने इस चुनौती को संभाला और 1907 में टाटा स्टील, जमशेदपुर ने उत्पादन शुरू कर दिया. भारत इस्पात संयंत्र बनाने वाला एशिया का पहला देश बना. जमशेद जी ने एक ओद्यौगिक शहर बनाने के लिए भी निर्देश छोड़ा था. अभी जमशेदपुर में स्थित टाटा स्टील १० मिलियन टन का उत्पादन करती है. इसके अलावा इसके कई प्लांट देश-विदेश के विभिन्न भागों में अवस्थित है. सभी प्लांट्स की कुल उत्पादन क्षमता ५० मिलियन टन से भी ज्यादा की है.
जमशेदपुर शहर का निर्माण उनके निर्देशों के अनुसार ही हुआ. उन्होंने दोराब को लिखे पत्र में कहा था, "सड़कें लंबी होनी चाहिए और उसके दोनों तरफ छाएदार पेड़ लगाए जाए. लॉन और बगीचों के लिए पर्याप्त जगह होनी चाहिए. फुटबॉल, हॉकी मैदान के अलावा पार्क के लिए भी जगह होनी चाहिए. हिंदुओं के लिए मंदिर, मुस्लिमों के लिए मस्जिद और ईसाईयों के लिए गिरिजाघर भी होने चाहिए." उनके इस निर्देश का नतीजा बना जमशेदपुर शहर. जमशेदपुर भारत का पहला शहर बना जो ISO 14000 के पर्यावरण के अनुकूल है. और इसका प्रमाण पत्र भी हासिल है. दुनिया भर के दूसरे देशों में भी जब अपने कर्मचारियों के भले के लिए योजनाएं नहीं के बराबर होती थीं, तब टाटा ने श्रमिकों के लिए कल्याणकारी योजनाएं शुरू की थीं. 1877 में पेंशन की व्यवस्था, 1912 में प्रति दिन आठ घंटे की शिफ्ट और 1921 से मातृत्व सुविधाएं मुहैया करानी शुरू कीं.
जमशेद जी का यकीन ये था कि कारोबार तभी आगे बढ़ेगा जब उसमें समाज के बड़े तबके की हिस्सेदारी होगी.
उन्होंने बैंगलोर में इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ़ साइंस की स्थापना की ताकि देश के विकास में योगदान देने के लिए इंजीनियर और वैज्ञानिक तैयार हो सकें. जमशेद जी और उनके बेटों ने अपने निजी धन को भी चैरिटेबल ट्रस्ट के हाथों में सौंप दिया. जिसकी टाटा होल्डिंग कंपनी टाटा संस में 66 फ़ीसदी की हिस्सेदारी है. परिवार के पास अभी भी मात्र तीन फ़ीसदी शेयर हैं और बाकी अलग अलग कंपनियों और शेयर धारकों के पास मौजूद हैं. मुंबई के कारोबारी विश्लेषक जेरी राव के मुताबिक इससे ट्रस्ट की विश्वसनीयता बढ़ती है. राव कहते हैं, "हर कोई ये जानता है कि कंपनी के ज़्यादातर शेयर ट्रस्ट के पास मौजूद हैं और न कि अपना फ़ायदा चाहने वाले व्यक्तियों के पास. इससे फ़ायदा होता है."
टाटा के कारोबार को संभालने वालों में जेआरडी यानी जहांगीर टाटा का अहम योगदान रहा है. वे 1938 में टाटा समूह के चेयरमैन बने. तब उनकी उम्र महज 34 साल थी और वे आधी शताब्दी तक कंपनी के मुखिया बने रहे. भारत के पहले पायलट जेआरडी उद्योगपति नहीं बनना चाहते थे. उनका सपना पायलट बनने का था. इसके चलते वे लुइस बेलराइट से मिले थे, जिन्होंने 1909 में पहली बार इंग्लिश चैनल पर उड़ान भरने का कारनामा दिखाया था.
जेआरडी, भारत में पायलट बनने वाले पहले शख़्स थे. बांबे फ्लाइंग क्लब से जारी उनका लाइसेंस का नंबर 1 था, जिस पर उन्हें काफी गर्व भी था. 1930 में उन्होंने ब्रिटेन से भारत तक अकेले उड़ान भरने की कोशिश की थी. वे ये रेस जीत भी जाते, अगर उन्होंने विमान से जुड़े कुछ अहम स्पार्क प्लग अपने प्रतिद्वंदी को नहीं दिए होते. इस भलमनसाहत की वजह से जेआरडी कुछ घंटों से ये रेस हार गए थे.
दो साल बाद उन्होंने भारत में पहली एयरमेल सर्विस शुरू की. तब वे उस विमान को ख़ुद ही उड़ाया करते थे. उस दौर में कोई रनवे नहीं था, तब वो कीचड़ की जमीन पर विमान उतारते थे और उड़ाते थे. यही मेल सेवा आगे चलकर भारत की पहली एयरलाइन टाटा एयरलाइंस बनी जो बाद में एयर इंडिया के नाम से काफी मशहूर भी हुई. पहले तो ये टाटा और सरकार का संयुक्त उपक्रम था, लेकिन 1953 में सरकार ने देश की वायुसेवा के राष्ट्रीयकरण का फ़ैसला लिया. एयर इंडिया की कामयाबी. जेआरडी को 1978 तक एयरइंडिया के चेयरमैन बने रहे और वे इस कंपनी के अंतरराष्ट्रीय ऑपरेशन का कामकाज भी देखते रहे.
जब सूचना का युग आया तो जेआरडी ने 1968 में टाटा कंसल्टेंसी सर्विस (टीसीएस) की स्थापना की, ताकि कंपनी का पेपरवर्क कंप्यूटर के माध्यम से हो. आज टीसीएस पूरे टाटा समूह की सबसे मुनाफ़े वाली यूनिट है, जो दुनिया भर में कंप्यूटर सॉफ्टवेयर की आपूर्ति करती है. 1991 में रतन टाटा समूह के मुखिया बने. तब उदारीकरण का दौर शुरू हो रहा था और रतन टाटा ने दुनिया भर में पांव पसारने शुरू किए.
टाटा समूह ने टेटली टी का अधिग्रहण किया. इसके अलावा इंश्योरेंस कंपनी एआईजी के साथ उन्होंने बॉस्टन में एक संयुक्त इंश्योरेंस कंपनी शुरू की. उन्होंने यूरोप के कोरस स्टील और डेवू की हैवी वीकल यूनिट का भी अधिग्रहण किया. नैनो कार यानी लखटकिया कार उनका ही सपना था जिसे आम आदमी भी खरीदकर अपने परिवार के साथ कार में चल सके.
दुनिया भर में फैला कारोबार उन्होंने टाटा के कारोबार को हर जगह फैला दिया, चाय से लेकर सूचना तकनीक तक. टाटा भारत का सबसे बड़ा कारोबारी समूह है लेकिन अपने प्रतिद्वंदियों के मुक़ाबले ये हमेशा लो प्रोफाइल समूह रहा है. जेआरडी कंपनी के मुख्यालय के नज़दीक हमेशा किराए के घर में रहे जबकि रतन टाटा काम पर खुद से ड्राइव करके पहुंचते थे या फिर ड्राइवर के साथ आगे ही बैठते थे. 2009 में रतन टाटा का लंबे समय का सपना तब पूरा हुआ जब कंपनी ने सबसे सस्ती कार- नैनो को बाज़ार में उतारा. कार की कीमत थी एक लाख रुपये. हालांकि ये कार बाज़ार में उतनी चली नहीं.
औसतन, टाटा समहू हर साल सामाजिक कार्यों में करीब 20 करोड़ डॉलर खर्च करता है. टाटा स्टील का चैरिटेबल ट्रस्ट ग्रामीण विकास की योजनाओं को जमशेदपुर से सटे आदिवासी इलाकों में चलाता है. ये ट्रस्ट इलाके की महिलाओं के लिए साक्षरता और माइक्रो फाइनेंस के कार्यक्रम चलाता है. आदिवासी म्यूज़िक को संरक्षित रखने के लिए एक प्रोजेक्ट भी है. इस कंपनी का विज्ञापन, उनकी ख्याति की तरह का है, "हम स्टील भी बनाते हैं."... (क्रमश:...)

-    जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

Saturday, 6 February 2016

दिल्ली की दयनीयता

दिल्ली सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश भारत की राजधानी, मेट्रो सिटी, कीमती शहर, अब स्मार्ट सिटी बनने की तैयारी में है। स्मार्ट सिटी का मतलब सबकुछ स्वचालित होगा. ट्रैफिक ब्यवस्था से लेकर सभी कुछ माउस क्लिक या स्मार्ट फोन पर उपलब्ध होगा। सीधे-सादे शब्दों में कहें तो स्वर्गिक सुख का अहसास होगा। दिल्ली जो दिलवालों की है वह तो सभी स्मार्ट शहरों में आगे होगी। उसी का ट्रेलर शायद अभी दिखाया जा रहा है। पूरी गंदगी फैलाकर सारी ब्यवस्था को ठप्प करने के बाद ही तो उसे सुधारा जायेगा। तब लगेगा के हमारी दिल्ली सच में सभी शहरों से अलग नूतन, नवयौवना, अल्ल्हड़ की भांति सबको रोमांचित करेगी। तभी लोगों को महसूस भी होगा स्मार्ट सिटी क्या होता है?
दिल्ली में नगर निगम के एक लाख से ज़्यादा कर्मचारियों की हड़ताल के चलते सड़कों से लेकर निगम के स्कूल अस्पतालों में असर दिखने लगा है। अपनी मांगों को लेकर एमसीडी कर्मचारियों ने दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के कैंप ऑफिस के बाहर पटपड़गंज में कूढ़े का ढेर लगाकर प्रदर्शन किया। इस हड़ताल में तीनों निगमों के सफाई कर्मचारी, शिक्षक, डॉक्टर सब शामिल हैं। एमसीडी कर्मचारियों ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के घर के सामने और जंतर मंतर पर प्रदर्शन किया था। दिल्ली के तीनों नगर निगमों के कुल सवा लाख कर्मचारी हैं जिनमें से करीब 60 हज़ार सफ़ाई कर्मचारी हैं। सफाई कर्मचारियों के हड़ताल पर चले जाने से सड़कों, गलियों से भी कूड़ा उठना बंद हो गया है।
दिल्ली के तीनों नगर निगम अपने कर्मचारियों को तीन महीने से पैसा नहीं दे पा रहे। निगम कहता है, दिल्ली सरकार उसका फंड नहीं दे रही। जबकि, दिल्ली सरकार का दावा है कि उसने निगमों को इस साल 2000 करोड़ रुपये दे दिए हैं। निगम का दावा 3000 करोड़ का है। कर्मचारियों की मांग है - महीने की पहली तारीख़ को मिले वेतन, तीनों नगर निगमों को फिर से एक किया जाए, बक़ाया वेतन का भुगतान तुरंत हो। दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) के सफाईकर्मियों, स्वास्थ्य कर्मियों की हड़ताल को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट ने निराशा जताई है। कोर्ट ने कहा कि दिल्ली को साफ रखना एमसीडी कर्मचारियों का दायित्व है। सरकार और एमसीडी की लड़ाई से आम जनता को नुकसान हो रहा है। गौरतलब है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कुछ दिनों पहले बंगलोर में(इलाजरत) प्रेस कॉन्फ्रेंस कर हड़ताल कर रहे कर्मचारियों की मांगों पर अपनी बात रखी थी। केजरीवाल ने दोनों (पूर्वी और उत्तरी) एमसीडी को 693 करोड़ रुपए देने की बात कहते हुए हड़ताल खत्म करने की अपील की थी। इस मांग को एमसीडी कर्मचारियों ने ठुकरा दिया है।
एमसीडी कर्मचारियों के यूनियन ने कहा कि केजरीवाल बेवकूफ बना रहे हैं, सफाईकर्मी हड़ताल वापस नहीं लेंगे। केजरीवाल ने एमसीडी के हड़ताली कर्मचारियों को 31 जनवरी तक की सैलरी देने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि एमसीडी का दिल्ली सरकार पर एक भी पैसा बकाया नहीं, फिर भी वह पैसों का इंतजाम कर रहे हैं। साथ ही उन्होंने बीजेपी पर राजनीति करने का आरोप लगाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि एमसीडी में बड़ा घोटाला हुआ है, इसलिए वो अपने खातों की जांच कराने को तैयार नहीं होते हैं।
दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग से भी बैठक बेनतीजा निकली है। इससे पूर्व एमसीडी कर्मचारियों को दिल्ली हाईकोर्ट ने फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार और एमसीडी की लड़ाई में आम लोग परेशान हो रहे हैं। इस बीच पूर्वी दिल्ली एमसीडी ने कोर्ट को बताया कि आज की तारीख तक का सारा बकाया पैसा सफाईकर्मियों को दे दिया गया है, अब कोई बकाया नहीं है, कोर्ट ने पूछा कि जब पैसा दे दिया है तो कर्मचारी काम पर क्यों नहीं लौट रहे। एमसीडी कर्मचारी समस्या का स्थायी हल चाहते हैं। हड़ताल में तीनों एमसीडी के सफाईकर्मी, डॉक्टर और शिक्षक शामिल हैं, जिसकी वजह से शहर में कूड़ों के ढेर के अलावा अस्पतालों और स्कूलों में भी व्यवस्था चरमरा गई है।
मुझे नहीं पता कि एम सी डी कर्मचारियों की हड़ताल के शिकार आम जनता, दिल्ली सरकार के कुछ मंत्रीगण ही हैं या राज्यपाल, राष्ट्रपति, प्रधान मंत्री और उनके मंत्री परिषद के सदस्य भी हैं। क्या कोर्ट के आँगन में भी किसी ने कचड़ा फेंका या वहां की नालियां भी जाम हैं? जिस रस्ते से VVIP लोग गुजरते हैं, वह रास्ता भी वैसा ही है, जैसा टी वी पर दिखाया जाता है? दिल्ली के स्वास्थ्य विभाग के कर्मचारी, क्या गंदे माहौल में रहकर सेवा दे रहे हैं? खैर मनाया जाय कि यह बरसात का समय नहीं हैं, नहीं तो सड़कों पर नाव चल रहे होते। महामारी फ़ैल चुकी होती। जीका वायरस की जरूरत ही नहीं पड़ती।
जमशेदपुर का बड़ा हिस्सा टाटा टाउन विभाग के नियंत्रण में है। यहाँ की सफाई सुथराई, बिजली पानी की ब्यवस्था टाटा की ही अनुषंगी इकाई जुस्को द्वारा की जाती है। यहाँ कभी हड़ताल नहीं होता कभी छुट्टी नहीं होती। जुस्को के कर्मचारी अनवरत सेवा में लगे रहते हैं। उन्हें हड़ताल की इजाजत नहीं है। हड़ताल मतलब स्थाई छुट्टी। इसके अधिकांश कर्मचारी ठेका पर काम करते हैं। अगर एक दिन भी बिना उचित वजह के काम पर नहीं आएं तो दूसरे दिन छुट्टी तय है। इसलिए ये लोग जल्दी नागा नहीं करते। प्राइवेट कंपनियों के कर्मचारी/अधिकारी भी बंधुआ मजदूर की भांति काम करते हैं। पर जहाँ कही भी नगरपालिका  म्युनिस्पलिटी, या नगर निगम है। ब्यवस्था ऐसी ही चरमराती रहती है। टैक्स तो सभी अपना समय पर चुकाते हैं पर सुविधा और सेवा समय पर मिले यह कोई जरूरी नहीं है।
'कुशासन करने वाले शासक को सहयोग देने से इंकार करने का अधिकार प्रत्येक व्यक्ति को है।'- महात्मा गांधी 'यदि सरकार भ्रष्टाचार को रोक पाने में नाकाम रहती है, तो उसे टैक्स देने से इंकार करके असहयोग आंदोलन शुरू कर दें।'- हाईकोर्ट नागपुर बेंच.
इन दोनों कथनों में 96 वर्षों का फर्क है, लेकिन अर्थ की दृष्टि से दोनों में कोई अंतर नहीं है। पहले वाक्य में 'कुशासन करने वाले' से मतलब है- अंग्रेजी शासकों से तो दूसरे कथन में जो 'सरकार' है, वह आजाद हिंदुस्तान की अपनी सरकार है। पहले वाक्य के शब्द उस नोटिस से लिए गये हैं, जो महात्मा गांधी ने 22 जून 1920 को वायसराय को दिया था। इसके बाद ही पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आंदोलन पूरे देश में फैल गया था।
यह दूसरा कथन महाराष्ट्र हाईकोर्ट की नागपुर बेंच का है, जो उसने महाराष्ट्र सरकार और बैंक ऑफ महाराष्ट्र के एक मामले की सुनवाई करते हुए कहे। जाहिर है कि जनहित याचिकाओं की लगातार बढ़ती जा रही संख्याओं ने कोर्ट के सामने प्रशासन का जो चरित्र और लोगों की जिन परेशानियों को प्रस्तुत किया है, उसने कोर्ट को यह कहने के लिए प्रेरित किया होगा। निःसंदेह रूप से इसमें कहीं न कहीं कुछ विशेष न कर पाने की कोर्ट की बेबसी भी झलक रही है। बेबसी यह कि 'अब जो करना है, लोग खुद करें।' ऊपर से शांत और सहज दिखने वाले इस कथन के गर्भ में आक्रोश का जो लावा उबल रहा है, उसकी अनदेखी किया जाना हितकर नहीं होगा।
यह एक बहुत ही व्यावहारिक सवाल है कि 'मुझसे जिस काम के नाम पर पैसा वसूला जा रहा है, वह काम होना ही चाहिए। यदि काम नहीं, तो दाम भी नहीं।' नगर निगम, नगर पालिकायें सम्पत्ति कर लेती हैं, लेकिन कचरों के ढेरों का साम्राज्य फैला हुआ मिलता है। रोड नहीं है, लेकिन रोड टैक्स है। सच यही है कि ऐसे में लोग टैक्स दें तो क्यों दें। वे किस पर भरोसा करके दें। ब्रिटेन में काउंटियां टैक्स लेती हैं। उस रकम की पाई-पाई का हिसाब जनता के लिए डिस्प्ले किया जाता है। वे जितना देते हैं, उससे अधिक वे पाते है। हम यह तो जानते हैं कि हमसे कौन-कौन से टैक्स किस-किस काम के लिए, लिए जा रहे हैं, लेकिन यह नहीं जानते कि उसका होता क्या है। कोर्ट ने इशारा किया है- भ्रष्टाचार।
अंत में मैं यही कहना चाहूंगा कि स्वच्छ भारत का सपना दिखानेवाले प्रधान मंत्री क्या इन सबसे अनजान हैं या अनजान बने रहना चाहते हैं? प्रधान मंत्री आसाम में जाकर बोलते हैं- एक परिवार उन्हें काम नहीं करने देता। पूर्ण बहुमत से बांये गए प्रधान मंत्री के ऐसे बोल?
प्लीज सर! हस्तक्षेप करिए समाधान निकालिए, वरना आप पर से लोगों का भरोसा उठ जायेगा. ऐसे ही अब डगमगाने लगा है।
- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

Thursday, 4 February 2016

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन!

फूल खिले हैं गुलशन गुलशन, देख के हर्षित होता है मन
अवसादों को दूर हटाकर, आओ घूमे उपवन उपवन!
ठंढ हवा से ये न डरते, तप्त सूर्य के सम्मुख रहते
आस पास को सुरभित करते, तितली संग भ्रमरों का गुंजन
सडकों पर चलती है गाड़ी, शोर शराबा करे सवारी
कहीं अगर कोई दब जाए, नाही सुनते उनका क्रंदन 
मानव जीवन सबसे सस्ता, क़ानून का अब हाल है खस्ता    
उपवन में सजती है क्यारी, माली देखे हो प्रसन्न मन 
उपवन को घर ले आये हैं, गमलों में पौधे भाये हैं.
गुलदाउदी डहलिया गेंदा, लाल गुलाब सुगन्धित गम-गम, 
फूल संग होते हैं कांटे, जीवन ने सुख दुःख हैं बांटे.
सुख में हम सब इतराते हैं, दुःख में क्यों घबराता है मन.
सुख दुःख दोनों नदी किनारे, इनके बीच जीवन के धारे 
दिवा-रात्रि जैसे होते हैं, सुख दुःख में पलता है जीवन 
दुःख को अंतर बीच छुपाकर, स्वर्ण भाँति तन को चमकाकर. 
परहित चाहे वह है मानव, खुशी बिखेरे वह है जीवन 
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन, देख के हर्षित होता है मन
जवाहर लाल सिंह ०५.०२.२०१६ 

Saturday, 30 January 2016

मालदा का सच और सियासत

पश्चिम बंगाल का मालदा कभी आम के लिए मशहूर हुआ करता था. वहां बड़े पैमाने पर चावल की खेती की जाती थी. लेकिन अब इस मालदा की तस्वीर बदल गई है. अब यहां अपराधियों और माफियायाओं का बोलबाला है. अब यहां बात-बात पर हिंसा होती है. मालदा हिंसा पर आज तक(न्यूज चैनेल) ने तहकीकात की कि आखिर वहां ऐसा क्यों हो रहा है. ऐसा क्या हो रहा है जिस पर सुरक्षा एजेंसियों को ध्यान देना बेहद जरुरी है.
मालदा के खेतों में अवैध रूप से अफीम की खेती हो रही है. आप को जानकर हैरानी होगी कि अफीम की खेती एक या दो बीघों में नहीं बल्कि अस्सी हजार बीघे में की जा रही है. इससे तीन हजार करोड़ से भी ज्यादा की काली कमाई होती है. जाहिर सी बात है कि करोड़ों की काली कमाई है, तो इसमें अपराधियों की बड़ी जमात भी होगी. इसकी कमाई के लिए लोग किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं.
इसका सबसे बड़ा उदाहरण 3 जनवरी 2016 को कालिया चक में हुई घटना है. इसमें पुलिस की मौजूदगी में थाने को ही फूंक दिया. दंगाईयों ने जो कहर बरपाया उससे पूरे राज्य में सनसनी फैल गई. पुलिस-प्रशासन भी इनके सामने लाचार हो गया. दंगाईयों के सामने जो आया वही उनका शिकार हो गया. इन लोगों ने जमकर उत्पात मचाया. पुलिस ने रोकने की कोशिश की तो थाने को ही फूंक दिया.
थाने में मौजूद सारे क्रिमिनल रेकॉर्ड तक जला डाले. पुलिस को अपनी जान बचाकर वहां से भागना पड़ा. 4 घंटे तक दंगाईयों ने जमकर उत्पात मचाया. कई लोग घायल हो गए. इसके बाद दंगाई खुद ही वहां से चले गए. पुलिस मूकदर्शक की तरह सिर्फ उस नजारे को देखती रही. मीठे आमों का शहर मालदा अब दहशत में है. यहां आये दिन हो रहे वारदात की वजह जानने के लिए आजतक की खुफिया टीम मालदा पहुंची.
आजतक की टीम की पड़ताल में जो सच सामने आया वो बेहद चौंकाने वाला है. मालदा में हिंसा की आग अभी बुझी भी नहीं थी कि सियासत सुलगने लगी. किसी ने घटना को सांप्रदायिक रंग दिया तो किसी ने कहा कि BSF और लोगों के बीच तनाव ने हिंसा का रुप धारण कर लिया. लेकिन सियासत के बीच कई सवाल सुलग रहे थे.
क्या वाकई मालदा की हिंसा सांप्रदायिक थी? या BSF और स्थानीय लोगों के बीच तनाव की वजह से हिंसा हुई थी? अचानक कहां से आई थी डेढ़ लाख लोगों की भीड़? हथियार लेकर लोग सड़कों पर विरोध प्रदर्शन के लिए क्यों उतरे थे? क्या पुलिस को डेढ लाख लोगों के इकट्ठा होने की सूचना थी? यदि, पुलिस को भीड़ की जानकारी थी तो मुक्कमल तैयारी क्यों नहीं की गई? राज्य सरकार पूरे मामले की लीपापोती करने में क्यों जुटी रही?
जितनी जानकारी मिल सकी है उसके अनुसार जानकारी होते हुए भी सरकार का आदेश नहीं था कि इस घटना को ज्यादा तूल दिया जाय क्योंकि इसके साम्प्रदायिक हो जाने के खतरे ज्यादा थे. सरकार इसे साम्प्रदायिक होने से बचाना चाहती थी. सरकारी संपत्ति का नुक्सान हुआ पर जान की हानि नहीं हुई. पुलिस मूकदर्शक बन सब कुछ देखती रही और लोगों का गुस्सा खुद ब खुद शांत हो गया.
मालदा में इतनी बड़ी तादाद में अवैध हथियार मौजूद हैं कि जितने पुलिस के पास भी नहीं. असलहों की बदौलत इस जिले में माफिया और अपराधियों की अपनी सरकार चल रही है. यहां नकली नोट और अवैध हथियारों की फसल लहलहा रही है. यह अब अपराधियों का गढ़ बन चुका है. यहां देश का कानून काम नहीं करता. अपराधियों की अपनी सरकार है. पराधियों का खौफ इस कदर हो चुका है कि पुलिस भी इनसे डरती है.
अफीम की खेती और हथियारों की तस्करी के लिए अफगानिस्तान दुनिया भर में कुख्यात है. पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणी के मुद्दे पर हिंसा और आगजनी का शिकार पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का कालियाचक इलाका भी अफगानिस्तान से कम नहीं है. अंग्रेजी दैनिक मेल टुडे के मुताबिक, भारत और बांगलादेश की सीमा पर बसा ये इलाका अफीम की खेती, हथियारों की तस्करी और उग्रवाद के गठजोड़ के कारण हिंदुस्तान का अफगा‌निस्तान बन गया है.
उल्लेरखनीय है कि उत्तर प्रदेश के एक हिंदुत्ववादी नेता की ओर से पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के विरोध में मालदा जिले के कालियाचक कस्बे में एक रैली निनकली ‌थी, जिसमें हजारों की संख्या में मुसलमान शामिल थे. रैली में शामिल प्रदर्शनकारी उस वक्त हिंसक हो गए, जब पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया. उन्होंने कालियाचक पुलिस थाने और क्षेत्र विकास अधिकारी कार्यालय में तोड़फोड़ कर आग लगा दी. सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया गया, बीएसएफ और एनबीएसटीसी के वाहनों को जला दिया। 30 पुलिसकर्मी भी घायल हो गए।
“देखिए, यह है अफीम की खेती का समन्दर…”, कालियाचक पहुंची NDTV की टीम से एक्साइज़ डिपार्टमेंट में काम करने वाले सब-इंस्पेक्टर ने कहा…
पश्चिम बंगाल के माल्दा जिले में कालियाचक के गांवों में जहां तक हमारी नज़र गई, बस, अफीम के खेत नज़र आए… हालांकि इस गैरकानूनी खेती को नष्ट करने का काम होता रहा है, लेकिन 3 जनवरी के बाद से इसके तार दंगे से सीधे जोड़े जा रहे हैं, जब डेढ़ लाख लोगों के हुजूम ने हिंसा, लूटपाट और आगज़नी की… NDTV की टीम भी बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स (बीएसएफ) की मदद से उन खेतों तक पहुंच सकी, जहां यह खेती होती रही है… इसकी रखवाली के लिए ड्रग माफिया के लोग बंदूकें ताने नज़र रखते हैं, लेकिन अब सख्ती के कारण उनकी पकड़ ढीली पड़ रही है…
अफीम से होने वाली कमाई गेहूं से होने वाली कमाई की तुलना में 10 गुना ज़्यादा होती है… अफीम के फूलों से निकाला हुआ गोंद ही 80,000 रुपये प्रति किलो तक बिक जाता है, और कहीं-कहीं तो एक-एक लाख रुपये में… इसी गोंज को बाद में प्रोसेस कर मॉरफीन और हेरोइन जैसी ड्रग बनाई जाती हैं, लेकिन यह काम स्थानीय स्तर पर नहीं होता…
बहरहाल, इसकी खेती के बढ़ते दायरे पर काबू के लिए बीएसएफ, एक्साइज़ और लैन्ड डिपार्टमेंट एकजुट होकर कार्रवाई कर रहे हैं… पिछली बार पांच-छह ट्रैक्टरों की मदद से खेती को नष्ट किया गया था, तो इस बार आठ से भी ज़्यादा ट्रैक्टर इस्तेमाल किए जा रहे हैं…
5 जनवरी से शुरू हुई कार्रवाई में 3,400 बीघा जमीन पर अफीम की खेती नष्ट की गई, लेकिन एक्साइज़ विभाग के पुराने लोगों का कहना है कि अगर 50 बीघा में से 30 बीघा भी नष्ट कर दी जाए, तो इसके बावजूद इस काम में लगे लोगों को फायदा ही होता है…
यहां ज़मीन कुछ किसानों की है, कुछ बाहरी लोगों की… किसानों को उनकी ज़मीन के एक बीघा के 50,000 रुपये के हिसाब से रकम दे दी जाती है, और फिर उस पर अफीम की खेती की जाती है… अब सबसे बड़ा सवाल उस नेक्सस (गठजोड़) का है, जो इस खेती को होने देता रहा है… सवाल है कि प्रशासन के लोग इसे नार्को-टैररिज़्म (narco-terrorism) कहते हैं, लेकिन इसके बावजूद यह कैसे पनपता रहा… कौन हैं वे ताकतें, जो इसको नजरअंदाज करती हैं, इसे शह देती हैं, और हमारे देश की सुरक्षा से समझौता करती हैं…
अब नारकोटिक्स विभाग की देख रेख में अफीम की खेती को नष्ट किया जा रहा है.
नशा नाश का कारण होता है, यह सभी जानते हैं फिर भी इसका कारोबार देश विदेश में बढ़ता ही जा रहा है. नशे की हालात में ही अधिकांश अपराध होते हैं. क्या हमें इनपर अंकुश नहीं लगाना चाहिए?
सवाल फिर वही है कि क्या आगे इस क्षेत्र में अफीम की खेती नहीं होगी, अवैद्य हथियारों और ‘फेक करेंसी’ के कारोबार पर अंकुश लगेगा, ताकि मालदा मिनी अफगानिस्तान बनने से बच जाय. हमारे देश के वंचित क्षेत्रों के पूर्ण विकास पर राज्य और केंद्र सरकारें ध्यान देगी? लोग जो दिक्भ्रमित हैं, उन्हें मुख्यधारा में लाने का समुचित प्रयास करेगी?
नक्सल प्रभावित क्षेत्र भी ऐसे ही हैं. विकास से कोसों दूर. दिक्भ्रमित नौजवान! जिनके हाथ में देश को बनाने का जज्बा होना चाहिए आज हथियारों से खेल रहा है और बेक़सूर, मासूम लोगों की जिन्दगी से खिलवाड़ कर रहा है. हम स्मार्ट सिटी का जितना भी ‘माया-जाल’ बुन लें, जबतक पिछड़े वंचित लोगों को मुख्यधारा में न लाया जायेगा, हमारा देश महँ नहीं बन पायेगा. उम्मीद है कि हमारी सरकारें, स्वयंसेवी संस्थाएं मिलजुलकर स्थायी हल ढूंढ निकलेगी. इसी आशा के साथ कि देश को जोड़ने का काम हो, तोड़ने का नहीं. जयहिंद !

- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

Saturday, 23 January 2016

पी एम का वाराणसी और लखनऊ दौरा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार सुबह वाराणसी में डीजल रेल इंजन कारखाना (डीरेका) मैदान में 9000 से ज्यादा विकलांगों को उपकरण बांटकर रिकॉर्ड बनाया। मोदी ने खुद कई बच्चों को उपकरण, हाईटेक छड़ी, ट्राइसाइकिलें बांटी। पी एम मोदी ने इस मौके पर यह भी कहा कि उनपर लगातार हमले हो रहे हैं, लेकिन वे विचलित नहीं हैं। पीएम मोदी ने इस मौके पर नई मॉडल रेलगाड़ी महामना एक्सप्रेस को भी हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह रेलगाड़ी वाया लखनऊ हफ्ते में तीन दिन दिल्ली के लिए चलेगी।
प्रधानमंत्री ने कहा, “जब किसी को विकलांग कह कर परिचय कराया जाता है तो नजर उस अंग पर जाती है जो काम नहीं करता। जबकि असलियत यह है कि विकलांग के पास भी ऐसी शक्ति होती है जो आम लोगों के पास नहीं होती। इनके पास दिव्य विशेषता होती है। इनके अंदर जो विशेष शक्ति है, उसे मैं दिव्यांग के रूप में देखता हूं।”

हालाँकि विकलांग लोगों के कई संगठनों ने समुदाय को संबोधित करने के लिए ‘दिव्यांग’ शब्द के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति जताते हुए प्रधानमंत्री मोदी से ‘विकलांग’ शब्द की जगह इसका इस्तेमाल ना करने की अपील की। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री ने पिछले साल 27 दिसंबर को अपने रेडियो संबोधन ‘मन की बात’ में कहा था कि शारीरिक रूप से अशक्त लोगों के पास एक ‘दिव्य क्षमता’ है और उनके लिए ‘विकलांग’ शब्द की जगह ‘दिव्यांग’ शब्द का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। संगठनों ने कहा, ‘हम दोहराना चाहेंगे कि विकलांगता कोई दैवीय उपहार नहीं है। ‘दिव्यांग’ जैसे वाक्यांशों के इस्तेमाल से किसी भी तरह से अपयश नहीं हट जाएगा या विकलांगता के आधार पर भेदभाव खत्म नहीं हो जाएगा।’ उन्होंने कहा कि सरकार को विकलांगों को देश के आर्थिक, सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में प्रभावशाली तरीके से हिस्सा लेने से रोकने वाली सांस्कृतिक, सामाजिक, शारीरिक और सोच संबंधी बाधाओं के कारण विकलांगों से जुड़े अपयश, भेदभाव और हाशिये पर डालने के मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।
इससे पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शुक्रवार को अपने संसदीय क्षेत्र पहुंचकर महामना एक्सप्रेस को हरी झंडी दिखाई। आरामदायक सीटों वाली सुपरफास्ट रेलगाड़ी, महामना एक्सप्रेस में सफर करने के लिए यात्रियों में जबर्दस्त उत्साह दिखा। गुरुवार को रेलगाड़ी का रिजर्वेशन खुलते ही अगले एक सप्ताह तक के लिए सभी सीटें फुल हो गईं। यह स्थिति तब है, जब इस गाड़ी का किराया अन्य मेल एक्सप्रेस से 15 फीसदी अधिक है। इस रेलगाड़ी का संचालन 25 जनवरी से शुरू होगा। इसके बाद 22418 नई दिल्ली से सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को और वाराणसी से 22417 मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को जाएगी।
लखनऊ में डॉ. भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के दौरान कुछ युवाओं ने ‘मोदी गो बैक’ के नारेबाजी की। यह भी प्रधान मंत्री मोदी की सभा में शायद पहली बार हुआ है. अभी तक देश विदेश में सिर्फ मोदी मोदी के ही नारे लगा करते थे. नारे लगाने वाले छात्रों को सुरक्षाकर्मियों ने बाहर निकाल दिया और कुछ को हिरासत में ले लिया गया, बाद में उन्हें जमानत पर छोड़ भी दिया। अब खबर यह भी है कि उन छात्रों को यूनिवर्सिटी के गेस्ट हाउस से निकाल दिया गया है। यानी विरोध करना सख्त मना है। 
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी के छात्र रोहित वेमूला की आत्महत्या के मामले का जिक्र करते हुए भारी मन से कहा कि इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, एक मां ने अपना बेटा खोया है। इस बात को कहते हुए पीएम मोदी भावुक हो गए। इस दौरान वे थोड़ी देर तक चुप रहे। उन्होंने कहा कि मां भारती ने अपना एक लाल खोया है।
प्रधान मंत्री ने भी उन नारों पर कुछ नहीं बोला। कुछ छात्रों की नारेबाज़ी सामान्य घटना नहीं है खासकर प्रधानमंत्री की सभा का बंदोबस्त काफी चाकचौबंद होता है। नारेबाज़ी करने वाले छात्रों ने भी जोखिम की परवाह नहीं की। अपने भाषण के अंतिम चरण में रोहित वेमुला का ज़िक्र करते हुए प्रधानमंत्री भावुक हो गए। मां भारती ने अपना लाल खोया है इससे भी ज़्यादा कह सकते थे ताकि इस घटना से नाराज़ तबके में भरोसा पैदा होता और तमाम विश्वविद्यालयों को संदेश जाता कि किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। लेकिन प्रधानमंत्री का भाषण समाप्त होते ही न्यूज़ चैनलों पर फ्लैश होने लगा कि मानव संसाधन मंत्री ने रोहित की आत्महत्या से जुड़ी तमाम परिस्थितियों और तथ्यों की जांच करने के लिए न्यायिक आयोग के गठन का फैसला किया है। यह आयोग तीन महीने में अपनी रिपोर्ट सौंपेगा। स्मृति ईरानी ने रोहित की मां से बात की और अपनी संवेदना व्यक्त की।
मानव संसाधन मंत्रालय ने दो सदस्यों की एक जांच टीम हैदराबाद भेजी थी, टीम ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। इस घटना का असर देश के विश्वविद्यालयों में दिखना चाहिए बल्कि एक जगह से दिखने की खबर भी आई है। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद गुरुवार को अजमेर में राजस्थान सेंट्रल युनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। इसमें छह अन्य प्रोफेसरों के भी नाम हैं। इन सभी पर पीएचडी के छात्र उमेश जोनवाल ने आरोप लगाया है कि गाइड उल्लास जाधव ने वी सी से मिलकर परेशान किया और विश्वविद्यालय से निकलवा दिया। पिछले अक्टूबर में जब जोनवाल ने शिकायत की थी तब पुलिस ने एफआईआर भी नहीं की थी। गुरुवार को कोर्ट के आदेश के बाद दर्ज किया गया है। जोनवाल को 15 दिन तक अनुपस्थित रहने के कारण विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया था।
अभी भी सात छात्र भूख हड़ताल पर हैं। दस छात्रों के संगठन ने मिलकर एक ज्वाइंट ऐक्शन कमेटी बनाई है। इसमें एबीवीपी नहीं है। शुक्रवार को जनरल बॉडी मीटिंग भी हुई ताकि स्थिति सामान्य हो सके लेकिन इस्तीफा देने वाले प्रोफेसरों और छात्रों ने विरोध किया और कहा कि वी सी का इस्तीफा होना चाहिए। रोहित वेमुला के सुसाइड नोट को भी फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है। रोहित के सुसाइड नोट में कई जगहों पर काटा गया है। उस पर रोहित ने लिखा है कि ये लाइन उन्होंने खुद काटी है फिर भी इनकी फोरेंसिक जांच कराई जाएगी। हमारी जिन पंक्तियों को काटा गया है उससे ज़ाहिर होता है कि रोहित जिन संगठनों के लिए काम करता था, उन्हें लेकर भ्रमित था और उनसे कुछ मतभेद थे। सुसाइड नोट से ऐसा ज़ाहिर होता है कि रोहित ने कहा है कि ए एस ए और एस एफ आई अपने हित के लिए ही काम करते हैं। पुलिस यह भी जांच करेगी कि रोहित का पता लगाने में छह घंटे क्यों लगे। बुधवार की प्रेस कांफ्रेंस में स्मृति ईरानी ने कहा था कि कार्यकारी परिषद की उप समिति के मुखिया दलित प्रोफेसर थे। उनके इस दावे को गलत बताते हुए 14 दलित और अन्य समुदाय के प्रोफेसरों ने अपने प्रशासनिक दायित्वों से इस्तीफा दे दिया। इस मामले पर केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय की तरफ से कोई सफाई नहीं आई है।
केरल के कोट्टायम में गर्वनमेंट आर्ट कॉलेज में ABVP और SFI के सदस्यों के बीच मारपीट में सात छात्र घायल हो गए। एबीवीपी और एसएफआई के नेताओं को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। कौन तय करेगा कि कौन राष्ट्रविरोधी है और किस मुद्दे पर हम आपको विचार करने की छूट देंगे और इस मुद्दे पर नहीं देंगे। अलग-अलग विचारधाराएं अगर एक दूसरे से संघर्ष करते हुए संवाद नहीं कर सकती हैं तो फिर उनकी आक्रामकता दादागीरी क्यों न मानी जाए। चाहे वो SFI हो या ABVP या NSUI।
इन दोनों प्रकरणों के आधार पर मेरा सिर्फ यही मत है कि सामाजिक, शारीरिक, शैक्षणिक, राजनीतिक तथा आर्थिक रूप से अशक्त लोगों के साथ सहानुभूति के साथ कुछ सुविधा देनी चाहिए। उनकी भावना, उनकी बात को भी सुनी जानी चाहिए। उन्हें भी मुख्यधारा में लाने का हर संभव प्रयास किया जाना चाहिए। महात्मा गाँधी ने दलितों को हरिजन कहा था पर उनके प्रति भेदभाव आज भी जारी है। मोदी जी ने विकलांगों को दिव्यांग कहा है, पर जरूरत है उनसे भेदभाव से अलग सहानुभूतिपूर्वक समान रूप से ब्यवहार करने की। अन्यथा लोग राजनीति की रोटियाँ सेंकेंगे। मुद्दे को तूल देंगे और मोदी जी के प्रवाह में अवरोध पैदा करने की कोशिश करेंगे। अत: मोदी जी और उनके तमाम सहयोगियों को इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। जयहिंद! 
– जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

Sunday, 17 January 2016

दिल्ली में सम-विषम सूत्र की सफलता

तमाम विरोधों का सामना करते हुए, विवादित, बहु चर्चित ‘ओड इवन फार्मूला’ आखिर घोषित अवधि (यानी १ जनवरी से १५ जनवरी) तक सफलतापूर्वक अपना अभियान पूरा कर चुका है. दिल्ली की हवा के प्रदूषण में थोड़ा सुधार भी दर्ज किया गया है. अब घोषित अवधि पूरा कर लेने के बाद मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल की दिल्ली की जनता से अपील की गयी है कि इस नियम को अपनी दिनचर्या में शामिल कर लें, अर्थात इसको आगे भी जारी रक्खें. अब जुर्माना नहीं देना पड़ेगा पर खुद से इसका पालन करेंगे तो दिल्ली की हवा कम प्रदूषित होगी. बच्चों और बुजुर्गों का स्वास्थ्य बेहतर होगा. सांस और फेफड़ों की बिमारियों से मुक्ति पा सकेंगे. आंकड़ों के अनुसार इन १५ दिनों के अभियान में 156 करोड़ का पेट्रोल भी बचा . ऑड-ईवन लागू होने से पहले और लागू होने के दौरान इस फॉर्मूले का जो पोस्टमार्टम हुआ है, वह इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। यह योजना शुरू होने से पहले दिल्ली सरकार भी उस तरह से आश्वस्त नहीं थी। इसलिए दिल्ली सरकार को भी लग रहा था कि कहीं यह नियम उनके खिलाफ नकारात्मक माहौल न बना दे। शायद यही वजह थी कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी नियम लागू होने से पहले ही कह दिया कि सिर्फ 15 जनवरी तक… अगर लोगों को पसंद नहीं आया तो स्कीम वापस ले लेंगे। दिल्ली सरकार ने विज्ञापनों का अभियान चलाया बल्कि खुद मुख्यमंत्री केजरीवाल ने विज्ञापन में आने का बड़ा ही ऑड तरीका निकाल लिया। इस विज्ञापन में उनका चेहरा नहीं दिख रहा था मगर आवाज आ रही थी। वे फोन पर बात करते हुए अपना संदेश लोगों तक ले गए। अब रोहतक, अहमदाबाद, मुंबई और बेंगलुरु में भी इसे आजमाने की बात चल रही है। 
15 तारीख को मुख्यमंत्री केजरीवाल और परिवहन मंत्री गोपाल राय ने एक प्रेस कांफ्रेंस कर दिल्ली की जनता को बधाई दी। अरविंद केजरीवाल ने कहा कि लोगों ने 2000 रुपये के जुर्माने के भय से ऑड-ईवन नहीं अपनाया। मात्र 9,144 लोग ऐसे थे जो गलत नंबर की कार लेकर निकले और सरकार को जुर्माने के तौर पर 1 करोड़ 82 लाख से अधिक की रकम दे आए। ऑड-ईवन की कामयाबी में इन फाइन देने वालों का भी योगदान सराहनीय है। लोगों को डर था कि ऑड-ईवन के दौरान ऑटो वाले काफी वसूली करेंगे लेकिन गोपाल राय ने बताया कि सिर्फ 917 चालकों की शिकायतें आई हैं और पहले से ज्यादा अनुशासित तरीके से ऑटो वालों ने काम किया है।
मुख्यमंत्री केजरीवाल ने बताया कि स्कीम लागू होने से पहले 47 लाख लोग दिल्ली की बसों में सफर करते थे, स्कीम लागू होने के बाद हर दिन औसतन 53 लाख लोगों ने बसों में सफर किया। यानी बसों में 6 लाख अधिक लोग सफर करने लगे। मुख्यमंत्री ने कहा कि दिल्ली की बसों के फेरे भी बढ़ गए हैं। मुख्यमंत्री ने बताया कि जिन बसों को एक दिन में 200 किलोमीटर चलना होता था वे ट्रैफिक के कारण 160 किलोमीटर ही चल पाती थीं। लेकिन ऑड-ईवन के लागू होने के बाद वे एक दिन में 220 किलोमीटर की दूरी तय करने लगीं। एक बस ने 60 किलोमीटर अधिक यात्रा की। इस वजह से दिल्ली की 6000 बसों ने 9000 बसों का काम किया। यह एक दिलचस्प आंकड़ा है। इसकी विश्वसनीयता का ठीक से अध्ययन होना चाहिए। क्या इसका यह मतलब है कि दिल्ली में नई बसों की जरूरत नहीं होगी। अगर ट्रैफिक कम हो तो क्या मौजूदा बसों से ही दिल्ली की जरूरत पूरी की जा सकती है। योजना लागू होने से पहले दिल्ली सरकार ने कहा था कि 3000 अतिरिक्त बसें चलाई जाएंगी। नई बसों के खरीदे जाने की भी बात हुई थी, इस मामले में सरकार को ठोस रूप से भरोसा देना होगा।
इस अवधि में उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया भी साइकिल चलाते नजर आए और साइकिल ट्रैक बनाने की बात करने लगे। पिछले बीस साल से दिल्ली में साइकिल ट्रैक की बात हो रही है। दिल्ली में एक अनुमान के मुताबिक बीस लाख से ज्यादा लोग साइकिल से काम पर जाते हैं। मुख्यमंत्री केजरीवाल ने दिल्ली के लोगों से कहा है कि वे ऑड-ईवन को अपने स्तर पर जारी रखें। क्या वे और उनके मंत्री भी आगे ऑड और ईवन को जारी रखेंगे। कार पूल करेंगे या साइकिल से दफ्तर जाते रहेंगे। क्या वे मिसाल पेश करने के लिए तैयार हैं। कई लोगों को इस योजना से बाहर रखा गया लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के कई जजों ने भी इस योजना को अपनाया। वे या तो कार पूल में गए या फिर पैदल भी। अदालत का रुख भी ऑड-ईवन के प्रति सकारात्मक होने लगा और वह इसकी शुरुआती कामयाबी से संतुष्ट होने लगी। यहां तक कि अदालत ने खास श्रेणी की नई डीज़ल कारों के पंजीकरण पर रोक लगा दी। उसे अभी तक नहीं हटाया गया है।
इस अभियान में डॉक्टर नरेश त्रेहान की ट्वीट की हुई उस तस्वीर ने भी बड़ा असर किया था जिसमें दिल्ली और हिमाचल के मरीज के फेफड़े की तुलना की गई थी। दिल्ली के मरीज का फेफड़ा बुरी तरह काला हो चुका था। बाद में दिल्ली सरकार ने भी लोगों के फेफड़ों की जांच शुरू की, अब पता नहीं वह जांच जारी है या नहीं लेकिन फेफड़ों की जांच के नतीजों ने कई लोगों को बुरी तरह हैरान कर दिया। प्रदूषण की वजह से अब साक़िब जैसे 28 साल के युवा का फेफड़ा 20% कम काम कर रहा है। हर तीन में एक दिल्ली वाले का फेफड़ा कमजोर हो गया है। चलिए अब प्रदूषण की बात कर लें। क्योंकि इस मुहिम का असली मकसद प्रदूषण कम करना ही माना जा रहा है। पहले दिन सरकार ने दावा किया कि प्रदूषण का स्तर कम हुआ है। लेकिन विपक्ष ने कहा कि कोई असर नहीं पड़ा है।
दिल्ली सरकार ने प्रदूषण पर अपने आंकड़े रखे हैं। सरकार का दावा है कि दिसंबर में PM 2.5 का स्तर 600 से ज्यादा था। ऑड-ईवन के दौरान PM 2.5 का स्तर 400 से ज्यादा रहा। ऑड-ईवन के दौरान बॉर्डर के इलाकों में प्रदूषण ज्यादा रहा, शहर के अंदर प्रदूषण करीब 20-25% तक कम हुआ है। अगर ऑड-ईवन न होता तो PM 2.5 का स्तर 600 से ज्यादा होता। इन आकंड़ों को अलग-अलग तरीके से देखा जा रहा है। सवाल उठ रहा है कि दुपहिया वाहनों से 30 फीसदी से ज्यादा प्रदूषण होता है। धूल से 56 फीसदी प्रदूषण होता है जबकि गाड़ियों से सिर्फ 9 फीसदी प्रदूषण होता है। तो क्या धूल रोकने के लिए भी सरकार कोई अभियान चलाएगी। कोई सिस्टम कायम करेगी। दिल्ली सरकार ने इन मामलों में एक कार्ययोजना अदालत के सामने रखी है। एनडीटीवी ने अपनी तरफ से एक एंबुलेंस चलाया यह देखने के लिए, एक खास दूरी के बीच एंबुलेंस को कितना समय लगता है। पाया कि पहले दस किमी की दूरी तय करने में जिस एंबुलेंस को 35 मिनट लगते थे अब वह एंबुलेंस 18 मिनट में पहुंच गया। यानी 17 मिनट की बचत हुई। क्या यह वक्त कीमती नहीं है। चार साल से एंबुलेंस चला रहे संजय सिंह ने बताया कि पिछले दो हफ्तों में काफी राहत महसूस हुई है। हमारी गाड़ी जाम में नहीं फंसी है। अन्य लोगों ने भी बताया कि उन्हें भी घर से दफ्तर के बीच फेरे लगाने में पंद्रह से बीस मिनट की बचत हुई है।
ऑड-ईवन स्कीम के खिलाफ हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक याचिका दाखिल की गई। लेकिन हाईकोर्ट ने ऑड-ईवन के नोटिफिकेशन पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि साथ में यह निर्देश भी दिया कि अगली बार सरकार उन सवालों पर भी जरूर विचार करे जो इस दौरान उठाए गए हैं। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी की। देश के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर ने कहा कि लोग प्रदूषण की वजह से मर रहे हैं और आप इस योजना को चुनौती दे रहे हैं। यहां तक कि खराब हालत के चलते सुप्रीम कोर्ट के जज भी कार पूल कर रहे हैं। तो दिल्ली में ऑड-ईवन प्रयोग का पहला दौर समाप्त हो गया…। कई लोग खुश हो रहे होंगे, नियमों से राहत भी महसूस कर रहे होंगे…लेकिन शायद इसकी सफलता से लग रहा है कि यह जल्दी खत्म हो गया। पिछले 15 दिनों से सड़कों पर भीड़ कम मिलती थी, ट्रैफिक जाम नहीं मिलता था, घर जल्दी पहुंचा जा सकता था। बस में सफर करने वाले भी खुश थे क्योंकि बैठने की जगह मिल जाती थी। प्रदूषण भी कुछ कम हुआ होगा। लेकिन शायद इसमें सबसे खास बात रही कि दिल्ली वासी एकजुट हुए। शहरियों ने भी परेशानियों के बावजूद नियम का पालन किया। दिल्ली पुलिस के लिए भी खासी चुनौती नहीं थी क्योंकि लोग स्वेच्छा से नियम पालन करते हुए दिखे।
एक रिपोर्ट के अनुसार – दिल्ली का बीता पखवाड़ा – एम्बुलेंस का रिस्पांस टाइम सुधरा क्योंकि लालबत्तियों पर 5 से 10 मिनट कम रुकना पड़ा। गाड़ी चलाने वाले खुश थे क्योंकि सड़कों पर कम वाहनों के कारण आधा घंटे जल्दी पहुंच सके। सीएनजी पर अच्छा माइलेज मिला क्योंकि ट्रैफिक कम था। पेट्रोल डीजल की बिक्री में 30 प्रतिशत कमी हुई। बस ड्राइवरों को ज्यादा ट्रिप लगाने का अवसर मिला क्योंकि ट्रैफिक कम था। पार्किंग लॉट 15 से 20 प्रतिशत खाली रहे। एक ऑनलाइन पोल के अनुसार 67 प्रतिशत दिल्ली वासियों ने इस प्रयोग का स्वागत किया है। तो अब जब दिल्ली के प्रदूषण पर थोड़ा बहुत असर भी पड़ा है तो और क्या किया जा सकता है जिससे हवा सुधरे? हालांकि दिल्ली में शहरीकरण देश में सबसे ज्यादा 98 प्रतिशत है लेकिन सार्वजनिक परिवहन सबसे देरी में विकसित हुआ। मुंबई में लोकल ट्रेन 1853 से दौड़ रही है, कोलकाता में मेट्रो 1984 में आ गई थी, जबकि दिल्ली में तो 2002 तक बस सर्विस ही होती थी।
सार्वजनिक परिवहन के विकास से समस्या का निदान संभव – एक रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में दोपहिया वाहनों से 33 प्रतिशत और ट्रकों से 46 प्रतिशत प्रदूषण होता है। इसके अलावा दिल्ली में गाड़ियों की तादाद अन्य बडे़ शहरों के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। दिल्ली में प्रत्येक 1000 व्यक्तियों में से 451 के पास गाड़ी है। ग्रेटर मुंबई में इस अनुपात में 102, कोलकाता में 110 वाहन हैं। सिर्फ बेंगलुरु ही ऐसा शहर है जहां प्रति हजार व्यक्ति पर दिल्ली से ज्यादा 489 वाहन हैं। अगर हमारा पब्लिक ट्रांसपोर्ट दुरुस्त होगा तो लोग निजी वाहन खरीदने की जरूरत महसूस नहीं करेंगे।
तात्पर्य यह है कि जब समस्या गंभीर हो तो सरकार के साथ जन भागीदारी की भी जरूरत होती है. बिना जन भागीदारी के किसी भी योजना को पूरी तरह सफल नहीं बनाया जा सकता है. स्वच्छता अभियान की भी पूर्णरूपेण सफलता तभी प्राप्त होगी जब उसमे जन भागीदारी होगी और कुछ नियमानुसार फाइन लगाने की भी ब्यवस्था होनी चाहिए.
उधर १७ जनवरी को अरविन्द केजरीवाल जनता को धन्यवाद देने और शायद इसका राजनीतिक लाभ लेने के लिए ही छत्रशाल स्टेडियम में लोगों के बीच बोल रहे थे, तभी भावना नामकी एक युवती ने उनपर स्याही फेंक कर रंग में भंग डालने की कोशिश कर दी. अब केजरीवाल की सुरक्षा को लेकर दिल्ली पुलिस पर जहाँ सवाल उठने लगे वहीं आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने भाजपा की साजिश करार दे दिया. अब यह सब तो आजकल की राजनीति का हिस्सा बन गया है. जनता ही सही मूल्यांकन करती है,जब अपना फैसला सुनाती है. 
– जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

Saturday, 9 January 2016

पठानकोट से हमने क्या सबक लिया

पठानकोट एयर बेस पर ६ आतंकवादियों द्वारा किया गया बड़ा हमला और घुंसपैठ एक बड़ी साजिश का नतीजा है. इतने सारे विध्वंसक साजो सामान के साथ घुंसपैठ लगातार तीन दिनों तक या उससे भी ज्यादा समय तक सेना से लोहा लेना मामूली वारदात नहीं कही जा सकती. भले ही सेना और सरकार की चुस्ती ने इसे नाकाम कर दिया पर सवाल अनेकों है, जो उठने लाजिम हैं.
यह हमला ठीक उस समय हुआ जब प्रधान मंत्री नवाज शरीफ से बिना कोई तय कार्यक्रम के मिलकर आये थे. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पाकिस्तान दौरा कर NSA स्तर से वार्ता की पृष्ठभूमि तैयार कर रही थी. हर मसलों पर समग्र बात-चीत की पहल के तौर पर इसे देखा जा रहा था, ताकि दोनों देशों के बीच सम्बन्धों में सुधार हो. इसी बीच पठानकोट के एयरबेस पर हमला सारे प्रयासों को जड़ से हिला देता है. यह आतंकी हमला पाकिस्तान आर्मी से समर्थित था, इसके भी सबूत मिल चुके हैं.
हम पाकिस्तान को सबूत पर सबूत भेज रहे हैं, पर पाकिस्तान उसे नाकाफी बता रहा है. पाकिस्तानी मीडिया पहले ही इन सबको ख़ारिज कर चुका है. अमेरिका भी पकिस्तान को आतंकियों पर सही एक्शन लेने की सलाह दे रहा है, पर उसे समय देने की भी वकालत कर रहा है. पाकिस्तानी सेना और आतंकवादी पाकिस्तान में स्वतंत्र एजेंसी की तरह काम करता है और वह हमेंशा भारत के विरुद्ध ही एक्शन में रहता है.
सवाल यह भी उठा है कि इतना बड़ा सुनियोजित और प्रायोजित हमला बिना हमारे लोगों के सहयोग के संभव नहीं था. कई लोगों से पूछताछ जारी है. जब तक हमारे लोग उनको सूचना उपलब्ध नहीं कराएँगे, वे कैसे पायेंगे? आतंकी सरगना तभी कामयाब होते हैं जब हमारे लोग उनके सहारे होते हैं. चाहरदीवारी पर लगे तीन फ्लड लाइट्स का रुख घुमाया किसने? दो लाइटों के वायर काटे हुए मिले. एस. पी. सलविंदर सिंह की भूमिका अभी तक संदेह के घेरे में है. उनकी जांच हो रही है. जांच के बाद कुछ एक्शन लिए जायेंगे तो? सेना के जवानों पर हम सब नागरिकों को ‘नाज’ होता है. अभी तक यह कहा जा सकता है कि सेना के जवान और उस संस्था में काम करने वालों में देश भक्ति कूट-कूट कर भरी हुई होती है. वह जीता है तो देश के लिए मरता है तो देश के लिए. हम उन जवानों को सैलूट करते हैं. उनके शव को तिरंगे में लपेटकर सम्मान दिया जाता है. सेना के जवानों के परिवार भी अपना उदगार जिस प्रकार व्यक्त करते हैं, एक बार हमारी ऑंखें नम हो जाती है. पर क्या इनमे भी कुछ गद्दार हैं, जो जिम्मेदार हैं, इस प्रकार के हमले और आतंकवादियों के घुंसपैठ के लिए. उनकी सजा तो होगी सो होगी पर इनकी जवाबदेही को हम कब मूल्यांकित करेंगे? तथा सुधारात्मक प्रक्रिया कब अपनाएंगे?
गद्दारों के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं ? हम क्यों अपने देश के प्रति खुद्दार नहीं है ? ड्रग्स, नारकोटिक्स का बिजनेस चलनेवाले ही घुंसपैठ कराते हैं. यह भी बातें स्पष्ट हो चुकी है. जिन पर बिश्वास कर हम चैन से सोते हैं, उनमे अगर गद्दार हों तो बहुत दुःख होता है. यह बेईमानी है, इसे हर हाल में रोका जाना चाहिए. हमें अपनी सीमा पर हर हमेशा चौकस निगाह रखनी होगी और हर तरह के घुंसपैठ को नाकाम करने के हर संभव प्रयास करने चाहिए. अपनी सुरक्षा ब्यवस्था को और चुस्त दुरुस्त करने होंगे. रक्षा मंत्री मनोहर परिकर ने भी कुछ कमियों को रेखांकित किया है. हमें उन्हें दूर करने ही होंगे. अब प्रधान मत्री भी पठानकोट का स्वयम दौरा कर चुके हैं. उन्होंने भी कुछ देखा होगा और अपनी कुछ राय दी होगी. निश्चित ही हमें उनके सलाहों पर गौर करनी चाहिए और अपने घर को अपने देश को सुरक्षित रखने के हर संभव प्रयास करने चाहिए.
बहुत पहले राष्ट्रकवि मथिलीशरण गुप्त ने कहा था
‘जिसको न निज भाषा तथा निज देश का अभिमान है।
वह नर नहीं, नर पशु निरा है और मृतक समान है।’ – राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त
कुछ और विश्लेषण पत्रकार रवीश कुमार के शब्दों में – “लेफ़्टिनेंट कर्नल सहित सात जवान शहीद हुए हैं। एक कृतज्ञ राष्ट्र को क्या करना चाहिए? क्या उसे चुप रहकर शोक जताना चाहिए या बोलने के नाम पर चैनलों पर बोलने की असभ्यता के हर चरम को छू लेना चाहिए? ऐसा लगता है कि हम आक्रामक होने के बहाने शहादत का अपमान कर रहे हैं। इन पाकिस्तानी मेहमानों के ज़रिये कहीं पाकिस्तान विरोधी कुंठा को हवा तो नहीं दी जा रही है। इस कुंठा को हवा तो कभी भी दी जा सकती है लेकिन ऐसा करके क्या हम वाक़ई शहादत का सम्मान कर रहे हैं? क्या ये पाकिस्तानी मेहमान कुछ नई बात कह रहे हैं? चैनलों पर पाकिस्तान से कौन लोग बुलाये जा रहे हैं? क्या वही लोग हैं जो इधर के हर सवाल को तू-तू मैं-मैं में बदल देते हैं और इधर के वक़्ता भी उन पर टूट पड़ते हैं। कोई किसी को सुन नहीं रहा। कोई किसी को बोलने नहीं दे रहा। इस घटना पर दोनों देशों के जिम्मेदार लोग बोल रहे होते तो भी बात समझ आती लेकिन वही बोले जा रहे हैं, जिन्हें घटना की पूरी जानकारी तक नहीं। जिनका मक़सद इतना ही है कि टीवी की बहस में पाकिस्तान को अच्छे से सुना देना। किसी की शहादत पर गली मोहल्ले के झगड़े सी भाषा उसका सम्मान तो नहीं है? उनका परिवार टीवी देखता होगा तो क्या सोचता होगा।
क्या यही एकमात्र और बेहतर तरीका है? अपनी कमियों और चूक पर कोई सवाल क्यों नहीं है? क्या इस सवाल से बचने के लिए मुंहतोड़ जवाब और बातचीत के औचित्य के सवाल को उभारा जा रहा है? दो दिन से पठानकोट एयरबेस में गोलीबारी चल रही है लेकिन आप देख सकते हैं कि गृहमंत्री का असम दौरा रद्द नहीं होता है। बेंगलुरु जाकर प्रधानमंत्री योग पर लेक्चर देते हैं। सबका ज़रूरी काम जारी है। टीवी पर इनके इधर उधर से बाइट आ जाते हैं। उन्हें सुनकर तो नहीं लगता कि कोई गंभीर घटना हुई है। बस नाकाम कर दिया और जवाब दे दिया। क्या नाकाम कर दिया? दो दिनों से वे हमारे सबसे सुरक्षित गढ़ में घुसे हुए हैं। हम ठीक से बता नहीं पाते कि पांच आतंकवादी शनिवार को मारे गए या रविवार को पांचवा मारा गया। ख़ुफ़िया जानकारी के दावे के बाद भी वो एयरबेस में कैसे घुस आए?
कहीं इस आतंकी हमले से जुड़े सवालों से भागने का प्रयास तो नहीं कर रहे? हम अपनी बात क्यों नहीं करते? क्या ये चैनल भारत सरकार के कूटनीतिक चैनलों से ज़्यादा पाकिस्तान को प्रभावित कर सकते हैं? हम सीमा पार से बुलाये गए नकारे विशेषज्ञों और पूर्व सैनिकों को बुलाकर क्या हासिल कर रहे हैं? वो तो हमले को ही प्रायोजित बता रहे हैं। क्या उनके दावों को भारत सरकार गंभीरता से लेती है? एंकर भले उन पाकिस्तानी वक्ताओं पर चिल्ला दे लेकिन क्या हम इतने से ही संतुष्ट हो जाने वाले पत्थर दिल समाज हो गए हैं? मैं कभी युद्ध की बात नहीं करता लेकिन निश्चित रूप से शहादत पर शोक मनाने का यह तरीका नहीं है।
हम सबको गर्व है लेकिन क्यों इस गर्व में किसी के जाने का दुख शामिल नहीं है? क्या ग़म उनकी शहादत के गौरवशाली क्षण को चैनलों की तू-तू मैं-मैं वाली बहसों से अलंकृत कर रहे हैं? हम कहां तक और कितना गिरेंगे? क्या इस तरह से लोक विमर्श बनेगा। हम रात को टीवी के सामने कुछ दर्शकों की कुंठा का सेवन कर क्या कहना चाहते हैं? इन नक़ली राष्ट्रवादी बहसों से सुरक्षा से जुड़े सवालों के जवाब कब दिये जायेंगे। सोशल मीडिया पर इस घटना के बहाने मोदी समर्थक मोदी विरोधियों का मैच चल रहा है। उनकी भाषा में भी शहादत का ग़म नहीं है। गौरव भी कहने भर है। कोई राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को हटाने का हैशटैग चला रहा है तो कोई मोदी का पुराना ट्वीट निकाल रहा है। सवालों की औकात इतनी ही है कि पूछे ही जा रहे हैं। जवाब देने की ज़िम्मेदारी और शालीनता किसी में नहीं।”
अभी पठानकोट के आग से धुँआ निकलना बंद भी नहीं हुआ कि मालदा में कुछ नासमझ लोग हुडदंग करने लगे, जिसकी तपिस पूर्णिया तक पहुँच गयी. सोसल मीडिया पर उनपर बेवजह वक्त जाया किया जा रहा है. इस तरह के अप्रिय वारदातों पर रोक लगाने की जरूरत है न कि उसे हवा देकर सांप्रदायिक माहौल में अपनी रोटी सेंकने का काम करने लग जाएँ. हम एक रहेंगे तो देश मजबूत होगा वरना अपने घर की फूट का फायदा पड़ोसी दुश्मन उठाएंगे ही. हम सभी को देश के जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभाने की जरूरत है. हम सुधरेंगे जग सुधरेगा … जग सुधरे या न सुधरे, कम से कम हमारे क्रियाकलाप ऐसे होने चाहिए, जिससे समाज और देश का भला हो और नुकसान तो कत्तई न हो. तभी होगा असली जय हिन्द, जय भारत और विश्वगुरु भारत.
- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर