Saturday, 5 September 2015

संघ की समन्वय बैठक में सरकार पास

भारतीय सरकार संविधान के दायरे में रहकर देश और उनके नागरिकों के हित के लिए काम करती है. आम तौर पर सरकार संसद के पार्टी जवाबदेह होती है और संसद के सदस्य जनता अर्थात मतदाता के प्रति जवाबदेह होते हैं. सरकार और संसद सदस्य लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए जन-प्रतिनिधि होते हैं. अगर ये जन-प्रतिनिधि जनता की अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे तो जनता उन्हें बदल देती है. यह मौका पांच साल के बाद ही मिलता है. सभी जन-प्रतिनिधि की कोशिश यही होती है या होनी चाहिए कि वे देश-हित और देश के नागरिकों के हित के लिए काम करे.
पिछले दशकों से कई दलों की मिली-जुली सरकारें काम करती रही है. इस बार भाजपा नीत एन. डी. ए. को पूर्ण बहुमत मिला और यह अपने आप में काफी शक्तिशाली है. श्री नरेन्द्र मोदी एन. डी. ए. के मुखिया और प्रधान मंत्री हैं. उन्होंने जनता से काफी सारे वादे किये थे. किये गए वादे के अनुसार वे काम करने का हर-संभव प्रयास कर रहे हैं. पर जनता की आकांक्षाएं प्रबल होती हैं और वह जल्द परिणाम भी चाहती है. गत दिनों सरकार के काम-काज पर अगर सरसरी-तौर पर निगाह दौराई जाय, तो हम पाते हैं कि विदेशों में भारत के प्रति मान-सम्मान बढ़ा है और श्री मोदी ‘वर्ल्ड लीडर’ बन कर उभरे हैं. हरेक देशों में इनकी अच्छी आवभगत हुई है और अनेक देशों के साथ कई समझौते भी हुए हैं. पर विकास की रफ़्तार जो होनी चाहिए थी, वह अभी अपेक्षाकृत नहीं हुई है. जरूरी सामानों के दाम बढे हैं और रोजगार में कोई खास बृद्धि नहीं हुई है. संसद में हंगामा खूब हुआ है और जरूरी बिल पारित नहीं हो सकें. कई महत्वपूर्ण बिल पारित नहीं हो सके. बहुचर्चित भूमि अधिग्रहण बिल को वापस लेना पड़ा है. फलस्वरूप आम आदमी के अलावा उद्योग जगत भी नाराज ही हुआ है. चीन और विश्व की मंदी का प्रभाव हमारे यहाँ भी हुआ है. शेयर मार्किट औंधे मुंह गिरा है और रुपये का भी अवमूल्यन हुआ है. जनता अधीर होकर एक-टक मोदी जी और उनकी सरकार पर नजरें टिकाये हुए है.
भाजपा की जीत के लिए आरएसएस(संघ) ने काफी प्रयास किया था. देश के कोने-कोने में अपने कार्यकर्ताओं को भेजकर माहौल बनाया था. मोदी जी के भाषण से देश आकर्षित हुआ था. उद्योग जगत ने भी मोदी जी के पक्ष में हवा या लहर बनाने के लिए भरपूर प्रयास किया था.  संघ की ईच्छा के अनुसार ही मोदी जी को प्रधान-मंत्री पद के लिए उम्मीदवार घोषित करवाया गया था. सरकार में मंत्री तक बनाने में संघ का अप्रत्यक्ष रूप से नियत्रण होता है. अब संघ जब इतना कुछ करती है तो जाहिर है सरकार से हिशाब भी मांगेगी और वही उसने किया. आर. एस. एस. के समन्वय बैठक में मोदी जी के साथ-साथ उनके काफी मंत्रियों ने अपना-अपना हिशाब दिया और संघ के प्रवक्ता के अनुसार सरकार सही दिशा में आगे बढ़ रही है. कई राज्यों में अपना झंडा गाड़ चुकी भाजपा की परीक्षा बिहार में होनी है. जाहिर है यहाँ भी संघ के सदस्यों का ही काफी योगदान रहेगा. राजनीति के धुरंधर अपनी-अपनी चालें चलेंगे और जनता को अपनी तरफ करने का हर संभव प्रयास करेंगे. बहुत सारे पत्रकार और राजनीतिज्ञ भी अपनी अपनी समीक्षा दे रहे हैं. ऐसे में NDTV के मशहूर पत्रकार रवीश कुमार द्वारा की गयी टिप्पणी को यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ.   
“बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि अब गिरिराज सिंह, शाहनवाज़ हुसैन, योगी आदित्यनाथ और मुख़्तार अब्बास नक़वी के हाथों कई लोग पाकिस्तान जाने से वंचित हो जाएंगे। इन नेताओं से मुझे बहुत उम्मीद थी कि कभी न कभी गुस्सा होकर शाहनवाज़ भाई या गिरिराज जी मुझे पाकिस्तान ज़रूर भेज देंगे। बिहार से होने के बाद भी इन्होंने मेरा ख़्याल नहीं रखा। अब तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान भाई-भाई होने जा रहे हैं तो इनकी शायद ज़रूरत भी न रहे। संघ के बयान के बाद भारतीय राजनीति के इन पाकिस्तान भेजक नेताओं को पाकिस्तान भेजने की ट्रैवल एजेंसी बंद कर बिहार चुनाव में जी जान से जुट जाना चाहिए।
भारतीय राजनीति में जैसे को तैसा का सबसे बड़ा चैप्टर है पाकिस्तान। पाकिस्तान को सबक सीखाना है, इसे हमारे नेता और उनके कुछ अज्ञानी समर्थक रटते रहते हैं। चुनाव आते ही ज़ोर-ज़ोर से रटने लगते हैं। पाकिस्तान का नाम लेकर कई नेताओं में विदेश-मंत्री की सी क्षमता का विकास होने लगता है। भारतीय राजनीति में पाकिस्तान एक ऐसी समस्या है जिसे बयानों से दो मिनट में सुलझा दिया जाता है। इन दिनों नेताओं ने पाकिस्तान भेजने का प्रयोग शुरू कर दिया है। वहां भेजने के इतने बयान आने लगे कि पाकिस्तान भी घबरा गया होगा। इस घबराहट में वो भी सीमा से इस पार लोगों को धड़ाधड़ भेजने लगा। इन नेताओं ने सिर्फ अपने विरोधियों को पाकिस्तान जाने का पात्र समझा। संघ के बयान से अब बीजेपी के समर्थकों को भी पाकिस्तान जाने में कोई नैतिक संकट नहीं होगा। पाकिस्तान को सबक सीखाने के सबसे बड़े स्कूल से आदेश आया है कि हम सब भाई-बंधु हैं। संघ और सरकार के बीच चली तीन दिनों की सफल समन्वय बैठक के बाद संघ के सह-सर-कार्यवाह दत्तात्रेय हसबोले ने कहा है कि भारत के पड़ोसी देशों के साथ पारिवारिक और सांस्कृतिक संबंध भी हैं। नेपाल, भूटान, श्रीलंका, पाकिस्तान या बांग्लादेश अपने शरीर से ही टूटकर बने हैं, तो स्वाभाविक है यहां रहने वाले लोग अपने ही परिवार के हैं। कभी-कभी संबंधों में, जैसे भाई-भाईयों में भी मतभेद हो जाता है। ऐसा कुछ दशकों में हुए होंगे। लेकिन इन सब को भूलकर हम पड़ोसी देशों के साथ सांस्कृतिक संबंध और अच्छे कैसे हो सकते हैं, इस दृष्टि से भी थोड़ा पड़ोसी देश के बारे में विचार किया। दत्तात्रेय हसबोले ने कहा कि भारत में कौरव और पांडव भी भाई-भाई थे। धर्म संस्थापना के लिए सब करना पड़ता है। लेकिन धर्म संस्थापना के लिए ही तो कौरव-पांडव के बीच युद्ध हुआ था। क्या हसबोले जी ने यह कह दिया कि धर्म को लेकर जो कौरव-पांडवों के बीच हुआ, वैसा कुछ होने वाला है या वे ये कह रहे हैं कि धर्म-युद्ध से पहले की तरह 105 भाई एक हो सकते हैं। इस बयान को सुनते ही मुझे हुर्रियत नेता गिलानी जी की थोड़ी चिन्ता तो हुई। अगर उन पर इस बयान का सकारात्मक असर हो गया तो क्या पता वे फिर से सूटकेस लेकर दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित पाकिस्तान दूतावास आ जाये, उधर से सरताज अज़ीज़ साहब भी आ जाएं। क्या अब ये मुलाकातें भाई-भाई के सिद्धांत के तहत हो सकती हैं। इन्हीं मुलाकातों के चलते तो वो बात न हो सकी जिसका वादा उफा में प्रधानमंत्री कर आए थे। क्या अब उफा की उल्फ़त रंग लाएगी। क्या कुछ नया और पहले से बड़ा करने के लिए कुछ अलग माहौल बनाया जा रहा है।
आखिर आरएसएस को क्यों लग रहा है कि भाई-भाई का झगड़ा था, सिविल कोर्ट वाला, आतंकवाद को लेकर झगड़ा नहीं था, टाडा कोर्ट वाला। क्या संघ अब आतंकवाद की शर्त से निकल कर संस्कृति और संबंधों के दूसरों रास्ते को मौका देना चाहता है। सबक सीखाने वाले चैप्टर का क्या होगा। क्या उसकी तिलांजलि दे दी गई है। वैसे संघ के भाई-भाई वाले बयान से जो भी बातचीत के समर्थक हैं, उन्हें खुश होना चाहिए कि उनके साथ संघ भी आ गया है। वैसे इसी साल जून में मथुरा में संघ प्रमुख मोहन भागवत का एक बयान आया था कि
पूरा उपमहाद्वीप ही हिन्दू-राष्ट्र है। किसी को शक नहीं होना चाहिए कि भारत बांग्लादेश या पाकिस्तान मे जो भी रह रहे हैं वो हिन्दू-राष्ट्र का हिस्सा हैं। अखबारों की रिपोर्ट के अनुसार उन्होंने पाकिस्तान और बांग्लादेश को भी हिन्दू-राष्ट्र कह दिया। उन्होंने कहा कि उनकी नागरिकता अलग हो सकती है मगर राष्ट्रीयता हिन्दू है। क्या संघ ने प्रधानमंत्री की किसी लाइन को स्वीकार किया है।
एक और महत्वपूर्ण बात हुई। दत्तात्रेय हसबोले ने कहा कि अर्थव्यवस्था का माडल पश्चिमी न होकर भारतीय मूल्यों पर बनें। सरकार गांव वालों की कमाई, पढ़ाई और दवाई पर ध्यान दे ताकि उनका शहरों की तरफ पलायन रूके। अगर संघ वाकई ऐसा चाहता है तो उसे सरकार को शाबाशी देने से पहले बताना चाहिए था कि अर्थव्यवस्था का कौन सा फैसला पश्चिमी माडल को नकार कर भारतीय मूल्यों के आधार पर किया गया है। स्मार्ट सिटी के दौर में क्या किसी के पास सचमुच ऐसा फार्मूला है या संघ के पास है तो क्या सरकार वाकई उस पर चलकर पलायन रोक देगी। पलायन बढ़ाने के लिए ही तो स्मार्ट सिटी तैयार किया जा रहा है ताकि भारत और अधिक शहरी हो सके। क्या ये सब कहने सुनने के लिए अच्छी बातें हैं या ‘मेक इन इंडिया’ को इस माडल में फिट कर बहला-फुसला दिया जाएगा। समन्वय बैठक से दोनों का समन्वय कहीं पूरे संघ परिवार को संदेश तो नहीं था कि बिहार चुनाव में चलकर जुट जाइये। सरकार, संघ सब एक हैं। पाकिस्तान हिन्दुस्तान भाई भाई हैं।“
अब तो प्रधान मंत्री जी भी बौद्ध धर्म के शरण में चले गए हैं जो कि हमारे अधिकांश पड़ोसी देश, खासकर चीन और श्रीलंका अपना रहे हैं. बौध-धर्म हिन्दू-धर्म से ज्यादा ब्यापक नजर आने लगा है!   प्रस्तुति – जवाहर लाल सिंह 

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