Sunday, 31 May 2015

अरुणा शानबाग का गुनाहगार



42 साल कोमा में रहकर पिछले दिनों दुनिया को अलविदा कह चुकीं अरुणा शानबाग को उस दहलीज तक पहुंचाने वाले शख्स को ढूंढा जा चुका है. माना जा रहा था कि सोहनलाल सिंह सात साल की सजा काटने के बाद मर गया था, लेकिन वह जिंदा है और हापुड़ के परपा गांव में रहता है.
अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए अपने इंटरव्यू में सोहनलाल ने बताया कि वह 42 सालों से सजा भुगत रहा है. सोहनलाल ने कहा, ‘मैं मांसाहारी था, बीड़ी-शराब पीता था. जेल जाने से पहले मेरी एक बेटी थी, लेकिन जेल में जाने के बाद वह मर गई क्योंकि मैंने गलती की थी. जेल से छूटने के बाद मैंने अपनी बीवी को छुआ तक नहीं. मैंने मांस, मदिरा, बीडी, सिगरेट आदि सब कुछ छोड़ दिया. जेल से छूटने के 14 सालों के बाद मेरा एक बेटा हुआ.’
सोहनलाल अरुणा को दीदी जी कहते हुए उस घटना को हादसा कहता है और बताता है कि उसे बहुत पछतावा है और वह उनसे और अपने भगवान से माफी चाहता है.
सोहनलाल, अरुणा को दीदी संबोधित करते हुए जिसे हादसा कह रहा है, वह घटना 27 नवंबर 1973 को किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में घटी थी, जहां हॉस्पिटल के स्वीपर सोहनलाल ने अरुणा शानबाग को कुत्ते की जंजीर से बांधकर बलात्कार करके मारना चाहा था, लेकिन वह कामयाब नहीं हो सका. इस हमले से अरुणा 42 साल तक कोमा में रहीं और 18 मई को इस दुनिया को अलविदा कह गईं. इस दौरान उनके लिए इच्छामृत्यु तक की मांग की गई लेकिन उनको इस स्थिति तक पहुंचाने वाला सोहन लाल गायब रहा.
सोहनलाल ने 7 साल पुणे की यरवडा जेल में काटे थे और इसके बाद वह गायब हो गया. कभी यह अनुमान लगाया गया कि वह मर गया और कभी यह माना गया कि वह दिल्ली के किसी हॉस्पिटल में काम कर रहा है, लेकिन इस दौरान वह अपने पैतृक घर दादूपुर रहा जहां से वह कुछ दिनों बाद अपने ससुराल पारपा चला गया. अब वह घर से 25 किलोमीटर दूर एक पावर प्लांट में लेबर कॉन्ट्रैक्टर है. सोहनलाल अपनी उम्र 66 बताता है जबकि उसका बेटा 72 बताता है.
सोहनलाल को अरुणा की मौत के बारे में पता नहीं था जब एक अखबार के पत्रकार ने उससे संपर्क बनाया तब उसे पता चला. सोहनलाल कहता है, ‘मैं सुबह 6 बजे काम पर निकल जाता हूं, रात 8 बजे वापस आता हूं. मुझे मजदूरी में रोज 261 रुपये मिलते हैं.’
सोहनलाल अपनी पत्नी, दो लड़कों, एक लड़की और तीन पोते-पोतियों के साथ रहता है. बेटे भी मजदूर हैं. एक लड़की की वह शादी कर चुका है. सोहनलाल ने उस बात का खंडन किया कि उसने जेल से छूटने के बाद अरुणा को मारना चाहा था. सोहनलाल कहता है, ‘उस हादसे के बाद मैं दस साल तक चैन से सो नहीं पाया. मेरे में उन्हें देखने तक की हिम्मत नहीं थी फिर में हॉस्पिटल कैसे जा सकता था. मैंने तभी मुंबई छोड़ दी थी.’
उस रात की घटना के बारे में पूछने पर सोहनलाल कहता है, ‘ जो कुछ उस रात हुआ वो बस गुस्से का नतीजा था. हम दोनों के बीच लड़ाई हुई, वहां काफी अंधेरा था और मैं बेहद गुस्से में था. उन्होंने भी मुझे काफी मारा था. हाथापाई के दौरान उनके गहने इधर-उधर हो गए थे तो पुलिस ने मुझ पर गहने चुराने का आरोप भी लगाया. मुझे यह स्वीकार करने के लिए पीटा गया कि मैंने रेप किया है जबकि मैंने ऐसा कुछ नहीं किया था. अरुणा दीदी मुझ पर कुत्तों का खाना चुराने का इल्जाम लगाती थीं जबकि मैं तो कुत्तों से खुद डरता था. मैंने अपने सीनियर्स से कहा था कि मुझे डॉग वॉर्ड की ड्यूटी से हटा दिया जाए लेकिन एक स्वीपर की कौन सुनता है.’
सोहनलाल ने कहा कि लोग सोचते थे कि मैं मर गया हूं लेकिन वास्तव में मैं मरना चाहता हूं. मैं उन यादों से तंग आ चुका हूं इसलिए अब मैं मरना चाहता हूं.
एक टीवी चैनल ने पारपा गांव जाकर सोहनलाल से मुलाकात की. जब सोहनलाल से उसकी सजा के बारे में पूछा गया तो उसने कहा, “मुझे सजा हुई थी. मैं प्रायश्चित कर रहा हूं लेकिन मुझे उस घटना के बारे में कुछ याद नहीं है. अब सिसक-सिसक कर जिंदगी काट रहा हूं.”
जब सोहनलाल से पूछा गया कि उसकी वजह से किसी ने 42 साल सज़ा काटी है, तो उसने कहा, “हां, साहब बहुत अफसोस है. मैंने अपना गांव छोड़ दिया. रिश्तेदार के यहां रहता हूं. गांव के लोगों से मेलजोल नहीं रखता. काम से काम रखता हूं.”
सोहनलाल ने कहा, “मेरे घर में पत्नी है, बच्चे हैं. पत्नी सब जानती है. वह कहती थी, समझाती थी. बहुओं से नजर मिलाने में शर्म आती है. मैं अब भी सजा ही काट रहा हूं.”
सवाल यही है कि इस तरह के अपराध करने वाले क्या अन्य लोगों को भी अफ़सोस है. निर्भया काण्ड का अपराधी रामसिंह को शायद अपने कृत्य पर अपराधबोध हुआ और उसने जेल में ही आत्म-हत्या कर ली, पर उसी का साथी मुकेश, पवन, विनय, अक्षय आदि को कोई पछतावा नहीं है. छठा नाबालिग होने के कारण सजा से बच गया है और सुधार गृह में मौज कर रहा है, जबकि उसी का अपराध जघन्यतम था…. और भी कई ऐसी अनेक घटनाएँ हुई हैं जिनमे पीड़िता मारी गयी है, फिर भी उसके अपराधी को या तो सजा ही नहीं हुई और उसे अफ़सोस भी नहीं है. क्या इस तरह के अपराधी के लिए कोई ब्यवस्था की जा सकती है ताकि वह दूसरों के लिए उदाहरण बने और इस प्रकार के अपराधों पर रोक लग सके? सामाजिक बहिष्कार का डर इन गरीब लोगों को ही होता है, अमीर लोगों के चाहनेवाले हर हाल में रहते हैं. कुछ नाम यहाँ मैं लेना चाहता हूँ. क्या तलवार दंपत्ति से किसी ने पूछा कि उन्हें अपने कृत्य पर अफ़सोस है या नहीं? सलमान खान जो सजा से बच गये हैं, क्या उन्हें अपने कृत्य पर अफ़सोस है? ऐसे नामचीन चेहरे हैं जिन्हे अपने किये पर कोई पछतावा नहीं. और बहुत सारे उदाहरण हैं. क्या ऐसे समय में यह सोचने और मंथन करने की घड़ी नहीं है कि जघन्य अपराध करनेवालों को ऐसी सजा दी जाय ताकि दूसरे ऐसी गलती करने से पहले सौ बार सोचें.
न्यायालय, संसद, समाज, स्वयं सेवी संस्थाएं एवं बुद्धिजीवी वर्ग को इस पर चिंतन कर राह निकालने की कोशिश करनी ही चाहिए ताकि अपराध कम हो और लोगों में स्वयम शुद्ध और सात्विक चेतना का विकास हो. न कि अपराध बढ़ते रहें और उनपर लीपा पोती होती रहे. हमारी शिक्षा ब्यवस्था, सामाजिक, पारिवारिक रहन-सहन, विचार-व्यवहार ऐसे हो ताकि एक स्वस्थ वातावरण युक्त समाज का निर्माण हो. सभी एक दूसरे के साथ प्रेम से रहें और एक दूसरे के हितचिन्तक हों. हम अपने को विश्वगुरु होने का दावा करते हैं, हमारे धर्म सबसे बेहतर हैं, हमारी संस्कृति और सभ्यता हजारों साल पुरानी है. हमें उसका गर्व भी है, लेकिन जब दुर्दांत घटनाएँ हमरे समाज में घटती है तो शर्म भी तो होनी चाहिए. हमरे बच्चे भावी पीढ़ी आखिर क्या सीखेगी? क्या ये टी वी चैनल, पत्र पत्रिकाएं इस दिशा में सक्रिय हैं या घटना को सिर्फ सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत कर ब्यवसाय बढ़ाना ही एक मात्र इनका उद्देश्य रह गया है! मैं इस घटनाक्रम के माध्यम से सबसे अपील करना चाहता हूँ कि कुछ ऐसा करें ताकि अपराध में कमी हो और हम सभी आपसी भाईचारा और प्रेम से रहें. रिश्तों की मर्यादा कायम रहे. 

- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

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