Friday, 11 October 2013

पूजा मार्केट और बोनस!

पूजा मार्केट और बोनस
सडकों पर, बाजारों में काफी भीड़ है …. कही तिल रखने की जगह नहीं … दूकानदार अपनी दुकान से आगे बढाकर सड़कों का अतिक्रमण किये हुए है, वही फेरी वाले, फूटपाथ दूकानदार भी सड़क पर कब्ज़ा किये हैं…. आखिर बात क्या है … पूजा बाजार है भाई!… हर साल दुर्गा पूजा के मौके पर बाजारों में, सडकों पर ऐसी ही भीड़ रहती है, रिक्शा से जाने से अच्छा है पैदल जाना, चौपहिया वाहन अगर फंस गया तो निकलना मुश्किल … बाइकर्स तो किसी तरह रास्ता निकाल ही लेंगे.
हर तरह के लोग, हर आय वर्ग के लोग खरीदारी में मशगूल है … दूकानदार भी विभिन्न प्रकार के ऑफर स्कीम लेकर आए हैं, आपको आकर्षित करने के लिए. २०% छूट, तीन के साथ एक फ्री, सोने के गहने पर पर १० % छूट, खादी पर २०% छूट.. छूट ही छूट… इसमें कही नहीं है लूट!
गाड़ी चेकिंग हो रहा है, सब पेपर सही हैं. इन्सुरेंस ..हाँ भाई है …. पोलुसन सर्टिफिकेट …. नहीं है …पकडाए २००० रुपये स्पॉट फाइन! हेलमेट जरूर पहनकर जाइएगा… बिना हेलमेट पकडाए तो ५०० रूपया फाइन!… ट्रैफिक एस पी खुद चेक कर रहे हैं…. बचकर निकलना मुश्किल है.
“अजी सुनते! हो शर्मा जी के यहाँ एल ई डी वाला टी वी आगया, वर्माजी नया सोफासेट खरीदे हैं, ऊ मिश्राइन नया झुमका दिखा रही थी हमको. हमरे किस्मत फूटल है … अभीतक बोनस का मार्केटिंग नहीं किये हैं. इनको तो ई एम आई का ही चिंता लगा हुआ है. पूरा कोलोनी कुछ न कुछ खरीद रहा है …हे भगवान! कब इनको सुबुद्धि आयेगी. हमको तो घर से बाहर निकलना मुश्किल है…. कल ही मिसेज चौबे ताना मार रही थी … आपके यहाँ पुराना डब्बा वाला टी वी अभीतक चल रहा है? … ऊ तो नया मोबाइल भी बार बार चमका रही थी.
आखिर गजोधर भाई भी बाजार गए … क्या करते … गाडी पार्किंग का कहीं जगह नहीं है …मिश्रा जी ठीके कह रहा था. … ऑटो से ही आना चाहिए था.
पार्किंग के चक्कर में एक किलोमीटर और ज्यादा चक्कर लगाना पड़ा … एगो कोना में जगह खाली था. वहीं लगा दिए क्या करते. अब वहां से पैदल आने में तो पहले ही थक गए … अब दुकान में खड़ा होने का भी जगह नहीं है. दुकान का लड़का बाहरे आकर बोलता है – क्या चाहिए सर! आप पसंद कर लीजिये शाम तक आपके घर में पहुंच जायेगा. हाँ पता ओर मोबाइल न. लिखवा दीजियेगा.
अरे बाप रे! जूता दुकान में इतना भीड़ … छोड़ो … बाद में खरीद लेंगे. “बाद में तो आप ऐसे मटियाते रहेंगे. लेट से घर आएंगे कहेंगे…. आज बहुत थके हैं… छोटका कब से पुराने जूता पहन के जा रहा है … आपको कुछो बुझाता है … सब लड़िकन इसको चिढ़ाता है… कंजूस बाप का बेटा! स्कूल से आकर रोज बोलता है! आपको तो ई सब सुनना नहीं पड़ता है …लगे रहेंगे मोदी और आडवाणी के पीछे.”
“अच्छा एक काम करते हैं, पहले हमलोग कुछ नाश्ता कर लेते हैं, क्या बाबु? क्या खायेगा बोल… चलो तुमको डोसा खिलाते हैं” …डोसा के दुकान में भी लाइन लगा है… अभी टेबुल खाली भी नहीं हुआ कि आदमी पहले से ही बैठने को खड़ा है. एक छोकड़ा आकर कहता है बाबूजी! आपलोग ऊपर चल जाइए…. फेमिली वाले के लिए ऊपर ही ब्यवस्था है …
डोसा बनाने में भी तो टाइम लगता है … जो पहले से आर्डर दिया है, उसका पहले आयेगा…
“खैर, अब नाश्ता पानी हो गया! अब चलते हैं किसी कपडे की दुकान में …. सुनते हैं बाजार कोलकाता में नया नया डिजाइन आया है … अरे बाप रे!… यहाँ भी ठेलम ठेल है …ई महंगाई में भी आदमी के पास इतना पैसा है?” … तो डबल पगार ‘बोनस’ काहे को देती है कंपनी …. इसीलिये न कि आपलोग कुछ स्पेसल खरीददारी कर सकें …
कपड़े का डिजाईन तो ठीके है, अब पसंद करना है… बच्चों का तो हो गया … अब मैडम के लिए साड़ी देखनी है….. साड़ी भी नाक भौं सिकोड़ते हुए ले ही लिया गया …. श्रीमती जी भुनभुनाती है – “इसीलिये इतना दिन पहले से बोल रहे थे. इस भीड़ में ठीक से देखने/पसंद करने का मौका मिलता है? अब अपने लिए भी देख लीजिये.” “छोड़ो न… मेरा तो सब पैंट- शर्ट ठीके है” … “ठीके है का मतलब? पूजा में नया कपड़ा नहीं पहनियेगा? नहीं लीजियेगा तो हम तो नहीं जानेवाले आपके साथ… घूमने के लिए” … “अच्छा भाई, ले लो! मेरे लिए भी तुम ही लोग पसंद करो जो ठीक लगता है …. ले लो.”
“आज का बाजार तो हो गया…. बाकी बाद में देखा जायेगा. अरे! मेरा गाडी कहाँ गया?” छोटका बोला – “यही तो है पापा, लगता है पीछे से कोई ठोक दिया है, नंबर प्लेट भी गायब है… “ऐसे में अगर पुलिसवाला देख लेगा तो वह भी अपना हिस्सा मांगने लगेगा. चलो अब जल्दी घर चलो … अब गाडियों ठीक ठाक कराना पड़ेगा … लग गया ५-६ हजार का गच्चा!!!
ये रहा गजोधर भाई का हाल… बाकी सब लोगों की कमोबेश वैसी ही स्थिति है. बोनस मिला है तो कुछ अतरिक्त खर्च भी करने ही होंगे. सब्जियों के दाम अचानक दुगुने हो गए. फल भी डेढ़ गुने तो हो ही गए हैं. कपड़े गहने आदि पर बोलता तो है कि छूट दे रहे हैं पर वे लोग हैं बड़े चालक! दाम पहले से ही बढ़ा देते हैं और छूट का लालच देकर अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं. घर के सामानों में भी विशेष ओफ्फर या छूट देने का दावा करके नौकरी पेशा वाले को लूट ले जाते हैं.
पर एक बात और ख़ास है, आपको सस्ते सामान भी मिल जायेंगे… १५० रु. का शर्ट और २०० रु की साड़ी भी मिल जायेगी!… इस महंगाई के ज़माने में … वो क्या है, कि हर वर्ग के लोग तो नए कपड़े बनवाना चाहते हैं … अब प्रतिदिन १०० -१५० रु. कमाने वाला आदमी तो अपनी जेब देखेगा न! दूसरी तरफ आपके बोनस की राशि में सबका हिस्सा बनता है … आखिर टाटानगर शहर, आप नौकरी पेशा वाले पर ही तो डिपेंडेंट (निर्भर) है!
नए कपड़े पहनकर त्यौहार मनाना हमारे संस्कार में है. दैनिक क्रियाकलाप तो जिन्दगी भर करनी होती है. त्यौहार के अवसर पर हम सभी इस आयोजन में शामिल होकर नयी उर्जा और उत्साह का वातावरण सृजित करते हैं. देखा देखी कर अपनी औकात से ज्यादा खर्च करना हमेशा ही हानिकारक होता है! कुछ तो लोग कहेंगे ही … अगर आप दिखावा के लिए अपनी औकात से ज्यादा खर्च करते हैं, तब भी लोग कहेंगे …और अति कृपणता में अपने परिवार को व्यथित करते हैं, तब भी अशांति का खतरा है! अत: सामंजस्य बैठाना आवश्यक है!
जय माँ दुर्गे!
या देवी सर्वभुतेशु शक्ति रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
या देवी सर्वभुतेशु विद्या रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:
या देवी सर्वभुतेशु शांति रूपेण संस्थिता नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:

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