Saturday, 8 October 2016

सर्जिकल स्ट्राइक (सेना की बड़ी कामयाबी)

"अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥"
"लंका पर विजय हासिल करने के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने छोटे भाई लक्ष्म से कहा: - यह सोने की लंका मुझे किसी तरह से प्रभावित नहीं कर रही है माँ और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर है।"
अभी नवरात्रि का त्योहार चल रहा है और विजयादशमी भी ११ अक्टूबर को हर्षोल्लास से मनाई जायेगी. विजया दशमी के दिन ही श्री राम ने माँ दुर्गे की आराधना करते हुए रावण को उसके ही देश लंका की रणभूमि में मार गिराया था. लंका पर विजय उनका उद्देश्य नहीं था. उनका उद्देश्य दुराचारी रावण और उसके सहयोगियों का विनाश था. इसीलिये उन्होंने सोने की लंका रावण के ही भाई विभीषण को सौंप दी और खुद माता सीता और अपने सभी सहयोगियों के साथ अयोध्या वापस लौट गए. वैसे रामायण में भी हनुमान जी द्वारा लंका जलाकर सुरक्षित लौट आने को भी काफी लोगों ने सर्जिकल स्ट्राइक का पहला उदाहरण माना है.
हमारे प्रधानमंत्री श्री मोदी भी नवरात्र व्रत करते हैं. उन्हें धर्मकार्यों में गंभीर आस्था है, साथ ही अपने वतन और वतन के वासियों से भी भरपूर प्यार है. वे चाहते हैं भारत दुनिया के प्रगतिशील राष्ट्रों की श्रेणी में हो. इसके लिए वे जी-जान से मिहनत भी कर रहे हैं. उन्होंने खा भी है कि उन्हें परायी जमीन नहीं चाहिए. अपनी भारतभूमि सर्वश्रेष्ट है. पर कुछ लोग और कुछ आतंकवादी संगठन उनके रास्ते में रोड़ा अटकाना चाहते हैं. कुछ आतंकवादी घटनाओं से देश में असुरक्षा की स्थिति पैदा करने का बार-बार प्रयास किया जाता रहा है. इसका जवाब देना उचित भी था. और जवाब के रूप में आया ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ .....
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी थल सेना के डीजीएमओ लेफ्टिनेंट जनरल रणवीर सिंह ने 29 सिंतबर को पूरी दुनिया के सामने यह ऐलान किया कि सेना का यह अभियान इस पर केन्द्रित था कि आतंकवादी किसी भी सूरत में अपने मंसूबों में कामयाब न हो पाएं भारतीय सेना ने सर्जिकल हमले करते हुए पाकिस्तान में आतंकवादियों की घुसपैठ की कोशिशों को नाकाम कर दिया..आतंकवादियों के खिलाफ इस अभियान के दौरान आतंकवादियों को तो नुकसान पहुंचाया ही गया साथ ही उनको समर्थन देने वालों को भी बख्शा नहीं गया है. आतंकवादियों को निष्क्रिय करने के उद्देश्य से इस काम को अंजाम दिया गया. इसे आगे जारी रखने की कोई योजना नहीं है.''
यह तब का बयान था डीजीएमओ का. आगे यह और होगा या नहीं यह निर्भर करता है कि पाकिस्तान के आतंकवादी क्या रुख अपनाते हैं और हमारी केंद्र सरकार का अगला निर्देश क्या होता है. भारत की 11 लाख की थल सेना जो भी ऑपरेशन करती है उसका प्रमुख डायरेक्टर जनरल मिलेट्री ऑपरेशन (DGMO) होता है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि सेना के पास सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत हैं. जितनी जानकारी मीडिया के द्वारा उपलब्ध है उस वक्त सेटेलाइट, यूएवी और कमांडो के हेलमेट में थर्मल इमेजिंग और नाइट विजन कैमरे से वीडियो और तस्वीरें ली गई हैं. इन तस्वीरों और वीडियो को सेना के आला अधिकारियों के साथ सरकार के सुरक्षा से जुड़े अधिकारियों ने भी देखा है. सूत्रों की मानें तो सेना ने पूरे ऑपरेशन पर केन्द्रित 90 मिनट के वीडियो फुटेज बतौर सबूत सरकार को दे भी दिए हैं. ऐसा भी नहीं है कि सेना ने पहली बार एलओसी पार जाकर सर्जिकल स्ट्राइक किया हो. पहले भी सेना छोटे स्तर पर ऐसी कार्रवाई को अंजाम देती रही है, लेकिन पहली बार इतने बड़े स्तर पर और डंके की चोट पर इसका ऐलान किया गया है.
सेना के सूत्रों की मानें तो सेना इस ऑपरेशन से जुड़े वीडियो या चित्र रिलीज करने के पक्ष में नहीं है, वजह है इससे जुड़ी जानकारी सार्वजनिक होते ही सारी जानकारी दुश्मनों को मिल जाएगी. मसलन कमांडो ने किस जगह से एलओसी पार की, लांचिंग पैड तक कैसे पहुंचे, हेलमेट में कौन-कौन से डिवाइस लगे थे, कौन-कौन से हथियार लिए हुए थे कमांडो. और तो और जवानों की पहचान सबके सामने आ जाएगी जो शायद राजनीतिक तौर पर तो सही हो सकता है लेकिन रणनीतिक तौर पर तो कतई सही नहीं ठहराया जा सकता. इसे अगर सबके सामने लाया जाता है तो न सिर्फ हमारे ऑपरेशन करने के तरीके दुश्मन जान जाएगा बल्कि भविष्य में इसका इस्तेमाल बखूबी हमारी सेना के खिलाफ भी कर सकता है. सेना से जुड़े लोग बता रहे हैं कि क्या दुनिया में कही भी ऐसे ऑपरेशन होते हैं, उसके सबूत सामने आते हैं क्या? अमेरिका ने दुनिया के सबसे बड़े आतंकी ओसामा बिन लादेन को मारा लेकिन आज तक उसकी न तो ऑपरेशनल डिटेल्स आई और न ही कोई तस्वीर. बस एक तस्वीर आई जिसमें व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति इस ऑपरेशन को टीवी पर देख रहे हैं. तो फिर हमारी सेना को अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने के लिए क्यों घसीटा जा रहा है? वैसे भी पाकिस्तान तो क्या कोई भी देश यह कैसे स्वीकार कर सकता है कि उसके घर में घुसकर उसकी पिटाई की गई है! यदि वह स्वीकार कर लेता है तो यह बात भी ससबूत स्पष्ट हो जाएगी कि वह आतंकियों की पनाहगाह है इसलिए उसके सामने तो यहां कुआं और वहां खाई वाली स्थिति है. यही कारण है कि वह इसे पुरजोर तरीके से झूठा साबित करने में जुटा है. तो क्या हमारे कुछ नेता पाकिस्तान की संतुष्टि के लिए सर्जिकल आपरेशन के सबूत मांग रहे हैं या उन्हें भी अपनी सेना-सरकार पर भरोसा नहीं है? हो सकता है कि सरकार विपक्ष के नेताओं और कुछ वरिष्ठ पत्रकारों को इस ऑपरेशन से जुड़े कुछ चुनिंदा वीडियो और तस्वीरें दिखाए, लेकिन इस बारे में अभी तक अंतिम फैसला नही लिया गया है.
दुःख की बात तो यह है कि राजनीतिक गुणा-भाग के चक्कर में उस भारतीय सेना की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है, जो देश में बाढ़ से लेकर तूफान तक और विदेश में युद्ध से लेकर आपदा के दौरान तक भारतीय लोगों के प्राणों की रक्षा के लिए बेझिझक अपने प्राण न्यौछावर करने में एक मिनट के लिए भी पीछे नहीं हटती. जहां तक कश्मीर में उस पर पत्थर फेंकने वाले और फिंकवाने वाले भी जब बाढ़ की विकरालता की चपेट में आते हैं तो वह बिना भेदभाव के उनके प्राण बचाकर अपने आदर्श को और भी मजबूती से स्थापित कर दिखाती है. न तो देश की आम जनता में और न ही दुनिया में इस सर्जिकल ऑपरेशन को लेकर किसी तरह का संदेह है. अब जरा उन लोगों की बात कर लेते हैं जो इस ऑपरेशन का सबूत मांग रहे हैं. इनमें सबसे प्रमुख हैं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जिन्होंने अपने वीडियो में सीधे तौर पर तो नहीं लेकिन इशारों में तो सवाल उठा ही दिए हैं. केजरीवाल और राहुल गाँधी अभी अपरिपक्व नेता हैं और अपनी बातों से सदा विवादों में घिरे रहते हैं. कुछ लोग उनपर आपत्तिजनक प्रहार भी करते हैं, जो मेरी नजर में राजनीति और सोसल मीडिया का गिरता हुआ स्तर को जाहिर करता है.  केजरीवाल के बाद, अपनी आदत से मजबूर कुछ कांग्रेसी नेता भी सवाल उठा रहे हैं, लेकिन अच्छी बात है कि कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी के प्रवक्ताओं ने ही ऐसे लोगों को आइना दिखाते हुए स्पष्ट कर दिया है  कि देश की सेना पर उन्हें भरोसा है. फिर भी बाद में जब भाजपा इस सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक इस्तेमाल कर पोस्टरों में दिखलाने लगी तो राहुल ने उन्हें सेना के खून की दलाली से विभूषित कर दिया. यह भी एक राष्ट्रीय स्तर के नेता के लिए मार्यादित नहीं कहा जा सकता. 
मेरा मानना है कि अभी जरूरत यह है कि पूरा देश न केवल एकजुट रहे, बल्कि एकजुट दिखे भी. क्योंकि राजनीति करने के लिए तो और भी मौके मिलेंगे, परन्तु सेना की छवि को हमने अपने चंद फायदे के लिए धूमिल कर दिया तो उसे सुधारने-संवारने में सालों लग जाएंगे. नेता तो अपनी करतूतों से जनता का विश्वास लगभग खो ही चुके हैं, लेकिन कम-से-कम सेना को तो अपनी राजनीति का मैदान न बनाएं. यह बात पक्ष-विपक्ष दोनों पर लागू होती हैं. सूत्रों के अनुसार प्रधान मंत्री भी अपने सभी मंत्रियों और सहयोगियों को इसपर सोच समझ कर बोलने और बयानबाजी से बचने की सलाह दी है. पर राजनीति तो ऐसी ही है कि  तू डाल डाल मैं पात पात !
अंत में मैं माँ दुर्गा से प्रार्थना करता हूँ कि हमें शक्ति के साथ सद्बुद्धि भी प्रदान करें. शक्ति का संयमित प्रयोग हो और अति उत्साह में दुस्साहस से बचने में हमारी मदद करें ! माँ दुर्गा ने भी महिषासुर का मर्दन किया और पृथ्वी को उसके दुश्चक्र से बचाया. उन्हें आदिशक्ति भी कहा जाता है, उनके कई रूप हैं और हमसभी उनके हर रूप की आराधना करते हैं. अंतिम दिन यानी महानवमी के दिन कुंवारी कन्याओं को पूजाकर उन्हें भी दुर्गाशक्ति की तरह बनाने की कमाना करते हैं. आज जरूरत है कि हर बेटी दुर्गा के रूप में अपने को प्रतिष्ठित करे और आतताइयों से लोहा लेने के लिए तैयार रहे. हम भी माँ, बेटी, बहन, पत्नी आदि सभी नारी-शक्ति के रूपों को उचित सम्मान और अधिकार दें!  
सभी पाठकों को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं!
जय माता दी! जय माँ दुर्गे! जय भारत माता! वन्दे मातरम!

-    जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.  

Sunday, 2 October 2016

आज है दो अक्टूबर का दिन

आज है दो अक्टूबर का दिन, आज का दिन है बड़ा महान
आज है दो अक्टूबर का दिन, आज का दिन है बड़ा महान
आज के दिन दो फूल खिले हैं, जिससे महंका हिंदुस्तान!
नाम एक का बापू गाँधी, और एक लाल बहादुर है,
एक का नारा अमन दूसरा जय जवान जय किसान!
बापू जिसने मानवता का दुनिया को सन्देश दिया
बागडोर भारत की सम्हालो नेहरु को आदेश दिया,
लाल बहादुर जिसने हमको गर्व से जीना सिखलाया
सच पूछो तो गीता का अध्याय उसी ने दोहराया
जय जवान जय किसान !
१९६८  में बने परिवार फिल्म का गीत जिसे लता मंगेशकर ने गाया था, हम सब बचपन में सुना करते थे, आज भी प्रासंगिक है.
दोनों महापुरुषों के बारे में जितनी भी चर्चा की जाय, जितना भी लिखा जाय, वह कम है.
फिर भी इस अवसर पर उन्हें याद करना भी जरूरी है.
महात्मा गाँधी जिन्होंने भारत को अंग्रेजों से आजाद कराया और राष्ट्रपिता कहलाये. वहीं लाल बहादुर शास्त्री ने गरीब परिवार में जन्म लेकर बड़ी मुश्किल से शिक्षा ग्रहण किया और देश के दूसरे प्रधान मंत्री बनकर ‘गुदड़ी के लाल’ कहलाये.
लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1904 में उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था. वह गांधी जी के विचारों और जीवनशैली से बेहद प्रेरित थे. उन्होने गांधी जी के असहयोग आंदोलन के समय देश सेवा का व्रत लिया था और देश की राजनीति में कूद पड़े थे. लाल बहादुर शास्त्री जाति से श्रीवास्तव(कायस्थ) थे, लेकिन उन्होने अपने नाम के साथ अपना उपनाम लगाना छोड़ दिया था क्योंकि वह जाति-प्रथा के घोर विरोधी थे. उनके नाम के साथ जुड़ा 'शास्त्री' काशी विद्यापीठ द्वारा दी गई उपाधि है. प्रधानमंत्री के रूप में उन्होने 2 साल तक काम किया. उनका प्रधानमंत्रित्व काल 9 जून 1964 से 11जनवरी 1966 तक रहा. उनके प्रधानमंत्रित्व काल में देश में भीषण मंदी का दौर था. देश के कई हिस्सों में भयानक अकाल पड़ा था. उस समय शास्त्री जी ने देश के सभी लोगों को खाना मिल सके इसके लिए सभी देशवासियों से हफ्ते में 1 दिन उपवास व्रत रखने की अपील की थी और लोगों ने उसे सहर्ष स्वीकार किया था. शास्त्री जी की मृत्यु यूएसएसआर के ताशकंद में हुई थी. ताशकंद की सरकार के मुताबिक शास्त्री जी की मौत दिल का दौरा पड़ने की वजह से हुई थी पर उनकी मौत का कारण हमेशा संदिग्ध रहा. उनकी मृत्यु 11 जनवरी 1966 में हुई थी. यह खबर रेडियो पर जब आयी थी, मेरे अग्रज भ्राता ने सुनकर रेडियो बंद कर दिया था. उस दिन पूरे गाँव में शोक का माहौल रहा था. गाँव के लोगों के आग्रह पर जिन्हें नवीनतम समाचार जानने की उत्सुकता रहती थी, मेरे भ्राता बीच-बीच में रेडियो चालू कर देते थे. उस दिन पूरे  दिन भर रेडियो पर शोकधुन ही बजता रहा. मानो रेडियो भी रो रहा हो. पूरा गांव रो रहा था. ... ऐसे रच-बस गए थे वे, जनता के दिलो-दिमाग में. खेत में काम करनेवाले किसान-मजदूर दालान में, गलियों में आकर बैठ गए थे. सभी के चेहरे पर उदासी थी. वे उस समय देश के प्रधानमंत्री थे. सच कहा जाय तो उन्होंने अपने देश के लिए बलिदान दिया.
गांधी जी से केवल भारतीय ही प्रभावित नहीं थे बल्कि विदेशों में भी गांधी जी के आदर्शों को माना जाता रहा है. स्थिति साफ है कि गांधी जी आज पूरी दुनिया के लिए एक आदर्श व्यक्तित्व है, जिनके बताये रास्तों पर चलकर ही इंसान तरक्की करना चाहता है क्योंकि उन्हीं के रास्ते इंसान को भटकने से बचाते हैं. इसलिए तो आज एक बार फिर से पूरा हिंदु्स्तान गा रहा है कि ऐनक पहने, लाठी पकड़े चलते थे वो शान से...जालिम कांपे थर-थर थर-थर लेके उनका नाम रे...बंदे में था दम, वंदे मातरम। भारत मां के इन दो महान सपूतों को हम सभी श्रद्धापूर्वक सर नवाते हैं.
महात्मा गाँधी में अन्य गुणों में एक और बहुत बड़ा गुण था स्वच्छता के प्रति जागरूकता. वे भारत के प्रमुख शहरों, तीर्थ स्थलों की गंदगी से बहुत दुखी थे. उन्होंने स्वच्छता के प्रति भी जन-आन्दोलन की शुरुआत की थी. उनके अनुसार स्वतंत्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण है स्वच्छता. उसी जन-आन्दोलन को वर्तमान प्रधान मंत्री श्री मोदी आगे बढ़ा रहे हैं. उन्होंने आज से दो साल पहले इस स्वच्छ भारत मिशन जन-आन्दोलन की शुरुआत लोगों को शपथ दिलाकर की थी. उन्होंने खुले में शौच से छुटकारे के लिए हर गांव, शहरों, कस्बों  में शौचालय बनाने के लिए लोगों को प्रेरित किया, विभिन्न विज्ञापनों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया और सरकारी, अर्ध-सरकारी, गैर-सरकारी संस्थाओं के माध्यम से स्वच्छता आन्दोलन को आगे बढ़ाया है. उन्होंने खुद से झाड़ू उठाकर इसकी शुरुआत की और उसके बाद अनेकों गणमान्य आज भी इस आन्दोलन को आगे बढ़ा रहे हैं. बहुत सारे मीडिया घराने भी इस पुनीत कार्य को आगे बढ़ाने में योगदान कर रहे हैं. निश्चित तौर पर जागरूकता बढ़ी है, फिर भी अभी बहुत काम बाकी है. थोड़ी सी बारिश में जब शहर की नालियां जाम हो जाती हैं, सड़कों पर पानी जमा हो जाता है तभी सफाई अभियान की कलई खुलती नजर आती है. हम सब जहाँ रहते हैं, जहाँ कार्य करते हैं, उन सभी जगहों को साफ़ रखने में हमारा कितना योगदान होता है, यह आकलन हमें अपने आपको खुद से करने की जरूरत है.
जनांदोलन की शुरुआत अपने घर से ही होती है. अपने घर को हम अपना समझते हैं, उसे साफ़ रखने में कोई कसर नहीं छोड़ते. पर हमारे घर के सामने की सड़क, गलियां, नालियां शहर, गाँव और यह पूरा देश हमारा है, यह अहसास हम सबके अन्दर होना जरूरी है. तन के साथ मन का साफ़ रहना जरूरी है. उसके लिए भी हम योग ध्यान आदि करते हैं ताकि हम विभिन्न प्रकार के गंदे विचारों से भी दूर रहें हम दूसरों को कष्ट न पहुंचाएं. यथासंभव दूसरों को मदद करने का हरसंभव प्रयास करें. अभी त्योहारों का मौसम है. सभी त्योहारों के मूल में स्वच्छता मुख्य रूप से शामिल रहता है. त्योहार मनाने से पहले हम सफाई सुथराई करते हैं. नए नए परिधान पहनते हैं. पर यह भाव त्योहार के अंत तक रहना चाहिए. अक्सर हम देखते हैं त्योहार के बाद त्योहार स्थल पर गंदगी और कचड़े का ढेर जमा हो जाता है. इसपर भी ध्यान रखने के आवश्यकता है.
 
आजतक टी वी चैनेल के ‘सो सॉरी’ कार्यक्रम में मेरा नाम जोकर के तर्ज पर मोदी जी को राजकपूर के रोल में दिखाया गया है जो लोगों को सफाई का सन्देश दे रहे हैं.
ए भाई जरा साफ़ तो रखो, सड़क ही नहीं गलियां भी
कस्बें ही नहीं बस्तियां भी,  ए भाई ....
तो समझ गए न आप भी ! पूरी सफाई! व्यक्तिगत भी और राष्ट्रीय भी. राष्ट्रीय सफाई अभियान भी चल ही रहा है, सीमा पर, सीमा पार और सभी संवेदनशील स्थानों पर...आप भी नजर रक्खें अगल-बगल, आसपास चौकन्नी निगाहों से ... ताकि हमारा देश साफ़ सुथरा रह सके! जयहिंद! जय भारत! जय जवान! जय किसान! जय विज्ञान! 

-    जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर 

Saturday, 24 September 2016

युद्ध हल नहीं हो सकता

पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत के युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम रणछोड़ (युद्ध से भागने वाला) भी है, क्योंकि जब जरासंध ने मथुरा पर हमला किया था तो उन्होंने अपनी प्रजा के हित में युद्ध करने के स्थान पर मथुरा से भागने का फैसला किया था, जिससे कृष्ण का नाम रणछोड़ पड़ गया. बाद में इस कदम से नाराज़ बड़े भाई बलराम को समझाते हुए कृष्ण ने कहा, "दाऊ, अगर मुझे रणछोड़ कहा जाता है, और इससे मेरा अपमान होता है, तो भी कोई बात नहीं, क्योंकि इस वक्त युद्ध न करना मथुरावासियों के हित में है... शांति हमेशा युद्ध से अच्छी होती है..."
उरी में जब १८ सैनिक शहीद हुए थे, पूरा देश टी वी के माध्यम से उनके विलखते हुए परिवार को देख रहा था, हर भारतीय बदले की अपेक्षा रखता था. मीडिया के शोरगुल में हम सभी युद्धोन्मादी बन गए थे. उपर्युक्त दृष्टान्त देश के भीतर जंग के लिए शोर मचा रहे सभी राष्ट्रवादियों के लिए है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान के बीच किसी भी वक्त जंग की संभावना कोई अच्छी खबर नहीं हो सकती. इसीलिए उरी में हुए आतंकवादी हमले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संयमित प्रतिक्रिया सुकून देने वाली है. यही बात उन्होंने केरल के कोझिकोड से भी कही. जहाँ उन्होंने पकिस्तान के शासकों को ललकारा भी है, तो वहाँ के नागरिकों से भी अपील की है कि वह अपने शासकों से सवाल पूछे के क्यों आजादी के बाद भारत सॉफ्टवेयर निर्यात करता है और पाकिस्तान आतंकवाद! भले ही गुजरात के मुख्यमंत्री रहते या फिर लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की हैसियत से उन्होंने पाकिस्तान को 'सबक' सिखाने की बात कही थी और पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर 'कमज़ोर सरकार' कहते हुए निशाना भी साधा था, लेकिन अभी सरकार को किसी भी तरह के बड़बोलेपन या जंगबहादुरी से बचने की ज़रूरत है. एक मंजे हुए नेता की यही पहचान होती है. अब वे कूटनीतिक तरीके से पकिस्तान को अलग थलग करने की बात कर रहे हैं.
पाकिस्तान की तुलना में भारत बहुत बड़ा देश है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी एक साख है. भारत के पास विश्व बाज़ार और आर्थिक महाशक्ति बनने की अपार संभावनाएं हैं और पाकिस्तान की छवि आतंकवाद को पनाह और बढ़ावा देने वाले एक देश की है. पाकिस्तान का पिछले 40 साल का इतिहास बताता है कि वह आतंकवाद के खेल में शामिल रहा है और उसकी सेना और खुफिया एजेंसियां इस खेल का हिस्सा रही हैं. इसलिए भारत सिर्फ पाकिस्तान को 'सबक' सिखाने के लिए जंग के जाल में नहीं फंस सकता. भारत ने पाकिस्तान के साथ तीन युद्ध और फिर करगिल की जंग लड़ी है. कारगिल युद्ध के दौरान सरकार ने जो किया, वह ज़रूरी था. अभी जंग जरूरी नहीं है. आत्मरक्षा जरूरी है. हमारे अपने छिद्रों कप भरने की जरूरत है.
फिलहाल भारत को पाकिस्तान जैसे बीमारू और आतंकवादी देश से निबटने के लिए वैश्विक मंच पर अपनी साख मजबूत करनी है. यह सब करने के लिए भुखमरी, कुपोषण, अशिक्षा और सामाजिक असमानता और शिशु मृत्युदर से लड़ने के साथ बेरोज़गारी और जनसंख्या की समस्या उसके सामने खड़ी है. पाकिस्तान के साथ जंग के जाल में फंसने पर हमारी अर्थव्यवस्था जो अभी गतिमान है, थम जायेगी.
अमेरिका पाकिस्तान को जैसे छद्म समर्थन देता है और आतंकवाद के खेल में उसकी शिरकत को अनदेखा करता है, उसके खिलाफ भारत को एक कूटनीतिक रणनीति बनानी होगी. अमेरिका भले ही दुनियाभर में आतंक के खिलाफ जंग की बात करता हो, लेकिन युद्ध के सामान को बेचने का कारोबार उसकी अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी रहा है. भारत को इस सच को भी समझना है कि लाखों-करोड़ का जंगी साजोसामान उसकी वास्तविक ज़रूरतों से उसे कितना पीछे धकेल रहा है. फ्रांस के साथ राफेल विमान का समझौता अभी अभी ही हुआ है.
सोशल मीडिया में जंगप्रेमी उफान पर सर्फिंग कर रहे देशभक्तों को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की ही एक कविता की कुछ पंक्तियों का एक बार अवलोकन कर लेना चाहिए ...
भारत-पाकिस्तान पड़ोसी, साथ-साथ ही रहना है,
प्यार करें या वार करें, दोनों को ही सहना है,
तीन बार लड़ चुके लड़ाई, कितना महंगा सौदा है
रूसी बम हो या अमरीकी, ख़ून एक ही बहना है...
यह देश सचमुच लालबहादुर शास्त्री के एक बार कहने पर दिन में एक बार भोजन करने लगा था. इस देश में ऐसा भी होता था कि पूरे शहर को अंधेरे में रखना है, घंटे-आधा घंटे हर घर की बत्ती बुझानी है, इसलिए पूरा का पूरा शहर स्वतः 'ब्लैकआउट' का अभ्यास करता था. इस देश में ऐसा भी होता था, जब लोग घरों से तरह-तरह की चीजें बनाकर विशेष रेलगाड़ियों से आवागमन कर रही सेना की ओर दौड़ पड़ते थे, कोई हलवा बनाकर खिलाता, कोई महिला बिना त्योहार के ही राखी बांधती नजर आती, किसी ने स्वेटर तक बना डाला, इसलिए कि फौजी भाई सीमा पर उनकी रक्षा करने जा रहे हैं. युवाओं की टोली स्कूल-कॉलेज के बाद टीन के डिब्बों में एक-एक दो-दो रुपये जमा करने के लिए निकल पड़ती. किसी सोशल मीडिया के बिना यह सब कुछ बिना अतिरिक्त प्रयास के स्वतः चलता रहता था. आज भी यह संभव है पर, जब अत्यंत जरूरी हो तब!
उरी में जो कुछ भी हुआ, उसके बाद इस तरह के गुस्से से कौन इंकार कर सकता है...? भारत की आवाम अब कोई हल चाहती है, ठोस हल. रोज-रोज की शहादत, रोज-रोज की अशांति को किसी एक निर्णय से निपटा देने का यह बेहतरीन वक्त लगता है, इसलिए भी, क्योंकि यह जो सरकार है, जिसे कई-कई सालों बाद भारतीय जनता ने अपनी पूरे समर्थन से सत्ता पर आसीन कराया है, वह कोई निर्णय ले पाने में समर्थ है. वह हल निकाल सकती है, लेकिन क्यों नहीं निकलता कोई हल. सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या युद्ध इसका हल है...?

ध्यान दीजिए, तमाम ख़बरों के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा का अख़बारों में छपा बयान, जिसमें उन्होंने उरी के हमलों ओर आतंक को प्रश्रय देने की निंदा तो की, लेकिन साथ ही यह भी कहा है कि 'इस वक्त दुनिया का कोई भी बड़ा देश किसी दूसरे देश पर युद्ध नहीं कर सकता है...' इस वक्त इस परिस्थिति में ओबामा के इस वक्तव्य के क्या मायने हैं? इसका छिपा सन्देश क्या है? दुनियाभर में अपनी दादागिरी दिखाने वाला यह देश क्या भारत-पाकिस्तान के इस मसले को यूं ही सुलगाए रखना चाहता है?
पाकिस्तान के पास अपने मूल सवालों, लोगों की बदहाल स्थिति, गरीबी से लड़ने और लोगों को उनके हकों से वंचित रखने के लिए इस कथित राष्ट्रवाद और कश्मीर के मसले को जिन्दा रखने के अलावा कोई हल नहीं है, लेकिन क्या हमारी राजनीति और विमर्श में भी कश्मीर का यह मुद्दा दूसरे अन्य मुद्दों पर पानी डालने का काम नहीं करता है...?
यदि पूरी गंभीरता से विकास के पहिये को और आगे ले जाना है तो निश्चित ही इस मुद्दे का हल निकालना होगा, लेकिन यदि अमेरिकी राष्ट्रपति खुले रूप में किसी भी हमले से इंकार कर रहे हैं, तो क्या हमारी राजनीतिक, कूटनीतिक रणनीति उनके खिलाफ जाकर हमले का साहस कर पाएगी, यदि हां, तो हम इसके लिए कितना तैयार हैं...? लड़ाई होती भी है, तो गौर कीजिए, क्या यह केवल भारत और पाकिस्तान ही की लड़ाई रह जाएगी, क्या दुनिया के दूसरे देश चुप बैठेंगे...? चीन का रवैया क्या होगा...? अमेरिका किसके साथ खड़ा होगा...? रूसी सेना किसके खेमे में जाएगी...? क्या हम यह सोच सकते हैं...! क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि भारत-पाकिस्तान का यह युद्ध केवल दो देशों में ही नहीं रह जाएगा...? और यदि फिर भी हमारा निर्णय लड़ाई के पक्ष में है तो क्या हम एक टाइम भोजन करने को तैयार हैं...? क्या देश अब भी वैसा ही है, या कुछ बदल गया है...? हमारे देश की कुल आबादी में से लगभग 70 फीसदी गरीबी रेखा के नीचे रहती है, इस बात का ठीक-ठीक कोई आंकड़ा नहीं है कि हजारों मीट्रिक टन अनाज पैदा होने के बावजूद कितने लोग रातों में भूखे सोते हैं, बीमारियों से हज़ारों लोग कर्जदार होकर कंगाल हो रहे हैं, हमारे देश के आधे बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, आधे भारत में बाढ़ के कारण उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन की टीम के साथ सेना भी संघर्ष कर रही है. कई राज्य सरकारों के साथ केंद्र भी इन समस्यायों से निपटने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है और हम पाकिस्तान से युद्ध करके उसे रौंदने चल पड़ें? यह सही है कि पाकिस्तान हमें फूटी आंख नहीं भाता, उसके लोग बार-बार हम पर हमला करते हैं, और चुनौती देते हैं, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि जैसा युद्धोन्माद का मानस हमारा समाज बनाता है, उससे हासिल क्या होना है? अत: सभी राष्ट्रभक्तों से हमारा विनम्र निवेदन है कि युद्धोन्माद के वातावरण से अपने को दूर रक्खे. केंद्र सरकार और हमारे सशक्त प्रधान मंत्री मंत्रणा कर सही हल निकालने के लिए प्रयासरत हैं. हमें उनके निर्णयों पर भरोसा होना चाहिए. जय हिन्द! जय भारत! जय जवान! जय किसान! जय विज्ञानं!  
- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर