Saturday, 12 January 2019

राष्ट्रीय युवा दिवस के दिन, स्वामी विवेकानंद को याद कर लें!


महान दार्शनिक स्‍वामी विवेकानंद की 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था. स्‍वामी विवेकानंद का वास्तविक नाम नरेन्द्र नाथ दत्त था. स्‍वामी विवेकानंद ने न सिर्फ भारत के उत्‍थान के लिए काम किया बल्‍कि लोगों को जीवन जीने की कला भी सिखाई. स्‍वामी विवेकानंद का जीवन बड़ा ही संघर्षमयी था. मात्र 25 साल की उम्र में अपने गुरु से प्रेरित होकर उन्‍होंने सांसारिक मोह-माया त्‍याग दी और संन्‍यासी बन गए. स्‍वामी विवेकानंद जीवन भर संन्‍यासी रहे और अपनी आख़िरी सांस तक वह समाज की भलाई के लिए काम करते रहे. स्‍वामी विवेकानंद की कही बातें दुनिया भर के लोगों को प्रेरणा देती हैं.
श्री नरेंद्रनाथ दत्त ने बेहद कम उम्र में ही वेद और दर्शन शास्‍त्र का ज्ञान हासिल कर लिया था. उनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के वकील थे, जबकि मां भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों वाली महिला थीं. साल 1884 में पिता की मौत के बाद परिवार की जिम्मेदारी उन्‍हीं के कंधों पर आ गई. स्‍वामी विवेकानंद बड़े अतिथि-सेवी थे, वह खुद भूखे रहकर अतिथियों को खाना खिलते थे. नरेंद्रनाथ 1871 में आठ साल की उम्र में स्कूल गए. 1879 में उन्‍होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज की प्रवेश परीक्षा में पहला स्‍थान हासिल किया. 
रामकृष्‍ण परमहंस और स्‍वामी विवेकानंद की मुलाकात 1881 कलकत्ता के दक्षिणेश्वर के काली मंदिर में हुई थी. परमहंस ने उन्हें शिक्षा दी कि सेवा कभी दान नहीं, बल्कि सारी मानवता में निहित ईश्वर की सचेतन आराधना होनी चाहिए.
विवेकानंद जब रामकृष्‍ण परमहंस से मिले तो उन्होंने वही सवाल किया जो वो औरों से कर चुके थे, 'क्या आपने भगवान को देखा है?' रामकृष्ण परमहंस ने जवाब दिया- 'हां मैंने देखा है, मैं भगवान को उतना ही साफ देख रहा हूं जितना कि तुम्हें देख सकता हूं. फर्क सिर्फ इतना है कि मैं उन्हें तुमसे ज्यादा गहराई से महसूस कर सकता हूं.'
अमेरिका में हुई धर्म संसद में जब स्‍वामी विवेकानंद ने 'अमेरिका के भाइयों और बहनों' के संबोधन से भाषण शुरू किया तो पूरे दो मिनट तक आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो में तालियां बजती रहीं. 11 सितंबर 1893 का वो दिन हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गया. 
स्‍वामी विवेकानंद ने 1 मई 1897 में कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन और 9 दिसंबर 1898 को गंगा नदी के किनारे बेलूर में रामकृष्ण मठ की स्थापना की. 
स्‍वामी विवेकानंद के जन्‍म दिन यानी कि 12 जनवरी को भारत में हर साल राष्‍ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है. इसकी शुरुआत 1985 से हुई थी. 
स्वामी विवेकानंद को दमा और शुगर की बीमारी थी. उन्‍होंने कहा भी था, 'ये बीमारियाँ मुझे 40 साल भी पार नहीं करने देंगी.'अपनी मृत्यु के बारे में उनकी भविष्यवाणी सत्य साबित हुई और वे उन्‍होंने 39 बरस की बेहद कम उम्र में 4 जुलाई 1902 को बेलूर स्थित रामकृष्‍ण मठ में ध्‍यानमग्‍न अवस्‍था में महासमाधि धारण कर प्राण त्‍याग दिए. स्वामी विवेकानंद का अंतिम संस्‍कार बेलूर में गंगा तट पर किया गया. इसी गंगा तट के दूसरी ओर उनके गुरु रामकृष्ण परमहंस का अन्तिम संस्कार हुआ था.
स्‍वामी विवेकानंद के 10 प्रेरणादायक विचार 
1. ''खुद को कमजोर समझना सबसे बड़ा पाप है.'' 2. ''ब्रह्मांड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं. वो हमी हैं जो अपनी आंखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अंधकार है.'' 3. ''जब तक जीना, तब तक सीखना, अनुभव ही जगत में सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है.''
4. ''किसी की निंदा न करें. अगर आप मदद के लिए हाथ बढ़ा सकते हैं, तो जरूर बढाएं. अगर नहीं बढ़ा सकते तो अपने हाथ जोड़िए, अपने भाइयों को आशीर्वाद दीजिये और उन्हें उनके मार्ग पे जाने दीजिए.'' 5. ''जब लोग तुम्हे गाली दें तो तुम उन्हें आशीर्वाद दो. सोचो, तुम्हारे झूठे दंभ को बाहर निकालकर वो तुम्हारी कितनी मदद कर रहे हैं.'' 6. ''ज्ञान स्वयं में वर्तमान है, मनुष्य केवल उसका आविष्कार करता है.'' 7. ''जब तक आप खुद पर विश्वास नहीं करते तब तक आप भागवान पर विश्वास नहीं कर सकते.'' 8. ''हम जितना ज्यादा बाहर जाएं और दूसरों का भला करें, हमारा ह्रदय उतना ही शुद्ध होगा और परमात्मा उसमे बसेंगे.'' 9. ''तुम्हें अंदर से बाहर की तरफ विकसित होना है. कोई तुम्‍हें पढ़ा नहीं सकता, कोई तुम्‍हें आध्यात्मिक नहीं बना सकता. तुम्हारी आत्मा के आलावा कोई और गुरू नहीं है.'' 10. ''दिल और दिमाग के टकराव में दिल की सुनो.''
स्वामी विवेकानंद के अमेरिका के शिकागो में दिए गए ऐतिहासिक भाषण की 125वीं वर्षगांठ पर याद कर लेते हैं, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है. स्वामी विवेकानंद ने जो कुछ भी उस समय कहा था, वह हमेशा हर शख्स, हर समाज पर लागू होता है, होता रहेगा, सो, आइए एक बार फिर पढ़ते हैं वह ऐतिहासिक भाषण, जो संभवतः आने वाले कई दशकों तक भी मानव समाज को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की शिक्षा देता रहेगा.
अमेरिका के बहनो और भाइयो,
आपके इस स्नेहपूर्ण और ज़ोरदार स्वागत से मेरा हृदय अपार हर्ष से भर गया है, और मैं आपको दुनिया की प्राचीनतम संत परम्परा की तरफ से धन्यवाद देता हूं. मैं आपको सभी धर्मों की जननी की तरफ से धन्यवाद देता हूं और सभी जातियों, संप्रदायों के लाखों, करोड़ों हिन्दुओं की तरफ से आपका आभार व्यक्त करता हूं. मेरा धन्यवाद कुछ उन वक्ताओं को भी है, जिन्होंने इस मंच से यह कहा कि दुनिया में सहनशीलता का विचार सुदूर पूरब के देशों से फैला है. मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने दुनिया को सहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढ़ाया. हम सिर्फ सार्वभौमिक सहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते, बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं.
मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे देश से हूं, जिसने इस धरती के सभी देशों और धर्मों के त्रस्त और सताए गए लोगों को शरण दी है. मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि हमने अपने हृदय में उन इस्राइलियों की पवित्र स्मृतियां संजोकर रखी हैं, जिनके धर्मस्थलों को रोमन हमलावरों ने तोड़-तोड़कर खंडहर बना दिया था. और तब उन्होंने दक्षिण भारत में शरण ली थी. मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूं, जिसने महान पारसी धर्म के लोगों को शरण दी और अभी भी उन्हें पाल-पोस रहा है.
भाइयो, मैं आपको एक श्लोक की कुछ पंक्तियां सुनाना चाहूंगा, जिन्हें मैंने बचपन से स्मरण किया और दोहराया है और जो रोज़ करोड़ों लोगों द्वारा हर दिन दोहराया जाता है - 'रुचिनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम... नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव...' इसका अर्थ है - जिस तरह अलग-अलग स्रोतों से निकली विभिन्न नदियां अंत में समुद्र में जाकर मिल जाती हैं, उसी तरह मनुष्य अपनी इच्छा के अनुरूप अलग-अलग मार्ग चुनता है, जो देखने में भले ही सीधे या टेढ़े-मेढ़े लगें, परंतु सभी भगवान तक ही जाते हैं. वर्तमान सम्मेलन, जो आज तक की सबसे पवित्र सभाओं में से एक है, गीता में बताए गए इस सिद्धांत का प्रमाण है - 'ये यथा मा प्रपद्यंते तांस्तथैव भजाम्यहम... मम वत्मार्नुवर्तते मनुष्या: पार्थ सर्वश:...' अर्थात, जो भी मुझ तक आता है, चाहे वह कैसा भी हो, मैं उस तक पहुंचता हूं. लोग चाहे कोई भी रास्ता चुनें, आखिर में मुझ तक ही पहुंचते हैं.
सांप्रदायिकताएं, कट्टरताएं और इनकी भयानक वंशज हठधर्मिता लंबे समय से पृथ्वी को अपने शिकंजों में जकड़े हुए हैं. इन्होंने पृथ्वी को हिंसा से भर दिया है. कितनी ही बार यह धरती खून से लाल हुई है, कितनी ही सभ्यताओं का विनाश हुआ है और न जाने कितने देश नष्ट हुए हैं. अगर ये भयानक राक्षस न होते, तो आज मानव समाज कहीं ज्यादा उन्नत होता, लेकिन अब उनका समय पूरा हो चुका है. मुझे पूरी उम्मीद है कि आज इस सम्मेलन का शंखनाद सभी हठधर्मिताओं, हर तरह के क्लेश, चाहे वे तलवार से हों या कलम से, और सभी मनुष्यों के बीच की दुर्भावनाओं का विनाश करेगा.
उपर्युक्त बातें आज भी प्रासंगिक हैं. हम सभी स्वामी विवेकानंद को आदर करनेवाले लोगों में से हैं. आज के युवा अगर स्वामी जो को प्रेरणा के स्रोत मानते हैं तो, सभी युवाओं को धार्मिक कट्टरता से दूरी बनाकर अपना और अपने आस-पास के साथ देश और विश्व के विकास के लिए काम करना चाहिए. यही तो धर्म है, यही तो वसुधैव कुटुम्बकम है और यही तो सबका साथ और सबका विकास है. अर्थात घृणा से दूरी बनाइए और सबको गले लगाइए. अच्छाई को ग्रहण करिए और बुराई से खुद को दूर रखिये. आज के दिन बहुत सारे लोगों ने स्वामी जी को याद किया है और उनके मार्ग पर चलने को कहा है. हम वही मार्ग अपनाएं और दूसरों को भी रास्ता दिखलायें.
जय भारत! जय विश्व ! – जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर 

Saturday, 5 January 2019

हम्पी : खंडहरों का रोमांच(भग्नावशेषों की प्रेम कथा)


हम्पी : खंडहरों का रोमांच(भग्नावशेषों की प्रेम कथा) 
एक पौराणिक गाथाओं का विलुप्त शहर, हम्पी, कभी एक शक्तिशाली साम्राज्य की राजधानी था।  आज, उसका होश उडा देने वाला भव्य प्राकृतिक दृश्य बड़े-बड़े गोल पत्थरों का फैला हुआ दृश्य, उसकी विनाश लीला की कहानी कह रहा है. एक विलुप्तप्राय पौराणिक, ऐतिहासिक, बलशाली और समृद्ध शहर हम्पी, जो तुंगभद्र नदी के तट पर स्थित है, कर्नाटक के आकर्षणों में से एक है. रानी का स्नानागार, एक शानदार कमल महल, एक शाही अश्वशाला और मंदिर जहाँ भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था, यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थली, प्रत्येक मोड़ पर ऐतिहासिक पहलू प्रकट करती है।  विनाश के बावजूद भी, हम्पी की भव्य संरचनाएं यहाँ की अमीरी की कहानी कहती है. हम्पी का उल्लेख हिन्दू महाकाव्य रामायण में भी मिलता है. बताया जाता है कि यह वानर राज्य किष्किन्धा की राजधानी था.
हम्पी का भव्य स्थल, दक्षिणी भारत में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है. यह शक्तिशाली राज्य विजयनगर की आखिरी राजधानी थी।  उसके अमीर राजकुमारों ने उत्कृष्ट मन्दिर और महल, बनाए जिसकी प्रशंशा  14वीं और 16वीं शताब्दियों के बीच आये पर्यटकों ने की।  बहुत बडे गोल पत्थरों के ढेरों के बीच एक अद्भुत प्राकृतिक दृश्य कई किलोमीटर तक जगह-जगह फैला हुआ, वास्तुकला के  नायाब खंडहर, पर्वतारोही, ट्रैकर(खोजी), अन्य साहसिक कार्य करनेवाले एवं खेल प्रेमियों के लिए उत्साह एवं आकर्षण का संवर्धन करता है. इन चट्टानों के पुराने विविध रंगों को , हरे भरे ताड़ के पेड़, केले के बगीचे और धान के खेत संतुलित कर देते हैं।  आज यह शान्त नगर, भक्तों, शैलानियों, साहसिक और जोखिम भरे कार्य करनेवालों, जिज्ञाशुओं का केंद्र बना हुआ है.   
प्रमुख आकर्षण: विरुपक्ष मन्दिर: विरुपक्ष मन्दिर, इस क्षेत्र में सबसे अधिक पुरानी संरचनाओं में से एक है, हम्पी बाजार के पास ही स्थित है. प्रमुख तीर्थ स्थान भगवान विरुपक्ष, भगवान शिव के एक अवतरण को समर्पित है।  मन्दिर की 49मीटर(लगभग) गुम्बद या गोपुरम् के बारे में कहा जाता है की यह 1442 का बना हुआ है  और नगर के उस पार से भी दिखता है।  यह हम्पी का एकमात्र मन्दिर है, जिसमे आज भी विधिवत पूजा-आराधना की जाती है. 
विट्टल मन्दिर: 16वीं शताब्दी का विट्टल मन्दिर, इस क्षेत्र में सबसे अधिक अलङ्कृत स्मारकों में से एक है, जो विजयनगर की सर्वोत्तम वास्तुकला को दर्शाता है।  अत्यधिक नक्काशी की कला से अलङ्कृत किया हुआ, मन्दिर की विशिष्टता का एक शानदार नमूना, पत्थर का रथ है, जो आँगन में खडा है।  दंतकथाओं के अनुसार यह भगवान विष्णु का रथ है जिसके पहिये कभी घूमते थे.  इस मन्दिर की एक और विशेषता उसके सङ्गीत स्तम्भ हैं, जिन्हें जब भी थपथपाया जाता है, 81 प्रकार के अलग-अलग सङ्गीत यन्त्रों की आवाजें निकलती हैं. यह कल्याण मंडप और उत्सव मंडप जैसा संयुक्त इमारतों में से एक पूर्ण रूप से विकसित मन्दिर है।  मन्दिर परिसर में वसंतोत्सव मंडप के साथ एक बडा पुष्करिणी है,  जो पानी के विभिन्न नाले, नहरों के जाल के साथ जुड़ा है । 
रानी का स्नानागार : बाहर से एक निर्बाध आयताकार संरचना जो एक अलंकृत बलुआ पत्थर के रंग के इंटीरियर को प्रकट करती है, क्वीन्स बाथ(रानी का स्नानागार) हम्पी में उत्कृष्ट भारत-इस्लामी वास्तुकला के बेहतरीन उदाहरणों में से एक है।  कहा जाता है कि राजाओं और रानियों के लिए बना  हुआ, प्रमुख स्नान-ताल सुन्दर मेहराबों, बरामदों, खम्भों से घिरा हुआ खिडकियों के साथ अलङ्कृत छज्जों से सुसज्जित है। 
जनाना अहाता (महिला प्रांगण):  दीवारों से घिरे महिलाओं के घर जनाना अहाते(महिला परिसर) के अन्दर है। एक संरचना जो शायद प्राचीन हम्पी की शाही महिलाओं के लिए बनाई गई थी, उसके खंडहर एक मजबूत इमारत की छवि तैयार करते हैं, इसके चारों ओर निगरानी करने वाले और हिंदू देवताओं और देवियों की मूर्तियों के साथ एक भव्य नक्काशीदार अन्तरंग  और छिछले निचले इलाके, हालांकि उपयोग करने योग्य स्थिति में नहीं है, प्रकाश और छाया का एक असली खेल बनाता है, क्योंकि सूर्य पानी में प्रतिबिंबित होता हुआ, पत्थर के खंभे और छत पर एक खाका खींचता है।  यहाँ एक और माना हुआ आकर्षण रानियों के लिए एक मनोरंजन हेतु हवेली, सुन्दर कमल महल मंडप है। कमल मंडप के बारे में कहा जाता है कि वह उस समय रानियों के लिए सुसज्जित और प्राकृतिक रूप से वातानुकूलित था.
हाथी शालाएं : जनाना परिसर के पास ही एक शानदार भवन है जिनमे शाही हाथियों को रखा जाता था. यहाँ गुम्बज और मेहराब के छत तथा द्वारपथ के साथ 11 कक्ष हैं, जहाँ कभी हाथियों को रखा जाता था. हर एक कक्ष में एक छोटी खुली जगह है जहाँ से महावत प्रवेश करते थे.
नंदी प्रतिमा: भगवान शिव का वाहन, नंदी की विशालकाय प्रतिमा, हम्पी में प्रतिष्ठित मूर्ति है।  विरुपक्ष मन्दिर के सामने, न्यूनतम-नक्काशी की कला से पूरित, प्रतिमा, नंदी की बैठी हुई मुद्रा (अवस्था) को दर्शाती है।  हम्पी बाजार (प्राचीन वाणिज्यिक केंद्र का) के अन्त में, यह प्रतिमा खम्भी संरचनाओं से चारों ओर से घेरी गयी है। यह हम्पी कला त्यौहार के लिए विजय उत्सव का प्रमुख स्थल है। 
अनेगुंडी: प्राचीन मजबूत गाँव अनोखा अनेगुंडी जो हम्पी से भी पुराना बताया जाता है, अपने चिर ग्रामीण परंपरा  के आकर्षण को बनाए रखता है।  दन्त कथा कहती है कि हम्पी के सामने तुंगभद्र नदी के किनारे, यह वही स्थान है जहाँ विजयनगर साम्राज्य की सेना के हाथी रखे गये थे।  पौराणिक गाथाओं के अनुसार अनेगुंडी किश्किंधा(जो बाली और सुग्रीव का  राज्य था) राज्य का ही हिस्सा था, जिसका उल्लेख रामायण में किया गया है।
तुंगभद्र डैम: महान तुङ्गभद्र नदी के उस पार, जो कृष्णा की उपनदी है एक बाँध बनाया गया है, यह बाँध हम्पी से लगभग २५ किलोमीटर होस्पेट के नगर के निकट है। सुन्दर रूचिकर उद्यान और नृत्य करती हुई फव्वारों से युक्त जिन्हें रङ्गीन प्रकाश से असाधारण रूप से प्रकाशित किया गया है, एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। 
चित्रदुर्गा: हम्पी से लगभग 150 कि.मी. दूर, बेंगलुरु और होस्पेट को जोड़नेवाली प्रमुख मार्ग पर है, चित्रदुर्गा, उसका विशालकाय कल्लीना कोट किला, आश्चर्यजनक सैनिक वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध है।  इसके 19 द्वारमार्ग, 38 पिछवाड़ा  प्रवेश, महल, मस्जिद, अन्नभंडार , तेल के गड्ढे, गुप्त प्रवेश द्वार, और पानी की टंकियां हैं। पहाड़ी पर किले परिसर के अंदर चट्टानी परिवेश के बीच कई मंदिर
विस्तृत विश्लेषण (डीप डाइव): पुरातत्व संग्रहालय छोटा लेकिन महत्वपूर्ण है, हम्पी में पुरातत्व क्षेत्र से बरामद मूर्तियों का एक शानदार संग्रह प्रदर्शित करता है।  इसमें हम्पी स्थलाकृति के दो छोटे मॉडल(अनुकृति) भी शामिल हैं, जिनमें स्मारक स्थित हैं।
बंगलोर से सडक मार्ग द्वारा होसपेट जाने में लगभग ८ घंटे का समय लगता है. हम्पी देखने और समझाने के लिए एक दिन का समय पर्याप्त नहीं है, फिर भी कार, ऑटो, और बैटरी से चलनेवाली गाड़ी का सफ़र करने के बाद भी प्रौढ़ आदमी थक जाता है. स्कूली बच्चे अपनी शिक्षिकाओं के आदेश से कतार-बद्ध होकर अनुशासित ढंग से चलते हुए भी आनंदित होते हैं.
पुरातत्व और पर्यटन विभाग द्वारा संरक्षित संरचनाएं हमारी समृद्धि और कारीगरी की निपुणता की गाथा कहती है. पत्थरों को तरासना, उस पर विभिन्न प्रकार की चित्रकारी करना और एक के ऊपर एक सजाकर इस प्रकार रखना कि आज भी देखने में अनूठी लगे, निश्चित रूप से हमारे इतिहास को अनूठा बताता है. कर्नाटक सरकार और स्थानीय लोगों की भागीदारी को आप सराहे बिना नहीं रह सकते. प्रकृति की अनूठी विरासत जो आज हमें देखने को मिल रही है निश्चित रूप से बचाकर रखने की आवश्यकता है.   
बंगलोर से होसपेट और होसपेट से हम्पी तक की सड़के बहुत ही अच्छी हैं. ऊपर से एक्सप्रेस वे का भी काम चल रहा है ताकि कम से कम समय में यह दूरी तय की जा सके. आस पास के गाँव, जहाँ सिंचाई का साधन है, फसलें हैं, नहीं तो बंजर सूखे खेत डरावने लगते हैं. उधर केले, नारियल, सुपारी के घने जंगल भी दिखे, फूलों के बगान भी और धान, मक्के के खेत भी अपनी कहानी सुना रहे थे. सबसे बड़ी बात लोगों की सरलता लगी और हिंदी न समझते हुए भी सहयोग करने को उत्सुक दिखे. कुछ उद्योग धंधे एवं विंड मिल्स भी दिखाई पड़े...सुनते हैं मित्तल और जिंदल ग्रुप इधर स्टील प्लांट लगाने को उत्सुक है. पर यहाँ पर उपलब्ध लौह अयस्क की गुणवत्ता पर अभी सवाल खड़े हो रहे हैं. फिर भी कुछ स्पंज आयरन के कुछ कारखाने दिखे. कर्नाटक में विकास हो रहा है और दिख भी रहा है ऐसा कह सकते हैं.  - जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.


बनरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान, बंगलोर की सैर


बनरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान, बंगलोर की सैर
प्रकृति एक महान स्रोत है, जो हर प्रकार के पदार्थों, वनस्पतियों और जीवों का निर्माण करती है और उन्हें विकसित होने के लिए उन्ही के अनुसार हर प्रकार का अनुकूल वातावरण भी प्रदान करती है. इस ब्रहमांड के बारे में भी बहुत कुछ हम जानते हैं, जानने की कोशिश करते हैं, काफी कुछ समझ पाते हैं या नहीं भी समझ पाते हैं. हर एक के विचार, भावना, सोच, कार्य-प्रणाली जीवन शैली अलग-अलग प्रकार के हो सकते हैं, पर यह प्रकृति ही है जो हममे सबके साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देती है. हम दिन-रात भले ही अपनी दिनचर्या में लीन हों, पर कभी-कभी ऐसा अवश्य लगता है कि हम अपने आस-पास या दूर के प्राकृतिक दृश्यों का अवलोकन करें, उनसे कुछ ग्रहण करें और उन्हें भी अपने जीवन में स्थान दें. अथवा अपने व्यस्ततम वातावरण से दूर हटकर प्रकृति की गूढ़ता का अध्ययन करें. एक आम आदमी के लिए यह हमेशा संभव नहीं होता कि वह सुदूर पहाड़ियों, घनघोर जंगलों, या निर्जन-निर्जल रेगिस्तान में चला जाय और वहां के बारे में जानने समझने का प्रयास करे. इसीलिए शायद हर क्षेत्र में कुछ प्राकृतिक वातावरण का या तो निर्माण किया गया है या उन्हें विकसित कर सुगम बनाया गया है ताकि एक आम आदमी उन इलाकों में जाकर प्राकृतिक अवस्था में प्राकृतिक प्राणियों और उनके जीवन शैली का अवलोकन करे, अध्ययन करे और महसूस करे. हमारे देश में के कई राष्ट्रीय उद्यान हैं जहाँ वन्य प्राणियों के संरक्षण की भरपूर ब्यवस्था की गयी है साथ ही वहां तक पर्यटकों को सुरक्षित ले जाने और उन्हें बतलाने, समझाने की भी भरपूर ब्यवस्था की गयी है.     
अभी हाल ही में बंगलुरु स्थित बनरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान जाने का मौका मिला और मैंने जो देखा, अनुभव किया, उसे ही यहाँ बतलाने का प्रयास कर रहा हूँ. -- जंगली बिल्लियों, भारतीय तेंदुओं, बाघ, चीतों और हाथियों को नैसर्गिक रूप से साक्षात देखने के लिए बेंगलोर से २० किलो मीटर दक्षिण में बनरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान बहुत सुंदर स्थल है. यहाँ सुरक्षित जू-सफारी में ड्राइव करते हुए जंगल के जानवरों को उनकी प्राकृतिक अवस्था में देखा जा सकता हैं. इस पार्क में एक साँप और मगरमच्छों का फार्म भी है.
बनरघट्टा बायोलॉजिकल पार्क को 2002 में बनरघट्टा नेशनल पार्क के एक हिस्से से बनाया गया था. बंगलौर से पार्क की यात्रा करने के लिए लगभग डेढ़ घंटे लगते हैं. यह जगह सबसे अधिक प्राकृतिक जैव संरक्षणों में से एक है. 25,000 एकड़ (104.27 वर्ग किमी) में फैला यह जैव उद्यान बंगलौर में एक प्रमुख पर्यटक आकर्षण का केंद्र है. बनरघट्टा राष्ट्रीय उद्यान में वन्य जीवों और तेजी से बढ़ते शहर बैंगलोर की शहरी आबादी के लिए मनोरंजन की सुविधाएं बनाने के लिए विशेष गहनता के साथ वन्य जीवन पर्यटन को बढ़ावा देने के संरक्षण के लिए अगस्त 1971 में शुरू किया गया था.
बनरघट्टा चिड़ियाघर में एक तेंदुआ(सफेद बाघों सहित) बाघ, शेर, हाथी, हरिणों, भालुओं, बंदरों सहित अन्य स्तनधारियों का आश्रय है. पार्क में पर्यटकों के भ्रमण के लिए सफारी बस, जीप आदि उपलब्ध है, जिसे सुरक्षित वातावरण में प्रशिक्षित चालकों और सहायकों द्वारा निर्धारित मार्ग से घुमाया जाता है. वे जगह-जगह रोककर या धीमा कर पर्यटकों को वन्य प्राणियों से परिचित कराते हैं. बाघ और शेर के इलाके कई सुरक्षित घेरे के अन्दर हैं जिन्हें इन सफारिर्यों के प्रवेश के समय ही खोला जाता है. वहां के सुरक्षा कर्मी भी प्रशिक्षित ही होते है जो अपनी सुरक्षा करते हुए पर्यटकों की सुरक्षा का विशेष ख्याल रखते हैं. सफारी का प्रबंधन और वित्त पोषण कर्नाटक राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा किया गया हैं. पार्क के टाइगर रिजर्व भारत के वन विभाग द्वारा मान्यता प्राप्त है. विशेष प्रबंधन के बावजूद भी कभी-कभी छोटी-मोटी दुर्घटनाएं घट ही जाती है क्योंकि जंगली जानवर शायद अपने प्राकृतिक जीवन में हस्तक्षेप समझते हों या पर्यटकों/संरक्षकों की सावधानी और हिदायत के बावजूद भी कभी-न-कभी कोई गलती हो जाती है. इसलिए वे लोग हमेशा आगाह करते रहते हैं कि, चिल्लाएं नहीं, जानवरों को छेड़ें नहीं. फोटोग्राफी कर सकते हैं, उसके लिए भी अनुमति लेनी होती है. इस उद्यान में एक साँप पार्क और एक छोटा सा थिएटर के अलावा, विशेष प्रदर्शन के लिए चिड़ियाघर में एक छोटा सा संग्रहालय भी है.
तितली पार्क - देश का पहला तितली पार्क बनरघट्टा के बायोलॉजिकल पार्क में स्थापित किया गया था. यह कपिल सिब्बल, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री द्वारा नवंबर 2006 शनिवार 25 को उद्घाटन किया गया. तितली पार्क भूमि का 7.5 एकड़ (30,000 M2) में फैला हुआ है. इसमें एक तितली संरक्षिका, एक संग्रहालय और एक दृश्य-श्रव्य (audiovisual) के कमरे शामिल हैं. एक पोली कार्बोनेट की छत के साथ एक हरा-भरा घिरा हुआ 10,000 वर्ग फुट (1000 वर्ग मीटर) बाड़ा, जो कि तितली संरक्षिका है. संरक्षिका के अंदर रहने के वातावरण को तितलियों के बीस से अधिक प्रजातियों की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए डिजाइन किया गया है. पर्यावरण के लिए एक आर्द्र जलवायु, एक कृत्रिम झरना और तितलियों को आकर्षित करने के लिए उपयुक्त वनस्पति के साथ, एक उष्णकटिबंधीय सेटिंग है. संरक्षिका के अन्दर एक छोटा थियेटर भी है जहाँ विशेष जानकारी दी जाती है.
इस उद्यान को कर्नाटक के चिड़ियाघर प्राधिकरण, कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय और पारिस्थितिकी और पर्यावरण के क्षेत्र में अनुसंधान के लिए अशोक ट्रस्ट (Ashoka Trust for Research in Ecology and Environment  - ATREE) आदि सस्थाएं कर रही हैं.
इसके अलावा इसके संरक्षण और वित्तपोषण में यहाँ की प्रमुख IT संस्थान INFOSYS का भी योगदान है, क्योंकि चिड़ियाघर का एक Tiger enclosure का उद्घाटन Infosysy फाउंडेशन की चेयरपर्सन श्रीमती सुधा कृष्णमूर्ति द्वारा १६ अक्टूबर २०१५ में किया गया है. इसका निर्माण भी इनफ़ोसिस फाउंडेशन के द्वारा ही किया गया है.  
पार्क के ही अन्दर एक ‘हिल व्यू रेस्तरां’ भी है जहाँ साउथ इन्डियन थाली का भोजन किफायती दर में उपलब्ध है. इसके अलावा बाहर में भी कई खाद्य पदार्थ और छोटे-बड़े होटल और रेस्तरां उपलब्ध है. जू के बाहर स्थानीय कारखानों में बने विभिन्न प्रकार के खिलौने और सजावटी सामान उपलब्ध हैं. पर्यटक यहाँ से कुछ भी सामग्री खरीदकर स्मृति चिह्न के रूप में घर ले जा सकते हैं.
पार्क में सफाई की ब्यवस्था उत्तम है. हर जगह गीले और सूखे कचड़े के लिए पात्र रखे गए हैं. बशर्ते कि लोग उसका सही उपयोग करें. ज्यादातर लोग अब सफाई के प्रति जागरूक हुए हैं. बन्दर आदि जानवर उन कूड़ों में से अपने पसंद का सामान छाँट लेते हैं और उनसे क्रीड़ा करते हुए कौतूहल पैदा करते हैं. एक बन्दर को चाय के फेंके कप से चाय पीने का उपक्रम करते हुए हमने भी देखा और उसे कैमरे में कैद भी किया.
विशेष प्रकार के दुर्लभ पशु-पक्षी, बड़े-बड़े घड़ियाल यहाँ आराम करते हुए और धूप सेंकते हुए देखे जा सकते हैं. कई प्रकार के शुतुरमुर्ग, हाथियों के झुण्ड, हरिणों, मृगों, नीलगायों और बारहसिंघा को भी यहाँ देखा जा सकता है. विभिन्न प्रकार के बन्दर, भालू, शेर चीतों को दूर और पास से देखने का आनंद ही अजीब होता है. बच्चे काफी आनंदित होते हैं. यहाँ एक छोटा सा झील भी है जिनमे आप बोटिंग का आनंद ले सकते हैं. परिवार के साथ, प्रेमी जोड़ो के साथ, या किसी विद्यालय के बच्चों का समूह ऐसी जगहों में अक्सर मिल जाते है जो अपने-अपने तरीके से आनंद मनाते हुए दिख जाते हैं. सबसे बड़ी बात यहाँ हर भाषा में बात करनेवाले मिल जाते हैं जिनसे आप अपनी बात कह सकते हैं और सुन-समझ भी सकते हैं. हाँ और एक बात यहाँ बच्चों के लिए एक बेबी केयर यूनिट भी है, जहाँ आप अपने छोटे बच्चों को छोड़कर पार्क घूमने आनंद ले सकते हैं अगर माँ और बाप में उचित समझदारी हो तो बच्चे को एक विशेष प्रकार के लैपटॉप वाले जैसे बैग में लेकर भी घूम सकते हैं क्योंकि मैंने ऐसे जोड़े को भी वहां देखा जो बच्चे को आधुनिक बैग में रक्खे सामने लटकाए हुए साथ चल रहे हैं. यहाँ पति पत्नी में आपसी सामंजस्य और सद्भाव जरूरी है.   
छुट्टी के दिनों में इन जगहों पर भीड़ ज्यादा रहती है. सामान्य दिनों में भीड़ कम रहती है पर चिड़ियाघर के कर्मचारी अपनी ड्यूटी मुस्तैदी से निभाते हैं, इतना तो मानना पड़ेगा. सरकारें जिस पार्टी की भी हो जन-कल्याण के कार्यक्रमों के साथ जैविक-वातावरण के संरक्षण की जिम्मेदारी भी सरकार की ही है. सभी सरकारें कमोबेश करती ही है. जहाँ का प्रबंधन बेहतर हो और सबकुछ सुनियोजित हो तो लिखने का मन करता ही है ताकि दूसरे लोग भी वैसी जगहों का लुत्फ़ उठा सकें.. आप यहाँ तनिक मन को शांत कर बैठ भी सकते हैं और शुद्ध हवा में जोर-जोर से सांस भी ले सकते हैं. यानी कि कपालभांति, अनुलोम विलोम, भ्रामरी या भाग दौड़ कुछ भी...बाबा रामदेव की पंतजलि की दुकानें यहाँ हर जगह मौजूद हैं.
तो आइये कुछ दिन तो गुजारिए कर्नाटक और बंगलोर में ....
-    जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.