Tuesday, 27 March 2018

चैत्र मास, नववर्ष, वासंती पूजा और रामनवमी


फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन होलिका दहन के साथ फाल्गुन मास की समाप्ति हो जाती है और चैत्र कृष्ण प्रतिपदा के दिन होली का त्योहार धूम धाम से मनाया जाता है. इस दिन हम सभी गिले-शिकवे भूलकर एक दूसरे के साथ रंग गुलाल खेलते हैं और आनंद मानते हैं. हाँ शराब और भांग के नशे में या धन या पराक्रम के नशे में कुछ अनचाही घटनाएँ घट ही आती है जिसके लिए पछताने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता. सौहार्द्र को बनाये रखना हम सबकी जिम्मेवारी है. सरकारें और प्रशासन यथासंभव प्रयास में रहती है कि शांतिपूर्ण माहौल बना रहे, पर कुछ छुटभैये नेता या आवारा किस्म के लोग हर समाज में होते हैं जो ख़बरों में आने के लिए भी कुछ अप्रत्याशित कर गुजरते हैं.
अब आते हैं चैत्र मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा यानी प्रथम दिन विक्रम संवत, हिन्दू संवत या भारतीय संवत जिसके बारे में रामधारी सिंह दिनकर ने भी लिखा है-
ये नव वर्ष(यानी अग्रेजी कैलेंडर का जनवरी से शुरू होने वाला) हमें स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं है अपनी ये तो रीत नहीं है अपना ये व्यवहार नहीं
धरा ठिठुरती है सर्दी से आकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर सर्द हवा का पहरा है
------
ये धुंध कुहासा छंटने दो, रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो, फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार जब स्नेह सुधा बरसायेगी
शस्य श्यामला धरती माता घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति प्रमाण से स्वयंसिद्ध नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा सदा नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
इस वर्ष विक्रम संवत २०७५, १८ मार्च से प्रारंभ हुआ. १८ मार्च के एक दिन पहले ही तमाम भारतीय और हिंदूवादी संस्थाओं के साथ वर्तमान सरकार ने भी घोषणा कर दी गयी कि हमलोग हिन्दू नववर्ष को धूम धाम से मनाएंगे. बाकी जगह पर तो शांतिपूर्ण ढंग से दोनों दिन जुलूश भगवा और तिरंगा ध्वज के साथ संपन्न हो गया सिर्फ भागलपुर को छोड़कर.
भाजपा, आरएसएस और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं की रैली पर भागलपुर शहर में दंगा भड़काने का आरोप लगा. इस रैली का नेतृत्व केंद्रीय राज्य मंत्री अश्विनी कुमार चौबे के बेटे अरिजीत शाश्वत कर रहे थे। इस रैली में शामिल लोग कथित तौर पर उकसाने वाले नारे लगा रहे थे। इस रैली का आयोजन हिंदू नववर्ष के उपलक्ष्य में नववर्ष जागरण समिति द्वारा किया गया था। यह रैली 15 किलोमीटर लंबे रास्ते से होकर गुजरी जिसमें आधे दर्जन मुस्लिम बहुल इलाके शामिल हैं। लालमाटिया आउटपोस्ट के इंचार्ज संजीव कुमार अनुसार रैली में शामिल लोगों द्वारा उकसाने वाले नारे लगाए गए, जिससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ा. बतौर नीतीश कुमार दंगा बर्दाश्त नहीं किया जायेगा पर जिनके साथ वे हैं उनको वे कैसे रोक पाएंगे? रामनवमी के झंडा जुलूश में भी वे ही लोग शामिल हैं इनका उद्देश्य ही दंगा फैलाना या अशांति पैदा करना है. धर्म के नाम पर राजनीति की रोटी सेंकी जा रही है. देश के कई शहर अशांत हो चुके हैं. सौहार्द्र के उद्देश्य से निकाली गई यात्रायें अनियंत्रित होने में देर नहीं लगती, जिसे नियंत्रित करने में प्रशासन के पसीने छूट जाते हैं. राजनीतिक लोग दूर से देखते हैं, मुस्कुराते हैं और कुछ कार्रवाई करके खानापूर्ति ही करते हैं.
अब आते है २३ मार्च शहीद दिवस पर इस दिन भी पूरे देश में शहीद दिवस पूरी धूम धाम से मनाया गया और इस दिन शहीद होने वाले भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव जैसे नौजवानों ने हंसते हँसते फांसी को गले लगा लिया था. कहने की जरूरत नही कि ये सभी अंग्रेजों के खिलाफ लड़नेवाले बहादुर नौजवान थे. इस दिन तो मैंने महसूस किया कि हिन्दुओं के साथ मुस्लिमों ने भी इस शहीद दिवश को जोश-ओ-ख़रोश के साथ मनाया और तिरंगा यात्रा के साथ इन शहीदों को श्रद्धांजलि दी.
अब आइए रामनवमी और वासंती दुर्गापूजा पर थोड़ी चर्चा कर लेते हैं. चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से ही नवरात्रि शुरू हो जाती है और काफी लोग नौ दिन तक फलाहार पर ही गुजारा करते हैं. नवमी के दिन कन्यापूजन के साथ नवरात्र संपन्न माना जाता है. बासन्ती दुर्गापूजा भी इन्ही दिनों मनाया जाता है और दशमी के दिन माँ दुर्गा की प्रतिमा को विसर्जन किया जाता है. रामनवमी को ही भगवान राम का जन्म हुआ था. तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है.
नौमी तिथि मधुमास पुनीता, शुक्ल पक्ष अभिजित हरिप्रीता   
मध्य दिवस अति धूप न घामा, पावन काल लोक विश्रामा
इस दिन भगवान राम का जन्म दिन तो हम मनाते ही हैं, एक और मान्यता है कि श्री हनुमान जी भगवान् राम के सबसे बड़े भक्त हैं और तुलसीदास को भी भगवान राम से मिलानेवाले हनुमान जी ही थे. सुग्रीव, बाली, अंगद और विभीषण को भी भगवान राम से मिलानेवाले हनुमान जी ही थे. यहाँ तक कि रावण द्वारा अपहरित माँ सीता को भी पता लगनेवाले हनुमान जी ही थे. इसलिए लोकगायक लखबीर सिंह लक्खा के शब्दों में “पार न लगोगे श्री राम के बिना, राम जी मिले न हनुमान के बिना” इसीलिए राम भक्त भी हनुमान जी की आराधना में ही आस्था व्यक्त करते हैं और हनुमान जी के ध्वज को स्थापित करते हैं, उसे लेकर बड़े-बड़े जुलूस निकालते हैं तथा दशमी के दिन उस ध्वज को पवित्र नदियों, सरोवर के जल में स्नान कराकर ठंढा करते हैं.
यह झाड़खंड वासियों और जमशेदपुर वासियों के लिए खुशी और उल्लास का प्रदर्शन भी है. रामनवमी पर्व को जमशेदपुर में रायट पर्व के रूप में भी परिभाषित किया जाता रहा है, क्योंकि १९७९ में रामनवमी के दिन ही झंडा जुलूश के दौरान भीषण साम्प्रदायिक दंगा हो गया था. तब से हर साल कुछ न कुछ अनिष्ट होने की संभावना बनी रहती है. शांति-पसंद लोग कभी दंगा नहीं चाहते, नहीं प्रशासन दंगा का धब्बा देखना चाहती है. पर कुछ शरारती तत्व हर समुदाय में होते हैं, जिन्हें अपनी रोटी सेंकनी होती है, राजनीति चमकानी होती है.
रामनवमी के दिन मंदिरों में, पूजा स्थलों में भगवान् राम का जन्मोत्सव मनाया जाता है. बिहार और झाड़खंड में श्रीराम के परम भक्त श्री हनुमान जी के ध्वज की स्थापना कर उनका पूजन-वंदन किया जाता है. माँ दुर्गा और और बजरंगबली दोनों शक्ति के प्रतीक हैं, इसलिए उनके भक्त अपनी शक्ति का प्रदर्शन, आस्था और विश्वास के साथ करते हैं. जमशेदपुर में सन १९२२ ई. से ही कई अखाड़ों के अंतर्गत महावीर हनुमान जी का ध्वज का आरोहन करते आ रहे हैं और उनके ध्वज के साथ जुलूस में एक साथ चलते हुए, अपनी शक्ति का प्रदर्शन लाठी, भाले, तीर, तलवार, और अब चाकू के साथ आधुनिक हथियार के साथ विभिन्न करतब दिखलाते हुए करते हैं. इनके करतब को देखने के लिए श्रद्धालु सड़कों के किनारे जमा होते हैं.
१९७९ में इसी जुलूस को एक खास सम्प्रदाय के आराधना स्थल के सामने काफी देर तक प्रदर्शन किया गया. सभी भक्त अपने करतब दिखलाने में इतने मशगूल हो गए कि उन्हें समय का पता ही न चला और एकाध पत्थर के टुकड़े भीड़ पर आ गिरे. दंगा के लिए इससे ज्यादा और क्या चाहिए. उस साल के बाद से इस जुलूस के दिन में प्रशासन की तरफ से परिवर्तन कर दिया गया. अब झंडा का जुलूस नवमी के बजाय दशमी को निकलने लगा. उस दिन शुबह से ही चाक चौबंद ब्यवस्था होने लगी. भीड़ को नियंत्रण करने के लिए जगह जगह बैरिकेड लगाये जाने लगे. वाहनों की नो इंट्री भी लागू हो गयी. सभी ब्यावसायिक संस्थान को बंद कर आकस्मिक सेवाओं को चालू रक्खा गया. अपराधियों को धड़-पकड़ के साथ दोनों समुदायों के बीच शांति समितियां बनाकर, विशिष्ट जनों को बुलाकर विशेष हिदायतें और निर्देश दिए गए ताकि माहौल शांति और सद्भावपूर्ण बना रहे.
परिणाम स्वरुप अब तो तमाम स्वयं सेवी संस्थाओं के साथ दूसरे समुदाय के लोग भी इस भयंकर गर्मी में शरबत पानी लेकर खड़े दिखते हैं और भक्त जनों की प्यास को शांत करने का हर संभव प्रयास करते हैं. इस साल लगभग २१० छोटे बड़े झंडों के साथ अखाड़ों का प्रदर्शन हुआ. विभिन्न अखाड़ा समितियों ने भव्य शोभायात्राएं निकालीं. शक्ति, सामंजस्य और सौहार्द्रपूर्ण वातावरण में धवज को निश्चित मार्ग से घुमाते हुए पास की नदी स्वर्णरेखा या खरकाई या किसी पास के सरोवर में विसर्जित कर दिया गया. प्रशासन की चुस्त ब्यवस्था ने कुछ भी अनिष्ट होने से बचा लिया. प्रशासन की चुस्ती से सबकुछ शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो गया. आखिर यह मुख्य मंत्री रघुबर दास का शहर है और टाटा स्टील का प्रशासन भी हर घटना से निबटने को तैयार रहता है. उम्मीद की जानी चाहिए कि जमशेदपुर में सभी कार्यक्रम इसी तरह शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो जायेंगे और अमन-चैन के साथ भाईचारा भी बना रहेगा. जय बजरंगबली! जय श्रीराम! जयहिंद!
-    - जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

No comments:

Post a comment