Saturday, 22 April 2017

ऐसा भी एक किसान आन्दोलन!

वरिष्ठ पत्रकार और टी वी एंकर श्री रविश कुमार के शब्दों में- “लोकतंत्र की हम जब भी बात करते हैं, हमारा ध्यान राजनीतिक दल और उनके नेताओं की तरफ ही जाता है. स्वाभाविक भी है. लेकिन आप यह भी देख सकते हैं कि जब चुनाव समाप्त हो जाता है तो वो कौन लोग हैं जो आवाज़ उठाने का साहस करते हैं, सत्ता से सीधे टकराते हैं. राजनीति से निराश होते वक्त भी हम इनकी तरफ नहीं देखते. हो सकता है कि हमें ये लगता हो कि लाठी खाते शिक्षकों से हमारा क्या लेना देना, फीस वृद्धि की मार सहने वाले मां-बाप से हमारा क्या लेना, रोज़गार की मांग करने वालों से हमारा क्या. हालांकि आप इन सबमें होते हैं लेकिन देखने और सोचने की ट्रेनिंग ऐसी हो गई है कि पार्टी के बाहर आप किसी को नेता की तरह देखते ही नहीं हैं. हम सब यह मान चुके हैं कि लोकतंत्र के लिए संघर्ष राजनीतिक दलों के मुख्यालयों से ही होता है”. कुछ साल पहले जब रामलीला मैदान में दिन-रात सत्याग्रह चल रहा था तब नर्मदा नदी में कुछ किसान जल सत्याग्रह करने उतर गए. 213 लोगों ने 32 दिनों तक कमर भर पानी में खड़े होकर प्रदर्शन किया था. उनके पांव खराब हो गए थे. मीडिया और सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए आम लोगों को क्या-क्या करना पड़ रहा है. वे अपनी रचनात्मकता के ज़रिए इस लोकतंत्र को समृद्ध करते रहे हैं. कभी जीत जाते हैं, कभी हार भी जाते हैं.
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मार्च को तमिलनाडु से 134 किसान दिल्ली आए. तमिलनाडु में भयंकर सूखा है, 140 साल में ऐसा सूखा किसी ने नहीं देखा, मगर वहां के नेता सत्ता का खेल खेल रहे हैं. किसान मुआवज़े और कर्ज़ माफी की मांग को लेकर दिल्ली आए. मुश्किल से इनके बीच कोई हिन्दी बोलने वाला है. देखिए कि इन किसानों ने अपने प्रदर्शन को किस तरह से हर दिन एक नई ऊंचाई दी है. ये प्रदर्शनों की रचनात्मकता का दौर है. किसान नहीं ये असली कवि हैं.
स्टेशन से उतरते ही वहां छोटी मोटी सभा जैसी कर ली. सबको निर्देश दिया कि कहां जाना है, क्या करना है और फिर जंतर-मंतर के लिए चल दिए. जल्दी ही ये लोग हर दिन ख़ुद ही घटना बनने लगे. सबसे पहले खुद को अर्धनग्न किया. हाथ में कटोरा लिया और उस पर बेगर(begger) लिख दिया. आधे ढंके तन के साथ ये किसान कर्ज़ माफी की मांग करने लगे. इनके गले में नरमुंड की माला भी थी. इनका कहना था कि यह खोपड़ी उन किसानों की है जिन्होंने कर्ज़ से तंग आकर आत्महत्या कर ली है. 40 दिन से ये जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं. इन किसानों में 25 साल का नौजवान भी है और 75 साल के बुजुर्ग किसान भी.
दूसरे दिन दो किसान पेड़ पर चढ़ गए और फांसी लगाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने समय रहते इस घटना को रोक दिया. तीसरे दिन किसानों ने अपने कपड़े उतार दिए और पत्तों से शरीर को ढंक लिया. चौथे दिन पूरे शरीर को पेंट कर लिया. छठे दिन वे रुद्राक्ष की माला पहनकर प्रदर्शन करने लगे. सातवें, आठवें और नौंवे दिन इन्होंने कुछ अलग नहीं किया. जंतर मंतर पर ही प्रदर्शन करते रहे. 10 वें दिन सुप्रीम कोर्ट तक लंगोट में पदयात्रा की, 11 वें दिन जंतर मंतर पर कुत्ता बन गए और भौंककर प्रदर्शन करने लगे. 12 वें दिन एक किसान लाश बन गया, किसान लाश के आसपास बैठकर घंटा बजाने लगे, रोने लगे,लाश बने किसान की शवयात्रा भी निकाली. 13 वें दिन रो-रोकर प्रदर्शन करने लगे. 14 वें दिन दिल्ली रेलवे स्टेशन गए और वहां से चूहे पकड़कर ले आए. पटरियों पर दौड़ते चूहों को पकड़ना और उन्हें लेकर आना और फिर दांत से दबाना. तमाम मंत्रियों के दफ्तर भी गए, तमिलनाडु से मोदी सरकार में मंत्री भी आए, राहुल गांधी भी गए और बहुत से सामान्य लोग भी गए. इनका कहना है कि कुछ हो जाए, दिल्ली से लड़ाई जीतकर जाएंगे. इनका कहना है कि अगर सरकार ट्रेन में बिठा देगी तो चेन खींच देंगे, फिर भी उतरने नहीं देगी तो चलती ट्रेन से कूद जाएंगे. अब तो इन किसानों का कहना है कि वे पेशाब पीने जा रहे हैं.
उन्होंने जंतर मंतर पर एक नाटक भी खेला. इसमें प्रधानमंत्री को चाबुक मारते हुए दिखाया गया और किसान गांधी का मुखौटा पहनकर ज़मीन पर कोड़ा खाते रहे और मदद मांगते रहे. यह उनके प्रदर्शन का 15 वां दिन था. 16 वें दिन सांप का मांस खाया. 17 वें दिन काले कपड़े से सर और आंख को ढंक लिया. 18 वें दिन कटोरा लेकर भिखारी बन गए. 19 वें दिन आधा सर और आधी मूंछ मुंडवा ली. 21 वें दिन पूरी मूंछ साफ कर दी और 22 वें दिन सर के बल खड़े हो गए.
इस आंदोलन का नेतृत्व 70 साल के एक वकील कर रहे हैं. इनका कहना है कि ये पिछले साल भी दिल्ली आए थे. तमिलनाडु के किसानों की व्यथा बताई थी मगर किसी ने परवाह नहीं की. वे ज़रूर दिल्ली में प्रदर्शन कर रहे हैं मगर तमिलनाडु की राजनीतिक गतिविधियों को देखकर नहीं लगता कि वहां के विधायकों या सरकार को किसानों की चिंता है.  24 वें दिन इन किसानों ने कपड़े से खुद को ढंक लिया. 25 वें दिन एक आदमी प्रधानमंत्री बन गया और किसान अपनी हथेली काटकर खून उनके चरणों में अर्पित करने लगा. 26 वें दिन भूख हड़ताल की. 27 वें दिन गले में फांसी डालकर प्रदर्शन करने लगे. 28 वें और 29 वें दिन इनका प्रदर्शन झकझोर देने वाला रहा. किसी ने कल्पना नहीं की थी कि प्रधानमंत्री कार्यालय में अपना ज्ञापन देकर लौटते वक्त ये निर्वस्त्र हो जाएंगे और प्रदर्शन करने लगेंगे.
जैसे-जैसे दिन गुजरा इन किसानों की ज़िद बढ़ती गई. चालीस हज़ार करोड़ की मदद राशि की मांग है इनकी. किसी भी सरकार के लिए मुश्किल है. केंद्र सरकार ने भी 2000 करोड़ से अधिक की मदद का एलान तो किया ही है मगर चालीस हज़ार करोड़ वह दे सकेगी, हम अंदाज़ा तो कर ही सकते हैं. 29 वें दिन इन्होंने जो किया वो और भी मुश्किल था. खुली सड़क पर चावल को चादर की तरह बिछा दिया. उस पर दाल डालकर खाने लगे. 30 वें दिन उन्होंने जिस शरीर को भाषा में बदला था, उसी की छाती और पीठ पर मांग लिख दी. 31 वें दिन की जानकारी नहीं है हमारे पास. 32 वें दिन इन किसानों ने साड़ी पहनकर प्रदर्शन किया. इन किसानों ने बताया कि एक किसान ने पत्नी का मंगलसूत्र गिरवी रखकर कर्ज़ लिया था. लोन नहीं चुका पाया तो साहूकार मंगलसूत्र ले गया. इस सीन को किसानों ने जंतर मंतर पर दोहराया. धागे के मंगल सूत्र पहनकर प्रदर्शन करने लगे.
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार राज्य के सहकारिता बैंकों से लिए गए 5,780 करोड़ के कर्ज़ वहां की सरकार ने माफ कर दिए हैं. हाईकोर्ट ने भी कहा है कि तमिलनाडु के किसानों का कर्ज़ माफ होना चाहिए. पिछले साल यहां 170 मिलीमीटर बारिश हुई जबकि औसतन 437 मिलीमीटर बारिश होती है. 80 फीसदी किसान, छोटे किसान हैं. 34 वें दिन किसान औरत बन गए, चूड़ी तोड़कर प्रदर्शन करने लगे. 37 वें दिन किसानों ने फटा हुआ कुर्ता पहन लिया.
हम कह सकते हैं कि किसानों के इन प्रदर्शनों में अतिवाद है, विचित्रता भी हैं, लेकिन यह भी तो देखिए कि आम किसान अपनी बात को लेकर कैसे लड़ रहा है. लड़ने के लिए किन-किन तरीकों को ईजाद कर रहा है. जंतर मंतर पर ही उनका घर बस गया है. मांग पूरी होने तक जाने वाले नहीं हैं इसलिए वहीं रात बिताते हैं, वहीं खाना बनाते हैं. आसपास से लोग मदद भी करने आ रहे हैं. कोई आर्थिक मदद कर रहा है तो कोई नैतिक मदद दे रहा है. लेकिन इनके प्रदर्शनों में कोई ज़ोर शोर से शामिल नहीं है. नेता मंत्री गए हैं मगर जाने की औपचारिकता दर्ज हो, उतने भर के लिए गए हैं. किसान चक्रव्यूह में फंसे हैं. ऐसा नहीं है कि सरकारें कुछ नहीं करती हैं लेकिन उनका करना काफी नहीं है. किसानों ने जो रचनात्मकता दिखाई है उससे उनकी बेचैनी समझ में आती है. कुछ लोग निंदा भी कर रहे होंगे कि इतना अतिवाद क्यों. कई बार करुणा दिखानी चाहिए. समझने की कोशिश करनी चाहिए कि क्यों कोई मुंह में चूहा दबा रहा है, ज़मीन पर दाल-भात बिछाकर खा रहा है. वो क्या कहना चाहता है, क्या पाना चाहता है. ऐसी ही ज़िद और रचनात्मकता चाहिए किसानों को अपनी समस्या से निकलने के लिए. प्रदर्शन के लिए भी और खेती के तौर तरीके बदल देने के लिए भी.... इसमे मेरा कुछ भी नहीं है, मात्र संकलन है- ध्यानाकर्षण के लिए मात्र आप सबने जरूर देखा सुना होगा. इस देश का जय जवान! जय किसान! नारा भी सुना ही होगा .....

- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर 

1 comment:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व पृथ्वी दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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