Tuesday, 29 March 2016

बाबा भीमराव आंबेडकर की प्रासंगिकता

पिछले कुछ दिनों या कहें तो गत सालों में बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर पर खूब चर्चा हुई। यूं तो भारतीय संविधान के निर्माता और दलितों के मसीहा को १९९० में ही भारतरत्न सम्मान से सम्मानित किया गया था। दलितों के नाम से बनी बहुजन समाजवादी पार्टी के आदर्श पुरुष तो हैं ही और भी दलितों के नाम से राजनीति करने वाली पार्टियाँ उनका नाम बड़े आदर के साथ लेती है। वर्तमान मोदी सरकार ने उनके सम्मान में दिसम्बर माह में १० रुपये और १२५ रुपये के सिक्के जारी किये। नवम्बर में संविधान दिवश के अवसर पर भी बाबा साहब पर जम कर चर्चा हुई और सभी पार्टियों ने उन्हें अपना आदर्श माना।
प्रधानमंत्री मोदी ने २१ फरवरी को भीमराव अंबेडकर नेशनल मेमोरियल का शिलान्यास किया। पीएम मोदी ने कहा, ‘मुझे बाबा साहेब के सपने पूरे करने का अवसर मिला है। वह हमें 1956 में छोड़ गए थे। 60 साल के बाद उनका मैमोरियल बनाया जा रहा है। मुझे पता नहीं हम इसके बारे में क्या कहेंगे, लेकिन 60 साल बीत गए। शायद यह काम मेरे नसीब में था। मैं इस उद्घाटन 14 अप्रैल 2018 में करूंगा।’ उन्हों।ने कहा- ‘मुझे याद है कि जब वाजपेयी जी की सरकार बनी तो चारों तरफ हो-हल्ला मचा कि ये भाजपा वाले आ गए हैं, अब आपका आरक्षण खत्म होगा।’ एमपी, गुजरात में कई सालों से बीजेपी राज कर रही है। महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा में हैं। हमें दो तिहाई बहुमत से अवसर मिला। लेकिन कभी भी दलित, पीड़ित के आरक्षण को खरोंच नहीं आने दी। फिर भी झूठ बोला जाता है।’ पीएम मोदी ने कहा कि बाबा साहब ने तो राष्ट्र निष्ठा की प्रेरणा दी थी, लेकिन कुछ लोग सिर्फ राजनीति चाहते हैं। उन्हों ने आगे कहा कि बाबा साहेब को दलितों का मसीहा बताकर अन्याय करते हैं। उन्हें सीमित न करें। वे हर वर्ग के शोषित, कुचले, दबे लोगों की आवाज बनते थे। प्रधानमंत्री ने कहा कि बाबा साहेब को सीमाओं में न बांधे। उन्हें विश्व मानवीयता के रूप में देखें। दुनिया मार्टिन लूथर किंग को जिस तरह देखती है, उसी तरह हमारे लिए बाबा साहेब अंबेडकर हैं। पीएम ने कहा- ‘जिसका बचपन अन्याय, उपेक्षा, उत्पीड़न में बीता हो। जिसने अपनी मां को अपमानित होते देखा हो, मुझे बताइए वह मौका मिलते ही क्या करेगा? वह यही कहेगा कि तुम मुझे पानी नहीं भरने देते थे, तुम मुझे मंदिर नहीं जाने देते थे, तुम मेरे बच्चों को स्कूल में एडमिशन नहीं लेने देते थे।’

बसपा प्रमुख सुश्री मायावती के अनुसार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार सफ़ाई दे रहे है कि आरक्षण को कोई छीन नही सकता है लेकिन इन लोगों पर विश्वास नही किया जा सकता है। वास्तव में यह सब भी उसी प्रकार की जुमलेबाजी लगती है जैसा कि उन्होंने विदेशों से काला धन देश में वापस लाकर हर भारतीय के अकाउंट में 15-15 लाख डालकर उनके ‘अच्छे दिन’ लाने का वादा किया था। अब उसी संकीर्ण मानसिकता वाले लोग आरक्षण की इस व्यवस्था में कमियां निकालकर इसकी समीक्षा की अनुचित जातिवादी बातें कर रहे हैं।सुश्री मायावती ने कहा कि इसमें आरएसएस और भाजपा की कट्टर हिन्दुत्ववादी विचारधारा साफ झलकती है। ऐसी मानसिकता वाले लोगों को दलितों और अन्य पिछडों से माफी मांगनी चाहिये। अपनी सरकार की विफलताओं पर पर्दा डालने के लिये साम, दाम, दण्ड, भेद हथकण्डों को अपनाया जा रहा है। इन हथकण्डों में बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के नाम पर स्मारक और संग्रहालय आदि की घोषणा करके उन्हें अनेकों प्रकार से बरग़लाने का काम भी शामिल है।
बात यह है कि भाजपा की सहयोगी संगठन आरएसएस की तरफ से बयान आते हैं कि आरक्षण की समीक्षा की जानी चाहिए, तभी प्रधान मंत्री को स्पष्टीकरण देना पड़ता है और दूसरी पार्टियाँ हो-हल्ला करती हैं। जैसे कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला की आत्म हत्या के बाद से जो स्थिति बनी. मानव संशाधन विकास मंत्री को संसद में अपना बचाव करना पड़ा। JNU के कन्हैया कुमार भी रोहित वेमुला और बाबा साहब आंबेडकर को अपना आदर्श बता चुके हैं। प्रधान मंत्री को भी अपने भाषण में रोहित वेमुला का नाम लेते वक्त भावुकता का प्रदर्शन करना पड़ा. केजरीवाल और राहुल गांधी भी हमदर्दी जाता चुके हैं. सवाल यही है कि बाबा साहेब किनके किनके आदर्श पुरुष हैं अगर वे सबके लिए आदर्श हैं तो उनके द्वारा किये गए प्रयासों का प्रतिफल अभी तक क्या है? क्या अभी भी दलित सताए नहीं जा रहे हैं? उनके आरक्षण पर सवाल नहीं उठाये जा रहे हैं? मोहन भागवत ने कहा कि संपन्न लोगों को स्वेक्षा से आरक्षण का लाभ छोड़ देना चाहिये। उनकी इस घोषणा के बाद एक नेता सिर्फ जीतन राम मांझी ने यह घोषणा की कि वे अब आरक्षण का कोई लाभ नही लेंगे। अच्छी बात है, अभी वे और उदित राज जी भाजपा के साथ हैं इसलिए भाजपा की पार्टी लाइन के साथ चल रहे हैं। कब ये अलग हटकर अपनी विचारधारा बदल लेंगे कहना मुश्किल है क्योंकि अभी उन्हें सभी सुविधाएँ प्राप्त है।

डॉ॰ भीमराव रामजी अंबेडकर (१४ अप्रैल १९९१- ६ दिसंबर १९५६) एक विश्व स्तर के विधिवेत्ता थे। वे एक बहुजन राजनीतिक नेता और एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी होने के साथ साथ, भारतीय संवोधन के मुख्य शिल्पकार भी थे। वे बाबासाहेब के नाम से लोकप्रिय हैं। इनका जन्म एक गरीब अस्पृश्य परिवार मे हुआ था। एक अस्पृश्य परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें सारा जीवन नारकीय कष्टों में बिताना पड़ा। बाबासाहेब आंबेडकर ने अपना सारा जीवन हिन्दू धर्म की चतुर्वर्ण प्रणाली और भारतीय समाज में सर्वव्यापित जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। हिंदू धर्म में मानव समाज को चार वर्णों में वर्गीकृत किया है। जो इस प्रकार है- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। शूद्रों को उनसे उच्च वर्ग के लोग अत्यधिक कष्ट देते थे। बाबा साहब ने इस व्यवस्था को बदलने के लिए सारा जीवन संघर्ष किया। इस लिए उन्होंने बौद्ध धर्म को ग्रहण करके इसके समतावादी विचारों से समाज में समानता स्थापित कराई। उन्हें बौद्ध आन्दोलन को प्रारंभ करने का श्रेय भी जाता है। चूँकि वे विश्व की एक बहुत बड़ी आबादी के प्रेरणा स्रोत हैं, इस लिए उन्हें विश्व भूषण कहना ही उपयुक्त है।
कई सामाजिक और वित्तीय बाधाएं पार कर, आंबेडकर उन कुछ पहले अछूतों मे से एक बन गये जिन्होने भारत में कॉलेज की शिक्षा प्राप्त की। आंबेडकर ने कानून की उपाधि प्राप्त करने के साथ ही विधि, अर्थशास्त्र वा राजनीति शास्त्र में अपने अध्ययन और अनुसंधान के कारण कोलंबिया विश्वविद्यालय आयर लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से कई डॉक्टरेट डिग्रियां भी अर्जित कीं। आंबेडकर वापस अपने देश एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप में लौट आए और इसके बाद कुछ साल तक उन्होंने वकालत का अभ्यास किया। इसके बाद उन्होंने कुछ पत्रिकाओं का प्रकाशन किया, जिनके द्वारा उन्होंने भारतीय अस्पृश्यों के राजनैतिक अधिकारों और सामाजिक स्वतंत्रता की वकालत की। डॉ॰ आंबेडकर को भारतीय बौद्ध भिक्षुओं ने बोधिसत्व की उपाधि प्रदान की है, हालांकि उन्होने खुद को कभी भी बोधिसत्व नहीं कहा।
अपनी जाति के कारण उन्हें इसके लिये सामाजिक प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा था। स्कूली पढ़ाई में सक्षम होने के बावजूद आंबेडकर और अन्य अस्पृश्य बच्चों को विद्यालय मे अलग बिठाया जाता था और अध्यापकों द्वारा न तो ध्यान ही दिया जाता था, न ही कोई सहायता दी जाती थी। उनको कक्षा के अन्दर बैठने की अनुमति नहीं थी, साथ ही प्यास लगने परद कोई ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके हाथों पर पानी डालता था, क्योंकि उनको न तो पानी, न ही पानी के पात्र को स्पर्श करने की अनुमति थी। लोगों के मुताबिक ऐसा करने से पात्र और पानी दोनों अपवित्र हो जाते थे। आमतौर पर यह काम स्कूल के चपरासी द्वारा किया जाता था जिसकी अनुपस्थिति में बालक आंबेडकर को बिना पानी के ही रहना पड़ता था।
छुआछूत के विरुद्ध संघर्ष – अम्बेडकर ने दलितों और अन्य धार्मिक समुदायों के लिये पृथक निर्वाचन और आरक्षण देने की वकालत की। १९२० में, बंबई में, उन्होंने साप्ताहिक मूकनायक के प्रकाशन की शुरूआत की। यह प्रकाशन जल्द ही पाठकों मे लोकप्रिय हो गया, तब, अम्बेडकर ने इसका इस्तेमाल रूढ़िवादी हिंदू राजनेताओं व जातीय भेदभाव से लड़ने के प्रति भारतीय राजनैतिक समुदाय की अनिच्छा की आलोचना करने के लिये किया। दलित वर्गों में शिक्षा का प्रसार और उनके सामाजिक आर्थिक उत्थान के लिये काम करना था। सन् १९२६ में, वो बंबई विधान परिषद के एक मनोनीत सदस्य बन गये। सन १९२७ में डॉ॰ अम्बेडकर ने छुआछूत के खिलाफ एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का फैसला किया। उन्होंने सार्वजनिक आंदोलनों और जुलूसों के द्वारा, पेयजल के सार्वजनिक संसाधन समाज के सभी लोगों के लिये खुलवाने के साथ ही उन्होनें अछूतों को भी हिंदू मंदिरों में प्रवेश करने का अधिकार दिलाने के लिये भी संघर्ष किया। यह संघर्ष आज भी जारी है।
तात्पर्य यही है कि जबतक दबे कुचले, अस्पृश्यों के प्रति सहानुभूतिपूर्वक न्याय नहीं किया जाता, बाबा साहेब की प्रासंगिकता बनी रहेगी। – जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

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