Sunday, 22 February 2015

माझी जो नाव डुबाए उसे कौन बचाए….



२० फरवरी को विधानसभा में शक्ति परीक्षण से ठीक पहले बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने राजभवन जाकर इस्तीफ़ा दे दिया। मांझी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसकी औपचारिक घोषणा की। मांझी के इस्तीफे के बाद बिहार विधानसभा अनिश्चित काल तक के लिए स्थगित कर दी गई। २० फरवरी से ही विधानसभा में बजट का सत्र शुरू होना था। राज्यपाल श्री केशरी नाथ त्रिपाठी ने मांझी का इस्तीफा मंजूर कर लिया है।
राजभवन पहुंचे नीतीश कुमार ने पत्रकारों से कहा कि इस चीज का फैसला पहले हो जाना चाहिए था, ताकि बजट सत्र सुचारू रूप से चल सके। उन्होंने कहा कि राज्यपाल के अभिभाषण से ठीक पहले यह किया गया। इसके साथ ही नीतीश ने कहा कि इससे बीजेपी का गेमप्लान एक्सपोज हुआ है।
उधर, बीजेपी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने नीतीश के आरोपों को गलत बताया है और कहा कि इस घटनाक्रम में बीजेपी का कोई रोल नहीं है। आरजेडी नेता लालू प्रसाद यादव ने कहा है कि मांझी को बीजेपी के साथ नहीं जाना चाहिए। उन्होंने मांझी को नीतीश के साथ मिलकर काम करने की सलाह भी दी है।
राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी के अभिभाषण के बाद मांझी को बहुमत साबित करना था, लेकिन संख्याबल नहीं होने की वजह से इस्तीफा दे दिया था। मांझी के साथ बीजेपी के 87 विधायकों के अलावा जेडी(यू) के 13-14 विधायक थे। बीजेपी ने गुरुवार(१९ फरवरी) को ही मांझी के समर्थन में वोट डालने का फैसला किया था।
अब नीतीश कुमार २२ तारीख को चौथी बार बिहार के मुख्य मंत्री के रूप में शपथ ले लिया है. इस शपथ ग्रहण समारोह में भाजपा के खिलाफ एक जुट होकर भाजपा को हराने के लिए सभी क्षेत्रीय पार्टियों के प्रमुख ममता बनर्जी, बाबूलाल मरांडी, यह दी देवगौड़ा, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, तरुण गोगोई के साथ जीतनराम मांझी भी शामिल हुए. नीतीश जी के मंत्रिमंडल की टीम लगभग वही लोग है जो जीतन मांझी के टीम में थे. उम्मीद है की बिहार फिर से पटरी पर दौड़ेगा. विकास की तरफ उन्मुख होगा.
२०१४ के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते बिहार में नीतीश कुमार के जे डी यु को सिर्फ दो सीटें मिली थी. हार की जिम्मेदारी लेते हुए नितीश कुमार ने मुख्य मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था और एक महादलित समाज से आने वाले जीतन राम मांझी को मुख्य मंत्री मनोनीत किया था. कुछ दिन वे नीतीश कुमार के बिश्वास पात्र बने रहे, पर बाद में (शायद भाजपा के बहकावे में आकर) अपनी ताकत दिखाने का प्रयास करने लगे. कुछ ऊटपटांग बयान भी देते रहे, जिसकी जमकर आलोचना भी हुई. फिर कुछ अपने राजनीतिक हित के खातिर कुछ कुछ घोषणाएं भी करने लगे, जिससे नितीश कुमार और उनके समर्थक नाराज होने लगे. उन्हें अपने नीचे की जमीन खिसकती हुई दिखाई पड़ने लगी. तब उन्होंने अपने समर्थन में १३० विधायकों को इकठ्ठा किया और उन्हें लेकर राज्यपाल और राष्ट्रपति के सामने परेड भी करा दिया. वे चाहते थे कि राज्यपाल महोदय मांझी को बर्खाश्त कर उन्हें यानी नितीश कुमार को फिर से नयी सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करें, पर राजभवन और पटना हाई कोर्ट भी नियमों का हवाला देता रहा. अंत में राज्यपाल महोदय ने मांझी को अपना बहुमत साबित करने के लिए २० फरवरी की तिथि निश्चित की. मांझी अपने बहुमत का दावा करते रहे पर उन्हें अंदाजा हो गया कि बहुमत उनके साथ नहीं है, इसलिए विधान सभा में बिश्वास मत साबित करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया.
इधर नितीश कुमार ने अपना इस्तीफ़ा देकर जीतन राम मांझी को मुख्य मंत्री बनाने की गलती स्वीकार कर ली और बिहार की जनता से सार्वजनिक रूप से बार बार माफी मांग ली है. अरविन्द केजरीवाल ने भी दिल्ली की जनता से माफी मांगी और जनता ने उन्हें माफ़ ही नहीं किया बल्कि प्रचंड बहुमत देकर फिर से सत्ताशीन किया. अब देखने वाली बात यह होगी कि बिहार की सियासत किस करवट मोड़ लेती है. यहाँ भाजपा विरोधी पार्टियाँ इकठ्ठा हो रही हैं. भाजपा की कूटनीति फिर एक बार मात खा गयी है. अंतिम फैसला तो जनता की अदालत में ही होना है, तब तक(लगभग आठ महीने का समय) नीतीश कुमार को मिल जाएगा, अपनी छवि को बेहतर बनाने के लिए. भाजपा और श्री जीतन राम मांझी ने यहाँ महादलित कार्ड खेलने की कोशिश की है. कुछ महादलितों में अपनी पैठ बनाई भी है. यह बात जग जाहिर है कि बिहार में जातिगत आधार पर ही मतदान होते हैं और लालू, नितीश यहाँ तक कि भाजपा भी यहाँ विभिन्न जातियों को ही भुनाती रही है…. अभी तक.
बिहार के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद जीतन राम मांझी द्वारा लगाए गए आरोपों का जवाब देते हुए पूर्व सी. एम. नीतीश कुमार ने कहा कि मैंने कभी भी सरकार के कामकाज में दखल नहीं दिया। उन्होंने कहा- ‘एक बार फिर बिहार की जनता की सेवा करूंगा और उसी तेवर के साथ करूंगा जैसा कि इससे पहले साढ़े आठ साल करता रहा था।‘ उन्हें राज्यपाल महोदय से निमत्रण मिल चुका है और २२ तारीख को शपथग्रहण समारोह होने जा रहा है.(आलेख छपने तक शपथ ग्रहण हो चुका होगा)
मांझी के इस्तीफे के बाद बुलाई गई जेडी(यू) विधायकों की बैठक के बाद नीतीश ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि भावना में आकर मैंने आठ महीने पहले इस्तीफा दे दिया था, इसके लिए मैं बिहार की जनता से हाथ जोड़कर माफी मांगता हूं। उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाते हुए कहा कि पूरी स्क्रिप्ट बीजेपी की तरफ से लिखी गई थी और उसका गेमप्लान बेनकाब हो गया है। नीतीश ने कहा कि हमारी पार्टी की चट्टानी एकता की वजह से मांझी पहले ही मैदान छोड़कर भाग गए। उन्होंने कहा कि मांझी अब जाति कार्ड खेल रहे हैं, जबकि इतना बड़ा सम्मान उन्हें पार्टी ने ही दिया था।
नीतीश ने कहा कि बीजेपी जुगाड़ से सरकार बनवाना चाहती थी. इससे पहले बिहार विधानसभा में विश्वास मत के दौरान हार के आसार साफ तौर पर देख रहे मांझी ने यह कहते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया कि उनके समर्थकों को जान से मारने की धमकी दी गई और वह नहीं चाहते थे कि विधानसभा से उनके समर्थक विधायकों की सदस्यता समाप्त हो। मांझी ने अपने घर पर संवाददाताओं को बताया, ‘जब यह स्पष्ट हो गया कि किसी और के कहने पर काम कर रहे विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी विश्वास मत के दौरान गुप्त मतदान की अनुमति नहीं देंगे तो मैंने सोचा कि अपने समर्थक विधायकों को खतरे में डालना उचित नहीं होगा और फिर मैंने इस्तीफा दे दिया।’
मांझी ने दावा किया अगर आज भी गुप्त मतदान हो, तो उनके पास मौजूद बहुमत का पता चल जाएगा। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री बनने के बाद दो-तीन महीने तक वह सिर्फ उनके पास भेजे गए फाइलों पर ही हस्ताक्षर करते रहे और कुंठित रहे, लेकिन लोगों द्वारा रबर स्टांप मुख्यमंत्री कहे जाने पर उनका स्वाभिमान जागा और खुद निर्णय लेना शुरू किया, जिसके बाद पैसे के लिए काम करने वाले लोग नाराज हो गए।
उन्होंने कार्यकाल के दौरान कई काम पूरे नहीं कर पाने पर भी अफसोस जाहिर किया। मांझी ने कहा, ‘मैं समाज के हर तबके के लिए काम करना चाहता था, कुछ तो काम किया, लेकिन बहुत कुछ नहीं कर पाया।’ उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद पर भी निशाना साधते हुए कहा, ‘पहले वह भी मांझी को परेशान नहीं करने की बात करते थे, लेकिन पिछले 10-15 दिन से न जाने क्या हो गया कि वह भी चुप हो गए।’
अब देखने वाली बात यह होगी कि मांझी का अगला रुख क्या होता है, वे जे डी यु में ही रहते हैं, भाजपा में जाते हैं या अलग पार्टी बनाने की घोषणा करते हैं. उनकी हालत सांप छुछूंदर वाली हो गयी है. जिस पार्टी और उसके मुखिया ने उन्हें सम्मान दिया वे उसी की खिलाफत में लग गए और अंत में गच्चा खा गए. अगर वह भी समयानुसार अपनी भूल सुधारकर पार्टी के साथ बने रहते हैं तो सबका भला होगा पर अगर अलग हो जाते हैं तो नीतीश जी के लिए थोड़ा मुश्किल हो सकता है. लालू यादव तथा अन्य पार्टियां जो अभी उन्हें समर्थन दे रही है अपना कीमत भी वसूल करना चाहेगी. मांझी गुट अगर भाजपा के साथ हो जाता है तो भाजपा को भविष्य में फायदा हो सकता है. यह समय बतलायेगा. पर भाजपा को ऐसे तिकड़मों से बचना चाहिए ताकि मोदी और अमित शाह की वर्तमान छवि में इजाफा हो. अभी तो वे लोग दिल्ली की हार से उबर नहीं पाये हैं. बल्कि अपने अंदर ही दबी जुबान में विरोध का सामना कर रहे हैं. राजनीत गजब चीज है!… यहाँ कब किसको कौन और कहाँ पटखनी दे दे, कहना मुश्किल है. इसीलिये ज्यदातर राजनीतिक व्यक्ति अपने परिवार वालों को ही उत्तराधिकारी बनाते हैं. लालूजी जेल जाने से पहले अपनी पत्नी राबडी देवी को अपना उत्तराधिकारी बनाया था. मुलायम सिंह यादव अपने बेटे अखिलेश सिंह को उत्तर प्रदेश की जागीर सौंप चुके है. झाड़खंड के गुरूजी शिबू सोरेन ने अपने बेटे हेमंत सोरेन को अपना उत्तराधिकारी बनाया है. नेहरु खानदान से हम सभी परिचित हैं ही. अर्थात इस प्रजातंत्र में भी अप्रत्यक्ष रूप से राजतन्त्र ही हावी रहता है. 
- जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर 

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