Sunday, 20 April 2014

आज कोयल फिर बोली है....

आज कोयल फिर बोली है
कर्ण में मिश्री घोली है
शुबह शुबह जब किरणे निकली
कोयल आम्र तरु पर छिप ली
ई कोइली भी भीषण काली
मगर निराली बोली है, आज कोयल फिर बोली है
शुबह शुबह जब मन अलसाये
बिस्तर उपर पसीना छाये
बिना चाय के नींद न टूटे
पत्नी नई नवेली है, आज कोयल फिर बोली है
कर्कश बाणी टी वी लागे,
पक्ष विपक्ष को गोली दागे
मोदी केजरी राहुल लालू
जहर सभी ने घोली है, आज कोयल फिर बोली है.
पुरवाई जब तन में लागी,
सैंया संग गुजरिया भागी
छुप कर प्रीत निभाती पी सँग
आखिर नयी नवेली है,.आज कोयल फिर बोली है
कवि को कोयल खूब छकाती
पत्तों बीच कभी छुप जाती
आम्र मंजरी का रस लेकर
मादकता संग खेली है …आज कोयल फिर बोली है

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