Sunday, 1 December 2013

नारी सशक्तीकरण- जागृति ही बचाव है!

दामिनी, निर्भया, गुड़िया, सोनाली, गीतिका, मधुमिता,  भंवरी देवी, रूपम पाठक,  अनुराधा बाली उर्फ़ फिजा, अपने माँ बाप द्वारा जघन्य मौत की शिकार आरुषी और अब उस पर फिल्म बनाने की बेशर्मी..... आदि के साथ जघन्य और क्रूरतम दरिन्दगी, कानून में बदलाव,  सजा का ऐलान, त्वरित अदालतें, ज्यादातर मामलों में अपराधी किश्म के विक्षिप्त नौजवान, कुछ रसूखदार राजनीतिक, गैर राजनीतिक, संत आशाराम जैसे लोग... पहले बचते, फिर फंसते, .... नारायण साईं जैसा, पहले अपने पिता का बचाव करते ... फिर स्वयम फंसने के बाद भूमिगत होना और कोर्ट द्वारा भगोड़ा  घोषित.....    
पुलिस अधिकारी के. पी. एस. गिल, नारायण दत्त तिवारी जैसे सम्मानित बुजुर्ग, अभिषेक मनु सिंघवी जैसे कांग्रेस नेता और अब सुप्रीम कोर्ट के सेवा निवृत न्यायाधीश ए. के, गांगुली,.. और ....तहलका के पत्रकार ५० वर्षीय तरुण तेजपाल, और ना जाने कितने... कितने लोग, कोई बच जाता, छिप जाता, सामने आता, दांत निपोरता, .... बेदाग़! आखिर तरुण तेजपाल स्टिंग ऑपरेशन के महारथी, पत्रकार से बने बड़े ब्यावसायी काफी दाँव-पेंच के बाद कानून के गिरफ्त में!
क्या हो गया है, इस देश को? ... नारियों की सम्मान की रक्षा में लंका दहन, रावण मरण से लेकर महाभारत की गाथा लिखने वाले आर्यावर्त के भारतवर्ष की क्या यही नियति बाकी रह गयी है. बहुत सारे लोग, बहुत सारे विद्वान और बहुत सारे तर्क! ....कुतर्क! ... प्राकृतिक और स्वाभाविक प्रक्रिया, नारी को भोग्या और उपभोग की वस्तु समझना, हमारे धर्मग्रंथों में भी उचित सम्मान नहीं, फिर नारी मुक्ति आन्दोलन, महिला आयोग! और कितनी संस्थाएं, अब ‘लिव इन रिलेशन’ को सही ठहराता सुप्रीम कोर्ट भी ... विवाह आदि सामाजिक संस्था को नकारना. धर्म और समाज से अलग नए समाज और उत्थान की कामना! और कितनी उच्छ्रिन्खलता, स्वच्छंदता के नए आयाम सृजित किये जायेंगे. विवाहेतर संबंधों की भी अतिशयता ...कोई दिशा निर्धारित नहीं...पल पल बदलते हालात...
मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता और यौन संबंधों के परत दर परत उघाड़ती, अबोधों को नि:शब्द करती, बी ए पास कराती फ़िल्में, टी. वी. सीरियल भी पीछे नही, टी. वी. का दिन प्रति दिन स्लिम होता स्क्रीन.... समाचारों के माध्यम से भी अश्लीलता को पड़ोसन की सोची-समझी साजिश ... भोंड़े विज्ञापन...  ‘अंकल’ शब्द को परिभाषित करने की नयी कोशिश ....उत्पाद को बेचने की नयी नयी विकसित कलाएं .... द्विअर्थी लोकप्रिय होते, फ़िल्मी गैर फ़िल्मी गाने .... कहाँ जा रहे है हमलोग!     
महिलाएं अब हर पेशे में अपनी महानता सिद्ध कर चुकी हैं, फिर भी वह प्राकृतिक रूप से कमजोर होने के कारण अपने ही सहयोगियों, वरिष्ठ अधिकारियों, सम्बन्धियों द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकार होती बेटियां, माताएं, बहनें ...जाय तो जाय कहाँ?. स्त्री और पुरुष एक दुसरे के पूरक एक बिना दूसरे की कल्पना करना ही असंभव ... दोनों को एक दूसरे की जरूरत, पर रजामंदी जरूरी ..क्यों एक तरफ़ा हमला,... ऐसा एकदम नहीं, कि हमेशा पुरुष ही हमलावर होता है, कभी कभी महिलाएं भी जुर्म करती या बदला लेतीं, कही चंद पैसों या अपनी महत्वाकांक्षा के आवेश में पड़कर, षड्यंत्र में शामिल होती.
इतना सब कुछ देखने, सुनने के बाद क्या जरूरत नहीं है, एक बड़े बहस की, सर्वमान्य और सर्वप्रिय मान्यता की? हम दूसरे के क्रिया कलाप देख... झेंपने, सकुचाने, शर्माने या मुंह छिपाने का असफल प्रयास करते दीख जाते हैं. जब तक यह दूसरों पर हो रहा होता है, हम मजा ले-ले कर सुनते सुनाते, देखते दिखाते ...पर अगर किसी अपने सगे संबंधी को भुक्त भोगी या लिप्त पाकर अपना होश नहीं खो बैठते हैं? डॉ. तलवार दंपत्ति ने भी होश खोया था... अब समाज के सामने खुद को बेदाग साबित करने की कोशिश ? रसूखदार लोग? बेटी से ज्यादा इज्जत की चिंता ....
घटनाएँ पहले भी घटती थी, पर ‘लोकलाज’ के डर से अधिकांशत: मामले दबा दिए जाते थे. पर अब महिलाएं, लड़कियां जागृत हो, मुखर होने लगी है, मीडिया या सहयोगियों का समर्थन पा अब अदालतों तक जाने लगी हैं. पर हमारी अदालतों का अत्यंत धीमा रफ़्तार, हजारों लाखों लंबित मुकदमे ... दिन प्रतिदिन होते सैंकड़ों अपराध जो थाने तक भी नहीं जाते..... थाने में भी दुर्व्यवहार! कई बार दूसरी महिलाएं भी इस तरह के वारदात में सहभागी, पत्नी, बेटी, सहकर्मी या अन्य के रूप में!
नहीं, नहीं... ऐसा नहीं होना चाहिए, नैतिक शिक्षा, यौन शिक्षा, संयम, योग, आदि को बुनियादी शिक्षा में शामिल करना होगा, समाज को दुरुस्त करना होगा. हम हमेशा दूसरों में दोष देखते हैं. अपने अन्दर झांकने की कोशिश कभी नहीं करते. एक फिल्म में दिखलाया गया था - समाज द्वारा घोषित बदचलन महिला को पत्थरों से मारे जाने की सजा, ...वहीं नायक सामने आता है और कहता है कि “पहला पत्थर वही मारे जिसने कभी पाप न किया हो” ...और सबके हाथ के पत्थर, हाथ से छूट नीचे गिर जाते हैं.
तात्पर्य यह कि हर व्यक्ति(अपवाद हो सकते हैं) कभी न कभी किसी न किसी अपराध में शामिल रहा है ... जो छिपा है, छिपा है ...पर कबतक? हम अपने को सुधारने का प्रयास नही करते और चाहते हैं पूरी दुनिया सुधर जाय, जबकि शुरुआत अपने आप से होनी चाहिए, अपने घर से होनी चाहिए.  सुख, संतोष आत्मसंतुष्टि की परिभाषा बदलनी होगी, तलाशने होंगे नए रास्ते जो नैतिकता के साथ बौद्धिकता को बढ़ाये और शिखर तक ले जाय .... सूर्य की भाँति, खुद जलकर दुनिया को रोशनी देने वाला.... कोई शंकराचार्य, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस .... हरि ॐ .....हरि ॐ हरि ......जय माँ काली, जय माँ दुर्गे, जय माँ शारदे! 

प्रस्तुति – जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर. 

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