Saturday, 2 March 2013

आस्था का आधार!

आस्था का आधार
आस्था ज्ञान के आधार के बिना किसी भी परिघटना के सत्य मानने का विश्वास है। अलौकिक शक्तियों- ईश्वर, देवदूत, असुर आदि- में अंधविश्वास प्रायः सभी धर्मों का अंग होता है। इस अर्थ में देखा जाय तो आस्था और अंधविश्वास के बीच कोई अंतर नहीं है।आस्था शब्द को अगर थोड़ा तोड़ा मरोड़ा जाय तो आश + था यानी पहले आशा थी, अब नहीं है!
अब क्यों नहीं है? क्योंकि अब मन चाहा नहीं होता तो क्या पहले होता था? जरूर होता होगा यह हमें अपने धर्म शास्त्रों से ज्ञात है!
मैं किसी एक धर्म की बात नहीं कर रहा हूँ, लगभग सभी धर्मों में यही बताया गया है कि ईश्वर हमारे सारे अपराध, पाप, माफ कर देता है अगर उसकी शरण में चला जाय तो.
अनेक धार्मिक आयोजन विश्व में कही पर भी होते हैं सभी या अधिकांश लोग भाग लेते हैं, तन मन और धन से यथा संभव!
लगभग सभी आयोजनों में कुछ न कुछ अघट घटनाएँ घट जाती हैं, जिनसे जान-माल की काफी क्षति होती है. एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर हम शांत भी हो जाते है, फिर संसार जैसे चलता है चलता ही जाता है. हम सब भूलकर नए दिन की शुरुआत भी कर लेते हैं. यह अंतहीन कभी न रुकनेवाला समय चक्र है जो चलता ही जाता है! कभी रुकने का नाम नहीं लेता!
महीनों तक चलनेवाला कुम्भ मेला लगभग समाप्त हो चला है, कुछ लोग शिवरात्रि तक मान रहे है और सभी स्तर के लोग उसी आस्था में डुबकी लगाकर अपने आपको कृतार्थ समझते हैं.
साधु-सन्यासी, नेता-राजनेता, अभिनेता-सिलेब्रिटी, कर्मचारी, ब्यापारी, कार्यरत-सेवामुक्त सभी एक ही आस्था रूपी डोर से बंधे/खिचे चले आते हैं. जो सकुशल लौट गए वे अपने आपको धन्य समझते हैं जो नहीं लौट सके, उनकी आत्मा धन्य हो जाती है! आखिर अंत में सबको तो वहीं पर जाना है, अगर धाम पर मृत्यु हुई तो क्या कहने! इन हादसों में अक्सर महिलाएं, बच्चे, और अशक्त लोग ही शिकार होते हैं, या शिकार होते हैं आम लोग शायद ही कोई ऐसा हादसा हुआ होगा, जिसमे कोई वी आई पी शिकार हुआ होगा! बशर्ते कि वह पूर्वनियोजित न हो! कल्पवास करनेवाले कहते हैं – यहाँ अजीब शांति महसूस होती है! जो जीवन भर नहीं मिला यहाँ पा लेते हैं! अलौकिक सुख! मुझे नहीं पता उन्होंने अपने द्वारा कमाए गए पैसों से ही यह सुख प्राप्त किया है, या दान के भरोसे! पर बहुत से भिखारियों का भी भला इन आयोजनों से हो जाता है, जो सरकारी कार्यक्रमों के जरिये लाभ लेने से वंचित रह जाते हैं.
केवल कुम्भ की ही बात क्यों करें मक्का में भी भगदड़ हुई है और अनेक लोग मारे गए हैं.
अब आते हैं इसके अलावा अन्य आयोजनों पर – आजकल धार्मिक समारोह सभी शहरों, नगरों, चौक चौराहे पर, बड़े बड़े पंडालों से लेकर, बड़े बड़े प्रेक्षा-गृहों में भी होने लगे हैं. सभी अधर्म पर धर्म की जीत, असत्य पर सत्य की जीत, अंधकार पर प्रकाश की जीत बतलाते हैं. यही एक ऐसा पेशा है, उद्योग है जिसमे कभी कोई नुक्सान नहीं होता! यहाँ मंच से किसी को भी गाली दी जा सकती है. उस गाली को प्रमुखता से दिखलाया भी जायेगा और छापा भी जायेगा. इसी बहाने आपको न जानने वाला भी जान जायेगा! सब कुछ होता है धर्म के नाम पर! नेता भी इन आयोजनों में बढचढ कर भाग लेते हैं, लाभ भी कमाते हैं.
कोई भी पर्व त्यौहार हो, अचानक फलों या पूजन सामग्रियों के दाम बढ़ जायेंगे. इसमे लाभ कमाने वाले तो तत्काल फल प्राप्त कर लेते ही हैं. “मज्जन फल पेखिय तत्काला, काक होंही पिक बकऊ मराला!”
प्रश्न यह है कि हम सभी इतने धर्मरत हैं, आस्थावान हैं फिर भी पाप क्यों नहीं रुकते? अधर्म का नाश क्यों नहीं होता?
एक और बात मन में उठती है, कुम्भ मेला महीनो तक चला या चल रहा है …इसमे कोई भी भयंकर हादसा न हुआ (छिट-पुट घटनाओं को छोड़कर). सोचिये अगर हैदराबाद का बम बिष्फोट कुम्भ नगरी में हुआ होता तो? …. यह भी एक चमत्कार ही कहा जायेगा, जहाँ नित्य करोड़ों लोग गंगा स्नान कर, मन के पाप को धोकर (कुछ समय के लिए ही सही) सही सलामत अपने घर वापस आ गये! ‘वे’ वहां का वृतांत सुनाते नहीं थकते हैं! ….लेटे हुए हनुमान जी का दर्शन! सरस्वतीकूप, शिव कुटी, भारद्वाज आश्रम, मनकामेश्वर मंदिर, शंकर विमान मंडपम, संगम स्थल आदि आदि दर्शनीय स्थल भी हैं जो धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व रखते हैं.
आलेख को ज्यादा लम्बा न करते हुए मैं सिर्फ यही कहना चाहता हूँ कि आस्था का आधार है! आप इसे जिस रूप में लें! सूर्य भगवान् पर्तिदिन उदित होते हैं और विश्व को प्रकाशित करते हैं. महान उर्जा का स्रोत जिनके उदित और अस्त होने का समय नियत है और उससे जरा भी इधर उधर नहीं होते! गंगा, गोदावरी, यमुना …आदि नदियाँ जहाँ से बहती है जीवन वहीं से शुरू होता है! पृथ्वी हमारी धारक ही नहीं पालक, पोषक भी है! समुद्र को रत्नाकर भी कहा जाता है. समुद्र मंथन से ही तो अमृत और विषदोनों निकले थे! तात्पर्य यह कि प्रकृति के जितने भी स्वरुप हैं, सभी हमारे लिए ही तो है हम माने तो आस्था नहीं तो प्रकृति का स्वरुप! आप जैसे चाहे उपयोग करें! हाँ इतना अवश्य हो रहा है कि कुछ तथाकथित धर्माधिकारी हमारी आस्था का दोहन करते हैं और हम भी अंध विश्वासी बन उनके चंगुल में फंस जाते हैं. हमारे धर्मग्रंथों में भी बताया गया है – अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए अगर ईश्वर को याद भर रखा जाय या प्राणी मात्र से प्रेम किया जाय तो वही परमार्थ का मार्ग है! “प्रयत्नहीन प्रार्थना, प्रार्थना हो ही नहीं सकती”- विनोवा भावे

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