Monday, 14 July 2014

उम्मीदों का बजट!

मोदी सरकार का पहला बजट संसद में पेश किया गया. लोग इसे ‘उम्मीदों का बजट’ कह रहे हैं. बजट में लगभग हर वर्ग का ध्यान रक्खा गया है. किसानों, महिलाओं, मध्यमवर्ग के साथ साथ उद्योगपतियों का भी ख्याल रक्खा गया है. बकौल वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली – “मैंने चुन-चुन कर सबको कुछ न कुछ दिया है”. रक्षा में और बीमा क्षेत्र में FDI की सीमा को बढ़ाकर ४९% कर दिया है, जिससे देश में रोजगार बढ़ने की संभावना बढ़ेगी और सामान भी सस्ते में उपलब्ध होंगे ऐसी संभावना व्यक्त की जा रही है.
बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए, सड़क, एवं गंगा में परिवहन की योजना के साथ बिजली बनानेवाली कंपनियों को दस साल तक टैक्स में छूट के साथ, अल्ट्रा मेगा सोलर पावर प्रोजेक्ट लगाने का ऐलान सबको भानेवाला है. हर गाँव में बिजली, यातायात और संचार के साधनों के विकास से जहाँ गाँव से शहरों का पलायन रुकेगा, वही १०० स्मार्ट सिटी बनाने का सपना भी कम लुभावना नहीं दीखता.
महिलाओं की लिए सुरक्षा और ‘बेटी बचाओ, बेटी बढ़ाओ योजना भी काबिले तारीफ है, बशर्ते कि इनपर भरपूर अमल किया जाय. निर्भया फंड का लेखा-जोखा कुछ है या नहीं, यह भी बताना चाहिए था. किसानों की खेती में उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है. हर क्षेत्र की मिट्टी की जांच कराई जायेगी और उसकी उर्वराशक्ति के अनुसार फसलें लगाई जायेगी. साथ ही नए कृषि अनुसन्धान के लिए पूसा के तर्ज पर दो बड़े भारतीय कृषि अनुसन्धान केंद्र और चार नए कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना की घोषणा भी सराहनीय है. किसानों को सस्ते दर(७%) पर ऋण, किसान विकास पत्र को फिर से शुरू किये जाने, और किसानो के लिए एक विशेष टी वी चैनेल के शुरू किये जाने की योजना मनोहारी है. नरेंद्र मोदी के सपने को साकार करने के लिए वित्त मंत्री ने हर संभव प्रयास किये हैं. अनाज भण्डारण, एवं कृषि उत्पादों की ढुलाई, उचित बाजार आदि की ब्यवस्था निश्चित ही क्रांतिकारी है, अगर इसे सही रूप से क्रियान्वित किया जाय.
शिक्षा के विकास के लिए पांच नए आई आई टी, पांच नए आई आई एम और चार नए AIMS के स्थापना की घोषणा सपने जैसा ही है. इन सब के लिए धन और संकल्प शक्ति कहाँ से आयेगी, पता नहीं, पर सपने तो सुन्दर हैं ही.
PPP यानी पब्लिक, प्राइवेट पार्टनरशिप के द्वारा धन जुटाने की प्रक्रिया पहले से भी जारी है, इसके अच्छे नतीजे मिल भी रहे हैं, भुगतान भले ही आम आदमी को करना पड़ता है.
‘नमामि गंगे’ के नाम से राष्ट्रीय गंगा संरक्षण मिशन के लिए २०३७ करोड़ का आवंटन बहुत ज्यादा नहीं कहा जायेगा, इससे पहले भी गंगा की सफाई पर करोड़ों के वारे-न्यारे हुए हैं नतीजा कुछ भी नहीं. गंगा दिन प्रतिदिन मैली होती गयी है. पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की नदियों को जोड़ने की महत्वाकांक्षा को भी आगे बढ़ाने का जिक्र किया गया है.
२०२२ तक सबको अपना घर का सपना भी कम सुहावना नहीं लगता है, इससे रियल एस्टेट क्षेत्र में आई गिरावट को सम्हालने की चेष्टा की गयी है. घर खरीदने में आयकर में मिली छूट लोगों को लुभाएगी. पिछली एन डी ए की सरकार में वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने भी इसमे छूट दी थी, जिसका लाभ अब तक लोग उठा रहे हैं. गावों और कस्बों में भी शुद्ध पेय जल की ब्यवस्था के लिए ३६०० करोड़ रुपये के साथ ग्रामीण पेय जल योजना की शुरुआत बहुत अच्छी है.
महंगाई और काले धन पर वित्त मंत्री मौन हैं और प्रधान मंत्री भी. उनकी सरकार आने के बाद महंगाई बढ़ती ही जा रही है. कहीं कोई रोक-टोक नहीं है. न तो कोई बड़े जमाखोर पकडे गए, नहीं कोई कारवाई हुई. मीटिंग्स जरूर हुई और मंत्रियों ने कह दिया – महंगाई नहीं बढ़ी. श्री गिरिराज सिंह के यहाँ से १.१४ करोड़ नगद की चोरी और बरामदगी वाला किस्सा भी बड़ा रोचक है. अब इस पर जांच चलेगी और लीपा-पोती की जायेगी, यह भी जग जाहिर है. सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी पर तो मुक़दमा हो चुका है. अदालती कार्रवाई जारी है. क्या ये भी सहारा श्री सुब्रत राय की तरह जेल जायेंगे. आसाराम बापू का क्या होनेवाला है. उनके विरुद्ध गवाही देने वाला तो इस दुनिया को अलविदा कह चुका है.
अगर बाजार जाकर देखें तो हर चीज के दाम बढे हैं और पैकेट के वजन कम कर दिए गए हैं, जिन पर ग्राहक बहुत कम ध्यान देता है. ऊपर से सरकारी आंकड़ों के अनुसार महंगाई बढ़ने की दर में कमी हुई है …ये आंकडे क्या कहते हैं – सुषमा स्वराज को कांग्रेस के शासन में समझ में नहीं आते थे, अब समझ में आने लगे हैं शायद?
कुछ चीजों पर टैक्स घटाकर दाम कम करने की कोशिश की गयी है, तो कुछ विलासिता और नशीली चीजों के दाम बढ़ाये गए है, जो अच्छा ही है. परिणाम क्या हुआ कि अभी से ही तम्बाकू और पान मसाले की कालाबाजारी चालू हो गयी और सस्ते होनेवाले सामान तो तब सस्ते होंगे, जब नया स्टॉक आयेगा.
कांग्रेस के अनुसार यह उसी के बजट का विस्तार है तो कांग्रेस और भाजपा की नीति में कोई खास परिवर्तन नहीं ही दीखता है. जब वे विपक्ष में थे तो FDI का विरोध कर रहे थे अब उन्हें यह जरूरी लगता है. वे भी अर्थ ब्यवस्था को ठीक कर रहे थे, ये भी वही कर रहे हैं. कुछ नामों का हेर-फेर है. महात्मा गाँधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव की जगह श्री दीनदयाल उपाध्याय, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, पंडित मदन मोहन मालवीय और लोकनायक जयप्रकाश के नाम उजागर हुए हैं. इनके नाम कुछ योजनाओं के साथ जोड़े गए हैं. ये सभी कांग्रेस का विरोध वाले नेता रहे हैं. सरदार वल्लभ भाई पटेल की एकता की मूर्ती के लिए २०० करोड़ रुपये की अलग से ब्यवस्था की गयी है. ये जवाहर लाल नेहरू के प्रतिद्वंद्वी थे.
करीब बीस योजनायें जिनमे बेटी बचाओ, बेटी बढ़ाओ, और गाँव में शहरी सुविधा भी शामिल है, के लिए १०० करोड़ समान रूप से आवंटित की गयी है. कश्मीरी पंडितों की वापसी के लिए ५०० करोड़ की ब्यवस्था की गयी है. कुछ राज्यों में आगामी चुनाव को देखते हुए शायद ज्यादा कड़वी दवा देने की कोशिश से परहेज किया गया है. जहाँ जरूरत है, वहीं टैक्स बढाया गया है.
रेल भाड़ा बृद्धि कांग्रेसी सरकार का था, उसे ज्यों का त्यों लागू कर दिया गया. पर खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लोगों को अनाज मुहैया करने की योजना का क्या हुआ, जिक्र नहीं है. जन वितरण प्रणाली को बेहतर बनाने की बात सभी सरकारें करती रही है, पर इनमे कितना भ्रष्टाचार होता है, इन्हें रोकने में कोई भी अभी तक सफल नहीं हुआ है. रामविलास पासवान से भी ज्यादा उम्मीद रखना बेमानी होगी, क्योंकि वे तो मानते हैं कि मीडिया की वजह से महंगाई बढ़ी है. यह बात भी वे मीडिया के माध्यम से ही कहते हैं.
बजट के दौरान प्रधान मंत्री चिंतन की मुद्रा में दिखे …शायद वे कुछ नए शब्द सोच रहे थे.
उनके अनुसार आम बजट मरणासन्न पडी अर्थब्यवस्था के लिए संजीवनी है. यह बजट भारत को विकास की नई ऊँचाइयों तक ले जानेवाला है. गरीबों और दबे कुचले तबकों के लिए यह आशा की किरण है.
बजट के बाद अमरीका की बेताबी बढ़ी है, कभी नरेंद्र मोदी को वीजा देने से इंकार करने वाला अमरीका मोदी को निमंत्रण देने आ पहुंचा. ओबामा ने सितम्बर में मिलने के लिए बुलाया है, देखना यह होगा कि अमेरिका की दिलचश्पी किस क्षेत्र में निवेश की है. क्या वह रक्षा उपकरणों के निर्माण में विनिवेश करेगा या फिर हमारे लिए जासूसी कर खतरे का कारण बनेगा. वैसे भी वह भाजपा की जासूसी पहले कर चुका है, जिससे भाजपा वाले नाराज भी थे.
मिलाजुकर सभी घोषणाएँ अच्छी हैं, अगर वे नेक नीयत से धरातल पर उतरें. वित्त मंत्री कहते है, यह तो शुरुआत है, आगे और बातें होंगी, जिससे देश और देशवासी का विकास निश्चित होगा. हम सभी यही तो चाहते हैं. जय हिन्द !
जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर

Saturday, 12 July 2014

दूब का चरित्र देखो, आम जन जैसा है

दूब का चरित्र देखो, आम जन जैसा है,
सुख दुःख से विरक्त, संत मन जैसा है.
झुलसे न ग्रीष्म में भी, ओस को सम्हाल रही  
ढांक ले मही को मुदित, पहली बौछार में ही
दूब अग्र तुंड को, चढ़ावे विप्र पूजा में,
जैसे हो नर बलि, स्वांग यह कैसा है ! दूब का चरित्र देखो, आम जन जैसा है,
गाय चढ़े, चरे इसे, बकरियों भी खाती है,
खरगोश के बच्चे को, मृदुल दूब भाती है.
क्रीडा क्षेत्र में भी, बड़े श्रम से पाली जाती है
देशी या विदेशी मैच, कुचली यही जाती है.
आम जन की गति, ऐसी ही होती है,
पिसे हर हाल में, प्रबंधन यह कैसा है. दूब का चरित्र देखो, आम जन जैसा है,
गर्मी दुपहरी में भी ये हरी होती है
पहली फुहार पड़ते ही बड़ी होती है.
लोग बाग़ जाएँ, तब रास्ता बन जाता है
अगर जाना छोड़ दें, बिछौना बन जाता है
कुचलकर भी मुस्कुराए, जड़ दृढ़ कहलाये,
वंश वृधि का प्रतीक, सूक्ष्म चलन कैसा है. दूब का चरित्र देखो, आम जन जैसा है,
खेतों खलिहानों में, दूब साफ़ होती है
खेतों की मेड़ों पर, दूब पास होती है
दूब अगर डूब जाय, चिंता नहीं करना
पानी निकलते ही, फिर से हरी होती है.
दुःख से न घबराये, घुटकर भी जीता रहे,
देखते सभी हैं, अदम्य घुटन जैसा है .. दूब का चरित्र देखो, आम जन जैसा है,
पर्यावरण माह में, करने हो अगर स्वांग सिर्फ  
वातानुकूलित कक्ष में भी, दूब लगा सकते है.
मिट्टी संग दूब को, पत्थर पे बिछा सकते हैं.
पत्थर पर दूब उगा, मुहावरा बदल सकते हैं.
आम जन को भी, यह दूब सीख देती है.
बिना कुछ चूं-चपर, सब कुछ सह लेती है.
जितना भी हो विकास, आम ‘आम’ ही रहेगा
चूसे हुए रस की भांति, गुठली कहीं बहेगा  
उगे नए पेड़ कहीं, या फिर ये सड़ जाय
मिलेंगे ही आम बहुत, विशद विश्व ऐसा है.. दूब का चरित्र देखो. आम जन जैसा है,
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जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर  

Wednesday, 9 July 2014

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सवाल.

हमारे प्रजातंत्र के संघीय ढांचे में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका सबकी अपनी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है. सभी अपने क्रियाकलाप में स्वतंत्रता चाहते हैं. पर न्यायपालिका एक ऐसी ब्यवस्था है, जिसमे सबकी आस्था निहित है. सभी अंतत: उच्चतम न्यायालय के फैसलों को ही अंतिम मानते है. कार्यपालिका या विधायिका के द्वारा नागरिक अधिकारों के हनन की रक्षा न्यायपालिका ही करती है. यह कार्यप्रणाली तबतक भलीभांति संपन्न नहीं हो सकती, जबतक कि न्यायपालिका पूरी तरह से कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त न हो.
न्यायपालिका की स्वाधीनता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए हमारे संविधान में न्यायधीशों की नियुक्ति, सेवा शर्तें, उनके वेतनमान, सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों की सेवानिवृत्ति के बाद प्रैक्टिस करने की पाबंदी… आदि विभिन्न उपबंध हैं, जो इन्हें किसी भी हस्तक्षेप से बचाते हैं.
संविधान के अनुच्छेद १२४(२) और २१७ (१) के अनुसार सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति भारत के प्रधान न्यायधीश और और अन्य न्यायाधीशों के परामर्श से करेगा. इसमे भी विवाद होते रहे हैं. इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने ही यह ब्यवस्था दी कि न्यायधीशों की नियुक्ति की सिफारिश पांच सदस्यीय ‘कोलेजियम’ द्वारा की जायेगी जिसमे प्रधान न्यायधीश के अलावा चार वरिष्ठतम न्यायधीश होंगे. सरकार अधिक से अधिक किसी नाम पर आपत्ति कर सकती है. श्री गोपाल सुब्रमण्यम के मामले में यही हुआ, लेकिन कोलेजियम द्वारा उसे दुबारा भेजे जाने पर राष्ट्रपति अर्थात सरकार इनको नियुक्त करने के लिए बाध्य है.
पिछली संप्रग सरकार ने २०१३ में एक संविधान संशोधन विधेयक भी संसद में पेश किया था, जिसे लेकर भाजपा आदि राजनीतिक पार्टियाँ भी रजामंद थी. इस बिल के अनुसार न्यायिक नियुक्ति आयोग में प्रधान न्यायधीश, सुप्रीम कोर्ट के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, केन्द्रीय कानून और न्याय मंत्री के अतिरिक्त दो अति प्रतिष्ठित व्यक्ति होंगे, जिनका चयन प्रधान मंत्री, संसद में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायधीश की एक समिति करेगी. सवाल यहाँ भी उठे थे.
संसदीय समिति की एक अन्य अनुशंसा के अनुसार इन तीन सदस्यों में कम से कम एक सदस्य दलितों,आदिवासियों,महिलाओं,पिछड़ों अथवा अल्पसंख्यकों में से होना चाहिए, जो रोटेसन से हो सकते हैं. यह सराहनीय है कि वर्तमान राजग सरकार ने पुराने बिल पर फिर से परामर्श करने का निर्णय लिया है.
अब आते हैं इस आलेख की प्रासंगिकता पर –
सीनियर वकील गोपाल सुब्रमण्यम को सुप्रीम कोर्ट का जज न बनाए जाने पर एनडीए सरकार की सार्वजनिक रूप से आलोचना करने से पहले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश आर एम लोढ़ा ने कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को चिट्ठी लिखकर भी अपनी नाराजगी जाहिर की थी. लोढ़ा ने स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि सरकार आइंदा ऐसा न करे.
सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम ने जिन चार लोगों के नाम की सिफारिश की थी, उनमें सीनियर वकील गोपाल सुब्रमण्यम का नाम भी था, लेकिन उन्होंने अपना नामांकन वापस ले लिया था.
56 वर्षीय सुब्रमण्यम यूपीए सरकार में सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं. एनडीए सरकार ने जजों की नियुक्ति करने वाले कॉलेजियम को लिखा था कि सुब्रमण्यम की सिफारिश पर फिर से विचार करें।
इस बारे में चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि उनकी गैरहाजिरी में और उन्हें बिना बताए यह फैसला लिया गया.
अंग्रेजी अखबार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खबर के मुताबिक यूं सबके सामने अपनी नाराजगी जाहिर करने से पहले उन्होंने 30 जून को सरकार को एक खत लिखा था। लोढ़ा ने लिखा था, ‘मेरी जानकारी और सहमति के बिना प्रस्ताव को अलग कर देने को मैं मंजूरी नहीं देता। एकतरफा अलगाव का ऐसा काम कार्यपालिका आइंदा न करे’
इंडियन एक्सप्रेस ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि यह पत्र कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को बुधवार को ही मिला है। लोढ़ा ने इस पत्र में सख्त नाराजगी जताते हुए लिखा, ‘आपने गोपाल सुब्रमण्यम के प्रस्ताव को बाकी तीन नामों से अलग कर दिया है। अब सुब्रमण्यम ने अपना नाम वापस ले लिया है और मेरे पास उनका प्रस्ताव वापस लेने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है’
ज्यादातर मामलों में अदालत के फैसलों में इतनी देर हो जाती है कि आम आदमी जल्दी कोर्ट का रुख नहीं करना चाहता है. चाहता है कि आपस में समझौता हो जाय और मामला सलट जाय. विशेष परिस्थितियों में ही आम आदमी थाना और कोर्ट की शरण लेता है. फिर भी न्यायपालिका सर्वोपरि है, यह सभी मानते हैं. इसी सन्दर्भ में आइये देखते है, इधर हाल के दिनों में कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले जो काबिले तारीफ है.
१. वसंत विहार गैंगरेप केस में फैसला ( दिल्ली का निर्भया केस)
२. BCCI के अध्यक्ष के श्रीनिवास को हटाने का फैसला – भारतीय क्रिकेट को भ्रष्टाचार मुक्त करने की तरफ कदम.
३. आरुषि-हेमराज हत्याकांड पर फैसला
४. चारा घोटालाः लालू, जगन्नाथ मिश्र और जगदीश शर्मा को जेल
५. समलैंगिकता के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट का फैसला जिसे भारतीय संस्कृति और प्रकृति के भी खिलाफ बताया गया.
६. पिछले 9 सालों से हो रही ‘राइट टू रिजेक्ट’ की मांग को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट की सहमति हासिल हो गई है। 27 सितंबर 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए मतदाताओं को ‘नन ऑफ द अबव’ यानी ‘उपरोक्त में से कोई नहीं’ का अधिकार दिया। जिसका मतलब यह है कि अगर किसी मतदाता को लगता है कि मतपत्र पर मौजूद कोई भी उम्मीदवार उसकी पसंद का नहीं है तो वह इस विकल्प पर अपनी मुहर लगा सकता है। इस विकल्प की मांग पिछले 5 दशकों से हो रही थी। पिछले 9 सालों से तो इस सम्बंध में सुप्रीम कोर्ट में याचिका लम्बित थी, जिसे अब जाकर मान्यता मिली है।
७. सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला भारत में सियासत को अपराध से मुक्त करने की दिशा में एक और अहम पड़ाव है. भविष्य में दागी नेता राजनीति में बने रहने के लिए अदालती कार्यवाही की लेटलतीफी का फायदा नहीं उठा सकेंगे.
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों को निर्देश दिया है कि दागी नेताओं के मुकदमे हर हाल में एक साल के भीतर निपटाए जाएं. इस फैसले से अपराधी से नेता बने लोगों का अपील का अधिकार तो सुरक्षित रहेगा लेकिन व्यवस्था को भी इन दीमक नुमा नेताओं से बचाया जा सकेगा.
८. दिल्ली हाई कोर्ट ने विदेशी फंडिंग के आरोपों को लेकर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से कांग्रेस और भाजपा पर उचित कार्रवाई करने को कहा है।
९. सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय का मामला ( एक बड़ी हस्ती के खिलाफ फैसला)
१०. किन्नरों को उनके हक़ दिलानेवाला मामला
इस तरह के महत्वपूर्ण फैसले के बीच न्यायाधीशों की नियुक्ति का मामला को विवाद में आना और इसे व्यक्तिगत अहम् के टकराव तक पहुँचने को सही नहीं ठराया जा सकता.
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने शनिवार को कहा, “जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका का दखल बढ़ाने के मकसद से पिछली सरकार द्वारा पेश संविधान संशोधन विधेयक पर मोदी सरकार फिर से काम करेगी. उसमें कई जरूरी बदलाव करेगी”.
रविशंकर प्रसाद के अनुसार, “हमारी पार्टी भाजपा ने राष्ट्रीय न्यायिक आयोग के गठन का वादा किया है. हम उसमें न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करेंगे. क्योंकि हम स्वतंत्र न्यायपालिका के पक्षधर हैं”.

उनका यह बयान वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रमण्यम की सुप्रीम कोर्ट के जज पद पर नियुक्ति को लेकर पैदा हुए विवाद के बीच आया है. सरकार ने सुब्रमण्यम की नियुक्ति संबंधी कोलेजियम के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था और फाइल को पुनर्विचार के आग्रह के साथ लौटा दिया था. सरकार के इस कदम का सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आरएम लोढ़ा ने विरोध किया था. इस बाबत पूछे गए सवाल पर प्रसाद ने कहा कि सरकार को न्यायिक नियुक्तियों पर अपनी राय देने का अधिकार है. वह पुनर्विचार का आग्रह कर सकती है.
राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति बनाएगी सरकार
कानून मंत्री ने बताया कि अदालतों में लंबित मामलों की बढ़ती तादाद के मद्देनजर सरकार राष्ट्रीय मुकदमेबाजी नीति बनाने की तैयारी में है. प्रसाद के अनुसार, “वर्तमान में देश की अदालतों में करीब तीन करोड़ मामले लंबित हैं। इनमें से 2.68 करोड़ केवल निचली अदालतों में वर्षों से लटके हुए हैं। इस समस्या समाधान खोजना ही होगा”.
“हम ऐसा राष्ट्रीय न्यायिक आयोग चाहते हैं जिसमें न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों रहेंगे, लेकिन दबदबा न्यायपालिका का ही होगा. हम सकारात्मक तरीके से बिल लाएंगे। पिछली सरकार ने जो बिल पेश किया था, उसमें काफी कमियां थीं”. – वर्तमान कानून और न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद.
यह भी स्वागतयोग्य है कि गोपाल सुब्रमण्यम के विवाद के बीच वर्तमान कानून और न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि भारत सरकार न्यायिक ब्यवस्था और सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता का सम्मान करती है. आशा है कि वर्तमान सरकार संविधान, मर्यादा और जनहित के मद्देनजर न्यायपालिका की स्वायत्तता की रक्षा करते हुए सभी विन्दुओं पर ध्यान रखते हुए उचित फैसले लेगी, ताकि न्यायपालिका के प्रति आस्था और भी मजबूत हो.
-जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.

Tuesday, 1 July 2014

गंगा माँ का शोधन या पुनर्जीवन.

पुराणों के अनुसार भगवान के बिष्णु के अंगूठे से निकली गंगा ब्रह्मा जी के कमंडल में सुरक्षित थी. राजा सगर के वंशज भगीरथ के अथक प्रयास और शिव जी की कृपा से गंगा कैलाश पर्वत से होते हुए पृथ्वी पर आई और बंगाल की खाड़ी में जा मिली, जिससे कपिल मुनि की क्रोधाग्नि जले राजा सगर के ६०,००० पुत्रों को मोक्ष की प्राप्ति हुई. आज भी गंगा मोक्षदायिनी ही बनी हुई है. हिन्दू धर्म अनुयायी के सभी मृत शरीर की अस्थियाँ गंगा में ही विसर्जित की जाती है, मुक्ति के लिए.
पतित पावनी गंगा आज स्वयं प्रदूषण की शिकार होकर मैली हो गयी है. अब इसे साफ़ कर या पुनर्जीवित कर निर्मल गंगा बनाने का अथक प्रयास जारी है. गंगा के प्रदूषित होने का मुख्य कारण, इसके प्रवाह में अवरोध, कल-कारखानों का प्रदूषित ठोस और अवशिष्ट तरल पदार्थ हैं, इसके अलावा इनके किनारे बसे शहरों, गांवों के नालों का प्रवाह भी, जो बिना संशोधित किये गंगा में छोड़ दिया जाता है. इसके अलावा विभिन्न पशुओं, मनुष्यों का शव भी है, जिसे सीधे गंगा में छोड़ दिया जाता है.
गंगा को साफ़ करने के अनेक प्रयास हुए, बहुतों ने तपस्या की, अनशन किये, आरती की और गंगा के किनारे का भ्रमण किया, सौगंध खाए, गंगा एक्सन प्लान बनाई, इसे राष्ट्रीय नदी भी घोषित किया. करोड़ों के वारे न्यारे हुए, नतीजा वही धाक के तीन पात. अब एक बार पुन: जोर शोर से अभियान चला है. श्री मोदी जी को गंगा माँ ने ही बनारस में बुलाया था. उन्होंने अपनी ऐतिहासिक विजय के बाद गंगा माँ की आरती की और इसे निर्मल बनाने क बीरा उठा लिया है. जल संशाधन मंत्री उमा भारती ने भी पूर्व में काफी प्रयास किया है अब उन्हें यह महत्पूर्ण जिम्मेदारी भी दे दी गयी है कि वे अपने प्लान में सफल हों.
बहुत सारे मीडिया घराने भी इस प्रयास में आगे निकले हैं, जन जागरूकता बढ़ाने के लिए सबको साथ लेने के लिए, आखिर जन जागरूकता ही तो परिवर्तन लाती है.
अब आइये कुछ आंकड़ों की बात करते हैं. ४००० मीटर की ऊँचाई पर गोमुख से निकलने वाली २५२५ किलोमीटर लम्बी गंगा नदी का क्षेत्रफल लगभग १० लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक है. देश की ४३% जनसँख्या इसके प्रवाह क्षेत्र में रहती है.यह उत्तराखंड में ४५० कि.मी, उत्तर प्रदेश में १०० कि मी बिहार में ४०५ कि मी झाड़खंड में ४० कि मी, पशिचिम बंगाल में ५२० कि मी की यात्रा करती है इसके अलावा ११० कि मी की लम्बाई उत्तर पदेश और बिहार की सीमा रेखा में तब्दील है. 
नेसनल मिसन फॉर क्लीन गंगा के एक अधिकारी के अनुसार, गंगा एक्सन प्लान -१, गंगा एक्सन प्लान -२, और एन जी आर बी ए पर अब तक १७०० करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. हालाँकि संसद की एक स्थाई समिति के अनुसार अब तक ९००० करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. यह सब रकम सीवर की गन्दगी के शोधन पर खर्च हुए हैं लेकिन स्थिति में सुधर कुछ खास नहीं हुआ. लगभग २६००० मिलियन लीटर गन्दगी बिना साफ़ किये हुए रोजाना गंगा में गिर रही है.
हरिद्वार से निकलते ही कई परियोजनाओं के लिए बने बैराज इसे रोक लेते हैं. बनारस तक घरेलू गन्दगी साथ ही इनकी सहायक नदियों का भी गन्दा पानी इससे में गिरता है. गंगा का जायजा लेने गयी संसद की स्थाई समिति के अनुसार तीर्थराज प्रयाग और वाराणसी में गंगाजल पीने लायक तो दूर नहाने योग्य भी नहीं है. फिर भी करोड़ों लोग रोज गंगा स्नान करते ही हैं. गंगा का पवित्र जल विभिन्न पूजा विधि में भी उपयोग में लाया ही जाता है.    
जहाँ बैराज बन चुके हैं उन्हें तोड़कर यथास्थिति में लाना शायद संभव न हो क्योनी कई विद्युत् परियोजनाएं इनसे चल रही है और विकास की राह में अपना अहम् योगदान कर रही है. पर नदियों में प्रवाहित होनेवाला सीवर के गंदे जल को शोधन कर पुनरुपयोग(कृषि कार्यों में, कारखानों में सफाई हेतु) में लाया जा सकता है. कारखानों के प्रदूषित जल का भी शोधन कर पुनरुपयोग में लाया जा सकता है या विभिन्न रसायनों और गंदगियों से मुक्त कर तब नदियों में छोड़ा जा सकता है.
नदी का अर्थ सिर्फ पानी नहीं है. इसकी अपनी एक पारिस्थितिकी होती है. इसके प्रवाह को अखंडित किये बिना जलीय जंतुओं के शरणस्थल के रूप में भी देखा जाना चाहिए. जलीय जंतु, मछलियों, कछुओं, मगरमच्छों, डोल्फिनों के साथ साथ सैंकड़ों तरह के पौधों और जानवरों को भी पुनर्स्थापित करना होगा, जो इनकी अशुद्धियों को दूर करने में सहायक होते हैं.
गंगा को साफ़ रखने के क्रम में उसकी सहायक नदियों की भी स्वच्छता का ध्यान रखना होगा, ताकि उनकी गन्दगी से गंगा प्रदूषित न हो.   
धार्मिक आस्था रखने वाले लोग गंगा में स्नान के लिए प्रवेश करने से पहले बाहर में ही मल-मूत्र त्याग कर लेते हैं, ताकि नदी की पवित्रता और स्वच्छता बनी रहे. हम सब को यह मिलकर प्रयास करने होंगे/संकल्प लेने होंगे कि मैं गंगा को या किसी भी नदी को प्रदूषित नहीं कर रहा हूँ. इसके लिए किसी भी प्रकार के कचरे को नदी में फेंकने से बचना चाहिए तभी सारे प्रयास सफल होंगे. सरकारी तंत्र मनोयोग से काम करे और भ्रष्टाचार से बचे, मीडिया हर पहलू को दिखाए तभी योजनायें सफल होंगी अन्यथा योजनायें तो पहले भी बनती रही हैं और सरकारी यानी जनता के धन का बंटाधार होता रहा है.   
निष्कर्ष यही है कि केवल कागज पर योजनायें बनाने और शब्दों के मायाजाल से बाहर निकलकर धरातल पर काम करने होंगे. जन चेतना जागृत करनी होगी, जो वास्तव में गंगा या अन्य नदियों को भी माँ मानकर उसे पूजे, साफ़ रक्खे और साफ़ रखने में मदद करे.  
“इतनी ममता नदियों से भी जहाँ माता कहके बुलाते हैं” की हमारी परंपरा को कायम रखने के लिए कुछ तो कर्तव्य हमारा भी बनता है. हमारे देश के प्रधान मंत्रियों में जवाहर लाल नेहरु, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गाँधी, चौधरी चरण सिंह, राजीव गाँधी, वी पी सिंह, चन्द्रशेखर, अटल बिहारी बाजपेयी आदि का गंगा से नजदीकी का सम्बन्ध रहा है. सबने कुछ न कुछ किया है. अब श्री नरेंद्र मोदी जो गंगा की नगरी वाराणसी से चुनाव जीतकर आए हैं, उन्होंने विशेष संकल्प भी लिया है और अपने संकल्प को पूरा करने हेतु गंगा सफाई अभियान या उसे पुनर्जीवित करने के लिए संकल्परत साध्वी उमा भारती को जल संशाधन, नदी विकास के साथ गंगा सफाई का भी विभाग सौंपा है. उम्मीद है, वह अपनी और प्रधान मंत्री की उम्मीदों पर खरी उतरेंगी. समस्त शुभकामनाओं के साथ ...

जवाहर लाल सिंह. जमशेदपुर.               

Sunday, 22 June 2014

महंगाई को काबू में रखना सबसे बड़ी चुनौती !

महंगाई, भ्रष्टाचार, अनाचार आदि मुद्दों पर चुनाव जीतकर आयी भाजपा की मोदी सरकार के लिए महंगाई से लड़ना ही अभी सबसे बड़ी चुनौती होने वाली है. कमजोर मॉनसून की भविष्यवाणी, सम्बंधित विभागों के मंत्रियों के साथ प्रधान मंत्री की बैठक, इराक संकट से उपजे कच्चे तेलों की कीमत में बृद्धि, ऊपर से श्री मुकेश अम्बानी की घोषणा कि तेल की कीमतों में बृद्धि अनिवार्य रूप से करनी होगी, जिसका असर महंगाई बढ़ानेवाला होगा.... और अब रेल के यात्री किराये में बजट से पहले १४.२ प्रतिशत और माल भाड़े में ६.५ % की बढ़ोत्तरी से क्या महंगाई काबू में आने वाली है? कड़े फैसले का पहला कड़वा घूँट? 
अब खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री श्री रामविलास पासवान कह रहे हैं कि आवश्यक खाद्य पदार्थों की देश कोई कमी नहीं है, उपलब्धता को यथानुसार आपूर्ति में बदलने की चुनौती तो है. हरेक राज्यों को कहा गया है कि जमाखोरों के खिलाफ कड़े कदम उठायें जाएँ... पर ऐसा हो रहा है क्या. वित्त मंत्री भी चिंतित हैं- आम उपभोक्ता क्या करे? 
प्रधान मंत्री, वित्त मंत्री, खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री के हवाले से दिए गए बयानों के बाद भी महंगाई बढ़ती जा रही है. फल एवं सब्जियों के कम पैदावार और जमाखोरी रोकने के उचित कार्रवाई किये बिना इनके दामों की बढ़ोत्तरी रोकना संभव भी नहीं है. राज्य सरकारें आजतक जमाखोरों पर नियंत्रण तो नहीं कर सकी है, क्योंकि चुनाव खर्च के लिए चन्दा भी तो वही लोग देते हैं. अब बहाना भी आसान है-इराक संकट. पिछली सरकारें भी तो अंतराष्ट्रीय संकट का हवाला देती रही हैं. वैसे अब मोदी सरकार में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले गृह  मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने ६ महीने का वक्त मांग लिया है. यानी ६ महीने तक महंगाई बढ़ेगी उसके बाद घटेगी(?) ...तब तक टी वी और सडकों पर नूरा-कुश्ती देखते रहें.
वैसे भी मॉनसून की शुरुआत में फल,सब्जियों के पैदावार और उसके संग्रहण, संरक्षण में भी खासी दिक्कत होती है, इसका फायदा ब्यापारी वर्ग उठाते ही हैं. यह कोई नई बात भी नहीं है. पर विपक्ष क्या बैठा रहेगा? इस मुद्दे पर वह कत्तई चुप नहीं बैठ सकता. ऊपर से प्रधान मंत्री द्वारा कड़े फैसले के संकेत, बजट में नए टैक्स बढ़ोत्तरी के संकेत, रेल भाड़े में बृद्धि की योजना ये सभी कदम महंगाई को बढ़ानेवाले ही साबित होंगे. अबतक रोजगार सृजन के लिए भी कोई मजबूत कदम नहीं उठाये गए हैं. लोगों की आमदनी नहीं बढ़ेगी तो खरीददारी कहाँ से करेगा और संकट बरकरार रहने की ही संभावना बनी हुई है. ऐसे में मोदी सरकार के उपयुक्त कदमों का सबको इन्तजार है.        
मुख्य मुद्रास्फीति साल दर साल आधार पर अप्रैल के 5.2 फीसदी के मुकाबले मई में 6 फीसदी हो गई। दिसंबर के बाद से यह इसका उच्चतम स्तर है।
इसके दोषी को खोज निकालना बहुत मुश्किल नहीं है। खाद्य मुद्रास्फीति पिछले कई सालों से वृहद आर्थिक प्रबंधन की धुरी रही है। जैसे-जैसे इसमें उछाल या गिरावट आती है वैसा ही हमें मुख्य मुद्रास्फीति में भी देखने को मिलता है। अप्रैल से मई के दौरान इसमें एक फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिली। चावल की कीमतों की इसमें अहम भूमिका रही। पिछले कुछ माह के दौरान इसमें साल दर साल आधार पर 12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि यह इससे पहले के कुछ महीनों के मुकाबले कम ही है। उस वक्त यह बढ़ोतरी 17 फीसदी की दर से हो रही थी। दूध, अंडे, मछली तथा मांस कुछ अन्य खाद्य पदार्थ हैं, जिन्होंने महंगाई पर असर डाला है।
यह बात पूरी तरह स्पष्ट हो जानी चाहिए कि बगैर खाद्य कीमतों को नियंत्रित किए महंगाई के विरुद्घ जंग नहीं जीती जा सकती है। सरकार ने इस प्राथमिकता को भली भांति समझा है। यह बात संसद के आरंभिक सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण से भी स्पष्ट हुई। अब जरूरी यह है कि सरकार जल्दी से नीति बनाकर इस दिशा में तत्काल कदम उठाए। विनिर्मित वस्तुओं के क्षेत्र में आ रही महंगाई को समझा पाना थोड़ा मुश्किल है। अगर मांग कमजोर बनी हुई है तो इसका अर्थ यही है कि उत्पादक अब कीमतों के मामले में एकदम निचले स्तर पर हैं और अब वे कच्चे माल के रूप में पडऩे वाली किसी भी लागत को उपभोक्ताओं पर डालने के लिए मजबूर हैं। यह कम कीमतों के बीच मांग बढ़ाने के लिए अच्छे संकेत तो कतई नहीं हैं।
खाद्य महंगाई को लेकर कोई भी प्रतिक्रिया देने की जिम्मेदारी अब सरकार पर है। जैसा कि यह समाचार पत्र कहता रहा है, मध्यम अवधि में सरकार को चावल की खुले बाजार में बिक्री करनी चाहिए। इससे कम से कम एक महत्त्वपूर्ण जिंस में महंगाई से पार पाने में मदद मिलेगी। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार ने ऐसा करने में जो अनिच्छा दिखाई उससे कई लोग चकित हुए। मौजूदा सरकार की निष्क्रियता हालात को और खराब कर सकती है। लंबी अवधि में कृषि जिंसों को लेकर समूची प्रोत्साहन व्यवस्था को नए ढंग से तय करना होगा। उसे चावल और गेहूं तथा उन सभी उत्पादों से दूर करना होगा जो खाद्य महंगाई के मूल में हैं। यह लक्ष्य रातोरात हासिल नहीं होगा, लेकिन एक विश्वसनीय नीति बनाकर इस दबाव से निपटने की दिशा में काम करना चाहिए।
जनता को उम्मीद थी कि मोदी सरकार के गठन होने के बाद महंगाई की मार से वो बच सकेगी, लेकिन देश की आर्थिक स्थिति ऐसी है कि अभी इसकी कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। पूंजी की कमी, इराक में बढ़ता तनाव, काला धन और देश की अनिश्चित अर्थव्यवस्था जैसे कारण महंगाई को लगातार बढ़ा रहे हैं। अगर बात महंगाई को काबू करने की करें तो जमाखोरी पर तत्काल लगाम लगाने, देश के डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम से भ्रष्टाचार को दूर करने और डीजल के दाम को कैटेगराइज करने से कुछ बात बन सकती है।
 क्यों नहीं कम हो रही महंगाई?
 1.भारतीय अर्थव्यवस्था में इस समय मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ माइनस 2 फीसदी चल रही है। अब जब आरबीआई दीर्घकालिक उपाय के रूप में ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर रहा है तो इससे मैन्युफैक्चरिंग ग्रोथ और धीमी हो जा रही है। ऐसे में एक तरफ जहां पूंजी की कमी हो रही है, वहीं प्रोडक्शन भी नहीं बढ़ पा रहा है।
2.सरकार के दीर्घकालिक उपाय बैंक के माध्यम से बाजार में रोटेट होने वाली पूंजी को कम करते हैं, लेकिन देश में काला धन इतनी प्रचुर मात्रा में है कि आरबीआई की कोशिशों के बावजूद दीर्घकालिक उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं। जिस व्यक्ति के पास काला धन है, वह कम प्रोडक्शन में भी अधिक पैसा देकर चीजों को खरीद रहा है।
3.भारतीय अर्थव्यवस्था में तेल का अहम योगदान है। इराक के संकट ने इसे और बढ़ा दिया है। पिछले कुछ दिनों में तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरेल से 110 डॉलर प्रति बैरेल तक पहुंच गई है। यह हमारे देश में माल उत्पादन से लेकर माल की ढुलाई तक को प्रभावित कर रहा है। इराकी संकट यदि लंबे समय तक बना रहा तो वस्तुओं के दाम और बढ़ जाएंगे।
4.देश में आर्थिक अनिश्चितता का माहौल खत्म नहीं हुआ है। इराक संकट और सरकार के भविष्य में कड़े कदम उठाने के बयान इसको और बढ़ा रहे हैं। रेल का माल भाड़ा बढऩे जैसी खबरें आग में घी का काम कर रही हैं। जमाखोर सोच रहे हैं कि भाड़ा बढ़े या तेल महंगा हो उससे पहले माल जमा कर लो।
 क्या उपाय करती है सरकार
सरकार रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के माध्यम से महंगाई को रोकने के लिए दीर्घकालिक उपाय करती है। आरबीआई देश में महंगाई को रोकने के लिए देशभर के कमर्शियल बैंकों के द्वारा रुपए का सर्कुलेशन इस तरह से बनाकर रखता है कि महंगाई पर लगाम लगाई जा सके। जब भी बाजार में पूंजी की तरलता व अवेलेबिलिटी बढऩे लगती है तो आरबीआई निम्न उपाय करती है।
 1.सीआरआर : महंगाई बढऩे पर आरबीआई को लगता है कि बाजार में पैसे की सप्लाई कम की जाए तो वह सीआरआर बढ़ा देता है।
2.एसएलआर : एसएलआर यानी स्टैच्युटरी लिक्विडिटी रेशो का मतलब होता है कि बैंक को अपने कुल डिपॉजिट का कुछ हिस्सा आरबीआई एवं सरकार द्वारा जारी सिक्युरिटीज में निवेश करना होता है। जब महंगाई चरम पर होती है तो आरबीआई इसे बढ़ा देती है। इससे बाजार में पूंजी की तरलता कम हो जाती है।
3.रेपो एंड रिवर्स रेपो रेट : रेपो रेट वह रेट है जिस पर आरबीआई कमर्शियल बैंकों को लोन देता है। महंगाई बढ़ती है तो रेपो रेट को बढ़ा दिया जाता है, जिससे बैंकों को अधिक ब्याज दर पर लोन मिलता है। इससे कमर्शियल बैंक भी लोन पर ग्राहकों से इंटरेस्ट रेट अधिक लेते हैं और आम आदमी लोन लेना कम कर देता है। इससे पूंजी की सप्लाई रुक जाती है।
उपर्युक्त सभी सैधांतिक बाते हैं जिन्हें पिछली सरकारें भी करती रही हैं, नतीजा???  वैसे श्री नरेंद्र मोदी द्वारा किये जा रहे उपायों से इनकार नहीं किया जा सकता है, बशर्ते कि इसका परिणाम आम जनता तक पहुंचे और कृषि और पशुधन उत्पादकों को भी समुचित सुविधा-लाभ मिले. पिछले कई साल मॉनसून अच्छे रहे हैं, खाद्य उत्पादन भी अच्छा हुआ है साथ ही सरकारी आंकड़ों के अनुसार स्टॉक की भी कमी नहीं है. जरूरत है उन्हें समयानुसार अमल में लाने की, जिसमे राज्य सरकारों और ब्यापारियों का भी सहयोग अपेक्षित है. जब पूर्ण बहुमत प्राप्त सरकार है तो कड़े फैसले और उसके परिणाम का इंतज़ार तो करना ही पड़ेगा.    

जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर 

Friday, 20 June 2014

बरसाती बादल आ ही गए,

बरसाती बादल आ ही गए, ठंढक थोड़ी पहुंचा ही गए.
तपती धरती, झुलसाते पवन, ऊमस की थी घनघोर घुटन,
खाने पीने का होश नहीं, 'बिजली कट' और बढ़ाते चुभन
अब अम्बर को देख जरा, बिजली की चमक दिखला ही गए... बरसाती बादल आ ही गए,

सरकारें आती जाती है, बिजली भी आती जाती है,
वादों और सपनों की झोली,जनता को ही दिखलाती है
पर एक नियंता ऐसा भी, बस चमत्कार दिखला ही गए... बरसाती बादल आ ही गए,

अंकुरे अवनि से सस्य सुंड, खेतों में दिखते कृषक मुण्ड.
व्याकुल जो थे उस गर्मी में, पशुओं के देखो सजग झुण्ड,
चहुओर बजी अब शहनाई, कजरी के बोल सुना ही गए... बरसाती बादल आ ही गए,

Wednesday, 18 June 2014

बारिश की झड़ी लगा दो आज...



नदियों को जोड़ भी सकते हैं,
धारा को मोड़ भी सकते हैं,
पर्वत को करते क्षत विक्षत,
सड़कों से जोड़ तो सकते हैं,
गर्मी में लाते शीत पवन,
सर्दी में जलती तप्त अगन,
बागों की हरियाली देखत,
पुलकित होता है तन औ मन.
सागर की छाती पर जहाज,
उसपर उतरे हैं यान आज,
बादल की लड़ी बनाकर के,
बारिश की झड़ी लगा दो आज!