कल मैं बाजार गया – कुछ सूखे मेवे (ड्राई फ्रूट्स) खरीदने थे. क्या दाम बढ़ा है, … भाई सूखे मेवे के! काजू – ६५० रुपये किलो! बादाम- ५५० रुपये प्रति किलो. अखरोट १०५० रुपये प्रति किलो.
दाम सुनकर और ज्यादा पूछ कर दिमाग ख़राब करने से क्या फायदा. मैंने कहा- काजू तीन किलो बादाम दो किलो और बाकी सभी एक एक किलो दे दो भाई!…बिल हुआ ५५५० रुपये….. दो प्लास्टिक के थैले में सारे सामान को दोनों तरफ बाइक के हैंडिल में लटकाया और पहले सेल्फ दिया तो स्टार्ट नहीं हुआ. फिर मैंने ‘किक’ लगाना शुरू किया, तब भी स्टार्ट नहीं हुआ…. मैंने सोचा स्पार्क प्लग शोर्ट हो गया होगा, इसलिए टूल बॉक्स से औजार निकाल कर स्पार्क प्लग खोलने की कोशिश की….. काफी दिनों से साफ़ भी नहीं करवाया था….. क्या कहें भाई, प्लग खोलने के चक्कर में कुछ ऐसा जोर लग गया कि स्पार्क प्लग ही टूट गया. प्लग का बिना थ्रेड वाला भाग मेरे हाथ में आ गया और थ्रेडेड पोर्सन अन्दर ही रह गया….. अब तो बड़ी मुश्किल में पड़ गया…… खैर किसी तरह गाडी को ठेल कर एक मेकानिक के पास पहुंचा … रात्रि के सवा आठ बज रहे थे, सो वह मेकानिक भी अत्यधिक ठंढा होने के चलते अपने औजार को समेट रहा था. मैंने कहा कि ठहरो भाई … जरा मेरा स्पार्क प्लग बदली कर दो….. उस मेकानिक ने देखा थोडा प्रयास भी किया ..पर उससे नहीं खुला … मैंने उसे थोडा काजू खिलाया और फिर प्रयास करने को कहा. पर उससे नहीं खुला …उसने सलाह दिया इसे ‘लेथ’ मशीन में चढ़ाकर काटना होगा …और यह काम आज नहीं होगा छोड़ जाइये,…. कल ले जाइएगा. मैंने उसकी बात न मानी और दुसरे मेकानिक के पास चला. यह मेकानिक सरदार जी था. सरदार को भी मैंने कहा- पहले थोडा काजू खा लो, फिर जोर लगाना. सरदार जी ने कहा – वाहे गुरु की कसम मैंने मक्के की रोटी और सरसों की साग खाई है और दो गिलास बीबी के हाथ की लस्सी भी पी है. देखता हूँ कैसे नहीं खुलता है. और उसके जोरदार प्रयास से पुराना प्लग का टूटा हुआ हिस्सा बाहर निकल गया . फिर उसने नए प्लग लगाकर किक मारी तो एक किक में स्टार्ट हो गया … मैंने एक सौ के दो नोट के साथ एक मुट्ठी काजू निकालकर उसके हाथ में पकड़ा दिया और कहा – ये लो तुम्हारा इनाम है. अब मैं खुशी-खुशी बाइक पर सवार हो, जा रहा था, तभी अचानक से ऐसा लगा जैसे पीछे का टायर बैठ गया है. मैंने सोचा – वास्तव में काजू और सूखे मेवे में दम होता है ….इस सूखे मेवे का ही जोर था कि बाइक बार बार अपना हिम्मत हार रहा था.
अब क्या करता बाइक से उतर धीरे धीरे अपने घर की तरफ बढ़ने लगा. ठंढ की रात थी फिर भी मुझे पसीने आने लगे थे. मैंने कुछ गाने भी गुनगुनाने शुरू किये, ताकि सफर आराम से कट जाय. ….”गीत गाता चल ओ साथी गुनगुनाता चल”….. “ओ रे मांझी! ले चल पार,… चल उस पार” … “दुनिया में जो आए हैं तो जीना ही पड़ेगा…”
किसी तरह दस बजे के बाद ही घर तक पहुँच सका. मैंने पत्नी से कहा – लो भाग्यवान! मैंने काजू और सूखे मेवे ला दिए. अब जरा इसे(काजू को) भूनकर लाओ, पहले दो पैग ले लूं, उसके बाद ही खाना खाऊँगा. पत्नी ने प्लास्टिक के सभी थैले निकाले और पूछा – “काजू किधर है?” मैंने कहा – “उन्ही में से किसी एक में होंगे”. मेरी पत्नी ने फटे हुए प्लास्टिक के थैले को दिखाया और कहा- “इसी में थे”??? … मेरा बहुत बुरा हाल था … मैंने इसी में से दो मुट्ठी काजू निकाल कर दोनों मेकानिक को भी दिए थे. लगता है इसी क्रम में या चलते समय प्लास्टिक के थैले फट गए और सारे काजू रास्ते में ही गिर गए!… “चलो कोई बात नहीं कल फिर से ला दूंगा” … आज तो जो बना है वही खिला दो … बहुत जोरों की भूख लगी है.
(यह मेरी अपनी कहानी नहीं है मेरे परम मित्र शर्मा जी, …नहीं… नहीं वर्मा जी की है,…. जिन्होंने मुझसे यह सब कहा. उन्होंने जैसे कहा, मैंने वैसे ही लिख दिया. मैंने उनसे सिर्फ इतना ही कहा- “सचमुच काजू में है दम!”)
Friday, 15 February 2013
कुम्भ स्नान और मेरी श्रीमती जी!
आज जैसे ही ऑफिस से लौटा, अभी जूते उतारने के लिए सोफे पर बैठता कि श्रीमती जी जल्दी से आकर गले लग गयीं…. मैं तो अकबका गया, कोई बात न चीत, न कोई इजहार सीधे गले लग गयीं. इतना प्यार मैंने पहले (इधर हाल के दिनों में) कभी महसूस नहीं किया था! मुझे थोड़ी सी शंका हुई. थोड़ी देर बाद जब हम अलग हो गए तो पूछ ही डाला- “आज क्या कोई खास बात है? बहुत प्यार जता रही हो!” … श्रीमति जी तुनक कर बोली – “हमेशा झिड़कते रहते हो. तुम्हे कुछ पता भी है, आज आलिंगन दिवस है! मैंने टी वी में सुना है और अखबार में भी पढ़ा है!”
मेरा माथा ठनका – अब बुढ़ापे में यही सब याद रखना बाकी रह गया है! तभी मुझे वो विज्ञापन याद हो आया जिसमे एक बुजुर्ग ब्यक्ति अपनी बुजुर्गा (पत्नी) को गुलाब देकर कहता है ‘आइ लव यू’! और बुजुर्गा कहती हैं- “बीस रुपये का फ्लावर! कौली फ्लावर ही ले आते!” कितनी समझदार हैं, वो बुजुर्ग महिला अगर सामने होती तो जरूर चरण चूम लेता! इधर मेरी श्रीमती को ‘आलिंगन और वेलेंटाईन डे’ की याद आ रही है!
फिर मैंने टी वी चालू कर नए समाचार जानना चाहा. तभी श्रीमतिजी चाय और पकौड़े लेकर हाजिर हो गयीं. चाय तक तो ठीक था, पर पकौड़े भी … मुझे थोडा शक हुआ !!! अब वे सामने बैठ गयी और कहने लगी – “सुनते हो!” मैंने टी वी से ऑंखें हटाई – “कहा जाय” – “क्यों न हमलोग भी कुम्भ नहाने चलें, इलाहाबाद में. जरा देखो न ट्रेन में जगह है, तो टिकट अभी ही बुक करा लो!”
मैंने कहा – “देख चूका हूँ अगले एक महीने तक वेटिंग लिस्ट है! तो क्या हुआ वेटिंग लिस्ट में ही ले लो, इतनी भीड़ है तो एक्स्ट्रा बोगी तो लगेगी ही!” “अगर नहीं लगी तो?” “तो किसी तरह घुसकर चले जायेंगे. इतने सारे लोग जा रहे हैं. वहां धाम पर जाने में अगर दिक्कत भी होती है, तो तपस्या ही समझी जायेगी!”
मैंने सोचा – शायद इलाहाबाद के हादसे के बारे में श्रीमती को पता नहीं है! -”पता है न अभी दो दिन पहले ही (१० फरवरी को) भयंकर हादसा हुआ है इलाहबाद रेलवे स्टेसन पर!”
“पता है, तभी तो कह रही हूँ! अगर कुम्भ नहाकर लौट आए तो आगे की जिन्दगी या अगले जन्म में अच्छे फल की प्राप्ति होगी और अगर हादसे के शिकार हुए तो धाम पर मरने से तो सीधे स्वर्ग का रास्ता ही बनता है …ऊपर से अगर मुआवजा मिल गया तो हमारे बच्चे की बाकी की जिन्दगी अच्छे तरीके से कट जायेगी!”
मै अवाक् होकर अपनी पत्नी का चेहरा देख रहा था …वह मुस्कुरा रही थी!… मैंने मन में सोचा – “वाह रे माता! हे भारतीय नारी! इसीलिये आप पूजने योग्य हो!”
मेरा माथा ठनका – अब बुढ़ापे में यही सब याद रखना बाकी रह गया है! तभी मुझे वो विज्ञापन याद हो आया जिसमे एक बुजुर्ग ब्यक्ति अपनी बुजुर्गा (पत्नी) को गुलाब देकर कहता है ‘आइ लव यू’! और बुजुर्गा कहती हैं- “बीस रुपये का फ्लावर! कौली फ्लावर ही ले आते!” कितनी समझदार हैं, वो बुजुर्ग महिला अगर सामने होती तो जरूर चरण चूम लेता! इधर मेरी श्रीमती को ‘आलिंगन और वेलेंटाईन डे’ की याद आ रही है!
फिर मैंने टी वी चालू कर नए समाचार जानना चाहा. तभी श्रीमतिजी चाय और पकौड़े लेकर हाजिर हो गयीं. चाय तक तो ठीक था, पर पकौड़े भी … मुझे थोडा शक हुआ !!! अब वे सामने बैठ गयी और कहने लगी – “सुनते हो!” मैंने टी वी से ऑंखें हटाई – “कहा जाय” – “क्यों न हमलोग भी कुम्भ नहाने चलें, इलाहाबाद में. जरा देखो न ट्रेन में जगह है, तो टिकट अभी ही बुक करा लो!”
मैंने कहा – “देख चूका हूँ अगले एक महीने तक वेटिंग लिस्ट है! तो क्या हुआ वेटिंग लिस्ट में ही ले लो, इतनी भीड़ है तो एक्स्ट्रा बोगी तो लगेगी ही!” “अगर नहीं लगी तो?” “तो किसी तरह घुसकर चले जायेंगे. इतने सारे लोग जा रहे हैं. वहां धाम पर जाने में अगर दिक्कत भी होती है, तो तपस्या ही समझी जायेगी!”
मैंने सोचा – शायद इलाहाबाद के हादसे के बारे में श्रीमती को पता नहीं है! -”पता है न अभी दो दिन पहले ही (१० फरवरी को) भयंकर हादसा हुआ है इलाहबाद रेलवे स्टेसन पर!”
“पता है, तभी तो कह रही हूँ! अगर कुम्भ नहाकर लौट आए तो आगे की जिन्दगी या अगले जन्म में अच्छे फल की प्राप्ति होगी और अगर हादसे के शिकार हुए तो धाम पर मरने से तो सीधे स्वर्ग का रास्ता ही बनता है …ऊपर से अगर मुआवजा मिल गया तो हमारे बच्चे की बाकी की जिन्दगी अच्छे तरीके से कट जायेगी!”
मै अवाक् होकर अपनी पत्नी का चेहरा देख रहा था …वह मुस्कुरा रही थी!… मैंने मन में सोचा – “वाह रे माता! हे भारतीय नारी! इसीलिये आप पूजने योग्य हो!”
Saturday, 26 January 2013
राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस!
हर साल १५ अगस्त को स्वतंत्रता दिवस और १६ जनवरी को गणतंत्र दिवस आता है. उस दिन हम अपने वतन को याद करते हैं, शहीदों को याद करते हैं, स्वतंत्रता सेनानियों को याद करते हैं, देश में हुई तरक्की के पुल बांधते हैं, या फिर गरीबो की हालत देख कर नेताओं पर जम कर गुब्बार निकालते हैं.मैं बचपन से इन दिनों को रेडियो पर सुनता आ रहा हूँ और आजकल टेलीविजन पर देखता हूँ. १५ अगस्त के दिन प्रधान मंत्री के भाषण में कई नयी घोषणाएं, कुछ चुनौतियाँ और अंत में तीन बार जयहिंद! ….मैं बिना लाग-लपेट के कह सकता हूँ, इंदिरा जी के जयहिंद में जो जोश मुझे रेडियो पर सुनायी पड़ता था, वह मुझे किसी नेता (प्रधान मंत्री) के स्वर में नहीं सुनायी/ दिखाई पड़ता! उस समय हिंदी में आँखों देखा हाल सुनाने वाले श्री जसदेव सिंह जी की आवाज का कोई जवाब नहीं था.
अब आता हूँ गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर! स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधान मंत्री के भाषण का अब कोई महत्व नहीं रहा. क्योंकि वे वही बोलते हैं, जो कर नहीं सकते, तो लालकिला से लाल सपने दिखाने का क्या मतलब??? यह भाषण अब ‘उबाऊ’ लगने लगा है!पर २६ जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के दिन का आज भी अपना खास महत्व है! गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का भाषण में देश के युवाओं का आक्रोश, युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म, बेरोजगारी की चिंता और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का सन्देश काबिले तारीफ कहा जायेगा!…उसके बाद शुबह की ठंढ में रायसीना हिल से राजपथ की सरगर्मी और विभिन्न झांकियां!… मन को मोह रहे थे. इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि भूटान नरेश के सपत्नीक उपस्थिति, हमारे सैन्य बल का प्रदर्शन, और देश भर के विभिन्न राज्यों और विभागों की झलकियाँ …. यानी पूरा भारत, एक जगह दिल्ली के राजपथ पर उपश्थित हो गया. विभिन्न सेना दल की टुकड़ी का परेड, हर राज्यों, प्रदेशों की संस्कृति की झलक क्या यह नहीं बतलाते कि भारत में विविधता में भी एकता है, सामंजस्य है…. हम आगे बढ़ रहे हैं, पर अपनी संस्कृति को साथ लेकर! ….अभी सतत प्रयास जारी है, रुकना नहीं है, आगे बढ़ते जाना है. ईमानदारी और कठिन परिश्रम के साथ….
अंत में नितीश कुमार द्वारा बंटती हुई जिलेबी देख कर मेरे मुंह में भी पानी आ गया … काश हम अभी भी बच्चे होते! …अगर हम अभी बच्चे नहीं हैं, तो क्या हुआ? हमारे और हमारे पड़ोसी के तो बच्चे हैं…… बाबु, जरा सुनो तो … जाओ कुछ जिलेबियां और समोसे लेकर आओ! आज गणतंत्र दिवस है!
अब आता हूँ गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर! स्वतंत्रता दिवस के दिन प्रधान मंत्री के भाषण का अब कोई महत्व नहीं रहा. क्योंकि वे वही बोलते हैं, जो कर नहीं सकते, तो लालकिला से लाल सपने दिखाने का क्या मतलब??? यह भाषण अब ‘उबाऊ’ लगने लगा है!पर २६ जनवरी यानी गणतंत्र दिवस के दिन का आज भी अपना खास महत्व है! गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर वर्तमान राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का भाषण में देश के युवाओं का आक्रोश, युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म, बेरोजगारी की चिंता और नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना का सन्देश काबिले तारीफ कहा जायेगा!…उसके बाद शुबह की ठंढ में रायसीना हिल से राजपथ की सरगर्मी और विभिन्न झांकियां!… मन को मोह रहे थे. इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि भूटान नरेश के सपत्नीक उपस्थिति, हमारे सैन्य बल का प्रदर्शन, और देश भर के विभिन्न राज्यों और विभागों की झलकियाँ …. यानी पूरा भारत, एक जगह दिल्ली के राजपथ पर उपश्थित हो गया. विभिन्न सेना दल की टुकड़ी का परेड, हर राज्यों, प्रदेशों की संस्कृति की झलक क्या यह नहीं बतलाते कि भारत में विविधता में भी एकता है, सामंजस्य है…. हम आगे बढ़ रहे हैं, पर अपनी संस्कृति को साथ लेकर! ….अभी सतत प्रयास जारी है, रुकना नहीं है, आगे बढ़ते जाना है. ईमानदारी और कठिन परिश्रम के साथ….
अंत में नितीश कुमार द्वारा बंटती हुई जिलेबी देख कर मेरे मुंह में भी पानी आ गया … काश हम अभी भी बच्चे होते! …अगर हम अभी बच्चे नहीं हैं, तो क्या हुआ? हमारे और हमारे पड़ोसी के तो बच्चे हैं…… बाबु, जरा सुनो तो … जाओ कुछ जिलेबियां और समोसे लेकर आओ! आज गणतंत्र दिवस है!
Monday, 21 January 2013
हाय राम क्रिकेट का है जमाना!
शाम को टहलते हुए मैंने देखा की शर्मा जी अपने बच्चे के साथ किकेट खेल रहे हैं! मैंने चुटकी ली – “लगता है धोनी के रिटायर होने से पहले आप दूसरा धोनी तैयार कर लेंगे, क्या शर्मा जी?”
शर्मा जी मुस्कुराते हुए बॉल को हाथ में लेकर यूं ही घुमाने लगे.-” बिलकुल सही समझा है आपने! मैंने अपने बेटे का नाम इंग्लिश मीडियम में लिखा दिया है. वहां यह अंगरेजी बोलना सीख जायेगा और क्रिकेट में पारंगत हो जाय, बस और मुझे कुछ नहीं चाहिए!”
मैंने पूछा – “अचानक ऐसा परिवर्तन आपमें कैसे आ गया? हममे से ज्यादातर लोग तो अपने बेटे को डाक्टर, इंजिनियर या वकील बनाना चाहते है … आप तो ‘लीक’ से हटकर सोचने लगे!”
शर्मा जी चहकते हुए बोले- “वही तो, एक डाक्टर, इंजिनियर या वकील कितना कमा लेगा, जितना भी कमाएगा महीने के अंत में सब्जी के लिए अपनी पत्नी से ही पैसे मांगेगा. बेटी की शादी में दहेज़ के लिए कर्ज लेगा. सामाजिक प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए भी कर्ज लेगा. पर एक क्रिकेटर कितना कमा लेता है, इसका अंदाजा है आपको?… पैसे की बात छोड़िये … उसकी कितनी इज्जत है, समाज में और देश में. वह जीत कर आए तो जश्न! हार कर आने पर भी नयी रणनीति बनाने की सलाह हर आदमी देता है, जिसने क्रिकेट का नाम भर सुना है.”
“अभी रांची में अन्तर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच हुआ. हमारी धोनी की सेना ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये. ऐसी मजबूत जीत की हमारा ‘टीम इण्डिया’ अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय क्रिकेट के पहली पांवदान पर पहुँच गया. वह भी कब जब झारखण्ड यानी रांची में कोई सरकार नहीं है … राष्ट्रपति शासन लागू है!…. रांची के चारो तरफ ‘लैंड माइन’ बिछे हुए हैं. उससे निपटने के लिए हमारी पुलिस ढाल बनी हुई है. उसके बाद आम आदमी भी … क्या मजाल जो किसी खिलाड़ी का कोई बाल भी बांका कर सके. यही नक्सली किसी भी पैसे वाले से लेवी मंगाते हैं. पर आपने कभी सुना धोनी या किसी क्रिकेट प्लेयर से लेवी मांगी गयी हो. दरअसल वे भी क्रिकेट प्रेमी हैं, जंगल में अपने लैपटॉप पर मैच देखते हैं.”
“पिछले सप्ताह रांची या झाड़खंड की कहें तो कानून ब्यवस्था भी बिलकुल सही रही. कही कोई बलात्कार या लूट-पाट की घटनाएँ नहीं हुई. इलाहाबाद के कुम्भ में आए विदेशी शैलानी भी दो दिन के लिए रांची में आ धमके.सभी होटल हाउस फुल! कांग्रेस का ‘चिंतन शिविर’ भी मैच के दिन तक फीका ही रहा. जब हम मैच जीत गए, उसके बाद ही राहुल बाबा का सम्मोहक भाषण हुआ. मेरा मानना है कि यह क्रिकेट मैच हर दिन कहीं न कहीं होना चाहिए ! मीडिया भी क्रिकेट की ही ख़बरें दिखायेगा. बलात्कार, महंगाई जैसे विषयों को किनारे खड़ा कर देगा. आपने भी सुना होगा कि रांची के स्टेडियम में ४० रुपये लीटर पानी और ५० रुपये के समोसे खाने में किसी को भी कष्ट नहीं हुआ … सोचिये कितने लोगों की आमदनी अचानक बढ़ गयी. डॉ. मनमोहन सिंह को इस खेल में भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देना चाहिए. हमारा आर्थिक विकास दर क्रिकेट की बदौलत ही आगे बढ़ सकता है.
एक चीज और जो आज राहुल बाबा ने सबको कही. क्रिकेट (कांग्रेस) का डी एन ए हिन्दुस्तान है. एक इसी के नाम पर पूरा देश एक रहता है. न कोई जाति, न कोई धर्म, नहीं आतंकवाद, जिसे देखो अपने माथे पर, गाल पर, पेट पर, सायकिल पर, मोटर सायकिल पर, कार पर, ट्रक पर, बाल पर, बैट पर तिरंगा बनाये नजर आयेगा. इतना राष्ट्रीय भाव तो हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के साथ लड़ाई में भी नहीं होता . अब तो मुझे लगने लगा है कि अगर १६ दिसंबर को भी अगर दिल्ली में मैच हुआ होता, तो शायद वे युवा प्रेमी युगल फिल्म के बजाय मैच ही देखने जाते और वह अनहोनी न होती जिससे आज तक हम सभी शर्मशार है. इसलिए क्रिकेट परमो धर्म है, क्रिकेट से ही वसुधैव कुटुम्बकम, क्रिकेट से राष्ट्रीयता, संस्कार आदि सभी में निरंतर सुधार होते रहेंगे! अब चलिए मोहाली वहां का नजारा देखेंगे. वैसे मोहाली या रांची को विश्व में कोई नहीं जानता, पर क्रिकेट के साथ प्रेम रखने वाले इन दोनों जगहों को भी अच्छी तरह जानने लगे हैं.”
मुझे शर्मा जी के ‘क्रिकेट दर्शन’ पर आश्चर्य हो रहा था … तब तक चाय का प्याला और स्नैक्स की प्लेट भी खाली हो गयी थी, जिसे शर्मा जी की मिसेज ने हम दोनों के बीच रख दिया था. शर्मा जी का बेटा अपने होम वर्क में कठिनाई महसूस करते हुए पास में आकर खड़ा हो गया था और तब मैंने प्रफ़्फ़ुल्लित मन से शर्मा जी से विदा ले ली! मेरे मन में एक फ़िल्मी धुन के तर्ज पर गाना याद आने लगा था – “मैं भी हुआ क्रिकेट का दीवाना, हाय राम क्रिकेट का जमाना!”
शर्मा जी मुस्कुराते हुए बॉल को हाथ में लेकर यूं ही घुमाने लगे.-” बिलकुल सही समझा है आपने! मैंने अपने बेटे का नाम इंग्लिश मीडियम में लिखा दिया है. वहां यह अंगरेजी बोलना सीख जायेगा और क्रिकेट में पारंगत हो जाय, बस और मुझे कुछ नहीं चाहिए!”
मैंने पूछा – “अचानक ऐसा परिवर्तन आपमें कैसे आ गया? हममे से ज्यादातर लोग तो अपने बेटे को डाक्टर, इंजिनियर या वकील बनाना चाहते है … आप तो ‘लीक’ से हटकर सोचने लगे!”
शर्मा जी चहकते हुए बोले- “वही तो, एक डाक्टर, इंजिनियर या वकील कितना कमा लेगा, जितना भी कमाएगा महीने के अंत में सब्जी के लिए अपनी पत्नी से ही पैसे मांगेगा. बेटी की शादी में दहेज़ के लिए कर्ज लेगा. सामाजिक प्रतिष्ठा बचाए रखने के लिए भी कर्ज लेगा. पर एक क्रिकेटर कितना कमा लेता है, इसका अंदाजा है आपको?… पैसे की बात छोड़िये … उसकी कितनी इज्जत है, समाज में और देश में. वह जीत कर आए तो जश्न! हार कर आने पर भी नयी रणनीति बनाने की सलाह हर आदमी देता है, जिसने क्रिकेट का नाम भर सुना है.”
“अभी रांची में अन्तर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच हुआ. हमारी धोनी की सेना ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये. ऐसी मजबूत जीत की हमारा ‘टीम इण्डिया’ अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय क्रिकेट के पहली पांवदान पर पहुँच गया. वह भी कब जब झारखण्ड यानी रांची में कोई सरकार नहीं है … राष्ट्रपति शासन लागू है!…. रांची के चारो तरफ ‘लैंड माइन’ बिछे हुए हैं. उससे निपटने के लिए हमारी पुलिस ढाल बनी हुई है. उसके बाद आम आदमी भी … क्या मजाल जो किसी खिलाड़ी का कोई बाल भी बांका कर सके. यही नक्सली किसी भी पैसे वाले से लेवी मंगाते हैं. पर आपने कभी सुना धोनी या किसी क्रिकेट प्लेयर से लेवी मांगी गयी हो. दरअसल वे भी क्रिकेट प्रेमी हैं, जंगल में अपने लैपटॉप पर मैच देखते हैं.”
“पिछले सप्ताह रांची या झाड़खंड की कहें तो कानून ब्यवस्था भी बिलकुल सही रही. कही कोई बलात्कार या लूट-पाट की घटनाएँ नहीं हुई. इलाहाबाद के कुम्भ में आए विदेशी शैलानी भी दो दिन के लिए रांची में आ धमके.सभी होटल हाउस फुल! कांग्रेस का ‘चिंतन शिविर’ भी मैच के दिन तक फीका ही रहा. जब हम मैच जीत गए, उसके बाद ही राहुल बाबा का सम्मोहक भाषण हुआ. मेरा मानना है कि यह क्रिकेट मैच हर दिन कहीं न कहीं होना चाहिए ! मीडिया भी क्रिकेट की ही ख़बरें दिखायेगा. बलात्कार, महंगाई जैसे विषयों को किनारे खड़ा कर देगा. आपने भी सुना होगा कि रांची के स्टेडियम में ४० रुपये लीटर पानी और ५० रुपये के समोसे खाने में किसी को भी कष्ट नहीं हुआ … सोचिये कितने लोगों की आमदनी अचानक बढ़ गयी. डॉ. मनमोहन सिंह को इस खेल में भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को बढ़ावा देना चाहिए. हमारा आर्थिक विकास दर क्रिकेट की बदौलत ही आगे बढ़ सकता है.
एक चीज और जो आज राहुल बाबा ने सबको कही. क्रिकेट (कांग्रेस) का डी एन ए हिन्दुस्तान है. एक इसी के नाम पर पूरा देश एक रहता है. न कोई जाति, न कोई धर्म, नहीं आतंकवाद, जिसे देखो अपने माथे पर, गाल पर, पेट पर, सायकिल पर, मोटर सायकिल पर, कार पर, ट्रक पर, बाल पर, बैट पर तिरंगा बनाये नजर आयेगा. इतना राष्ट्रीय भाव तो हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के साथ लड़ाई में भी नहीं होता . अब तो मुझे लगने लगा है कि अगर १६ दिसंबर को भी अगर दिल्ली में मैच हुआ होता, तो शायद वे युवा प्रेमी युगल फिल्म के बजाय मैच ही देखने जाते और वह अनहोनी न होती जिससे आज तक हम सभी शर्मशार है. इसलिए क्रिकेट परमो धर्म है, क्रिकेट से ही वसुधैव कुटुम्बकम, क्रिकेट से राष्ट्रीयता, संस्कार आदि सभी में निरंतर सुधार होते रहेंगे! अब चलिए मोहाली वहां का नजारा देखेंगे. वैसे मोहाली या रांची को विश्व में कोई नहीं जानता, पर क्रिकेट के साथ प्रेम रखने वाले इन दोनों जगहों को भी अच्छी तरह जानने लगे हैं.”
मुझे शर्मा जी के ‘क्रिकेट दर्शन’ पर आश्चर्य हो रहा था … तब तक चाय का प्याला और स्नैक्स की प्लेट भी खाली हो गयी थी, जिसे शर्मा जी की मिसेज ने हम दोनों के बीच रख दिया था. शर्मा जी का बेटा अपने होम वर्क में कठिनाई महसूस करते हुए पास में आकर खड़ा हो गया था और तब मैंने प्रफ़्फ़ुल्लित मन से शर्मा जी से विदा ले ली! मेरे मन में एक फ़िल्मी धुन के तर्ज पर गाना याद आने लगा था – “मैं भी हुआ क्रिकेट का दीवाना, हाय राम क्रिकेट का जमाना!”
Sunday, 13 January 2013
नारी शक्ति, जाग जाओ!
एक आह्वान! बहनों और बेटियों के नाम!
घोर चिंता का विषय, दुष्कर्म बनता जा रहा!
बात गैरों की नहीं, अपनों का डर सता रहा!
भारत-इण्डिया, लक्ष्मण-रेखा, नारियों के ही लिए !
समाधान, इन्साफ हो, चिंता भी इसकी कीजिये!
अमन व कानून के, रक्षक ही अब भक्षक बने!
ट्रेन से फेंका युवती को, आप यूं चलते बने!
इस धरा की नारियां, अब शस्त्र लेकर हाथ में,
जुल्म की वे दें सजा, ‘रूपम’ बने खुद आप में!मोमबत्ती, भीड़ से अब हो नहीं सकता भला.
काट दो उस हाथ को, नारी नहीं है अबला!
घोर चिंता का विषय, दुष्कर्म बनता जा रहा!
बात गैरों की नहीं, अपनों का डर सता रहा!
भारत-इण्डिया, लक्ष्मण-रेखा, नारियों के ही लिए !
समाधान, इन्साफ हो, चिंता भी इसकी कीजिये!
अमन व कानून के, रक्षक ही अब भक्षक बने!
ट्रेन से फेंका युवती को, आप यूं चलते बने!
इस धरा की नारियां, अब शस्त्र लेकर हाथ में,
जुल्म की वे दें सजा, ‘रूपम’ बने खुद आप में!मोमबत्ती, भीड़ से अब हो नहीं सकता भला.
काट दो उस हाथ को, नारी नहीं है अबला!
*****
“छीनता हो स्वत्व कोई, और तू त्याग तप से काम ले यह पाप है
पुण्य है विछिन्न कर देना उसे बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है”
पुण्य है विछिन्न कर देना उसे बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है”
*****
'दिनकर' की ऐसी पक्तियां आज भी उपयुक्त है
शक्ति की देवी है तू, दे दंड गर तू भुक्त है
घर से बाहर तू निकल, शालीनता को साथ ले.
अनाचारी गर मिले, तो झट उसी का माथ ले.
काली, दुर्गा, लक्ष्मी बाई, सब तेरे ही रूप हैं
घर से बाहर आ निकल, ये जग नहीं कोई कूप है
लोक लज्जा क्या भला बस बेटियां सहती रहे.
और अपराधी दुराचारी सुवन घर में रहे!
हो नहीं सकता भला इस दानवी संसार में,
छोड़ ये मोमबत्तियां कटार लो अब हाथ में!
अम्ल की लो बोतलें, डालो रिपु के अंग पर!
पावडर मिर्ची की झोंको, नयन में उसे अंध कर!
आत्म रक्षा आप कर लो, रोकता अब कौन है?
कुछ नहीं बिगड़ेगा तेरा, क़ानून खुद मौन है!
कुछ नहीं बिगड़ेगा तेरा, क़ानून खुद मौन है!
शक्ति की देवी है तू, दे दंड गर तू भुक्त है
घर से बाहर तू निकल, शालीनता को साथ ले.
अनाचारी गर मिले, तो झट उसी का माथ ले.
काली, दुर्गा, लक्ष्मी बाई, सब तेरे ही रूप हैं
घर से बाहर आ निकल, ये जग नहीं कोई कूप है
लोक लज्जा क्या भला बस बेटियां सहती रहे.
और अपराधी दुराचारी सुवन घर में रहे!
हो नहीं सकता भला इस दानवी संसार में,
छोड़ ये मोमबत्तियां कटार लो अब हाथ में!
अम्ल की लो बोतलें, डालो रिपु के अंग पर!
पावडर मिर्ची की झोंको, नयन में उसे अंध कर!
आत्म रक्षा आप कर लो, रोकता अब कौन है?
कुछ नहीं बिगड़ेगा तेरा, क़ानून खुद मौन है!
कुछ नहीं बिगड़ेगा तेरा, क़ानून खुद मौन है!
Sunday, 6 January 2013
राजनीति है क्या भला!…भाग -३ (मनमोहन का मन)
प्रधान मंत्री आज बहुत बेचैन हैं! उनके सामने बीते दिनों की याद चलचित्र की भांति घूम रही है…
महंगाई, भ्रष्टाचार, लूट, खसोट, हंगामा, अन्ना, रामदेव और केजरीवाल का ड्रामा…. पक्ष-विपक्ष एक दूसरे पर आरोप…. संसद ठप्प, भारत बंद, पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में बृद्धि, और महंगाई!!! और उसके बाद आई, एफ डी आई… किसानो को ज्यादा फायदा. उपभोक्ता को सस्ते में सामान, और क्या चाहिए आपको श्रीमान!…ओ हो प्रोमोसन में आरक्षण!… वह भी दे देंगे महिला आरक्षण दिया है, तो यह भी दे देंगे!….. पर कुछ लोग हैं कि मानते नहीं, बेवजह मुद्दे को देते हैं हवा…. जैसे सत्ता इन लोगों की है रखैल…. अरे भाई तुम लोग हो आम आदमी….. भूखे रहोगे तभी काम करोगे. अभाव में रहोगे तो और ज्यादा काम करोगे! इसी लिए तो विद्वानों ने कहा है आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है…. आपलोग बेवजह शोर मचाते हैं…… कभी चीनी का दाम बढ़ने पर चिल्लाते हैं और ज्यादा चीनी खाकर मधुमेह को बढ़ावा देते हैं … पेट्रोल का दाम बढ़ने पर भी सडकों पर गाड़ियों का चलना कम नहीं हुआ ..अब तो लोग पान खाने के लिए भी गाड़ियों से निकलते हैं….. पैदल चलने के लिए गाड़ियों से जाते हैं… जिम जाने के लिए भी गाड़ियाँ और वह जाकर चलाएंगे सायकिल, जो कभी आगे नहीं बढ़ती.
बड़ा गड़बड़ है, संसद चले तो हंगामा… जब बंद है तो पब्लिक कहती है- नया कानून बनाओ. छुट्टी का समय है तो कहती हैं- संसद का विशेष सत्र बुलाओ. विशेष सत्र बुलाकर क्या फायदा? वहां भी तो हंगामा ही करेंगे. किसी को बोलने नहीं देंगे…. अध्यक्ष और सभापति की भी बात नहीं मानेंगे. चलो जो होता है, ठीक ही होता है. इसीलिये तो मैंने पूछ लिया था ‘ठीक है’? उस पर भी व्यंग्य! … क्या करें हम….. चलो इसी हंगामे के बीच पेट्रोल, डीजल आदि के दाम बढ़ाने का फैसला ले लेते हैं. जनता का ध्यान बंट जाएगा. अभी सी. एन. जी. का दाम बढ़ाया है, कोई शोर शराबा नहीं हुआ…
पर, उन युवाओं का क्या करें जो जंतर मंतर से हटने का नाम ही नहीं ले रहा .. इतनी ठंढ में भी डंटे हैं …वो तो अच्छा है…. विरोधी पार्टी और और आम पार्टी भी दूर से ही तमाशा देख रहा है. हमने तो कह दिया भाई नया साल नहीं मनाएंगे मुझे देख विपक्षी दलों ने भी घोषणा कर दिया .. नया साल नहीं मनाने का, मायावती, सुषमा जी महिला हैं, इसलिए महिला के दर्द को समझती है, पर मुलायम भाई को हम क्या कहें! ….उनका प्रदेश है उनकी मर्जी! अब ममता के चेलों को क्या हो गया ?…. छोडो वो तो अब मेरे साथ नहीं है.
चिदंबरम जी, वो ‘डायरेक्ट कैश ट्रान्सफर’ वाला स्कीम का क्या हुआ?… घोषणा हो गयी है न?… मोदी को भी समझाना पड़ेगा. बहुत बोलता है. अब न्यायालय की चपत लगी है लोकायुक्त मामले में … बचाले अपने आप को! जयशंकर प्रसाद ने ठीक ही लिखा था “अरुण यह मधुमय देश हमारा, जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा”… मैंने भी तो शरण दिया है- बंगला देशियों को, नेपालियों को तिब्बतियों को,…कुछ आतंकवादियों को भी और अब नक्सली भी आतंकवादियों की तरह तैयार हो गए है, उन्हें आयातित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी ..बीच बीच में उनका खर्चा-पानी हथियार आदि मिलते रहना चाहिए! सब ठीक हो जायेगा ..शशि थरूर ने एक काम आसान कर दिया… अब पीडिता के नाम से स्मारक बनवाकर, उसके नाम से कानून बनवाकर, भीड़ को शांत किया जा सकता है… बाद में कुछ पुरस्कार वगैरह भी चालू कर देंगे …बलात्कार पीड़ितों के लिए …
बरसों पहले जब विनोद दुआ ने टी वी पर मुझसे सवाल किया था — “एक अर्थशास्त्री को राजनीति का कितना ज्ञान है?” .. मैंने उससे कहा था – “सीख रहा हूँ …और आज देखो सीख गया हूँ!”….. राजा, कलमाडी और कनिमोझी को तो जेल भिजवाया था. अब वो जमानत पर छूट जाते हैं तो हम क्या करें!…. कानून अपना काम काम करेगा और कर रहा है. इस दुष्कर्म वाले मामले भी कर रहा है …हम क्यों उसमे टांग अड़ाने जाएँ! …पर वो बहादुर नौजवान!… पीड़िता का मित्र! सचमुच बहादुर है! उसे भी सम्मानित करना चाहिए…. इसके लिए मैडम से पूछ ही लेते हैं!
(पूरा आलेख काल्पनिक है और यह लेखक के मनोभाव पर आधारित है.)
महंगाई, भ्रष्टाचार, लूट, खसोट, हंगामा, अन्ना, रामदेव और केजरीवाल का ड्रामा…. पक्ष-विपक्ष एक दूसरे पर आरोप…. संसद ठप्प, भारत बंद, पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में बृद्धि, और महंगाई!!! और उसके बाद आई, एफ डी आई… किसानो को ज्यादा फायदा. उपभोक्ता को सस्ते में सामान, और क्या चाहिए आपको श्रीमान!…ओ हो प्रोमोसन में आरक्षण!… वह भी दे देंगे महिला आरक्षण दिया है, तो यह भी दे देंगे!….. पर कुछ लोग हैं कि मानते नहीं, बेवजह मुद्दे को देते हैं हवा…. जैसे सत्ता इन लोगों की है रखैल…. अरे भाई तुम लोग हो आम आदमी….. भूखे रहोगे तभी काम करोगे. अभाव में रहोगे तो और ज्यादा काम करोगे! इसी लिए तो विद्वानों ने कहा है आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है…. आपलोग बेवजह शोर मचाते हैं…… कभी चीनी का दाम बढ़ने पर चिल्लाते हैं और ज्यादा चीनी खाकर मधुमेह को बढ़ावा देते हैं … पेट्रोल का दाम बढ़ने पर भी सडकों पर गाड़ियों का चलना कम नहीं हुआ ..अब तो लोग पान खाने के लिए भी गाड़ियों से निकलते हैं….. पैदल चलने के लिए गाड़ियों से जाते हैं… जिम जाने के लिए भी गाड़ियाँ और वह जाकर चलाएंगे सायकिल, जो कभी आगे नहीं बढ़ती.
बड़ा गड़बड़ है, संसद चले तो हंगामा… जब बंद है तो पब्लिक कहती है- नया कानून बनाओ. छुट्टी का समय है तो कहती हैं- संसद का विशेष सत्र बुलाओ. विशेष सत्र बुलाकर क्या फायदा? वहां भी तो हंगामा ही करेंगे. किसी को बोलने नहीं देंगे…. अध्यक्ष और सभापति की भी बात नहीं मानेंगे. चलो जो होता है, ठीक ही होता है. इसीलिये तो मैंने पूछ लिया था ‘ठीक है’? उस पर भी व्यंग्य! … क्या करें हम….. चलो इसी हंगामे के बीच पेट्रोल, डीजल आदि के दाम बढ़ाने का फैसला ले लेते हैं. जनता का ध्यान बंट जाएगा. अभी सी. एन. जी. का दाम बढ़ाया है, कोई शोर शराबा नहीं हुआ…
पर, उन युवाओं का क्या करें जो जंतर मंतर से हटने का नाम ही नहीं ले रहा .. इतनी ठंढ में भी डंटे हैं …वो तो अच्छा है…. विरोधी पार्टी और और आम पार्टी भी दूर से ही तमाशा देख रहा है. हमने तो कह दिया भाई नया साल नहीं मनाएंगे मुझे देख विपक्षी दलों ने भी घोषणा कर दिया .. नया साल नहीं मनाने का, मायावती, सुषमा जी महिला हैं, इसलिए महिला के दर्द को समझती है, पर मुलायम भाई को हम क्या कहें! ….उनका प्रदेश है उनकी मर्जी! अब ममता के चेलों को क्या हो गया ?…. छोडो वो तो अब मेरे साथ नहीं है.
चिदंबरम जी, वो ‘डायरेक्ट कैश ट्रान्सफर’ वाला स्कीम का क्या हुआ?… घोषणा हो गयी है न?… मोदी को भी समझाना पड़ेगा. बहुत बोलता है. अब न्यायालय की चपत लगी है लोकायुक्त मामले में … बचाले अपने आप को! जयशंकर प्रसाद ने ठीक ही लिखा था “अरुण यह मधुमय देश हमारा, जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा”… मैंने भी तो शरण दिया है- बंगला देशियों को, नेपालियों को तिब्बतियों को,…कुछ आतंकवादियों को भी और अब नक्सली भी आतंकवादियों की तरह तैयार हो गए है, उन्हें आयातित करने की जरूरत नहीं पड़ेगी ..बीच बीच में उनका खर्चा-पानी हथियार आदि मिलते रहना चाहिए! सब ठीक हो जायेगा ..शशि थरूर ने एक काम आसान कर दिया… अब पीडिता के नाम से स्मारक बनवाकर, उसके नाम से कानून बनवाकर, भीड़ को शांत किया जा सकता है… बाद में कुछ पुरस्कार वगैरह भी चालू कर देंगे …बलात्कार पीड़ितों के लिए …
बरसों पहले जब विनोद दुआ ने टी वी पर मुझसे सवाल किया था — “एक अर्थशास्त्री को राजनीति का कितना ज्ञान है?” .. मैंने उससे कहा था – “सीख रहा हूँ …और आज देखो सीख गया हूँ!”….. राजा, कलमाडी और कनिमोझी को तो जेल भिजवाया था. अब वो जमानत पर छूट जाते हैं तो हम क्या करें!…. कानून अपना काम काम करेगा और कर रहा है. इस दुष्कर्म वाले मामले भी कर रहा है …हम क्यों उसमे टांग अड़ाने जाएँ! …पर वो बहादुर नौजवान!… पीड़िता का मित्र! सचमुच बहादुर है! उसे भी सम्मानित करना चाहिए…. इसके लिए मैडम से पूछ ही लेते हैं!
(पूरा आलेख काल्पनिक है और यह लेखक के मनोभाव पर आधारित है.)
Tuesday, 25 December 2012
सेवामुक्त सरकार बाबु…
सरकार बाबु को सेवामुक्त हुए लगभग ६ साल हो गए हैं. उनका लड़का राज भी कंपनी में ही कार्यरत है. इसलिए कंपनी का क्वार्टर छोड़ना नहीं पड़ा. यही क्वार्टर राज के नाम से कर दिया गया. पहले पुत्र और पुत्रवधू साथ ही रहते थे. एक पोता भी हुआ था. उसके ‘अन्नप्रासन संस्कार’ (मुंह जूठी) में काफी लोग आए थे. अच्छा जश्न हुआ था. मैं भी आमंत्रित था….. बंगाली परिवार मेहमानों की अच्छी आवभगत करते हैं. खिलाते समय बड़े प्यार से खिलाते हैं. सिंह बाबू, दु टा रसोगुल्ला औरो नीन! मिष्टी दोही खान!(दो रसगुल्ला और लीजिये, मिष्टी दही खाइए)… अंत में सूखे मेवे के साथ सौंफ, पान आदि अवश्य देंगे! सिगरेट बीड़ी आदि भी रक्खेंगे … क्या है कि हर तरह के लोग आते हैं न!
‘पोता’ बहुत ही प्यारा है! सरकार बाबु उसी को गोद में लिए टहलते रहते हैं. कभी बैठकर उसके साथ खेलते हैं, बोतल से दूध भी पिलाते हैं,चेहरे पर क्रीम या आधुनिक तेल भी लगा देते हैं. पोते के हाथ पैर की भी मालिश कर देते हैं … हँसते हैं … कहते हैं बड़ा होकर मेरा पैर दबाएगा न! बच्चा मुस्कुराता है! सरकार बाबु बच्चे की भाषा समझते हैं… अपने आप से कहते हैं … क्यों नहीं दबाएगा? आशीर्वाद और टाफी भी तो पायेगा!…. ये सब बीते दिनों की बाते हैं! बच्चा जब रोता है, पुत्रवधू(वंदना) से चुप नहीं होता … वह फिर सरकार बाबु के ही बांहों में आ जायेगा. सरकार बाबु दूध की बोतल से उसे दूध भी पिलायेंगे. बच्चा हंसेगा… दादा की थकान को दूर करेगा! सरकार बाबु की मिसेज भी बच्चे के साथ खेलती है … किचेन में बहु की मदद भी कर देती है … वो क्या है कि बहु को स्कूल जाना होता है और समय पर पहुंचना होता है! पहले समय बिताने के लिए स्कूल ज्वाइन की थी. अब जरूरत बन गयी है. आखिर महंगाई के दौर में एक हाथ से कमाने से काम नहीं चलता न! … बच्चे को अच्छे स्कूल में दाखिला कराना होगा…. फिर और भी तरह तरह के खर्चे…. बाबूजी और माँजी का भी ख्याल रखना पड़ता है …..फिर एक फ्लैट भी तो चाहिए होगा … कंपनी क्वार्टर में कब तक रहेंगे! सो उन्होंने एक दो बेडरूम का एक फ्लैट बुक करा लिया है … पोजीसन मिलते ही वे लोग फ्लैट में चले जायेंगे … माँजी और बाबु जी इसी क्वार्टर में रहेंगे … उन्हें यही मन लगता है … क्या है कि काफी दिनों से सरकार बाबु इस क्वार्टर में रहते आए हैं, तो यही क्वार्टर उन्हें अपना घर लगता है. आस पास के लोगों से भी उनके मधुर सम्बन्ध है ! मिलने से पूछेंगे- “केमोन आछेन!”.. “भालो तो?” (कैसे हैं? अच्छे है तो?)
सरकार बाबू को पुराने गाने बहुत अच्छे लगते हैं … के एल सहगल का – “बाबुल मोरा, नैहर छूटोही जाय” और मन्ना डे का – “लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे!” अक्सर गुनगुनाते रहते हैं … कभी तो हारमोनियम भी बाहर ले आएंगे और हारमोनियम के साथ गायेंगे. मिसेज सरकार को सुनाते हैं और समझाते भी हैं .. इन गानों का गूढ़ अर्थ. मिसेज सरकार हंसती है … कहती है, शुरू से ही जिंदादिल आदमी हैं … फिर वो अपने पुराने दिनों में खो जाती है … कैसे वे दोनों सप्ताहांत में साथ साथ फिल्म देखने जाते थे … टिकट नहीं मिलने की स्थिति में ब्लैक में भी टिकट का जुगाड़ कर एक साथ दोनों बैठकर पिक्चर देखते थे. तभी राज का इस दुनिया में आगमन हुआ और वे दोनो दंपत्ति उसी में खो गए! पिक्चर जाना बंद … छोटे बच्चे को साथ लेकर पिक्चर जाने में परेशानी है, उसे भी पैखाना-पेशाब उसी समय लगेगा, जब कोई बढ़िया सीन चल रहा होता है! सो उन्होंने पिक्चर जाना बंद कर दिया और एक ‘ब्लैक एंड वाइट टी वी’ ले आये उसमे हर सन्डे को एक फिल्म दिखलाई जाती थी और सप्ताह में दो दिन ‘चित्रहार’ भी होता था…. धीरे धीरे राज बड़ा हुआ और उनलोगों ने उसका नाम कंपनी के ही स्कूल में लिखवा दिया. अब उसे शुबह शुबह ही तैयार कर स्कूल बस में छोड़ आते थे. बस के ड्राईवर और कंडक्टर सभी बच्चों का ख्याल रखते थे. बच्चे भी उन्हें अंकल कहकर बुलाते थे.
इस तरह राज की पढाई पूरी हुई और कंपनी में ही जॉब में लग गया. फिर वंदना के पिता एक दिन सरकार बाबु के घर आए और राज को अपनी बेटी के लिए मांग लिया …. उस समय ज्यादा कुछ नहीं चाहिए था, तीन कपड़ों और पांच गहनों में बहु और बारातियों का स्वागत ठीक तरह से होना चाहिए! वंदना के पिता ने सरकार बाबु की चाह से कही ज्यादा…बहुत कुछ दिया!
जिन्दगी की गाड़ी लोकल की रफ़्तार से चल रही थी.
अचानक राज ने आकर अपने पिता सरकार बाबु से कहा – पापा, हमलोगों का फ्लैट बनकर तैयार हो गया है … हमलोग जल्दी ही वहां शिफ्ट हो जायेंगे … वो क्या है कि बंटी यहाँ आपलोगों के लाड़-प्यार में बिगड़ता जा रहा है. उसे अब कम्पटीसन की तैयारी करनी है, इसलिए उसे अब अकेले ही रहना होगा! .. आपलोग इसी क्वार्टर में रहेंगे .. आपके उपयोग का सामान छोड़ जायेंगे .. आपको यह जगह प्यारा भी लगता है! … सरकार बाबू ने तो सोचा ही नहीं था … ‘राज’ उनका ‘जिगर का टुकड़ा’… इस तरह आकर कहेगा! उन्होंने सोचा था … कहेगा … पापा, हमलोग अब नए फ्लैट में चलेंगे … हम दोनों हॉल में पड़े रहते….. बंटी को जी भरकर देखते तो सही … पर ऐसा नहीं हुआ … कुछ दिनों तक सरकार बाबु सदमे में रहे, उनका ब्लड प्रेसर भी बढ़ गया… राज और वंदना बीच बीच में आते थे. जरूरत का सामान दे जाते थे. बंटी भी साथ में आकर दादा के पैर छु लेता था और दादा उसे गले से लगा लेते थे…. बंटी अब तो तू बड़ा हो गया है अब टॉफी नहीं रसोगुल्ला खायेगा … राज की माँ, ले आना तो रसोगुल्ला,… मेरे बंटी के लिए और उसे जी भरकर रसोगुल्ला खिलाते .. बंटी कहता .. बस दादाजी, अब और नहीं वे कहते एक और खा ले मेरी तरफ से … एक तुम्हारी दादी की तरफ से! ….
‘विजय दशमी’ को सरकार बाबू के ही घर पर ‘विजया मिलन’ होता .. सभी नए पुराने लोग आते .. राज के मित्र भी आते! सभी सरकार बाबु के पैर छूते और आशीर्वाद स्वरुप कुछ न कुछ उपहार अवश्य पाते!……
************
अभी कल ही देखा, सरकार बाबु दो छोटे-छोटे बच्चों को पकड़े हुए हैं- उन्हें समझा रहे हैं .. “तुम लोग तो मेरे बंटी के समान है .. तुम लोग बदमाशी करेगा तो हम तुमको डांटेगा…. तुम्हारे पापा को बोल देगा” .. बच्चे कहते – “नहीं दादा जी, हम तो बदमाशी नहीं कर रहे थे”. सरकार बाबु कहते – “तो पत्थर कौन चला रहा था ? …. अगर किसी को लग जाता तो? …..मेरा पैर देख रहे हो? …..उन्होंने अपना पैंट थोडा ऊपर किया और रेडीमेड ‘प्रेसर बैंडेज’ को दिखाया … इस पैर में मुझे चोट लगी थी…. बंटी के साथ क्रिकेट खेलने में उसने जोर का बाल फेंका था, जो मेरे पैर में लगी थी .. तभी से पैर में दर्द है…. ठंढा में यह और बढ़ जाता है ….. तभी तो मैं धूप में बैठा रहता हूँ” … बच्चे कहने लगे- “तो डाक्टर को क्यों नहीं दिखाते?” … “अरे बेटा बहुत दिखलाया डॉ. गोली दे देता है और कहता है- आराम से रहिये!” मैं सरकार बाबु को देखता था – दूध ले जाते वक्त थोड़ा लंगड़ा कर चलते थे … अगर दूध वाले के आने में विलंब है, तो मैदान का दो चक्कर भी काट लेते थे. संकोच वश मैंने कभी उनके पैर के बारे में नहीं पुछा … आज जब उनके पास से गुजर रहा था, उन्होंने मुझे पास बुला लिया और अपने जीवन की सारी ‘राम कहानी’ मुझे सुना दी जो ऊपर वर्णित है!
मैंने पूछ लिया – “आप राज के फ्लैट में जाते हैं कि नहीं” ? … “कहाँ मैं चढ़ पाऊँगा, पांच तल्ले पर”?… मैंने पुछा – “लिफ्ट तो होगी ही” .. सरकार बाबु दूसरी तरफ देखने लगे … मैंने पुन: उनसे आग्रह किया .. उनकी आँखों में आंसू छलक आए …”सिंह बाबू, राज अगर मुझसे यह कहता कि हमलोग सभी फ्लैट में एक साथ रहेंगे .. तो मै अवश्य जाता… पर उसने तो एकांत चाहा था, बंटी के बहाने … तो मैं क्यों उन्हें डिस्टर्ब करूँ? मेरा तो वही हाल है- जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ! .. आपलोग भले लोग हैं मेरा हालचाल पूछते रहते हैं इसी तरह जिन्दगी कट जायेगी.. सिर्फ एक बात आपसे कहूँगा अगर आपके भी माँ बाप है तो उन्हें बुढ़ापे में अलग मत करियेगा! अपने साथ ही रखियेगा. हमें और क्या चाहिए दो वक्त की रोटी और दो मीठे बोल!”
आज भी सरकार बाबु वैसे ही मस्त हैं और गुनगुनाते हैं “बाबुल मोरा… आ… आ…. नैहर छूटोही जाय!”….
‘पोता’ बहुत ही प्यारा है! सरकार बाबु उसी को गोद में लिए टहलते रहते हैं. कभी बैठकर उसके साथ खेलते हैं, बोतल से दूध भी पिलाते हैं,चेहरे पर क्रीम या आधुनिक तेल भी लगा देते हैं. पोते के हाथ पैर की भी मालिश कर देते हैं … हँसते हैं … कहते हैं बड़ा होकर मेरा पैर दबाएगा न! बच्चा मुस्कुराता है! सरकार बाबु बच्चे की भाषा समझते हैं… अपने आप से कहते हैं … क्यों नहीं दबाएगा? आशीर्वाद और टाफी भी तो पायेगा!…. ये सब बीते दिनों की बाते हैं! बच्चा जब रोता है, पुत्रवधू(वंदना) से चुप नहीं होता … वह फिर सरकार बाबु के ही बांहों में आ जायेगा. सरकार बाबु दूध की बोतल से उसे दूध भी पिलायेंगे. बच्चा हंसेगा… दादा की थकान को दूर करेगा! सरकार बाबु की मिसेज भी बच्चे के साथ खेलती है … किचेन में बहु की मदद भी कर देती है … वो क्या है कि बहु को स्कूल जाना होता है और समय पर पहुंचना होता है! पहले समय बिताने के लिए स्कूल ज्वाइन की थी. अब जरूरत बन गयी है. आखिर महंगाई के दौर में एक हाथ से कमाने से काम नहीं चलता न! … बच्चे को अच्छे स्कूल में दाखिला कराना होगा…. फिर और भी तरह तरह के खर्चे…. बाबूजी और माँजी का भी ख्याल रखना पड़ता है …..फिर एक फ्लैट भी तो चाहिए होगा … कंपनी क्वार्टर में कब तक रहेंगे! सो उन्होंने एक दो बेडरूम का एक फ्लैट बुक करा लिया है … पोजीसन मिलते ही वे लोग फ्लैट में चले जायेंगे … माँजी और बाबु जी इसी क्वार्टर में रहेंगे … उन्हें यही मन लगता है … क्या है कि काफी दिनों से सरकार बाबु इस क्वार्टर में रहते आए हैं, तो यही क्वार्टर उन्हें अपना घर लगता है. आस पास के लोगों से भी उनके मधुर सम्बन्ध है ! मिलने से पूछेंगे- “केमोन आछेन!”.. “भालो तो?” (कैसे हैं? अच्छे है तो?)
सरकार बाबू को पुराने गाने बहुत अच्छे लगते हैं … के एल सहगल का – “बाबुल मोरा, नैहर छूटोही जाय” और मन्ना डे का – “लागा चुनरी में दाग छुपाऊँ कैसे!” अक्सर गुनगुनाते रहते हैं … कभी तो हारमोनियम भी बाहर ले आएंगे और हारमोनियम के साथ गायेंगे. मिसेज सरकार को सुनाते हैं और समझाते भी हैं .. इन गानों का गूढ़ अर्थ. मिसेज सरकार हंसती है … कहती है, शुरू से ही जिंदादिल आदमी हैं … फिर वो अपने पुराने दिनों में खो जाती है … कैसे वे दोनों सप्ताहांत में साथ साथ फिल्म देखने जाते थे … टिकट नहीं मिलने की स्थिति में ब्लैक में भी टिकट का जुगाड़ कर एक साथ दोनों बैठकर पिक्चर देखते थे. तभी राज का इस दुनिया में आगमन हुआ और वे दोनो दंपत्ति उसी में खो गए! पिक्चर जाना बंद … छोटे बच्चे को साथ लेकर पिक्चर जाने में परेशानी है, उसे भी पैखाना-पेशाब उसी समय लगेगा, जब कोई बढ़िया सीन चल रहा होता है! सो उन्होंने पिक्चर जाना बंद कर दिया और एक ‘ब्लैक एंड वाइट टी वी’ ले आये उसमे हर सन्डे को एक फिल्म दिखलाई जाती थी और सप्ताह में दो दिन ‘चित्रहार’ भी होता था…. धीरे धीरे राज बड़ा हुआ और उनलोगों ने उसका नाम कंपनी के ही स्कूल में लिखवा दिया. अब उसे शुबह शुबह ही तैयार कर स्कूल बस में छोड़ आते थे. बस के ड्राईवर और कंडक्टर सभी बच्चों का ख्याल रखते थे. बच्चे भी उन्हें अंकल कहकर बुलाते थे.
इस तरह राज की पढाई पूरी हुई और कंपनी में ही जॉब में लग गया. फिर वंदना के पिता एक दिन सरकार बाबु के घर आए और राज को अपनी बेटी के लिए मांग लिया …. उस समय ज्यादा कुछ नहीं चाहिए था, तीन कपड़ों और पांच गहनों में बहु और बारातियों का स्वागत ठीक तरह से होना चाहिए! वंदना के पिता ने सरकार बाबु की चाह से कही ज्यादा…बहुत कुछ दिया!
जिन्दगी की गाड़ी लोकल की रफ़्तार से चल रही थी.
अचानक राज ने आकर अपने पिता सरकार बाबु से कहा – पापा, हमलोगों का फ्लैट बनकर तैयार हो गया है … हमलोग जल्दी ही वहां शिफ्ट हो जायेंगे … वो क्या है कि बंटी यहाँ आपलोगों के लाड़-प्यार में बिगड़ता जा रहा है. उसे अब कम्पटीसन की तैयारी करनी है, इसलिए उसे अब अकेले ही रहना होगा! .. आपलोग इसी क्वार्टर में रहेंगे .. आपके उपयोग का सामान छोड़ जायेंगे .. आपको यह जगह प्यारा भी लगता है! … सरकार बाबू ने तो सोचा ही नहीं था … ‘राज’ उनका ‘जिगर का टुकड़ा’… इस तरह आकर कहेगा! उन्होंने सोचा था … कहेगा … पापा, हमलोग अब नए फ्लैट में चलेंगे … हम दोनों हॉल में पड़े रहते….. बंटी को जी भरकर देखते तो सही … पर ऐसा नहीं हुआ … कुछ दिनों तक सरकार बाबु सदमे में रहे, उनका ब्लड प्रेसर भी बढ़ गया… राज और वंदना बीच बीच में आते थे. जरूरत का सामान दे जाते थे. बंटी भी साथ में आकर दादा के पैर छु लेता था और दादा उसे गले से लगा लेते थे…. बंटी अब तो तू बड़ा हो गया है अब टॉफी नहीं रसोगुल्ला खायेगा … राज की माँ, ले आना तो रसोगुल्ला,… मेरे बंटी के लिए और उसे जी भरकर रसोगुल्ला खिलाते .. बंटी कहता .. बस दादाजी, अब और नहीं वे कहते एक और खा ले मेरी तरफ से … एक तुम्हारी दादी की तरफ से! ….
‘विजय दशमी’ को सरकार बाबू के ही घर पर ‘विजया मिलन’ होता .. सभी नए पुराने लोग आते .. राज के मित्र भी आते! सभी सरकार बाबु के पैर छूते और आशीर्वाद स्वरुप कुछ न कुछ उपहार अवश्य पाते!……
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अभी कल ही देखा, सरकार बाबु दो छोटे-छोटे बच्चों को पकड़े हुए हैं- उन्हें समझा रहे हैं .. “तुम लोग तो मेरे बंटी के समान है .. तुम लोग बदमाशी करेगा तो हम तुमको डांटेगा…. तुम्हारे पापा को बोल देगा” .. बच्चे कहते – “नहीं दादा जी, हम तो बदमाशी नहीं कर रहे थे”. सरकार बाबु कहते – “तो पत्थर कौन चला रहा था ? …. अगर किसी को लग जाता तो? …..मेरा पैर देख रहे हो? …..उन्होंने अपना पैंट थोडा ऊपर किया और रेडीमेड ‘प्रेसर बैंडेज’ को दिखाया … इस पैर में मुझे चोट लगी थी…. बंटी के साथ क्रिकेट खेलने में उसने जोर का बाल फेंका था, जो मेरे पैर में लगी थी .. तभी से पैर में दर्द है…. ठंढा में यह और बढ़ जाता है ….. तभी तो मैं धूप में बैठा रहता हूँ” … बच्चे कहने लगे- “तो डाक्टर को क्यों नहीं दिखाते?” … “अरे बेटा बहुत दिखलाया डॉ. गोली दे देता है और कहता है- आराम से रहिये!” मैं सरकार बाबु को देखता था – दूध ले जाते वक्त थोड़ा लंगड़ा कर चलते थे … अगर दूध वाले के आने में विलंब है, तो मैदान का दो चक्कर भी काट लेते थे. संकोच वश मैंने कभी उनके पैर के बारे में नहीं पुछा … आज जब उनके पास से गुजर रहा था, उन्होंने मुझे पास बुला लिया और अपने जीवन की सारी ‘राम कहानी’ मुझे सुना दी जो ऊपर वर्णित है!
मैंने पूछ लिया – “आप राज के फ्लैट में जाते हैं कि नहीं” ? … “कहाँ मैं चढ़ पाऊँगा, पांच तल्ले पर”?… मैंने पुछा – “लिफ्ट तो होगी ही” .. सरकार बाबु दूसरी तरफ देखने लगे … मैंने पुन: उनसे आग्रह किया .. उनकी आँखों में आंसू छलक आए …”सिंह बाबू, राज अगर मुझसे यह कहता कि हमलोग सभी फ्लैट में एक साथ रहेंगे .. तो मै अवश्य जाता… पर उसने तो एकांत चाहा था, बंटी के बहाने … तो मैं क्यों उन्हें डिस्टर्ब करूँ? मेरा तो वही हाल है- जीना यहाँ मरना यहाँ इसके सिवा जाना कहाँ! .. आपलोग भले लोग हैं मेरा हालचाल पूछते रहते हैं इसी तरह जिन्दगी कट जायेगी.. सिर्फ एक बात आपसे कहूँगा अगर आपके भी माँ बाप है तो उन्हें बुढ़ापे में अलग मत करियेगा! अपने साथ ही रखियेगा. हमें और क्या चाहिए दो वक्त की रोटी और दो मीठे बोल!”
आज भी सरकार बाबु वैसे ही मस्त हैं और गुनगुनाते हैं “बाबुल मोरा… आ… आ…. नैहर छूटोही जाय!”….
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